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साहित्यम् इ पत्रिका –वर्ष १ अंक 6 - संपादक - यशवंत कोठारी

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साहित्यम् इ पत्रिका –वर्ष १ अंक 6 निशुल्क लघुकथा अंक सम्पादकीय –कभी लघुकथाएं पत्र-पत्रिकाओं में फिलर के रूप में आती थी ,समय बदला आज लघुकथा स...


साहित्यम् इ पत्रिका –वर्ष १ अंक 6 निशुल्क

लघुकथा अंक

सम्पादकीय –कभी लघुकथाएं पत्र-पत्रिकाओं में फिलर के रूप में आती थी ,समय बदला आज लघुकथा साहित्य की मुख्य धारा में हैं , सैकड़ों लोग लिख रहे हैं, शोध हो रहे हैं, समीक्षाएं व् पुस्तकें धडाधड आ रही हैं.  UGC, विश्वविद्यालय आयोग इस विधा को मान्यता देने की तैयारी कर रहा है,ऐसे माहौल में यह विनम्र प्रयास , आशा है आप को पसंद आएगा. बहुत सारी रचनाएँ आई, चयन मुश्किल था मगर किया.

सहयोगी लेखकों का आभार.

फेस बुक पर इ पत्रिका का यह प्रयास बिलकुल नया था फिर यह जिद कि लेखकों को मानदेय दिया जाय , मगर आपके आशीर्वाद से यह संभव हुआ . आभार प्रणाम . फ़िलहाल इस प्रयास को सफलता के साथ सम्पन्न मानते हुए विराम. जल्दी ही एक नया प्रोजेक्ट आएगा. तब तक कृपा बनाये रखें.

प्रणाम , शुभकामनायें

यशवंत कोठारी

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लत------आशा शर्मा

“जैसी माँ वैसी बेटी... एकदम लापरवाह... अरे! इतना भी क्या मोबाइल का चस्का... दोस्तों से बातें तो बाद में

भी हो सकती थी... ट्रेन छूट जाती तो?” शैलेश ने पत्नी रीमा को फोन पर ही लताड़ना शुरू कर दिया.

“लेकिन हुआ क्या? और आप तो दिल्ली जा रहे थे ना... बीच में बेटी कहाँ से आ गई? वो तो बेचारी जयपुर में

कोचिंग ले रही है...” रीमा को पति की बात कुछ समझ नहीं आई.

“दिल्ली ही जा रहा हूँ... रेलवे स्टेशन पर ही हूँ... अभी तुम्हारी बेटी का फोन आया... वो इंटरव्यू देने के लिए

भोपाल जा रही थी... दोस्तों से बातें करते-करते गलत प्लेटफॉर्म पर चली गई... वो तो समय रहते पता चल गया... भाग

कर ट्रेन पकड़ी... छूट जाती तो? पता नहीं मोबाइल की ये कैसी लत है...” शैलेश ने पूरी बात बताई. हालाँकि उसका

गुस्सा अभी भी उबाल पर था.

“अरे हो जाता है कभी-कभी... बच्ची है... इसे इतना तूल देने की क्या जरूरत है...” रीमा ने बेटी का पक्ष लिया.

“तुम तो कहोगी ही... उफ़्फ़! तुमसे बातें करते-करते प्लेटफॉर्म नंबर तीन पर आ गया जबकि दिल्ली वाली ट्रेन तो

प्लेट फॉर्म चार पर खड़ी है... बाप रे! बंद करो ये फोन... कहीं ट्रेन छूट गई तो लेने के देने पड़ जाएंगे... माँ-बेटी दोनों एक

जैसी हैं...” शैलेश ने बड़बड़ाते हुये फोन काटा और प्लेटफॉर्म चार पर जाने के लिए फुट ब्रिज की तरफ दौड़ लिया.

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संस्कारों की बात

“अरी मिन्नी! आज तो तुम्हारी छुट्टी है... अपना कमरा साफ़ कर ले... दीवाली आ रही है...” अम्मा जी को मिन्नी का दिन चढ़ने तक सोना नहीं सुहा रहा था.

