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कहानी - विजय शंकर विकुज - थोड़ा-सा कुछ

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कहानी                                                                  विजय शंकर विकुज                                                      ...

कहानी                                                                  विजय शंकर विकुज
                                              
                                                  थोड़ा-सा कुछ

            एक हल्का-सा झटका लगा था। इसके साथ ही मैं जैसे कहीं डूबता चला गया। चारों तरफ था किसी गहरे सुरंग-सा-घुप्प अंधेरा। मैं घबरा उठा। मैंने धीरे से आसपास कुछ टटोलने की कोशिश की ताकि यह अंदाजा लगा सकूं कि कहां हूं। कुछ समझ में नहीं आया। अगले ही पल उस अंधेरे में झिलमिला उठीं धुंधली-सी कई परिचित परछाइयां। मन कुछ शांत होने लगा। अपरिचित अंधेरा अब परिचित होने का अहसास दिलाने लगा था। उस अहसास के साथ उभरने लगी एक सनसनाहट की आवाज। परछाइयां जैसे सक्रिय होने लगीं और ...


             मैं महसूस करने लगा था उन दिनों उसकी निकटता अब एक फासले में तब्दील होने लगी है। बहाव दिशा बदल रही थी। आखिर क्यों ? मैं सोचता रहता, अपने अंदर उसके उस परिवर्तन का कारण तलाशता और मानसिक रूप से परेशान हो उठता। कई वर्षों के अंतरंग संबंध में बदलाव की कीर्चें जब दिल और दिमाग में चुभने लगती हैं तो स्वभाविक होती है ऐसी परेशानी।
             'पंकज, तुमने तो एम.ए. कर लिया है। कहीं नौकरी वगैरह का जुगाड़ बिठाया या नहीं। कहीं हमारे सपने बिखर न जायें ?' उसकी आंखों में अनगिनत सपने थे तीन वर्ष पहले जब मैंने एम.ए. की डिग्री हासिल की थी।
             उसका सपना मेरा सपना था। अपने सपने को साकार करने के लिये मैं जी-जान से कोशिश करते हुए भटक रहा था। असफलता की रेखाओं को अपने भाग्य से कैसे मिटाता ? वह मेरी सफलता के लिये भगवान से मन्नतें मांगती और मेरी आंखों में अपने सपनों को झांकती।
            कभी-कभार नियमित दिन या निर्दिष्ट स्थान पर उससे नहीं मिल पाता तो दूसरे दिन ही सुबह-सवेरे वह मेरे सामने हाजिर हो जाती। उस समय उसका चेहरा देखते ही बनता। सूजी हुई रात भर जागी लाल आंखें और शिकायत में थरथराकर उसे बोलते हुये देखकर मजा ही आ जाता। किन्हीं कारणों से मिल नहीं पाने के कारण मेरा मन भी कसक उठता। उसकी हालत देखकर मेरी हालत बिगड़ जाती। फिर मुझे 'वेराइटिज' कसमें खानी पड़तीं, वादा करना पड़ता कि चाहे जैसे भी हो, मिलने की नियमितता भंग नहीं होगी। शिकायत पर शिकायतों के साथ धीरे-धीरे वह सामान्य होती, 'तुम तो मर्द हो। तुम क्या जानोगे मेरी हालत ?'


            'पंकज, अगर तुमने मुझे धोखा दिया तो याद रखना कि फिर तुम मेरी लाश ही देखोगे।' रुंआसे चेहरे के साथ उसकी यह चेतावनी मुझे हमेशा याद रहती। वह जब भी युनिवर्सिटी में किसी लड़की के साथ मुझे थोड़ा भी घुल-मिलकर बात करते देख लेती तो अजीब-सा चेहरा बनाकर गंभीर हो जाती। तब उसे समझाना पड़ता, 'पागल हो तुम ! अरे, मैं तो तुम्हारे सिवा किसी और के बारे में सपने में भी नहीं सोच सकता। इस शरीर का प्राण तो तुम ही हो।'
            'कहीं ऐसा न हो कि तुम्हीं मुझसे नजरें फेर लो।' और मैं बाद में कभी-कभी मजाकिया मूड में कहता। 'नहीं, ऐसा कभी नहीं हो सकता चाहे दुनिया इधर की उधर क्यों न हो जाये।' वह अपने हाथों में मेरा हाथ कस कर पकड़ लेती और डबडबाई आंखों से मुझे अपलक निहारने लगती। इसके बाद बहुत देर तक वह मेरा हाथ अपने हाथों में थामे रहती।
            वही मंजू कुछ दिनों से मुझे बड़ी बदली-बदली-सी लगने लगी थी। बार-बार मिलने के लिये उसके उतावलेपन का ज्वार उतरता-सा लगने लगा था। प्रारंभ में मैंने महसूस नहीं किया था पर बाद में मुझे ये बातें अस्वाभाविक-सी लगने लगीं थीं। बेचैन होकर मैं उससे मिलने उसके घर पहुंचता तो वह न आ सकने का कई कारण प्रस्तुत कर देती। फिर तो धीरे-धीरे मुलाकातें कम होने लगीं थीं। दो-तीन महीने बाद तो उसने मिलना बिल्कुल बंद कर दिया था। बार-बार वहां जाना और उसकी उपेक्षा पर मैं छटपटाकर रह जाता।


