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लघुकथा - आस - बबीता गुप्ता

(ऊपर का चित्र - कलाकृति - डॉ. सुरेन्द्र वर्मा)


आस

बबीता गुप्ता

‘क्या खाक खुलकर जिओ?, रामदीन ने गुस्से में अखबार को गुड़ीमुडी करके जमीन पर दे मारा.

शांतचित प्रव्रति के रामदीन का इस तरह का उत्तेजित क्रोधित व्यवहार देख पास में बैठे मेवालाल ने जाना चाहा, ‘ऐसा क्या पढ़ लिया, जो इस तरह उखड़ गए, जरा मैं भी तो पढ़ूँ.’

गुड़ीमुडी अखबार को सीधा कर रामदीन के उखड़े मूढ़ का कारण मेवालाल की आंखें खोजते हुये, गंतव्य पर गढ़ गई, जहां मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा था, ‘ढलती उम्र में जिंदगी जीने के नुस्खे.’पढ़कर मन विचलित हो गया.

नजदीक ही योगा कर रहा उनका दोस्त, गयादीन भी माजरा जानने आकर बैठ गया.

मेवालाल के चेहरे पर अंदर का दर्द उभर आया, खोया हुआ सा कहने लगा, ‘सही कहते हो यार, भरा-पूरा परिवार होते हुये भी जिंदगी काटने को दौड़ती हैं.कुछ सुनना चाहता हूँ, कुछ सुनाना चाहता हूँ, पर सब अपनी-अपनी दुनिया में खोये रहते हैं.’

अपनी ठहरी हुई जिंदगी की दुखती रग को छेड़ दिया हो, हुलस भरी सांस लेते हुये गयादीन की आँखों की कोरे नम हो गई, अपने कंधे पर पड़े गमछे से पोंछते हुये, खोये हुये से कहने लगे, ‘हाँ, दोस्त, तुम सुबह-शाम उनकी आवाज सुन संतोष की नींद तो सो लेते हो, लेकिन यहाँ तो महीनों गुजरने पर भी चेहरा क्या, सुनने को तरस जाते हैं, बस, हम पति-पत्नी एक दूसरे को ढांढस बँधाते हुये सुबह-शाम काट लेते हैं.’

दोनों की बात सुनकर, झल्लाते हुये रामदीन का गला भर्राती, दम-तोड़ती आवाज में कहा, ‘तुम दोनों का तो कोई नाम लेने वाला भी हैं, पर मैं निपट अकेला, किसकी आस में जिंदगी का बोझ ढोंऊ.’सुनकर दोनों दोस्त निःशब्द हो गए, बस, अपने हाथ, उसके कंधों पर रख दिया, जैसे, उसको अकेला ना होने की तसल्ली दे रहे हो......

बबीता गुप्ता

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