“ये अम्मा भी ना! पता नहीं क्यों हर दीवाली पूरे घर को उधेड़ कर रख देती हैं... अरे! हर रोज तो होती है सफाई... फिर ऐसा कौन सा कूड़ा छिपा रह जाता है जो सिर्फ दीवाली पर सफाई करने से ही बाहर निकलता है... माँ! समझाओ ना अम्मा को...” मिन्नी ने गुस्साते हुए चद्दर कुछ और ऊपर तक खींच ली.

“रहने दीजिये ना अम्मा जी! कल इसके कॉलेज जाने के बाद कमरा मैं साफ़ कर दूंगी.” मैंने बीच में आते हुए बेटी का पक्ष लिया.

“बहू! बात सफाई की नहीं, संस्कारों की है... इसी तरह तो संस्कार एक पीढी से दूसरी पीढ़ी में जाते हैं... दीवाली पर घर की साफ़-सफाई करना हमारी परम्परा का हिस्सा है.” अम्मा जी को मेरा मिन्नी की तरफदारी करना अच्छा नहीं लगा.

हर दीवाली अम्मा जी का बड़बड़ाना और मिन्नी का झल्लाना बदस्तूर जारी रहता है. मुझे ही दोनों के बीच पुल बनकर स्थिति को संभालना पड़ता है.

इस साल मिन्नी कॉलेज खत्म करके आगे की पढ़ाई करने हॉस्टल चली गई. दीवाली आने वाली है. हर साल की तरह घर में साफ़-सफाई का काम शुरू हो गया.

“आज मिन्नी का फोन नहीं आया! रोज तो सुबह-सुबह ही आ जाता है...” अम्मा जी बार-बार उसके कमरे में आ-जा रही थी.

“आज छुट्टी हैं ना... सो रही होगी... चलिये आज मैं आपसे विडियो चैट करवाती हूँ.” मैंने मिन्नी को विडियो कॉल लगाईं.

“अरे! ये तुमने अपना कमरा क्यों उधेड़ के रखा है?” मैंने विडियो में उसका बिखरा हुआ कमरा देख कर कहा.

“कुछ नहीं माँ! दीवाली की सफाई कर रही थी.” मिन्नी ने कहा. तब तक अम्मा जी भी मेरे पास आ चुकी थी. मिन्नी को हॉस्टल के कमरे की सफाई करते देख कर वे भी मुस्कुरा दी.

संस्कार एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्थानांतरित हो चुके थे.

आखिरी इच्छा

सुनो! कल माँ का पहला श्राद्ध है... पंडित जी को कहलवा दिया ना! सब रिश्तेदारों को भी बुलाना है... कोई कमी नहीं रहनी चाहिए... आखिर एक बड़े अधिकारी की माँ थी वो... मुझे इस मुकाम तक पहुँचाने के लिए उन्होंने दिनरात एक कर दिए थे... सही मायने में कल का दिन उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि देने वाला होगा..” सुकेश अपनी रौ में कहता जा रहा था मगर निधि किसी और ही दुनिया में विचर रही थी.

उसे आज भी याद है वो काली रात जब सुकेश की माँ यानि उसकी सास ने अंतिम साँस ली थी. दिन भर निधि उनके साथ ही बनी रही थी. कितनी कातर आवाज में उन्होंने उसका हाथ थामते हुए कहा था- “निधि! बेसन की पकौड़ियाँ खाने का बहुत मन हो रहा है.”

सबकी निगाह बचा कर निधि उनके लिए पकौड़ियाँ बना लाई थी. पकौड़ियाँ देख कर उनके चेहरे पर जो तृप्ति की मुस्कान उभरी थी वह आज भी निधि के मन मस्तिष्क पर ज्यौं की त्यौं अंकित है. अभी उन्होंने प्लेट की तरफ हाथ बढाया ही था कि सुकेश आ गया.

