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एक रोचक आलेख - सुबह की नींद - डा. सुरेन्द्र वर्मा

आप रातभर भले ही करवटें न बदलते रहें लेकिन सुबह सवेरे जो आपकी आँख लगती है, उसका कोई मुकाबला ही नहीं है। बहुत ही मीठी नींद आती है। फिर भी परम्परावादी लोग अपनी इस जिद पर अड़े रहते हैं कि सूरज निकलने के पहले ही उठ जाना चाहिए, बल्कि उनका बस चले तो रात के आखिरी-पहर ही वे उठ जाएं। अक्सर उठ भी जाते हैं। दलील देते हैं, नींद ही नहीं आती, क्या करें? झूठ बोलते हैं।

सुबह उठने का दावा करने और उसे निभाने वाले, भले ही दिन भर उबासियाँ लेते रहें या सुबह के नाश्ते के बाद वे सो ही क्यों न जाएं, लेकिन जिद है कि हर हालत में उठना तो “अर्ली-मोर्निंग” ही है। समझ में ही नहीं आता की आखिर उन्हें सुबह थोड़ा सो लेने में आलस क्यों आता है ?

आजकल के तेज़-दिमाग़ बच्चों को देखिए। रातभर पढ़ते हैं और सुबह सोते हैं। अपनी रातें खराब नहीं करते, और दिनभर मटरगश्ती करते हैं। आम के आम और गुठलियों के दाम।

सुबह जब आप मीठी नींद के आगोश में होते हैं, उस समय उठने के लिए अलार्म लगा कर रखना एक निहायत वाहियात आदत है। अलार्म की आवाज़ सुनते ही आप भड़भड़ा जाते हैं। आपके सपने टूट जाते हैं। आप विचलित हो जाते हैं। लेकिन जो भी हो, सुबह उठ जाते हैं। वाह! क्या तीर मार लेते हैं ! सोचा है कभी, कितनी कीमत चुकानी पडी है आपको सुबह जल्दी उठाने के लिए ?

भले ही नसीहत देनेवालों ने यह कभी न कहा हो कि आपको रातभर जागना चाहिए और सुबह उठना आपका ज़रूरी नहीं है, लेकिन सच यही है कि वे जिनसे हम नसीहत लेते हैं वे स्वयं शायद ही कभी रात में सोए हों और सुबह उठ गए हों। बड़े बड़े लेखक, कवि, कहानीकार, उपन्यासकार, सभी रात के सन्नाटे में अपना लेखन- कार्य करते और सुबह सोते पाए गए हैं।

न जाने कितने ऐसे काम हैं, जिन्हें आप नहीं चाहते कि लोग आपको उन्हें करते हुए दिन में देखें। रात में करने के लिए आप उन्हें सुरक्षित रखते हैं। भले ही कुछ लोगों की यह मजबूरी ही क्यों न हो ! गृहस्थी में व्यस्त महिलाएं, यदि दुर्भाग्य से कुछ रचनात्मक लेखन-कार्य करना चाहती हैं तो उसे वे रात की वेला में ही अंजाम दे पाती हैं। सुबह का समय उनके लिए नींद निकालने का समय होता है।

लोग वेदों की दुहाई देते हैं। लेकिन वेदों में कहीं यह नहीं लिखा है कि आदमी को रात भर सोना और सुबह उठ जाना चाहिए। न माने आप तो वेदों को खंगाल सकते हैं। सच तो यह है कि उठने और सोने के लिए कोई समय निर्धारित किया ही नहीं जा सकता। यह तो पात्र, परिस्थिति और काल पर निर्भर करता है। अगर आपको सुबह के समय सोना माफिक आता है तो बेशक, बेहिचक और निश्चिन्त होकर नींद निकालिए। लोगों की बातों में न आइए, लोगों का काम है कहना। इनके कहे में आ जाएंगे तो आप कहीं के न रहेंगे। सुविधा सर्वोपरि। अपनी सुविधा देखिए। और सभी काम सहूलियत से कीजिए।

जो चीज सबसे ज्यादह तकलीफ देती है, वह नियम-पालन है। न जाने कितने काम हम केवल इसलिए करते हैं कि वे हमारी दिनचर्या में नियमित हो गए हैं। यह ज़रूरी है कि हम अपनी दिनचर्या के कामों का समय-समय पर परीक्षण करते रहें और गैर-ज़रूरी नियमों को छांट कर अलग करते रहें ताकि ज़िंदगी थोड़ी और आसान हो सके। एक रोज सुबह-सवेरे उठकर हम आत्मपरीक्षण करें कि सुबह सवेरे यदि हम उठ भी गए तो कौन सा तीर मार लेंगे ? सुबह की नींद मंगलमय हो। आमीन।

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--डा, सुरेन्द्र वर्मा

१०, एच-आई जी / १, सर्कुलर रोड ,

प्रयागराज, २१००१

1 टिप्पणियाँ

  1. वाह बड़ा रोचक आलेख है जिसे छात्र तो क्या हम भी सुबह जल्दी न उठने का या जागने का सफल प्रयत्न करेंगे। बच्चों के लिए यह आलेख उनकी चाहत की प्रस्तुति है जिसे वे बड़ों को छव से पड़ने के लिए कहेंगे। बधाई हो।

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