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साहित्य के लिए चेतना जगाताः राजकुमार जैन ’राजन’*

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साहित्य के लिए चेतना जगाताः राजकुमार जैन ’राजन’* -ओम प्रकाश ’प्रजापति कभी- कभी छोटा व्यक्ति भी कई ऐसे बड़े काम कर देता है जो बड़े-बड़े लोग अ...

साहित्य के लिए चेतना जगाताः राजकुमार जैन ’राजन’*

-ओम प्रकाश ’प्रजापति

कभी- कभी छोटा व्यक्ति भी कई ऐसे बड़े काम कर देता है जो बड़े-बड़े लोग अथवा संस्थाएं नहीं कर पातीं। इसका कारण यही है कि बड़े लोग ज्यादातर छद्म होते हैं। जो भीतर से कुछ और मगर बाहर से कुछ और नजर आते हैं। जबकि छोटा व्यक्ति जैसा भीतर होता है वैसा ही बाहर प्रदर्शित करता है। सच्चाई यह है कि ऐसा व्यक्ति सहज, सीधा, सच्चा और सरल होने के कारण प्रसिद्धि पाने और खुद को प्रचार से दूर ही रखता है। साहित्य की अनेक आयामी विधाओं के प्राणवन्त हस्ताक्षर, बाल साहित्य उन्नयन एवं बाल कल्याण के समर्पित साधक, रचनाकारों को प्रोत्साहित एवं सम्मान प्रदान करने के लिए हर साल समारोह आयोजित करने वाले कुशल आयोजक, आने वाली पीढ़ी को संस्कारों से पल्लवित करने को तत्पर लाखों रुपये की पुस्तकें निःशुल्क दान करने वाले बाल साहित्य प्रेमी! इन कार्यों में अपने जीवन का हर पल अर्पण करने हेतु सतत संकल्परत श्री राजकुमार जैन राजन ऐसे साहित्यकार हैं जिनका व्यक्तित्व एवं कृतित्व दोनों ही प्रशंसनीय है।

देश भर की पत्र-पत्रिकाओं तमाम मीडिया माध्यमों पर राजकुमार जैन ’राजन’ के बारे में लगातार पढ़ते, साहित्यिक मित्रों से इनके बारे में सुनते मेरा पत्रकार मन राजन जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व अन्वेषण हेतु सहज ही उत्सुक हो उठा। हर क्षेत्र में उनकी पहुँच, सक्रियता और गहरी पेठ होने के कारण सब उन पर अपनत्व का दावा कर सकते हैं। इनके लिए किसी शब्द विशेष का चयन निरपेक्ष और एकांगी दृष्टिकोण का ही परिचायक मानता हूँ मैं। इनके प्रति किसी की भी यह सहज धारणा बनना स्वाभाविक ही है कि 60-65 के बीच होगा यह व्यक्ति। क्योंकि लेखन इतना परिपक्व व चरम सीमा पर आरूढ़ काफी प्रयास, अंतराल और गहन अनुभव के बाद ही होता है। लगता है जन्मना ही इस क्षेत्र में निष्णात हैं वे। संयोग से सलूम्बर के एक ’बाल साहित्यकार समारोह’ में भाई राजकुमार जैन ’राजन’ से मुलाकात हो गई। थोड़े ही समय में बहुत कुछ जानने-समझने का अवसर प्राप्त हुआ। इनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व के बारे में जानकर अभिभूत हो गया। आजकल कुछ हो, चाहे न हो पर यश पाने की जो क्षुद्र भावना लोगों में घर कर गई है उससे दूर ही है यह व्यक्ति- कुछ ही नहीं, बहुत कुछ होने पर भी।

