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लंगोट का पेटेंट - सुरेश खांडवेकर

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लंगोट का पेटेंट सुरेश खांडवेकर वह दिन नीले अक्षरों में लिखने लायक था। दिल्ली के लक्ष्मी नारायण मन्दिर में भक्तों की भीड़ थी। मन्दिर में फू...

लंगोट का पेटेंट

सुरेश खांडवेकर

वह दिन नीले अक्षरों में लिखने लायक था। दिल्ली के लक्ष्मी नारायण मन्दिर में भक्तों की भीड़ थी। मन्दिर में फूलों के पौधों में नीले गुलाब और सैलिबिडर्स की संख्या ज्यादा थी। नीचे दुकानों में कहीं-कहीं नीले जीन्स के कपड़े व थान थे।

भूमिगत पुल में दो-तीन और सड़क पार की दरी वाले दुकानों पर भी छोटे बच्चों के जीन्स के कपड़े थे।

जेकाब डेविस ने भगवान लक्ष्मीनारायण के सामने हिन्दु रीतिरिवाजों के अनुसार प्रणाम किया और धीरे-धीरे प्रदिक्षिणा करते हुए बाहर आकाशीय परिसर में आया। दृश्य बड़ा सुखद और भव्य लग रहा था। वह देवी-देवताओं की मूर्तियों को उसी तरह प्रणाम करते हुए पूर्व दिशा में आ गया। वहां दो सीमेंट के हाथी सूंड उठाये खड़े थे।

जेकाब डेविस जीन्स की पेन्ट पहने था। ऊपर एक पट्टेदार कत्थई कोट पहने था। सिर पर फ्रांस की छतरी नुमा हेट थी। आंखों पर मोटा चश्मा था। कंधे पर टेलर मास्टर का इंचटेप लटका था।

दिसम्बर की ठण्ड में मन्दिर के खुले आकाश में धूप अच्छी लग रही थी। वह कभी अपनी पेंट को देखता कभी गमले के फूलों को, तो कभी दर्शनार्थियों को। बीच-बीच में नीला रंग आता-जाता। वह इसे रहस्य मानते हुए सीढि़यों से नीचे उतरा और जूताघर में अपने जूतों के लिए घुसा। अकस्मात उसे एक चिर-परिचित चेहरा दिखाई दिया। जेकाब कुछ बोलता इससे पहले वह पूछने लगा, ‘वंडर! ग्रेट कोईंसिडेंट! आप मुझे पहचान रहे हैं?’

जेकाब ने सोचते हुए इंचीटेप उसके गले में डाला, ‘ओ एस, आई रिमेम्बर…. लेवी स्ट्रास। इटली जिनेवा। आई कान्ट फॉरगेट यू।’

‘हेव यू गाट दर्शना?’

‘एस, यू?’

‘मी टू- नाईस! गुड, लवली, ग्रेट।’

इतने वार्तालाप में ही वहां दर्शक भी कौतुहल से इन गोरो को देखते रहे। कुछ ही देर में वे मन्दिर के परिसर से बाहर निकल गये।

****

किसी समय दोनों की आयु लगभग 40-45 की थी। इस समय 165 वर्षों बाद उनकी भेंट हुई थी। इटली के जिनोवा में लेवी स्ट्रास की परचून की दुकान थी। वहीं पर वह मोटे-नीले कपड़े का थान भी बेचता था। सर्दियों में इस कपड़े की मांग ज्यादा होती थी। ओडने-बिछाने से लेकर मोटे कपड़े भी बनवाते थे लोग। वैसे जिनोवा में कुछ बुनकर भी थे। ईस्ट इंडिया कम्पनी के माध्यम से सारे यूरोप में भारत से खाद्यान्नों के साथ प्रतिदिन तरह-तरह का हजारों थान कपड़ा भी पहुंचता था।

अमेरिका के जेकाब ने जब पहली बार यह मोटा कपड़ा लेवी स्ट्रास की दुकान पर देखा, तो आश्चर्य से उछल पड़ा। रोज-रोज अपने मैले कपड़े देख परेशान भी था। स्ट्रास से बोला, ‘हम इसकी पेंटे बनाना चाहेंगे? इस पर मोटी सिलाई करेंगे। मोटे-मोटे बक्कल लगायेंगे। घुड़सवारों के कमर के नीचे टांगों में इसकी पैंटे देख रहा हूं। रफ एंड टफ, बॉडी सेफ। फिर लेडिज हो या जेंट्स स्मार्ट और बहादुर लगेगा।’

लेबी स्ट्रास बोला, ‘इस कपड़े पर बारिश की बूंदों का असर नहीं पड़ता। ब्लाटिनपेपर की तरह पानी सोख लेता है। भीगता है पर दिखता नहीं, मैलखोर है। महिना-महिना ना धोओ कोई फर्क नहीं पड़ता। इसे पहने सोते-लोटते रहो, कोई फर्क नहीं पड़ता। मजदूर, मिलिट्री, काउबॉय, कारीगर, घुड़सवार और हिप्पी सबको इसकी पैंट पसंद आयेगी---- यही सोचकर हमने जींस के कपडे़, पैंट और जैकेट पेटेंट करवा लिये।