            “क्यों माँ की जान लेने पर तुली हो? क्या तुम्हें याद नहीं कि डॉक्टर ने क्या कहा था? आँतों के कैंसर में चटपटा खाना जहर की तरह होता है.” सुकेश ने प्लेट उठाकर सिंक में उलट दी थी. और उसी रात माँ अपनी आखिरी इच्छा दिल में धरे ही विदा हो गई थी. निधि अपनी आँखें पोंछती हुई वर्तमान में लौट आई.

            “पूरी-हलवा, दही बड़े, राजभोग, कचौरी... सब हो गया ना... लाओ थाल लगा दो... मैं छत पर कौवों को बुलाता हूँ.” सुकेश ने धोती पहनते हुए कहा.

            “बस! दो मिनट... बेसन की पकौड़ी निकाल ही रही हूँ...” निधि ने रसोई में से जवाब दिया.

            “इतना सब तो हो गया ना... तुम कहाँ इस टुच्ची सी पकौड़ी में उलझी हो...” सुकेश नाराज होता हुआ बोला मगर आज निधि ने उसकी एक न सुनी. थाली में सब पकवानों के साथ एक कटोरी में पकौड़ियाँ भी रख दी.

सुकेश थाल लेकर कौवों को आमंत्रित करने लगा. कौवों का एक झुण्ड आता देख सुकेश थाल को छत की मुंडेर पर रख कर एक कोने में खड़ा हो गया.

कौवों का झुण्ड थाली पर लपका और एक-एक कर सारी पकौड़ियाँ चोंच में दबा कर उड़ गया.

सुकेश अवाक् खड़ा था. निधि मुस्कुरा दी. माँ की आखिरी इच्छा पूर्ण हुई.

इंजी. आशा शर्मा

A-123, करणी नगर (लालगढ़)

बीकानेर- 334001

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लघुकथा.

पुण्य लाभ

-प्रभाशंकर उपाध्याय

तीन जने तथा तीनों ही हद दर्जे के कंजूस और झगड़ालू। जब वृद्धावस्था आयी तो सोचा कि संचित धन में से कुछ खर्च कर तीर्थ यात्रा कर ही कर लें। आखिर, थोड़ा बहुत पुण्य अर्जन भी होना चाहिए।

लिहाजा, कुछ धार्मिक स्थलों की उन्होंने यात्रा की। हर जगह, उनके विवाद हुए। धन उसका मूल कारण था। कहीं चढावे को लेकर, कहीं पंडितों-पंडों को दक्षिणा देने बात थी तो कहीं ढाबे-घर्मशाला के भुगतान का मामला था।

खैर किसी तरह यात्रा सम्पन्न हुई। यात्रा के अंतिम पड़व पर उन्होंने साधुओं को भोजन कराने का मानस बनाया। संयोगवश, एक स्थान पर उन्हें तीन साधु दिखाई दिए। वे यात्रियों से भोजन हेतु गुहार कर रहे थे।

लिहाजा, तीनों जन उन साधुओं को एक ढाबे पर ले गये। संतों ने भोजन किया और आशीर्वाद देते हुए चले गये। अब, भोजन का बिल आया। बिल को देखकर उनमें विवाद शुरू हो गया और उस चख-चख की वजह यह थी कि उनमें से प्रत्येक यह चाहता था कि जिस साधु ने सबसे कम खाया, उसका भुगतान वह स्वयं करेगा।