राजकुमार जैन ’राजन’ का व्यक्तित्व बहुआयामी है। ऐसे बहुत लोग हो सकते हैं, जो जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा का परिचय देते हों, परंतु ऐसे बहुत कम लोग होते हैं जो जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी दक्षता और उपलब्धियों को संतुलित कर पाते हैं। साहित्य की कई विधाओं में निरंतर इनका लेखन होता है पर इनका विशेष ध्यान ’बाल साहित्य उन्नयन एवं बाल कल्याण’ की ओर ही लगा रहता है। बाल साहित्य के प्रतिष्ठित रचनाकार की हैसियत से विभिन्न विद्यार्थियों, विद्यालयों, संस्थाओं, शोध केन्द्रों के माध्यम से बाल साहित्य की परंपरा को विकसित करने और आज के समय में इसकी महत्ता प्रतिपादित करते हुए बाल साहित्य से बच्चों को जोडने, साहित्य उन तक पहुँचाने हेतु स्वयं लाखों रुपये खर्च कर महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। आप द्वारा बाल साहित्य रचनाकारों को प्रोत्साहन/सम्मान देने के उद्देश्य से प्रतिवर्ष भव्य सम्मान समारोह आयोजित किया जाता है। तब ऐसा लगता है, मानो  ’बाल साहित्य का कुंभ’ लगा हो। यही नहीं आपने कई प्रतिष्ठित लेखकों  के साथ नवोदित लेखकों की बाल साहित्य की पुस्तकें भी स्वयं के आर्थिक सहयोग से प्रकाशित करवाईं हैं। प्रतिष्ठित वरिष्ठ बाल साहित्यकार श्री सीताराम गुप्त एवं श्री राजनारायण चौधरी की प्रथम पुस्तक प्रकाशन का श्रेय भी राजन जी को ही जाता है।

बाल साहित्य के विकास हेतु आयोजित सम्मेलनों में राजकुमार जी अक्सर दलील के साथ बात करते हैं और बाल साहित्य के महत्व पर बल देते हुए इस वास्तविकता की ओर स्पष्ट संकेत करते हैं कि, ’जिस कौम या राष्ट्र ने अपनी नई पीढ़ी की तरफ ध्यान नहीं दिया, समझो उसका भविष्य ज्यादा शानदार नहीं है।’ आज आवश्यकता इस बात की है कि बचपन से ही बच्चों को किताबों से जोडने के लिए अभिप्रेरित किया जाए। ताकि समाज व संस्कृति के निर्माण में बालक अपने विचारों से सुशिक्षित, सुदृढ़, समृद्ध और सुसंस्कारित हो सके।

यह भी कम आश्चर्यजनक नहीं है कि राजकुमार जैन ’राजन’ ने अपनी जन्म भूमि को ही कर्म भूमि बना दिया है। राजस्थान के चित्तौडगढ़ जिले का एक छोटा- सा गांव है- आकोला। जहां न  तो कोई साहित्यिक वातावरण है, न प्रेरणा, न प्रोत्साहन और न ही सहयोग। आकोला जैसे छोटे-से गांव में ऐसी चेतना पाना बहुत बड़ी बात है। अपने माता-पिता के आशीर्वाद और उनके दिये संस्कार ने मेरे इस भाई को प्रेरणा दी। ऐसी छोटी जगह पर एक अकेले व्यक्ति ने अपने दम पर सृजन, संपादन, प्रकाशन, वितरण, समारोह आयोजन सहित समाज सेवा के कई कार्य किए और वर्षों से निरंतर कर रहे हैं। लाखों-करोड़ों रुपये खर्च कर महानगरों की संस्थाएं एवं सरकारी अकादमियां भी जो कार्य नहीं कर पातीं, राजन जी आकोला जैसे छोटे-से कस्बे में रह कर वो सब कर रहे हैं। इस कारण आकोला जैसा छोटा-सा गांव  विश्व स्तर पर प्रतिष्ठित हो गया।

आज कई पत्र-पत्रिकाएं राजन जी के आर्थिक सहयोग से ही पुष्पित-पल्लवित हो रही हैं। हर पत्रिका को बाल साहित्य प्रकाशित करने के लिए प्रेरित भी करते हैं। कई पत्र-पत्रिकाओं ने आपके संपादन सहयोग से ऊँचाईयां प्राप्त की है। भोपाल से प्रकाशित साहित्यिक पारिवारिक पत्रिका ’साहित्य समीर दस्तक’ ने आपके संपादन में अंतर्राष्ट्रीय बनने में सफलता अर्जित की है। संपादन ही नहीं रचनाओं के सुंदर प्रस्तुतिकरण के लिए आपने स्वयं सुंदर रेखाचित्र भी बनाए। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है- राजकुमार जैन ’राजन’ बाल साहित्य के सर्जक ही नहीं बल्कि बाल साहित्य के ध्वज वाहक एवं कुशल व्यवस्थाकार के रुप में संपूर्ण देश के साहित्य जगत में ख्याति प्राप्त कर रहे हैं। एक विशिष्ट पहचान रखने के बावजूद भी आप सदैव जमीन से जुड़े सामान्य व्यक्ति के रुप में रहना पसंद करते हैं। हँसमुख व्यक्तित्व, मिलनसारिता, सहयोग भावना, निश्चलता, सरलता, इंसानियत आदि गुणों के बल पर वे अपने स्वयं के कम, दूसरों के ज्यादा हैं। ये अपने प्रचार-प्रसार आदि से दूर ही रहते हैं।