जेकाब बोला, ‘अब जींस और डेनियम ब्राण्ड कहां से कहां पहुंच गया। अमीर-गरीब, ब्यूरोक्रेट-पालीटिशन, बिजनेसमैन, सिलीब्रेटिज, ब्यूटीशियन सब जींस और डेनिम पर फिदा हैं।’

जींस के फैशन ने यूरोप, अमेरिका, अफ्रिका, एशिया के सभी देशों के युवाओं को जकड़ लिया है।

जेकाब, ‘कहो कैसे हो? यहां कैसे? यूरोप को छोड़कर यहां इंडिया कैसे आ गये?’

‘तुम बताओ, तुम क्यों आये?’

‘माई फ्रेंड, माई सोल, माई माईन्ड डिस्टर्ब्ड। टू अपसेट! मेरी आत्मा भटकती नो पीस। एण्ड यू?’

‘सेम प्रॉब्लेम! हरे रामा केम इन मार्ट ड्रीम… टोल्ड फॉरगेट आल टेंस, कम टू मी।’

***

चमन गाईड ने दोनों को पहाड़गंज के एक होटल में ठहरा दिया। दोनों के परामर्श पर चमन ने उन्हें मिलिट्री रोड, दिल्ली की जीन्स मार्केट का चक्कर कटवाते हुए कहा, ‘अब भारत में सौ से ज्यादा शहरों में जीन्स के कपड़ों की मार्केट है।

दोनों गदगद हुए। हर गली में जीन्स की पैंट। छोटे-बड़े, गरीबों-अमीरों सबकी वैरायटी और तो और नकली लिवाईस, नकली डेनिम। दोनों अपने आविष्कार के विस्तार पर गदगद थे। पूरी दुनिया में जीन्स सामान्य और दबंग के रूप में फैली है।

दोपहर बाद चमन के साथ भीड़-भाड़ वाली गफ्फार मार्केट में गये। उसने वहां खड़े-खड़े गरमागरम छोले-भटूरे खिलाये। घंटे दो घंटे इसी मार्केट की वस्तुओं और तरह-तरह के ग्राहकों को निहारते रहे।

लेवी स्ट्रास बोला, ‘प्लान, नॉनवेज डीनर टू डे…’

चमन बोला, ‘नो सर, आई विल नाट टेक नॉनवेज टूडे। टूडे इस ट्यूजडे, डे ऑफ हनुमान…. मंगलवार। ’

अचानक लेवीस स्ट्रॉस को झटका लगा…. ‘येस येस, दिस इज हनुमान…. हू सेंट अस अगेन दिस लाईववल्ड। एण्ड स्पेशियली इंडिया।’

जेकाब, ‘आई फिल सो….’

चमन ने पूछा, ‘क्या हुआ इन हेवन…? वाट हेपंड?’

दोनों बारी-बारी से बोलने लगे।

‘मिस्टर चामन गाईड, हमको वानर सेना असई मीन मंकी फोर्स उठाया और हनुमान दरबार ले गया।

लेवीस स्ट्रॉस बोला, ‘हमको ऐसा लगा, वहां हेवन में हनुमान गॉड गदा उठाकर हमसे पूछ रहे हैं, ‘हम राम सेतु बनाया हमने पेटेंट किया? नहीं। हम माउंटेन उठा लाये, संजीवनी लाये हम पेटेंट किया? नहीं ना। हमारा राम नाम का बड़ा-बड़ा स्टोन ओसियन में स्विम किया हमने पेटेंट किया? नहीं ना?’

दोनों की इन्द्रियां शून्य थी, किन्तु अंर्तचेतना से सुन रहे थे, ‘हमारे फोलोअर्स ने मिस्टेक किया। तुमने भी बहुत बड़ा मिस्टेक किया। तुम भी हमारे स्विम करने वाले स्टोन का पेटेंट करते तो पूरी दुनिया में उसकी मार्केट बनती। ओसियन में बड़ी-बड़ी टाउनशीप खड़ी होती! होती ना? बट यू मस्ट नो। ओसियन ब्रीज बनाने की टेक्नोलॉजी नल और नील इंजीनियर के पास था। लाखों साल पहले, वो आज भी सिक्रेट है, तो तुम हल्दी, चंदन, अदरक, स्पाईस, हर्बल का पेटेंट करने लगा। बड़ी-बड़ी मार्केट देखकर।

दोनों गर्दन हिला रहे थे। फिर उन्हें लगा हनुमान जी आवेश में आदेश दे रहे हैं। उनका शरीर बढ़ता गया दोनों की आंखें उनकी लंगोट देखने लगी। फिर आवाज आई, ‘तुम अमेरिका और अमेरिका और यूरोप वालो को पेटेंट करने की बीमारी है। तो चलो हमारे लंगोट का पेटेंट करो। बचपन में तुम्हारी मां ने तुम्हें लंगोट पहनाया था नेपी अण्डरस्टैंड। ’