            'पंकज, अगले हफ्ते मेरी शादी है। सभी लोग मजबूर कर रहें हैं। अगर मैंने हां नहीं की तो घर में निश्चय ही कोई दुर्घटना घट जायेगी।' आखिर एक दिन आते ही साधारण-सी औपचारिकतायें निभाकर उसने सीधे-सीधे अपनी बात कह दी। मैं अवाक-सा उसका मुंह ताकने लगा था। उसके चेहरे पर शिकन की एक लकीर भी नहीं थी।
            'तुम किसी बहाने कुछ दिन और इंतजार करती। तुम्हारे घर के लोगों को मेरी बेरोजगारी से ही तो शिकायत थी न,' बाद में थोड़ा साहस बटोरकर मैंने कहा था। वह तो बिफर ही पड़ी थी, 'तो इतने दिन तुम क्या कर रहे थे ?'
             इसके हफ्ते भर बाद उसकी शादी हो गयी। पति कोई अच्छा ओहदेदार सरकारी अफसर मिला था। अपनी शादी का निमंत्रण वह दे गयी थी मगर मैं नहीं गया। क्या करता जाकर ? अपनी अयोग्यता और उसके परिवर्तित निश्चय में परिवर्तन संभव नहीं था। बस आगे यही सोचने को विवश था कि जिस सपने का आधार खत्म हो गया, उसके बारे में क्या सोचना ? उन यादों को अपनी गांठ से खोलना होगा जो कि असंभव-सा भी लग रहा था। आखिर वे यादें मेरे जीवन का एक हिस्सा थीं। समय लगा था मुझे मानसिक रूप से संभलने में कि जीवन उस हिस्से जितना लंबा नहीं होता। जो बीत गया सो बीत गया।


             जीवन को प्रारंभ से बता पाना संभव नहीं होता लेकिन होश आते-आते मेरे जीवन में समस्यायों एवं दुर्भाग्य का आगमन हो चुका था। बर्दवान के कालना गेट मुहल्ले में दो कोठरियों का अपना घर है। पिताजी ने रेल में नौकरी करते हुये किसी तरह बना लिया था। अपने मां-बाप का मैं इकलौता पुत्र था सो लाड-प्यार पाकर बड़ा हुआ। सयाना होते-होते ही समस्यायों का सामना करने के लिये मुझे तैयार होना पड़ा। मैट्रिक पास करने से पहले ही मेरी मां पेट के कैंसर से गुजर गयी और हायर सेकेंडरी पास करने के बाद कुछ ही दिनों के भीतर हार्ट अटैक से मेरे पिता। मैं बेसहारा हो गया था मगर मैंने अपना एक लक्ष्य तय कर लिया था। रेल विभाग के पीछे दौड़ते-दौड़ते मैंने एम.ए. कर लिया मगर नौकरी नहीं मिली। पिताजी ने लगभग दसेक सालों तक ही नौकरी की थी और ऊपर से वे 'फोर्थ क्लास' कर्मचारी थे सो 'सर्विस मनी' अच्छी नहीं मिली थी। मैंने व्यवसाय वगैरह के बारे में नहीं सोचा। आराम से खा-पीकर पढ़ाई करता रहा और रेल में पिताजी के स्थान पर नौकरी पाने के लिये भटकता रहा। उस समय इतनी अकल भी नहीं थी कि उन रुपयों को किसी बैंक में फिक्स्ड कर देता या किसी काम में लगाता। नौकरी तो नहीं हुई और सात-आठ साल बेगारी झेलते-झेलते अधिकतर रुपये खर्च हो गये। ऊंची शिक्षा के कारण अच्छी नौकरी की सोचते-सोचते निठल्ला भी हो गया था। अंतत: जब जीवन तंगी के रास्ते पर आया तब चिन्ता हुई। पेट के लिये जुगाड़ तो करना ही होगा और मैंने 'ट्यूशन' करना प्रारंभ कर दिया। साथ ही नौकरी पाने के लिये आवेदन और साक्षात्कार का सिलसिला भी शुरू हो गया। इस तरह दो-ढाई वर्ष गुजर गये। जीवन समस्यायों और संवेदना का मोड़ निरंतर बदल रहा था।


               एक दिन सुबह देर तक मैं बिस्तर में ही पड़ा रहा। नींद सुबह ही खुल गयी थी। मैं बेहद ही लापरवाह हो गया था। एक सामान्य आदमी ही तो था मैं और कहते हैं कि पहला प्यार भुलाना मुश्किल होता है। लेटे ही लेटे कभी मंजू को तो कभी अपने भाग्य को कोसता रहा। आदमी सब कुछ जानता है, सब कुछ सोचता है, एक निर्णय भी लेता है लेकिन स्वभाव और भाग्य से विवश होता है।
              उन दिनों मेरा रहन-सहन बिल्कुल बेतरतीब हो गया था। कई-कई दिनों तक मैं सफाई नहीं करता सो घर अक्सर धूल और गंदगी से भर जाता। उस दिन मैं बिस्तर में पड़ा-पड़ा सोच रहा था कि आज ट्यूशन पर नहीं जाऊंगा। सारे घर की सफाई करुंगा। कपड़े भी गंदे थे। साथ ही असंभव-सी भुलाने वाली याद को भुलाने की कोशिश करता हुआ मैं कई तरह की बातें सोच रहा था कि अचानक बाहर से दरवाजा खटखटाने के साथ आवाज आई, 'दादा, जेगे आछेन? (भैया जगे हुये हैं ?)'