राजकुमार जैन ’राजन’ के व्यक्तित्व एवं कृतित्व के विभिन्न आयामों के साथ ही हिन्दी भाषा और साहित्य के विकास, बाल साहित्य उन्नयन, बाल कल्याण एवं रचनाकारों को प्रोत्साहन के क्षेत्र में इनके योगदान के महत्व को भी रेखांकित किया जाना चाहिए। साहित्य की यात्रा में हम सब सहयात्री हैं, साथी हैं, समान हैं। अतः इनके कार्यों को, इनके महत्व को देश के साहित्य-समाज के सम्मुख रखना हमारा कर्तव्य है। एक उर्दू शेर के माध्यम से राजन जी के व्यक्तित्व को जोड़ने का प्रयास-

’परिंदों को मिलेगी मंजिल एक दिन, ये फैले हुए उनके पर बोलते हैं

वही लोग खामोश रहते हैं अकसर, जमाने में जिनके हुनर बोलते हैं।’


*ओम प्रकाश ’प्रजापति’*

संपादकः ’ट्रू मीडिया’ मासिक,

ई-4/323, नंद नगरी,

दिल्ली-93 (भारत)

टिप्पणियाँ

ब्लॉगर: 15
  1. राजकुमार जैन राजन जी से पिछले साल सितम्बर में भोपाल में आयोजित साहित्य अकादमी के कार्यक्रम में भेंट हुई। उनके सहज सरल व्यक्तिव एवम् मृदुभाषिता से बहुत प्रभावित हुई। नई रचनाकार के रूप में उन्होंने मेरा उत्साहवर्धन भी बहुत किया जो को मेरे लिए एक अविस्मरणीय अनुभव रहा। ईश्वर उन्हें स्वस्थ रखें।

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  2. राजकुमार जैन'राजन'जी हिंदी बाल साहित्य जगत में ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण साहित्य जगत में एक जाना पहचाना नाम है। साहित्य के प्रचार प्रसार और साहित्यकारों का मार्गदर्शन करना इनकी विशेषता है। मेरी समझ से इससे बढ़कर साहित्य की सेवा नहीं हो सकती है। इसके लिए भाई राजन जी की जितनी तारीफ की जाय, कम है। साहित्य के सच्चे साधक हैं राजन जी।

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  3. मैं हमेशा राजकुमार जैन राजन जी के गहरे और अनमोल विचारों का सम्मान कर रही हूँ। राजन जी को एक महान भविष्य की शुभकामनाएँ।

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  4. मैं हमेशा राजकुमार जैन राजन जी के गहरे और अनमोल विचारों का सम्मान कर रही हूँ । उसे एक महान भविष्य की शुभकामनाएं।

    उत्तर देंहटाएं
  5. आभार,आपकी इस सदासयता के लिए। आपका नाम व परिचय भी जानना चाहूँगा आदरणीय