2

बहता पानी

वह अपनी रेलगाड़ी की प्रतीक्षा में प्लेटफार्म की एक बैंच पर बैठा था। सामने खड़ी हुई रेलगाड़ी रवाना हो गयी और रेल की पटरियां नज़र आने लगी थीं। उसने देखा कि बोगियों में भरने वाले पानी के पाइपों के चार वाल्वों से बड़ी तेजी से जल का प्रवाह हो रहा था। प्लेटफार्म पर यात्रियों की भीड़ थी किन्तु किसी का ध्यान उस ओर नहीं था। उसने चारों ओर देखा लेकिन रेलवे का कोई भी कर्मचारी आस पास नज़र न आया। उसकी गाड़ी के आने का संकेत हो चुका था किन्तु पानी का यूं बहते जाना उसे सहन न हुआ। वह, पटरियों के मध्य उतर पड़ा। उसने दो वाल्वों को बंद कर दिया। शेष दो को वह बंद करने जा रहा था कि उसे प्लेटफार्म से एक कड़कड़ाती आवाज सुनाई दी, ‘‘अबे इधर आ..।’’ उसने देखा कि रेलवे सुरक्षा बल का एक सिपाही उसे पुकार रहा था।

वह रूका नहीं और खुले हुए वाल्वों की दिशा में बढा। सुरक्षा बल का कांस्टेबल नीचे उतर आया और उसका कॉलर पकड़ कर गुर्राया, ‘‘भागता है, स्साले...चल थाने।’’

बहते पानी को बंद करने की उसकी बात को अनसुना कर सिपाही उसे थाने ले आया। उस पर रेल लाइन पार करने तथा रेलवे बल को चकमा देकर भागने के जुर्म के कागजात भरे जाने लगे। उसी बीच उसकी गाड़ी आकर चली गयी। पटरियों के मध्य वाल्वों से कलकल करता जल, अनवरत बह रहा था।

3.

धार्मिक लोग

वे धार्मिक लोग थे और पद यात्रा पर थे। उस दल में, भक्ति संगीत पर नाचते-झूमते हुए भक्तजनों का समूह सबसे आगे था। उसके पीछे झांकियां एवं संगीत मंडलियां थीं और सबसे पीछे थे पद यात्री। कुल मिलाकर पचास-साठ श्रद्धालु जन थे। उस समय वे एक शहर के साफ सुथरे पक्के मार्ग से गुजर रहे थे।

तभी किसी ने केले वितरित किये। पद यात्रियों ने उन्हें छीला, खाया और छिलके सड़क पर डाल दिये। यात्रा आगे बढ गयी। पीछे लगभग आधा किलोमीटर तक केलों के छिलके नुचे हुए पक्षी के पंखों की भांति सड़क पर यत्र-तत्र बिखरे हुए थे। जब तक छिलके पड़े पड़े सूख न गये, तब तक तकरीब चार-पांच पैदल चलते राहगीर और दस-ग्यारह दुपहिये वाहन फिसल गए।

4

तेरी बहन लगती है, क्या?

कस्बे के स्टैंड से बस रवाना हुई थी कि एक युवा महिला झपटकर उसमें चढ गयी। उसके पीछे ही भागता हुआ एक अधेड आदमी भी बस में आ चढा था। वह उस औरत का हाथ पकड़ कर नीचे उतारने का प्रयत्न करने लगा। युवा स्त्री ने दरवाजे का पाइप कस कर पकड़ लिया और हांफती कांपती चिल्लाने लगी, ‘‘नहीं जाऊंगी...नहीं जाऊंगी....।’’

मैं दरवाजे के पास वाली सीट पर बैठा था, पूछा, ‘‘इससे जबरदस्ती क्यों कर रहे हो?’’

वह बोला, ‘‘यह मेरी औरत है, घर से भाग रही है।’’

घबराई हुई युवती बोली, ‘‘मैं थाने जाऊंगी...थाने जाऊंगी।’’

मेरा उस बस से प्रायः आना जाना हुआ करता था अतः ड्राइवर और कंडक्टर मेरे परिचित थे। मैंने ड्राइवर को कहा कि इसी रूट पर पुलिस थाना है और वह थाने के आगे महिला को उतार दे। उस स्त्री के पीछे चढा पुरूष अब, मोबाइल पर बात करके किसी को थाने पर बुला रहा था।

कोतवाली के आगे बस रूक गयी और वह युवती दौड़ती हुई थाना परिसर में जा घुसी। पीछे पीछे वह व्यक्ति भी चला गया।