              आवाज पहचान कर अनमना-सा उठना पड़ा। दरवाजा खोला तो बाहर सोमा को खड़ा पाया। मैंने पूछा, 'क्या बात है ?'
              'क्या बात है क्या ? उठना है कि नहीं, दस बज गये हैं। क्या ट्यूशन पढ़ाने नहीं जाइयेगा ?' डांटती हुई हंसकर उसने बांग्ला में कहा।
              'नहीं, आज नहीं जाऊंगा। घर की सफाई करनी है। अच्छा, जरा एक कप चाय बनाकर ला दो न।' मैंने उससे सिफारिश-सी की।
              'अच्छा ला देती हूँ। और आप यह पागलों के जैसा रहना अब छोड़ दें।' एक अधिकारपूर्ण स्वर में कहकर वह लौट गयी।
              मेरे पड़ोस में रहने वाले एक बंगाली सज्जन सिन्हाजी की तीसरी और सबसे छोटी लड़की है सोमा। सिन्हाजी एक प्रायवेट फार्म में क्लर्क हैं। उनकी दो लड़कियों की शादी हो गयी है। सोमा बी.ए. में पढ़ रही थी और वे लोग उसकी शादी के लिये लड़का ढूंढ रहे थे। वे लोग बड़े ही सीधे-सादे लोग हैं और मेरे अच्छे पड़ोसी भी। मेरे माता-पिता के गुजरने के बाद से इन लोगों ने समय-असमय मेरी हमेशा मदद की है, मेरा ध्यान रखा है।
             थोड़ी ही देर में वह चाय और बिस्कुट लेकर हाजिर हो गयी। मैं चाय पीता रहा, वह बकबक करती रही। सोमा बात थोड़ा ज्यादा करती है और जिसके लिये उसे मेरी डांट खानी पड़ती है।
उसी दिन शाम को सोमा के पिताजी मेरे पास आये। वे काफी देर तक बैठे रहे और बातें करते रहे। मैंने उन्हें बताया कि कई 'इंटरव्यू' मैंने दिये हैं और विश्वास है कि कुछ दिनों में कहीं न कहीं हिल्ला लग जायेगा। उन्होंने भगवान से मेरी सफलता की कामना की थी।
             दो-तीन दिनों बाद ही किसी आवश्यक काम से मैं सोमा के घर गया। घर में वह अकेली थी। उसके पिताजी अपने काम पर गये हुये थे और मां बाजार। मुझे देखते ही वह मुस्कुराकर बोली, 'आइये-आइये। देर आयद-दुरूस्त आयद !'


