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लघु व्यंग्य - एक खुला पत्र - अमित कुमार चौबे

आर्थिक अपराधी भगोड़ों के लिए खुला पत्र

“मेरा यह पत्र आधुनिक भारत के उन आर्थिक लुटेरों के लिए है जो भारतीय बैंकों के पैसे खाकर इस देश को छोड़कर भाग गए हैं”

सम्माननीय आर्थिक पलायनकर्ताओं,

यह पत्र लिखकर मुझे बहुत हर्ष हो रहा है कि मैं यह पत्र आप लोगों के लिए लिख रहा हूँ। मैं एक आम आदमी हूँ और मैं आपसे विनती करता हूँ कि आप अपने देश वापस आ जाइये, आखिर आप लोग ये देश छोड़कर क्यों भागे क्योंकि आपने तो वह काम किया जिस पर हजारों नहीं लाखों लोगों को आप पर गर्व होना चाहिए। आपने तो उन लोगों का सिर गर्व से ऊँचा कर दिया है जो अपने पैसे निकालने के लिए सुबह से शाम तक बैंक की लाइन में लगे रहते है फिर भी उनको बिना पैसे निकाले ही घर वापस जाना पड़ता है।

मेरा आपसे कहना इतना ही है कि आप वापस आ जाइये क्योंकि जितना अनुकूल इस देश का कानून है उतना अनुकूल कानून आपको कहीं नहीं मिलेगा और मैं आप लोगों से कहना चाहता हूँ कि आप इस देश आकर चुनाव लड़ जाइये क्योंकि यहाँ पर वैसे भी कई चोर चुनाव लड़कर अपना अपराध छुपा सकते हैं। इसलिए मैं कहूँगा कि आप वापस आकर चुनाव लड़ जाइये और बैंकों की मनमानी से परेशान जनता आपको वोट जरूर करेगी। आपको बस भाषण देना होगा कि “हमने जो बैंकों के पैसे खाएँ हैं वह पैसे बैंकिंग भ्रष्टाचार के है और साथ ही घोषणा कर देना है कि हमारे चुनाव जीतने के बाद हर व्यक्ति के अकाउंट में लाखों रूपये आ जाएँगे”। इस तरह आप चुनाव जीत जाएँगें और आपका कलंक भी धुल जाएगा और न ही फिर आपको जनता के खातों मे पैसे डालने की जरुरत होगी। बल्कि आपको आजादी मिल जाएगी पैसे खाने की क्योंकि आप नेता बन चुके होगें। क्योंकि जो कानून की अनुकूल परिस्थितियाँ यहाँ के कानून में है वो शायद ही किसी देश में आपको मिले क्योंकि आप कहीं दूसरे देशों के पैसे जाएँगे तो आपको सजा हो सकती है, लेकिन यहाँ तो 20-25 साल निचली अदालत में ही आपकी पेशी चलती रहेगी और उसके बाद हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट भी तो होते हैं, और तब तक आपकी उम्र भी हो जाएँगी और अगर आप चुनाव जीतकर नेता बन गए तो फिर कहने ही क्या।

अतः मैं आपसे पुनः आग्रह करूँगा कि आप अपने वतन वापस आ जाइये और इस देश को लूटिए हमें तो संतोष है कि पहले तो विदेशी लूटते थे अब स्वदेशी लोग ही लूट रहे हैं।  मतलब हम आगे बढ़ रहे हैं, अतः हमेशा अगर आप इस देश को लूटना चाहते हैं, तो आप भारत देश में वापस आ जाइये क्योंकि बहुत सारे जरिये है इस देश को लूटने के।

आपका कुशलक्षेमी

बैंकों के चक्कर लगाने वाला एक आम आदमी

व्यंग्य 6307145028469918385

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