‘हां।’

दुनिया में इसकी मार्केट बढ़ेगी। कच्छे, जांघे बेकार हैं। ये लंगोट देखी है तुमने बचपन में। तुमने या तुम्हारे मां-बाप ने और उनके मां-बाप ने सबने सदियों से बचपन में इस लंगोट को बांधा है।’

‘लांगोट में स्वास्थ है, अध्यात्म है, सामाजिकता है। लंगोट चारो युगों का साक्षी है। इसका बीच का हिस्सा ब्रह्म है, बाकी तीन हिस्से त्रेता, द्वापर, और कलयुग है। कलयुग में लंगोट सिकुड़ता गया।’

क्या है? कलयुग में कच्छे जांघे बने हैं और अब तो बच्चों के लिए हगी बनाये हैं। हगी में स्वास्थ नहीं पॉल्यूशन और बीमारी है। नो क्लिननेस, स्वच्छता के खिलाफ। लंगोट में ब्रह्मचर्य, संस्कार और सेलीवेट है।

लंगोट का पेटेंट करो और नया इतिहास लिखो।’

चमन गाइड को ऐसा लगा कि लेबी स्ट्रॉस और जेकाब कोई स्वप्न देख रहे हैं। उसने दोनों को जगाया।

****

चमन गाईड से रहा ना गया बोला, ‘इंटेरेस्टेड टू विजिट हनुमान गॉड----। कनाट प्लैस? हनुमान टेम्पल? ऑल प्रॉब्लम्स विल साल्व, वेरी नीयर पचकुईया हनुमान टेम्पल बिग हनुमाना, वेरी रियल।

‘एस-एस-एस…. नो नॉनवेज। टू डे, प्लान दर्शना… हनुमान मान्डिर।’

चमन जेकाब और लेवी स्ट्रॉस को श्याम के समय पचकुईया हनुमान मन्दिर ले गया। मेट्रो रेल से ये हनुमानजी ऐसे दिखते जैसे कोई विराट दिव्य पुरुष आसमान छू रहे हो।

पूजा का सामान और प्रसाद लिये तीनों दर्शनार्थियों की पंक्ति में खड़े हो गये। खिसकते-खिसकते हनुमानजी के पैरों के सामने आ गये। हनुमानजी के पैर पत्थर की शीला की तरह चमक रहे थे। धीरे-धीरे दोनों ने अपना माथा ऊपर किया तो हनुमानजी की लंगोट का तुर्रा झूल रहा था। लंगोट चमक रही थी।

ये संयोग ही था कि फिर से लंगोट दिखाई दी और पिछली सारी बातें याद आने लगी। फिर उन्हें लगा बाजरंगबली फिर से सुना रहे हैं ‘ब्रह्मचारी साधू-संतों से लेकर बच्चों में इस लंगोट की डिमांड है। पुराने व्यापारी तो अपने बहिखाते इसी लाल लंगोट में बांधते थे। डिवोशनल भक्त लोग अपने पोथी-पुरान इनमें बांधते थे। कई भक्त तो इसे दीवार में टांगते थे और पूजा करते थे। कुछ तो पत्थर में लंगोट लपेटते हैं और हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं।’

अब दोनों की आंखें हनुमानजी की आंखों से टकराई तो घबराने लगे…। थरथराहट में दोनों ने घुटने टेके और अपने कान पकड़े। चमन ने प्रसाद लिया और दोनों को बाहर निकाला।

अंधेरा हो रहा था। इसी समय बंदरों की टोली हनुमान मन्दिर के पास आकर बैठ गयी। कुछ इधर-उधर उछलने लगे। मंदिर पर चढ़ने लगे।

एकाएक चमन बोला, ‘देखो मिस्टर जेकाब, मिस्टर स्ट्रॉस वो देखो, तीन बंदर। थ्री मंकीज आर हेंगिंग जीन्स एण्ड जम्पिंग, रनिंग। वे जींस की पैंट लिये दौड़ रहे हैं और वह देखो भिखारियों की भीड़ में एक बंदर जींस की पैंट को फाड़ रहा है और… एंड लास्ट, सी दे ग्रेट बेगर एट दी गेट ऑफ दी टेम्पल… बेगर्स वीयरिंग टीयर्ड जींस पैंट्स एण्ड बेगिंग मनी!

अब चमन बोला, ‘माई डियर गेस्ट, डोन्ट फारगेट, हियर इन इंडिया डेमोक्रेसी एज वेल एज ईक्वालिटी। नो डिफेरेंस फ्री राईट ऑफ फैशन।

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रचनाकार: लंगोट का पेटेंट - सुरेश खांडवेकर
लंगोट का पेटेंट - सुरेश खांडवेकर
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