             वह हंसने लगी और फिर उसकी वही बकबक। उसकी बकबक सुनने के लिये मैं विवश था और थोड़ी देर बाद मैंने कहा, 'अब अच्छा नहीं लगता है। सोचता हूँ कि बर्दवान छोड़कर कहीं दूर चला जाऊं।'
            'शौक से, शुभ कार्य में देरी कैसी ! भूत-भूतनी से बचने का बढ़िया उपाय है। हाँ, और कहीं ये वहां तक पीछे पड़े रहें तो ?' वह हंसते हुये बोली। उसका इशारा मैं समझ गया था। वे लोग मंजू से मेरे संबंध के बारे में जानते थे और यह भी कि उसकी शादी कहीं और हो गयी है।
            'फिलहाल तो तुम ही मेरे पीछे लग गयी लगती हो।' उसके इशारे से जेहन में झलक आये चेहरे को झटकने के लिये मैंने हंसकर कहा।
            वह गंभीर हो उठी। उसने धीरे से सिर झुका लिया। मेरा अन्तस अफसोस से भर उठा। बात तो मैंने मज़ाक-मज़ाक में कह दी थी लेकिन मेरे अन्दर एक डर भी समा गया था कि कहीं सोमा इसका गलत अर्थ न लगा ले। मैंने चोर नजरों से उसके चेहरे को देखा। उसकी गंभीर आंखों में शर्म झिलमिला उठा थे। मैंने धीरे से अपनी सफाई प्रस्तुत की, 'मेरी बात का बुरा मत मानना। मैंने मज़ाक में कह दिया।'
            वह खिलखिला कर हंस पड़ी। मैं अवाक-सा उसका मुंह ताकने लगा और वह थी कि हंसी जा रही थी।
            'अरे, पंकज ! कैसा हालचाल है ?' उसकी मां हाथ में सब्जियों से भरे थैले लिये हुये बाजार से लौटी थी। सोमा की हंसी थम गयी।
            'अच्छा हूँ मासी मां (मौसी) ! आप कैसी हैं ?' मैं सामान्य हुआ था।
            'चल रहा है। आओ, भीतर बैठते हैं। ऐई सोमा, दो कप चाय बना।' हमेशा की तरह उसी अपनेपन से उन्होंने कहा और सब्जी की थैली सोमा को पकड़ा दिया। मैं और उसकी मां भीतर कमरे की ओर बढ़ गये।
             'तब, कोई अता-पता नहीं है। बगल में रहते हो और दिखाई नहीं पड़ते। सोमा को भेजती हूँ तो आकर कहती है कि घर में ताला पड़ा हुआ है। क्या कहीं नौकरी-धंधा का जुगाड़ बैठा ?' कई प्रश्नों के साथ उनकी आंखों में हमेशा की तरह वही ममता थी।
            'आपने तो बहुत सारे सवाल एक साथ कर दिये।' मैं हंसा, 'नौकरी की उम्मीद तो है। दो-एक जगह इंटरव्यू अच्छे हुये हैं।'
             'चलो, तुम्हारी नौकरी हो जायेगी तो मैं मां काली को इक्यावन रुपये का प्रसाद चढ़ाऊंगी।' उन्होंने दीवार से लगी काली माता की तस्वीर को दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम करते हुये कहा।
             'देखिये, अब भाग्य में क्या लिखा है !'
             'हो जायेगी-हो जायेगी। भगवान के घर देर है, बस्स !' उन्होंने माता काली की तस्वीर की ओर निहारकर फिर हाथ जोड़ दिया था।
            'हाँ, भगवान के घर जाने में अभी मुझे देर है। मैं धीरे से हंसा।'
            'छि: ! ऐसी बातें नहीं कहते। अभी तो तुम्हें बहुत कुछ करना है, बहुत दिन जीना है। भगवान करे, तुम्हें मेरी उम्र भी लग जाये।' उन्होंने ममता भरे स्वर में डांटते हुये कहा था। मैं हंसने लगा था।
'अच्छा एक बात कहूँ ?' थोड़ी देर बाद उन्होंने मुझे गंभीरता से निहारते हुये कहा।
             'क्या ?' मैं उत्सुकता से उनकी ओर देखने लगा।


             मुझे गौर से निहारते हुये उनका स्वर गंभीर था, 'हमलोगों ने तुम्हें अपने लड़के की तरह ही समझा है। अब इस तरह कितना दिन गुजारोगे ? हमलोग सोच रहे ..... ' जैसे किसी संकोच से उन्होंने बात अधूरी छोड़ दी। मेरे अंदर उत्सुकता और प्रबल हो उठी। मैंने कहा, 'कहिये न, आपलोग तो मेरे माता-पिता जैसे ही हैं, मेरी भलाई के बारे में ही सोचेंगे। कहिये क्या बात है ?'
             उनका चेहरा सामान्य हो गया। वे मुस्कुरा पड़ीं, 'दरअसल हम लोग सोमा का हाथ तुम्हारे हाथ में देना चाह रहें हैं अगर तुम्हें एतराज न हो।'
             मैं अवाक-सा उनका मुंह देखने लगा। उनके चेहरे पर गंभीरता की रेखायें फिर उभर आईं। वास्तव में मैंने ऐसे प्रस्ताव के बारे में कुछ भी नहीं सोचा था फिर भी उनका प्रस्ताव मुझे अजीब-सा नहीं लगा। बस, कुछ मेरे लिये बड़ा कठिन हो गया। क्या कहूँ-क्या नहीं। बात भविष्य से जुड़ी है और भविष्य एक अपरिचित अंधेरे में है। हां, सोमा अच्छी लड़की है। मंजू सुंदर थी। सोमा उतनी सुंदर नहीं है लेकिन सामान्य सुंदर अवश्य है। कुछ सोचने-समझने में मैं अपने आपके असमर्थ पाने लगा और मैंने चुपचाप सिर झुका लिया।
            सोमा चाय लेकर आ गयी थी। उसने अपनी मां की ओर चाय बढ़ाया और फिर मुझे। मैंने चुपचाप कप थाम लिया। धीरे से चाय सुड़कते हुये उन्होंने सोमा से कहा, 'जा सब्जी काट। मैं आ रही हूँ।'
            'अच्छा,' सोमा सिर झुकाकर चली गयी।


