370010869858007
नीचे टैक्स्ट बॉक्स से रचनाएँ अथवा रचनाकार खोजें -
 नाका संपर्क : rachanakar@gmail.com अधिक जानकारी यहाँ [लिंक] देखें.

****

Loading...

शिक्षा का धन - बाल कहानी : गुडविन मसीह

शिक्षा का धन

कहानी : गुडविन मसीह

    सोनपुर नामक गांव में ननकू नाम का एक निर्धन किसान रहता था। वह बहुत मेहनतकश और परिश्रमी होने के साथ-साथ काफी दयालु और उदार प्रवृत्ति का था। दूसरों के सुख-दुःख में काम आना वह अपना परम कर्तव्य समझता था। इसीलिए गांव का प्रत्येक व्यक्ति उसे जरूरत से ज्यादार मान-सम्मान देता था।


     ननकू के परिवार में उसकी पत्नी और दो बेटे थे। ननकू की दिली इच्छा थी कि उसके दोनों बेटे भी उसी के नक्शेकदम पर चलें, नेकी और ईमानदारी के रास्ते को अपनाएं। उसी के समान उनके अन्दर भी दूसरों के प्रति आदर और सेवाभाव हो। इसीलिए वह उन्हें हर वक्त यही शिक्षा दिया करता था कि ‘‘बेटा, दूसरों के सुख में ही अपना सुख निहित होता है। मनुष्य को सदैव एक-दूसरे के सुख-दुःख का भागीदार होना चाहिए। जो दूसरों के प्रति स्वयं के समान श्रद्धाभाव रखता और निःस्वार्थभाव से सबके सुख-दुःख में काम आता है, वास्तव में वही सच्चा मनुष्य कहलाने योग्य होता है।’’


     ननकू के दोनों लड़के पढ़े-लिखे जरूर थे लेकिन स्वभाव से वे सर्वथा उससे भिन्न थे। इसीलिए उन पर ननकू की बातों का कोई असर नहीं होता। वे उसकी बातों को और शिक्षाओं, आदर्शों एवं उपदेशों को खोखला और किताबी बातें बताकर टाल जाते थे।


     कभी-कभी तो उसकी पत्नी भी ननकू के शिष्टाचार और उपदेशों से तंग आ जाती और झुंझलाकर उससे कहती, ‘‘स्वयं ने तो सारी जिन्दगी दुःखों और अभावों में जी है और अब बच्चों को भी यही शिक्षा देते रहते हैं। आखिर ऐसे खोखले आदर्शों और उपदेशों का ढिंढोरा पीटने से क्या फायदा ? जो जिन्दगी को बोझ बना दें। आप जिन्दगी भर दुःख भोग कर, हमेशा दूसरों के सुख-दुःख में काम आते रहे, खुद परेशानी उठाकर, हमेशा सबकी परेशानी दूर करते रहे, उससे आपको क्या लाभ मिला ? मैं तो तब मानती जब आज आपके ऊपर मुसीबत आयी तो कोई आपकी भी मदद करने आ जाता। इससे तो अच्छा होता कि आपने जो पैसा, धन-सम्पत्ति दूसरों की सहायता करने में समाप्त कर दिया। वह धन-सम्पत्ति हमारे और हमारे बच्चों के भविष्य के लिए रख छोड़ते तो आज इस तरह किसी का मुँह तो न ताकना पड़ता।’’


     पत्नी के तानों को सुनकर ननकू एकदम तिलमिला जाता। फिर अपने आप पर काबू पाकर अपनी पत्नी को समझाते हुए कहता, ‘‘सावित्री, तुम्हारा कहना शायद ठीक हो। लेकिन मनुष्य को इतना भी स्वार्थी नहीं होना चाहिए। मेरा कहने का तात्पर्य यह है कि यदि कोई किसी के लिए अगर कुछ करता है, तो उसे इस आशा के साथ नहीं करना चाहिए कि बदले में उससे भी उसको कुछ प्राप्त हो। नहीं तो उसके सब किए-धरे पर पानी फिर जाता है और वह भगवान की दृष्टि में स्वार्थी और खुदगर्ज साबित हो जाता है। और भगवान उसे अपनी आशीषों से वंचित कर देता है।’’