दो दिन बाद मैं उस रूट पर फिर लौटा तो जिज्ञासा मिटाने के लिए थाने के सामने ही उतर गया। वहां उपस्थित इंचार्ज से मैंने उस प्रकरण के बारे में पूछा। वह मूंछों मूंछों में ही मुस्कराया, ‘‘साली बदजात! घर से भाग रही थी....उसे उसके मर्द के सुपुर्द कर दिया।’’

मैंने कहा, ‘‘उसके शरीर पर मारपीट के निशान थे। वह बहुत घबरायी हुई थी और आपने कोई केस ही नहीं बनाया।’’

थाना प्रभारी की त्यौंरियां चढ गयीं, ‘‘इतना इंटरेस्ट क्यों ले रिया है? तेरी बहन लगती थी क्या?’’

मैं अपना सा मुंह लेकर लौट पड़ा।०००००

-प्रभाशंकर उपाध्याय

193, महाराणा प्रताप कॉलोनी

सवाईमाधोपुर (राज.)

पिन- 322001

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लघुकथा

सामर्थ्य

प्रताप दीक्षित

सुबह महरी रोनी सी आवाज में गिड़गिड़ा रही थी। पत्नी ने पिछले माह उसके पांच दिनों तक काम पर न आने के पैसे काट लिए थे। वह अपनी सफाई दे रही थी, ‘‘मालकिन! सर्दी अधिक होने से वह और उसका गोद का बच्चा दोनों बीमार हो गए थे।’’ पत्नी का पक्ष न्यायोचित ही था। ‘‘एक दो दिनो की बात हो तो बर्दास्त भी कर ली जाए। अब यह रोज रोज की तुम्हारी या बच्चे की बीमारी नहीं चल सकती।’’

     ‘‘बीबी जी, यह बीमारी तो अपने वश में है नहीं। मेरी अपनी होती तो फिर भी किसी तरह आ जाती। यह बच्चा छोड़ ही नहीं रहा था।’’ ‘‘तो फिर काम छोड़ दो।’’ पत्नी ने चेतावनी दी। उन्होंने पत्नी की बुद्धिमत्ता, अनुशासन और व्यवस्था की प्रशंसा की - यह लोग ऐसे ही ठीक रहते हैं।

अगली सुबह पानी बरसने से ठंडक और अधिक हो गई थी। काम वाली सुबह ही काम निपटा कर चली गई थी। ‘‘दिसंबर चल रहा है। आपकी कुछ छुट्टियां तो बाकी होंगी, कल से दो-चार दिन की ले लो।’’

‘‘नेक काम में देर क्या? आज से ही क्यों नहीं। अब आज पूरा आराम। कल पिक्चर और कविता भी तो पूरी करनी है। वह एक लोकप्रिय मंचीय कवि भी थे।

‘‘आज से? क्या दफ्तर में प्रार्थनापत्र नहीं देना होगा?’’ वह पत्नी के सीधेपन पर ठहाका लगाया, ‘‘छुट्टी का प्रार्थनापत्र, वह भी अग्रिम! क्ली ही तो कार्यालय अधीक्षक उनके सामने गिड़गिड़ा सा रहा था - हेड आफिस से आडिट टीम आ रही है। यह रिटर्न आज ही पूरा करना जरूरी है।

बहुमुखी प्रतिभा के धनी शर्मा जी ने अपने लंबे बालों पर हाथ फेरते हुए बड़ आत्मविश्वास से कहा था, ‘‘अब यह रिटर्न-विटर्न छोड़िए। बन्दे का समय पूरा हुआ।’’ साथ ही दो लाइनें भी जड़ थीं - और भी गम हैं जमाने में - -’’

अधीक्षक का, शर्मा जी के यूनियन के पदाधिकारी होने के कारण , आगे कुछ कहने का साहस नहीं हुआ था।

