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नया प्रपंच - ज्ञानदेव मुकेश की लघुकथाएँ

नया प्रपंच

नेताजी अपने दलबल के साथ बाढ़ प्रभावित क्षेत्र के दौरे पर निकले हुए थे। एक जगह सड़क बेहद ऊबड़-खाबड़ थी। उनकी गाड़ी हिचकोले खाने लगी। नेता जी उम्रदराज थे। उनको चक्कर आने लगा। उन्होंने गाड़ी रोकने की हिदायत दी। ड्राइवर ने बताया, ‘‘साहब, आगे रास्ता और भी गड़बड़ है। कई जगह जल-जमाव भी है। यदि आप आज्ञा करें तो हम वापसी की राह ले सकते हैं।’’

नेता जी गहरी चिन्ता के सागर में उतर गए। माथे पर छलछला आए पसीना पोंछते हुए उन्होंने अपने कुनबे के लोगों से कहा, ‘‘मीडिया में आज मेरे दौरे की न्यूज फ्लैश हुई है। यदि हम ऐसे ही बैरंग लौट गए तो बड़ी जग हंसाई होगी। बाढ़ प्रभावित क्षेत्र से हमें वैसे ही वोट नहीं मिलता। आगे भी वोट मयस्सर नहीं होगा।’’

तभी नेता जी का एक कार्यकर्ता धीरे से आगे आया और कहा, ‘‘साहब, एक प्रस्ताव रखूं ?’’

नेता जी ने आज्ञा दी। उस कार्यकर्ता ने कहा, ‘‘सर, मेरी शक्ल-सूरत और कद-काठी आपसे बहुत मिलती-जुलती है। आप इजाजत दें तो रात में मैं ‘आप’ बनकर बाढ़ प्रभावित क्षेत्र में चला जाता हूं। वहां ज्यादा बोलूंगा नहीं। राहत सामग्री फटाफट बाटूंगा और जल्दी से वापस खिसक लूंगा। मीडिया को अपना सर ढककर कवरेज दे दूंगा।’’

नेताजी सोचने-विचारने लगे। उन्होंने अपने साथियों से कहा, ‘‘हम बुरे चरित्र के लोग होते हैं। फिर भी हम छद्म साधनों से जनता के बीच अच्छी छवि उभारकर रहते हैं और बिचारी अल्हड़ जनता झांसे में रहती है। चलो, आज एक झांसा और सही।’’

इस नाटकीय योजना पर नेता जी के सभी गुर्गे तालियां ठोकते हुए ठहाका लगाने लगे।

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विकल्प
    
गुप्ता जी और उनकी पत्नी किराए के मकान में अकेले रहते थे। वे वृद्ध हो चुके थे। दैनिक कार्य निबटाने में कई तकलीफें होती थीं। मगर असली दंश अकेलेपन का था। ऐसी नहीं कि उनकी संतानें नहीं थीं। उनकी होनहार और योग्य संताने थीं। दो बेटे और एक बेटी। बेटी पराई होकर ससुराल चली गई थी। और बेटे भौतिकता में डूबकर माता-पिता से पराए होकर अलग जा बसे थे। उनमें इतना लोक-लिहाज जरूर था कि वे हर हफ्ते माता-पिता से मिलने आते।
मगर इधर कुछ हफ्तों से उनके दोनों बेटे अपनी मायावी दुनिया में कुछ ज्यादा ही डूब गए थे। महीना होने को आया था। मगर वे माता-पिता से मिलने नहीं आए। मां बेटों को फोन करती तो वे कोई-न-कोई बहाना बना जाते।
गुप्ताजी को अकेलापन ज्यादा डसता था। वे अक्सर रोने लगते। एक दिन वे अखबार पढ़ रहे थे। समाचार छपा था कि आजकल गर्मियों में पक्षी पानी के लिए तरस जाते हैं। कई पक्षी पानी बिना मर जाते हैं। समाचार के साथ एक अपील भी छपी थी कि अपने घर के मुंडेर पर पानी के बर्तन रखना न भूलें। इन प्यासे पक्षियों को जीवन-दान दें।
गुप्ताजी इस बात से बड़े दुखी हुए। उन्होंने उसी दिन से घर के बालकनी में पानी रखना शुरू कर दिया। शुरू में तो एक-दो पक्षी ही बालकनी में आते दिखे। मगर दो-चार दिन बीतते-बीतते पक्षियों की कतारें लगनी शुरू हो गईं। पक्षियों की चहचहाहट से गुप्ता जी का बालकनी गुलजार हो गया। अब तो पक्षियों को पानी पिलाना और उनकी चहचहाहट में डूब जाना गुप्ताजी के मन लगाने का साधन बन गया। उनका अकेलापन टूटने लगा। गुप्ताजी के दिन अच्छे निकलने लगे।
तभी एक दिन बड़े बेटे का फोन आया, ‘‘पापा, सारी। डेढ़ माह हो गए आए हुए। हम आज ही आ रहे हैं आपसे मिलने....’’
बेटों के फोन के लिए आतुर रहनेवाले और ऐसे समाचार पर कूदनवाले गुप्ताजी आज एकदम शांतचित्त थे। उन्होंने बेटे से कहा, ‘‘बेटा, कोई जरूरी काम हो तो पहले वह देख लो। आना-जाना तो लगा ही रहता है।’’
                                                    
                                                 

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- ज्ञानदेव मुकेश

पता-

फ्लैट संख्या-301, साई हारमनी अपार्टमेन्ट,

अल्पना मार्केट के पास,

न्यू पाटलिपुत्र कालोनी,

पटना-800013 (बिहार)


e-mail address - gyandevam@rediffmail.com

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