     ‘‘रहने दो....रहने दो....यह सब बातें कहानी-किस्सों में ही अच्छी लगती हैं। हकीकत में अब कुछ नहीं रह गया है।’’ उलाहना देते हुए उसकी पत्नी ने कहा।
     पत्नी की बात पर वह निरुत्तर हो जाता और मन-ही-मन सोचता रहता कि वह उसे समझाए तो कैसे समझाए ?
समय का चक्र अपनी गति से घूम रहा था। देखते-ही-देखते ननकू को बुढ़ापे की सफेदी ने अपने आवरण में ढांप लिया। उसकी बूढ़ी हड्डियों ने काम करना बन्द कर दिया और वह पूरी तरह चारपाई की गिरफ्त में आ गया अर्थात लम्बी बीमारी का शिकार हो गया।


     ननकू के बीमारी के बिस्तर पर लेट जाने से घर में आय के समस्त साधन बंद हो गए, जिससे घर की आर्थिक स्थिति डंवाडोल हो गई। नौबत यहां तक आ गयी कि घर में एक वक्त की रोटी जुटा पाना भी मुश्किल होने लगा। क्योंकि जीवन भर मेहनत-मजदूरी करके उसने जो कुछ कमाया था, वह सब उसने अपने लड़कों को पढ़ाने-लिखाने व दूसरों की सहायता करने में खर्च कर दिया था। परिणामस्वरूप घर का प्रत्येक सदस्य अपनी तंगहाली और बदहाली को ही नहीं अपनी किस्मत को भी कोसने लगा और ननकू को बुरा-भला कहने लगा।


     घर वालों का अपने प्रति कटु व्यवहार देखकर ननकू को काफी दुःख होता। लेकिन बेचारा किसी से कुछ कह नहीं पाता। सिर्फ अपना मन मसोस कर रह जाता। लेकिन जब बात उसकी बर्दाश्त से बाहर हो गयी तो एक दिन उसने अपने दोनों लड़कों और पत्नी को अपने पास बुलाया और उन्हें अपने पास बैठाकर समझाते हुए कहा, ‘‘मेरे बच्चों, मैं अच्छी तरह समझता हूं कि मैंने तुम लोगों के जीवन यापन या भविष्य के लिए कोई अचल सम्पत्ति या रुपया-पैसा नहीं रख छोड़ा, जिसकी वजह से तुम लोग मुझसे नाराज रहने लगे हो।


     अब जबकि मेरा अन्तिम समय आ गया है। इस अन्तिम समय में मैं आखिरी बार तुम सबसे एक बात कहना चाहता हूं। मुझे विश्वास है कि आज मैं तुम लोगों से जो कुछ भी कहूंगा, उसको तुम सब मानोगे और अमल में लाओगे। इसलिए मेरी बात ध्यान से सुनो। बात यह है कि प्रत्येक व्यक्ति को परिश्रमी, क्रियाशील और आत्मनिर्भर होना चाहिए। स्वयं ही अपने जीवन यापन का सहारा बनना चाहिए। क्योंकि जो लोग दूसरों पर निर्भर रहते हैं या दूसरों का सहारा ताकते हैं वह जीवन में कभी सफल नहीं हो पाते। मैं मानता हूं कि मैंने तुम लोगों को जीवन का कोई सुख नहीं दिया। लेकिन मैं तुम लोगों को एक ऐसा धन देकर जा रहा हूं, जिसके सहारे तुम दुनिया की हर चीज, हर सुख-सुविधा और ऐश और आराम आसानी से हासिल कर सकते हो। लेकिन परिश्रम तो तुम्हें फिर भी करना ही होगा।’’
     ननकू की बात सुनकर उसके दोनों लड़के भड़क उठते और क्रोधित होकर कहने लगते, ‘‘आप हमेशा हमसे यही कहते रहते हैं कि आपने हमारे लिए धन रख छोड़ा है, आखिर वो धन है कहाँ ?’’
     ‘‘इस तरह क्रोधित और आक्रोशित होने की आवश्यकता नहीं है मेरे बच्चों।