            'खैर,' वे थोड़ी देर बाद बोलीं, 'मैं समझ रही हूँ तुम्हारी मनोदशा। बाद में सोच-समझ कर कुछ कहना।'
            'मेरी नौकरी-चाकरी अभी नहीं है।' मैंने धीरे से कहा।
            'आज नहीं है, कल हो जायेगी। वैसा भी तुम अयोग्य या लाचार नहीं हो। हमें भरोसा है तुम पर। जरा और ध्यान दो तो 'ट्यूशन' करके ही किसी नौकरी वाले से अच्छा कमा लोगे।' उन्होंने जैसे एक विश्वास से कहा, 'अच्छा, बस इतना बता दो कि सोमा तो तुम्हें पसंद है ?'
             अनायास ही मेरा सिर स्वीकारोक्ति में हिल उठा और जिसका भान मुझे तुरंत हुआ। संकोच से मेरा सिर झुक गया। मैंने नहीं देखा कि उनके चेहरे पर क्या अनुक्रिया या प्रतिक्रिया हुई लेकिन सिर झुकाये ही मुझे आभास हुआ कि दूसरे कमरे के दरवाजे के पास कोई है। थोड़ी ही देर में पर्दे के नीचे से एक जोड़ी पांव नजर आये और मैं समझ गया कि वह सोमा थी।
            उस दिन थोड़ी देर और वहां बैठने के बाद मैं चला आया था। मासी-मां की बातों ने मेरे विचार ओर सोच-समझ को चंचल बना दिया था। सोचने लगा था कि उनका प्रस्ताव उचित है या अनुचित। उचित है तो स्वीकार कर लूँ या इंकार कर दूँ। उन्होंने हमेशा ही मेरा उपकार किया है। एक बात तो सही है कि इस तरह जीवन कब तक गुजरेगा ? सांसारिक बनकर मुझे भी सामाजिक जीवन जीना है। जिस समय मैंने मंजू को लेकर सपने बुने थे, उस समय भी तो मैं बेकार ही था। सोमा को तो मैं एक लंबे अर्से से जानता हूँ, अच्छी लड़की है। जीवन में परिवर्तन को स्वीकार करना पड़ता है जब वही सत्य हो।
             अगली सुबह ही सोमा आई। उसमें वह चंचलता नहीं थी। आंखों में एक लज्जा थी और चेहरे पर लाली। संकोच से आंखें चुराती हुई वह धीरे से बोली, 'पिताजी ने कहा है कि अब आपको होटल वगैरह में खाना खाने की जरूरत नहीं है। हमारे यहां ही आकर खाना पड़ेगा।'
             'बाप रे ! सीधा 'आर्डर' लेकर चली आई।' हंसकर कहने के साथ न जाने किस आवेग में मैंने चट से उसका हाथ पकड़ लिया। वह शर्माकर सिकुड़ गयी और अपना हाथ छुड़ाते हुये बोली, 'छोड़िये न, कोई देख लेगा।'
             'देख लेगा तो देख लेगा, मैं नहीं छोड़ूंगा।' मैं उसी रौ में था और कसकर उसका हाथ पकड़े हुये था। वह मचल रही थी, 'अभी छोडिय़े। जब थामने का समय आयेगा तब थाम लीजियेगा।' वह किसी तरह हाथ छुड़ाकर भाग गयी थी। उसके जाते ही मैं वस्तुस्थिति में आ गया था और अपने आप पर शर्मा उठा था। मंजू का चेहरा आंखों के सामने झिलमिला उठा था। उसे परे झटकने के लिये मैंने एक फिल्मी गीत गाना शुरू कर दिया था और मैं सफल हुआ था। मंजू का चेहरा बदल कर सोमा के चेहरे में परिवर्तित हो चुका था। मुझे अच्छा लगने लगा था।
             अगले ही दिन से मुझे नाश्ता और भोजन के लिये वहां जाना पड़ा। ना-नुकुर करने के बाद भी उनलोगों के अपनत्वपूर्ण अनुरोध के कारण मुझे विवश होना पड़ा। कुछ ही दिनों में मेरी रजामंदी उन पर जाहिर हो गयी थी।
             महीने भर के अंदर एक अच्छी नौकरी का 'ज्वाइनिंग लेटर' मुझे मिला। भगवान को धन्यवाद देते हुये मन में विश्वास दृढ़़ हुआ कि मेहनत का सिला अवश्य मिलता है। मेरे मन में यह भी विचार आया कि सोमा का मेरे जीवन में आने से ही मेरी भाग्य रेखा बदली है। अब मेरी समस्यायें खत्म। नये ढंग से जीवन की शुरुआत करनी होगी। जल्द ही सोमा से शादी हो जाने का प्रयास करुंगा। अब बात मुझे ही छेड़नी होगी। वे लोग तो राजी हैं ही। नौकरी के बारे में आज ही बता दूंगा कि मुझे जल्द ही 'ज्वायन' करना है और मैं फिर सपनों की दुनिया में भटकने लगा।
              शाम को मैं सोमा के घर गया। बैठक के कमरे में उसके पिताजी लेटे-से उठंगे थे। सामने कुर्सी पर कीमती कपड़े पहने एक मेरा ही हमउम्र युवक बैठा था। मैं उसे नहीं पहचानता था। सोमा के पिताजी ने मुझे देखते ही कहा, 'आओ-आओ। क्या आज पढ़ाने नहीं गये ?'
              'नहीं,' मैंने कहा, 'आपकी तबीयत खराब है क्या ?'
              'हाँ, आज सुबह से ही कुछ ठीक नहीं है और देखो हमारे मैनेजर साहब खैर-खबर लेने चले आयें। हम साधारण कर्मचारियों का बड़ा ख्याल रखते हैं ये।' वे हंस पड़े। वह युवक भी हंस पड़ा।
'इसमें इतनी प्रशंसा की बात नहीं है।' वह युवक बड़े ही अभिजात्यपूर्ण ढंग से मुस्कुराकर बोला, 'दरअसल मैं इधर से गुजर रहा था तो सोचा कि मिलता चलूं। घर देखना हो जायेगा और एक कप चाय भी पी लूंगा।'
             सभी लोग हंस पड़े।