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लघुकथा

विश्वास

प्रताप दीक्षित

वह प्रसिद्ध आलोचक थे। कविताएं भी लिखते। न केवल साहित्य बल्कि रंगमंच, चित्रकला आदि के क्षेत्र में उनकी ख्याति थी। गोष्ठियों सभाओं में उनके सामने उनके सामने लोगों की मुंह खोलने की हिम्मत न पड़ती। एक शासकीय कार्यालय में अधिकारी थे। परिष्कृत रुचि के व्यक्ति, डाई किए हुए बाल, लकालक - परफ्यूम में महकते कपड़े। मैं अक्सर उनके पास जाकर बैठता। काफी के साथ ही समकालीन कहानी, कविता, कविता, उपन्यास आदि पर चर्चा होती रहती। बातचीत के दौरान ही वह अपने सहायक, स्टेनो, चपरासी आदि को आदेश देते रहते। काम निपटाते रहते।

प्रत्येक विषय पर उनका दृष्टिकोण स्पष्ट रहता। हर समस्या पर वैज्ञानिक ढंग से विचार करते। ऐतिहासिक तथ्यों, तर्कों, प्रमाणों के साथ। ईश्वर, पौराणिक आख्यानों, भावुकतापूर्ण रचनाओं का मज़ाक़ उड़ाते। उनका कहना था - ‘‘इनका कोई प्रमाण है? क्या आपने स्वयं अपनी आंखों से इन्हें देखा है?’’

एक दिन हम लोग साहित्यिक चर्चा में मशग़ूल थे। तभी एक आधुनिक सी महिला केबिन में आईं। मित्र ने खड़े होकर उनका स्वागत किया। कुछ देर की दफ्तरी चर्चा के बाद वह चली गईं। मैं चुपचाप एक पत्रिका के पृष्ठ पलटता रहा था। उनके जाने के बाद मित्र महोदय ने अपना चश्मा उतारा। एक रहस्यमय मुस्कान के साथ मेरी ओर देख कर बोले, ‘‘यह हमारे आफिस में लिपिक थीं। अब जन-सम्पर्क अधिकारी हैं। डायरेक्टर साहब की ‘विशेष कृपा के कारण।’ वे एक आंख दबा कर मुस्कराए थे, ‘‘डायरेक्टर महोदय से बहुत ख़ास संबंध हैं।’’

     ‘‘क्या सचमुच? आपने तो स्वयं अपनी आंखों से देखा होगा!’’ मेरे मुंह से अचानक निकल पड़ा।

वह कुछ हतप्रभ हुए, ‘‘क्या बेवकूफी की बात करते हो! इन बातों का क्या कोई प्रत्यक्ष प्रमाण होता है?’’ वह नाराज हो गए थे।

प्रताप दीक्षित

m एम डी एव 2/33, सेक्टर एच,

जानकीपुरम, लखनऊ 226 021

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टाइम

आज द़फ्तर पहुँचने में बहुत देरी हो गई थी. ब्रीफकेस उठाए अपने कमरे की ओर जाते हुए मना रहा था कि कोई अधीनस्थ नज़र न आ जाए. कोई अधीनस्थ अगर अपने अफ़सर को देर से द़फ्तर में आता देख ले तो फिर अफ़सर की अफ़सरी की कड़क कमज़ोर पड़ जाती है न. जल्दी-जल्दी कमरे का सीक्रेट लॉक खोलकर धड़कते दिल से कमरे के अन्दर चला गया.

एकाध मिनट के बाद मुँह-हाथ धोने के लिए कमरे से बाहर निकला, तो देखा मेरा एक अधीनस्थ अपना बैग उठाए जल्दी-जल्दी अपने सेक्‍शन की ओर जा रहा था. उसे देखते ही अफ़सराना लहज़ेवाली रौबभरी आवाज़ में मैंने उससे कहा, ‘‘इतना लेट क्यों हो, टाइम से आया करो!’’