धन-सम्पत्ति का मतलब सिर्फ रुपया-पैसा अथवा जमीन-जायदाद ही नहीं होता है। बल्कि इंसान के गुण-दोष, चरित्र और उसके आदर्श भी होते हैं। इंसान समाज में रहकर जो शिक्षार्जन, ज्ञानार्जन एवं सामाजिक प्रतिष्ठा हासिल करता है वो रुपए-पैसे, धन-सम्पत्ति, जमीन-जायदाद से कहीं बढ़कर होती है। मैंने तुम दोनों को पढ़ा-लिखाकर इस योग्य बना दिया है कि तुम लोग नौकरी करके आत्मनिर्भर बन जाओ और हंसी-खुशी से अपना जीवन यापन करो।’’


     उस समय तो ननकू के लड़कों की समझ में ननकू की बात नहीं आयी। लेकिन कुछ समय पश्चात् जब ननकू की मृत्यु हो गयी तो घर की सारी जिम्मेदारी उसके दोनों लड़कों के कंधों पर आ पड़ी। घर की जिम्मेदारी कन्धों पर आते ही उनकी आँखें खुल गयीं और उन्होंने नौकरी की तलाश करनी शुरू कर दी।


जल्दी ही उन्हें उनकी योग्यता और पढ़ाई-लिखाई के मुताबिक अच्छी नौकरी मिल गई, जिससे उनके ऊपर आए दुःख के सारे बादल छंट गए और हँसी-खुशी उनका जीवन यापन होने लगा। तब उन्हें याद आया कि वास्तव में उनके पिता सच कहते थे कि शिक्षा से बड़ा कोई धन नहीं होता।
......................................
चर्च के सामने, वीर भट्टी, सुभाषनगर,
बरेली 243001 (उत्तर प्रदेश)

​​

......................................

​​

संक्षिप्त विवरण

नाम : गुडविन मसीह

पिता : श्री आर. एन. सी. लाल

माता : स्वर्गीय चन्द्रा

जन्म स्थान : बरेली उत्तर प्रदेश

जन्मतिथि : 8 अगस्त 1966

बतौर बाल साहित्यकार वर्ष उन्नीस सौ नवासी (1989) लगभग तीस वर्षों से निरन्तर बाल कहानियाँ, बाल उपन्यास, यात्रा वृतान्त संस्मरण बाल नाटक एवं बाल गीतों का सृजन ।

* ऑल इण्डिया रेडियो व दूरदर्शन के कई केन्द्रों से बाल कहानियाँ एवं बाल नाटकों का प्रसारण ।

'मंच पर मंचित होने वाले बाल नाटक

* गाड़ी (सामाजिक सद्‌भाव पर आधारित) माँ (मानवीय रिश्तों पर आधारित) हमारी दुनिया हमारे सपने (समाज की मुख्य धारा से अलग हुये बच्चों पर आधारित) आदि ।

रेडियो से प्रसारित बाल नाटक

* बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम, नेता जी का भाषण, प्रमोशन का चक्कर, चोर-चोर मौसेरे भाई,.... .और दांत उखड़ गये, सुनहरा कल, बैठे-बिठाये, किस्सा शान्ति का, कहो कैसी रही, खट्‌टा-मीठा (सभी हास्य नाटक) आदि ।

बाल साहित्य के अनेक संस्थानों द्वारा आयोजित बाल कहानी प्रतियोगिताओं में पुरस्कृत कहानियों

* प्रायश्चित, शिक्षा का धन, अनोखा जन्म दिन, अनोखा उपहार, समय का सदुपयोग, गलती का अहसास, अंकित का साहस, अंगूठी का चमत्कार, सच्चा कर्तव्य, सबसे बड़ी जीत, पुरस्कार, सुनहरे कल की कामना, एक और एक ग्यारह, रोशनी, सदबुद्धि और हृदय परिवर्तन । 'बिखरते सपने और 'छूना है आकाश' बाल उपन्यास, गुलाटीबाज तथा सुहानी आदि ।

प्रकाशित बाल कथा संग्रह

* बयालीस बाल कथाएँ, आधुनिक बाल कहानियाँ, इक्कीसवीं सदी की बाल कहानियाँ, इक्यावन हास्य बाल कहानियाँ एवं बाल साहित्य कोष; सभी संयुक्त संग्रह) एवं रेडियो नाटक की पुस्तक, ''गुडविन मसीह के नौ हास्य रेडियो नाटक'' ।