             'अरे हाँ,' कुछ ही पलों बाद सोमा के पिताजी मेरी ओर मुड़ कर बोले, 'इनसे मिलो। ये हैं श्री सूर्य घोष, हमारी कंपनी के नये मैनेजर साहब ! बड़े ही मिलनसार व्यक्ति हैं। और यह हमारे बेटे जैसा पंकज कुमार, पास में ही रहता है।'
             'आप से मिलकर बड़ी खुशी हुई।' और हम दोनों ने मुस्कुराकर एक-दूसरे को नमस्कार किया। 'इसने कुछ दिनों पहले ही एम.ए. किया है। अभी नौकरी के लिये प्रयास में है।' उन्होंने मि. घोष से कहते हुये मेरी ओर देखा।
             'कुछ ही दिनों में हमारे यहां ही कई नियुक्तियां होने वाली हैं। हमारे यहां अप्लाई कर देंगे, बाकी मैं देख लूंगा।' मि. घोष ने मेरी ओर देखा।
             मैंने कहना चाहा कि एक अच्छी नौकरी का 'ज्वाइनिंग लेटर' मुझे मिल गया है और जल्द ही मुझे 'ज्वायन' करना है मगर मैं कह नहीं सका। मि. घोष का 'प्रेस्टिज' ध्यान में आ गया। सोचा बाद में सिन्हा अंकल को बता दूंगा।


            'सोमा, एक कप चाय और बनाना। पंकज भी आया है।' उन्होंने थोड़ी ऊंची आवाज में कहा।
            'मुझे मालूम है,' कहती हुई तब तक सोमा एक तस्तरी में तीन कप चाय और बिस्कुट लेकर अंदर आ गयी। मैं सिर झुकाये बैठा था।
             सोमा ने हम लोगों को चाय दिया। मैंने कप थामते हुये मि. घोष की ओर देखा। वह अपलक बड़े ध्यान से सोमा को निहार रहे थे। उन आंखों में एक चमक थी। मेरे भीतर कुछ सुलग उठा। मैंने नजरें दूसरी ओर फेर लीं।
            'वाह ! चाय बहुत अच्छी है। लगता है कि अब तो बार-बार आना पड़ेगा।' मि. घोष ने सोमा को उसी तरह निहारते हुये तुरंत कहा।
             'क्यों नहीं,' सोमा ने धीरे से मुस्कुराकर कहा और सिर झुकाकर अंदर चली गयी।
             'यही हमारे लिये बड़े सौभाग्य की बात है कि आप हमारे यहां पधारे। आपका हमेशा ही स्वागत है।' सिन्हा अंकल ने सम्मानपूर्ण स्वर में कहा।
             मेरे भीतर मि. घोष के प्रति ईर्ष्या अब और प्रबल हो उठी थी। जल्दी-जल्दी चाय खत्म कर मैं उठते हुये बोला, 'आपलोग मुझे क्षमा करेंगे। मुझे जल्दी ही निकलना है।'
             मैं दरवाजे से बाहर निकला कि दूसरे दरवाजे पर खड़ी सोमा को देख मैं ठिठक गया। वह मुझे इशारे से बुला रही थी। मैं वहां गया, 'क्या बात है ?'
             'मां अंदर बुला रही हैं।' उसने धीरे से कहा।