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  6. राजकुमार जैन राजन से प्रथम मिलना नाथद्वारा मे श्याम देवपुरा जी के यहा हुआ था, नाथद्वारा साहित्य मंडल की ओर से मेरा सम्मान था तब हॉल की सीढ़ी चढ़ते हुए हमे देखा तो हमारे पेर लड़ खड़ा रहे थे, देखकर तुरंत ही दौड़ आए और हमे सहायता की, मेरे पेर में ऑपरेशन की वजह से चलने मे दिक्कत हो रही थी, हमारा वापस जाने के लिए टिकट अपने ड्राइवर प्रहलाद जी को भेज कर मंगवा लिया और शाम खाना खाने के बाद प्रह्लाद जी को भेजा गया कि हमे बस अड्डे पर छोड़कार आए लेकिन प्रहलाद जी ने हमे हमारी बस में सीट पर बैठा दिया और बस चलने पर ही वो वापस गए,
    राज कुमार जी ने हमे श्री अंबालाल हिंगड़ बाल साहित्य पुरस्कार के लिए लायक समजा इस लिए उनका धन्यवाद करते हैं,
    उनसे ज्यादा मिलना होते रहा, भोपाल, सलूम्बर मे भी मिलना हुआ, उनके सरल और दयालु स्वाभाव से हर कोई परिचित हैं, उनका साहित्य के प्रति ज्यादा लगाव है, वो न केवल लिखते हैं लेकिन जो लिख रहे हैं उन्हे प्रोत्साहित भी करते हैं,
    उनकी खोजना होगा अमरुत कलश हिन्दी से गुजराती में अनुवादित पुस्तक करने के लिए हमे सौ भाग्य प्राप्त हुआ है, उनकी यह किताब का नेपाली मे भी अनुवादित हुई है, वो बाल साहित्यकार होने के अलावा बाल साहित्य की पुस्तकों का दान स्वरूप भेट स्कूल ओ मे भेजते हैं, मेरे अंदाजा से करीबन 4 लाख रुपये की लागत की पुस्तकें अब तक बांट चुके हैं,हिंदी साहित्य जगत में राजकुमार जैन राजन से कोई परिचित नहीं हो एसा हो नहीं सकता है, उन्हे जो एक बार मिलता है वो फिर मित्र बन जाता है, ज्यादा नहीं लिखते हुए हम उन्हे हार्दिक बधाई एवं शुभकामना देने का साहस कर देते हैं,
    धन्यवाद

    डॉ गुलाब चंद पटेल
    कवि लेखक अनुवादक
    नशा मुक्ति अभियान प्रणेता
    ब्रेस्ट कैंसर अवेर्ने्‍सस कार्य क्रम योजक
    गुजरात गांधीनगर
    Mo 09904480753
    Email patelgulabchand19@gmail.com

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  7. राजकुमार जैन राजन जी के गहरे और अविचारों पर मैं बहुत सम्मान करती हूँ।कैलिबर भी बहुत आकर्षक है। इतना ही नहीं, हिन्दी साहित्य विषय में उसकी सेवा बहुत श्रेष्ठ है। प्रार्थना करूं कि उसके कौशल्या आगे बढ़ेगा।

    उत्तर देंहटाएं
  8. शीर्षक पुस्तक के बारे में बहुत कुछ कह जाता है। वर्तमान कालखंड की आवश्कताओं की ओर इंगित करता शीर्षक एवं पुस्तक की कविताएं हमें भविष्य की शांति,समरसता हेतु चिंतन-मनन करने के लिए प्रेरित करती है। कविताएं मानो जीवन में प्राप्त अनुभवों के बून्द बून्द से बना कलश समान है । साहित्य और स्वदेशी विधाओं के प्रति आपका रुझान, हिंदी पत्रिकाओं में आपका योगदान अनायास युवाओं को आकर्षित और माँ हिंदी की सेवा के लिए प्रेरित करता है।
    शुभकामनाओं सहित।

    उत्तर देंहटाएं
  9. हार्दिक आभार। यहां केवल संकलन के चित्र ही हैं न कि उनपर विवरण। आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभारी हूँ

    उत्तर देंहटाएं
  10. साहित्य के लिए चेतना जगाता राज कुमार जैन राजन ,पर श्री ओमप्रकाश प्रजापति और श्री गुलाब चंद पटेल की अभिव्यक्तियाँ पढ़ीं जो राज कुमार राजन को सर्वमान्य सार्थक साहित्यकार होने की अनुशंसा करती हैं।
    राज कुमार राजन की विविध साहित्यिक अभिरूचियाँ उन में साहित्य चेतना जाग्रत करती रहती हैं और यह प्रक्रिया साहित्यिक जागरण के लिए सदैव प्रशंसनीय और प्रेरणीय बनी रहती है।
    शुभार्शिवादीय - मुनव्वर अली 'ताज'

    उत्तर देंहटाएं
  11. बहुत ही विनम्र और नेक दिल इॉसान है राजकुमार जी। नये लोगों का उत्साह बढ़ाते हैं तथा मार्गदर्शन करते हैं। आपके उज्जवल भविष्य के लिये भगवान से प्रार्थना करती हूँ ।🙏

    उत्तर देंहटाएं
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रचनाकार: साहित्य के लिए चेतना जगाताः राजकुमार जैन ’राजन’*
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