समाचार-पत्र एवं बाल पत्रिकायें जिनमें गत तीस वर्षों से निरन्तर बाल कहानी. बाल गीत. बाल नाटक एवं बाल उपन्यासों का प्रकाशन हो रहा है ।

* बालवाणी, नन्दन, बाल भारती, देव पुत्र, बाल हंस, चंपक, लोटपोट, नन्हें सम्राट एवं अमर उजाला, दैनिक जागरण, नेशनल दुनिया बाल भास्कर, शब्दरंग, पंजाब केसरी, जनसत्ता व वेब पत्र-पत्रिकाओं आदि में बाल रचनाएँ कहानियाँ कविताएँ एवं गीतों का निरन्तर प्रकाशन हो रहा है ।

पुरस्कार एव सम्मान

* सृजनात्मक बाल साहित्य के लिये अनेक स्थानीय एवं राष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत ।

प्रकाशनाधीन बाल कथा एवं बाल गीत संग्रह

* बच्चों की प्रेरक कहानियाँ, बालिकाओं की प्रेरक कहानियाँ, किशोरों की मनभावन कहानियाँ एवं दादा जी के दाँत निराले, बाल गीत संग्रह का शीघ्र प्रकाशन ।

अन्य उपलब्धियाँ

* पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेई के कविता संग्रह 'जंग न होने देंगे' का नाट्‌य रूपान्तर ।

पूर्व प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल के यूपी. के बदायूँ शहर आगमन पर दूरदर्शन के लिए वॉइस ओवर राइटिंग ।

* विश्व की महान समाज सेविका मदर टेरेसा के जीवन पर 300 पृष्ठ की किताब ।

व्यस्कों के लिए रेडियो नाटक

* गलत फहमी, जब बस ने सर्वे किया, ग्रहों का चक्कर, जुनून, जियो तो जमाने के साथ जियो, आशिक मियां दीवाने, पति बुराई अभियान, किस्सा शान्ति का, कहो कैसी रही, एक थी दीपिका, डायरी का पन्ना, खट्‌टा-मीठा, आई हेट यू मरने की भी फुर्सत नहीं (सब हास्य व्यंग्य) आदि ।

रेडियो एवं टीवी. धारावाहिक

* जहाज का पंछी 'नाट्‌य रूपान्तर' (मूल लेखक-इलाचन्द्र जोशी); संकल्प, चुभन, जीवन संघर्ष एवं एक टुकड़ा आसमान का ।

रेडियो रूपक

* बरेली की जूरी जरदोजी, साम्प्रदायिक सौहार्द का प्रतीक चुन्ना मियाँ का मन्दिर एवं बरेली का सुरमा ।

बतौर कथा. पटकथा एवं संवाद लेखक फीचर फिल्म

*: बाँसुरी एक प्रेमकथा, पारो मेरी जान, राज बिहारी, अपाहिज, तुमसे कितना प्यार है, फॉरगेट मी नाउ, दर्द अपना-अपना, नासूर, ऐट्रक्शन आदि ।

प्रकाशाधीन पुस्तकें

१: रेडियो एवं टी.वी. लेखन, पटकथा लेखन, बच्चों के लिए कहानियां (कथा संग्रह), कतरा भर जिंदगी (कहानी संग्रह) -अमन प्रकाशन, दिल्ली ।

१: वर्तमान में उपरोक्त सभी गतिविधियों में सक्रिय होने के साथ-साथ रेडियो, टीवी. एवं फिल्मों के लिए कथा, पटकथा एवं संवाद लेखन कार्य ।

सम्प्रति

१: 'खुशबू मेरे देश की' (हिन्दी मासिक साहित्यिक पत्रिका) में कार्यकारी संपादक ।

सम्पर्क हेतु-

चर्च के सामने, वीर भद्‌टी, सुभाषनगर, बरेली उप्र-) पिनकोड-243 001

ईमेल - scriptwritergm8@gmail.com

(गुडविल मसीह)

​​

बालकथा 4594783035045789187

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

emo-but-icon

मुख्यपृष्ठ item

कुछ और दिलचस्प रचनाएँ

फ़ेसबुक में पसंद करें

---प्रायोजक---

---***---

ब्लॉग आर्काइव