             मैं उस कमरे में गया। मासी मां एक कुर्सी पर बैठी कोई धार्मिक पुस्तक पढ़ रही थीं। मैंने उनसे पूछा, 'आपने मुझे बुलाया ?'
              'मैंने ?' उन्होंने मुझे आश्चर्य से निहारा, 'नहीं तो !'
              'मां, पंकज दा मुझे अपने साथ पिक्चर जाने को कह रहें हैं। मैं जाऊं ?' सोमा अपनी मां के बगल में खड़ी होती हुई बोली और मेरी ओर देखकर मुस्कुरा पड़ी। मैं अवाक था, मगर उसकी शरारत को समझ गया था।
             'ठीक है, चली जाना।' उन्होंने सामान्य स्वर में कहकर वापिस पुस्तक में अपनी आंखें गड़ा दीं।
             'ठीक है। जल्दी से तैयार हो जाइये। शाम के शो में अभी एक घंटा समय है।' उसने उसी तरह मुस्कुराते हुये मेरी ओर देखकर कहा।
             'मगर !' मैं हक्का-बक्का था।
             'अब टालने से काम नहीं चलेगा।' उसने मेरी बात काट दी।
             'हां, जब जाना ही है तो देर मत करो।' मासी मां ने सिर उठा कर जैसे अपना आदेश सुना दिया। विवशत: मैंने चुपचाप सिर झुका लिया।
             कुछ ही मिनटों में फटाफट तैयार होकर मैं उसके घर गया तो वह पहले से ही तैयार मिली। मि. घोष चले गये थे और सिन्हा अंकल सो गये थे। हमदोनों निकलने को तैयार हुये तो मासी मां ने कहा, 'जल्दी घर लौटने की कोशिश करना।'
            हम दोनों सिर हिलाकर निकल पड़े। उस समय उसे देखते रहने को दिल चाह रहा था। गहरे हरे रंग की साड़ी में वह खूब खिल रही थी। साधारण शृंगार में बहुत ही सुंदर लग रही थी। मैं चुहल पर उतर आया, 'आज तो तुम्हें ही निहारते रहने को मन कर रहा है लेकिन डर है कि कहीं धड़कनें न बंद हो जायें।'
            'धत्त !' उसका चेहरा सूर्ख हो उठा था।
            'लगता है कि तुम्हारे पिताजी के नये मैनेजर साहब तुम पर मर मिटे हैं। अब तो मेरा पत्ता कटा।' मैं मजाकिया लहजे में था।
            'जलन हो रही है !' वह धीरे से हंसी।
            'वह तो स्वाभाविक है। लड़का अच्छा है, स्वस्थ-सुंदर और अच्छी नौकरीवाला है। तुम बहुत ही सुखी रहोगी।' चलते हुये मैंने उसकी ओर देखा।
            'जो कहना है कह लो।' वह संजीदा हो उठी थी।
            'डर लग रहा है। कहीं तुम भी मुझसे बिछड़ न जाओ।' और मैं भी गंभीर हो उठा था।
            'मुझ पर विश्वास नहीं है ?' ठहर कर उसने प्रश्नसूचक नजरों से मुझे निहारा। उसकी आंखें छलछला आई थीं।
            मेरा अंतर पिघल उठा था। मैं हंसा, 'ऐ पागल ! छोड़ो इन फिजूल बातों को। मजाक में फिल्म देखने का मूड खराब क्यों कर रहें हैं हम। चलो।'
            वह मुस्कुरा पड़ी। उसकी आंखों की गहराई में मुझे वह नजर आया जो मंजू की आंखों में मैंने कभी नहीं पाया था। हम दोनों चल पड़े।
             मंजू के साथ मैं कई बार फिल्म देख चुका था। बहुत सारे क्षण याद आकर जेहन में सक्रिय होने लगे थे। क्यों नहीं भुलाये जा सकते वे पल, बार-बार याद क्यों आते हैं ? मैं सोचने लगा था, सोमा का चेहरा आंखों में भर लेने की कोशिश करता हुआ यादों से दूर भागने की कोशिश करने लगा।
सिनेमा हॉल में मैं और सोमा पास-पास बैठे। सोमा सिमट कर बैठी थी। याद आया, मंजू ने ऐसा नहीं किया था। वह तो पहली ही बार मुझसे सट कर बैठ गयी थी। मैं सोचने लगा था, सोमा शर्मीली है। अच्छी बात है, यही तो नारियों का गहना है। धीरे-धीरे खुल जायेगी। फिल्म शुरू होते ही मैं सोमा की ओर झुक गया। अंधेरे में मुझे लगा कि जैसे वह और सिकुड़ गयी हो। मंजू ने तो मेरे हाथ में अपना हाथ डाल दिया था और मैंने उसके पांव पर अपना पांव चढ़ा दिया था। जांघें रगड़ खाने लगी थीं। उभार स्पर्श के आवेग में मचल उठे थे। यादों की गर्मी से मेरे पूरे शरीर में एक गरम श्रोत रिसने लगा। मैंने धीरे से अपना हाथ सोमा की ओर बढ़ाया। वह कसमसाकर फुसफुसाई, 'फिल्म देखने दीजिये न।'
             'कोल्ड !' मैं ठंडा पड़ने लगा था।
              हम दोनों फिल्म देखकर निकले, फिर एक रेस्टोरेंट में सीताभोग खाया। हम औपचारिक रूप से बातें करते हुये चल रहे थे। दो-एक बार उसने हल्की-सी चुहल करने की कोशिश करने की मगर मैं गुमसुम रहा। कुछ अच्छा नहीं लग रहा था।


              एक जगह मैंने दो मीठे पान खरीदे और हम दोनों पान खाते हुये घर की ओर चल पड़े। रात के लगभग नौ बजे थे। बर्दवान शहर बल्बों की रौशनी में जगमगा रहा था। हम दोनों धीरे-धीरे टहलते हुये चलते रहे। अचानक पीछे से किसी ने मेरे कंधे को थपथपाया। मैं चौंक कर मुड़ा। वह एक अपरिचित युवक था। मैंने पूछा, 'क्या बात है भाई ?'
             वह विद्रूपता से मुस्कुराया, 'भाई साहब ! जरा मैडम को कहें कि पान खाकर थूकते समय आगे-पीछे देख लिया करें। ये देखिये, इन्होंने मेरा पेंट कैसा कलरफुल बना दिया है !'
             मैंने देखा, उस युवक का पेंट पान की पीक के छींटे से गंदा हो गया था। सोमा की ओर देखा तो वह झट से उस युवक से बोली, 'भाई साहब ! माफ कर दीजिये, मैंने ध्यान नहीं दिया था।'
            'खैर, कोई बात नहीं, आगे से ध्यान दीजियेगा।' युवक गहरी सांस छोड़ता हुआ बोला और पलट कर चला गया।


             'बैकवर्ड !' मैं मन ही मन कसमसा उठा था। हम दोनों फिर चुपचाप घर की ओर चल पड़े। रास्ते में चलते हुये उसने कुछ बोलना चाहा मगर मेरा गंभीर चेहरा देख कर वह चुप लगा गयी। विचारों के बवंडर मेरे भीतर उथल-पुथल मचाने लगे थे। भविष्य की कल्पना के तार बिखर-उलझ कर रह गये थे। जीने के लिये तो उन्हें फिर से बुनना होगा लेकिन तारों के स्थान निश्चय ही बदल जायेंगे। सामान्य बनने की कोशिश में मैं हंसा, 'चलो, फिर पान खाते हैं।'
              उसने नहीं में सिर हिलाया और उसी तरह चुपचाप चलती रही। मैं भी चुपचाप चलने लगा था। एक झटके के साथ बदन हिल उठा। कुछ समय लगा था स्थिर होने में। परछाइयां सिमटने लगी थीं। अंधेरा सिमटने लगा था और कंपार्टमेंट में बाहर के बल्बों का रौशनी का कुहासा सिमट चुका था। मैंने खिड़की से बाहर की ओर झांका। यह सांइथिया स्टेशन था। बस, अब दो-तीन घंटे और, फिर मेरे सामने होगी एक नई जगह। प्रारंभ होगी एक नई शुरुआत की।
              सुबह का उजास आकाश में फैलने लगा था। मैंने अपने हाथ की घड़ी पर नजर डाली। सुबह के पांच बजने वाले थे। मैंने फिर नजरें घुमाई। मेरी इकलौती अटैची अपनी जगह सही-सलामत थी। दो-चार कपड़े और कुछ जरूरी कागजात उसमें डाल सब कुछ पीछे छोड़ आया था, बहुत पीछे।
दो दिन बाद, नौकरी ज्वायन करने के  'डेट' के एक दिन पहले आधी रात को चुपचाप बर्दवान हमेशा के लिये छोड़ देने के इरादे के साथ घर से निकल पड़ा था। सिन्हा अंकल के नाम एक पत्र डाल आया था कि वे लोग मुझे भूल जायें तो बेहतर हो। विवशत: मुझे बर्दवान छोड़ना पड़ रहा है। बाद में कभी आ सका तो आऊंगा और अपना घर बेच-बाच कर चला जाऊंगा। कोई अच्छा लड़का खोज-खाज कर सोमा की शादी कर दें। मि. सूर्य घोष अच्छे पात्र साबित होंगे। मेरी शुभकामनाएं उन लोगों के साथ हैं।


उस दिन के वाकये के बाद मेरे मन में यह निश्चय उभरा था कि इन 'बैकवर्ड' लोगों के परिवेश से मुझे बाहर निकलना होगा। मुझे एक सरकारी अफसर की नौकरी मिल गयी है, अब मुझे अपने आप को उसी तरह के 'स्टेटस' में प्रतिष्ठित करना है। सोमा तो .... बैकवर्ड .... कोल्ड ! क्या मिलेगा मुझे उससे शादी करके ? जीवन बहुत लंबा होता है और जीवन का हर निर्णय सोच-समझ कर लेना चाहिये।              यहां भावुकता से काम नहीं चलेगा। मंजू निश्चय ही समझदार थी। और आजकल कौन अपने भविष्य की नहीं सोचता। कल मंजू ने सोचा था, आज मैंने सोचा। कल सोमा भी एक नया निर्णय ले लेगी।
              थोड़ी देर सीटी बजने के बाद ट्रेन हल्के-हल्के झटकों के साथ सरकने लगती है और फिर गति में आ जाती है। सुबह के उजाले में अब सब कुछ साफ दिखने लगा था। तेज रफ़्तार के साथ आगे भागती हुई ट्रेन के साथ बाहर का हर कुछ, पेड़, खेत-खलिहान, गांव-मकान, नदी-नाले  पीछे छूटते जा रहे थे। मैं मन ही मन मुस्कुरा पड़ा। आगे बढ़ेने के लिये जरूरी है बहुत कुछ पीछे छूट जाना, उन्हें बिल्कुल भूल जाना भी।


(1997 में लिखी गयी मेरी पहली कहानी)

               ---------------------------------------------------------------------

विजय शंकर विकुज
द्वारा - देवाशीष चटर्जी
ईस्माइल (पश्चिम), आर. के. राय रोड
बरफकल, कोड़ा पाड़ा हनुमान मंदिर के निकट
आसनसोल - 713301
मोबाइल - 7430915414
ई-मेल - bbikuj@gmail.com

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रचनाकार: कहानी - विजय शंकर विकुज - थोड़ा-सा कुछ
कहानी - विजय शंकर विकुज - थोड़ा-सा कुछ
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