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ख़ुशी बनाम ख़ुशी

मोबाइल फोन पर यह सूचना मिलते ही कि नाटक प्रतियोगिता में मेरे नाटक के आलेख को प्रथम पुरस्कार मिला है, मैं ख़ुशी से उछल पड़ा. फिर झट-से दूसरे कमरे की तरफ़ लपका जहाँ माँ और सुधा (मेरी पत्नी) बैठे थे. उस कमरे में पहुँचते ही मैंने ख़ुशी से चहकते हुए कहा, ‘‘प्रथम पुरस्कार मिला है मेरे नाटक को!’’

सुनते ही माँ ने ख़ुशी से भरी आवाज़ में कहा, ‘‘वाह बेटे, जुग-जुग जिओ, पहला इनाम मिलना तो बहुत ही बड़ी बात है.’’

‘‘कितने पैसे मिलेंगे?’’ ख़ुशी सुधा की आवाज़ में भी थी.

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: हरीश कुमार ‘अमित’

304 एम.एस.4,

केन्‍द्रीय विहार, सेक्‍टर-56,

गुरूग्राम-122011 (हरियाणा)

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शक्ति प्रदर्शन

कालू का मदिरापान करना और घर आकर पत्नी को पीटना अब आदत में शुमार हो चुका था। जानकी की तो पीट पीटकर सूरत ही ख़राब हो चुकी थी। एक गाल पर थप्पड़ की सूजन कम होती तो दूसरा गाल फूलने लग जाता। कालू के इस दुर्व्यवहार के किस्से सर्वत्र फैलने लगे थे। एक दिन इसका पता सामाजिक कार्यकर्ता ज्योति को पड़ा तो उसने जानकी के मन में अपनी नारीवादी बातों से ऐसा जोश भर दिया कि उसका आत्मगौरव पुन: लौट आया। आज कालू ने जैसे ही मदिरा के नशे में जानकी पर हाथ उठाया तो उसने सहन करने के बजाय प्रत्युत्तर देकर कालू की पिटाई कर डाली। कालू का सारा नशा उतर गया और दूसरे दिन से ही कालू का मदिरापान करना बंद हो गया। न जाने क्यों आज मोहल्लेवासियों को महिला दिवस नहीं होते हुए भी महिला दिवस का आभास हो रहा था।

ग़लत ज़िद

सात वर्षीय सोहन अपने पड़ोस में रहने वाले मित्र मोहन की नई चमचमाती जैकेट को देखकर मां से कहने लगा- 'मुझे भी मोहन के जैसी नई जैकेट चाहिए।' 'लेकिन, बेटा तुम्हारे पास तो पहले ही दो जैकेट है, फिर तुम्हें नई जैकेट क्यों चाहिए?' मां ने सोहन से सवाल करते हुए पूछा। 'नहीं नहीं मुझे तो मोहन के जैकेट जैसी ही नई जैकेट चाहिए, अगर नहीं मिली तो मैं कल से स्कूल नहीं जाऊंगा।' सोहन ने ज़िद करते हुए मां से कहा। मां ने भी स्थिति को भांपते हुए कह दिया- 'ठीक है भाई, शाम को जब तुम्हारे पापा दफ़्तर से घर लौटेंगे तब तुम्हारी जैकेट की बात उनसे करूंगी।' सोहन मां के जवाब के बाद अब शांत हो गया था, तभी दरवाजे से आवाज़ आई- 'मैम साहब, घर में कोई पुराना शर्ट और स्वेटर तो हमारे टाबर को पहनाओ, आपको दुआ मिलेगी।' मां और सोहन घर के दरवाजे के पास पहुंचे तो देखा कि एक निर्धन महिला अपने पांच साल के अर्द्धनग्न बेटे के साथ ठिठुर रही थी। मां ने सोहन की ओर देखते हुए कहा- 'देखो इस बच्चे को, इसके पास तो तुम्हारे जैसी जैकेट छोड़ो ढंग का शर्ट भी नहीं है, फिर भी यह ज़िद नहीं करता।' मां के जवाब और दारुण दृश्य को देखने के बाद सोहन की आंखें बता रही थीं कि उसे अपनी ग़लत ज़िद का अहसास हो गया था।

वचन

मोहन आज बहुत खुश था। आज रक्षा बंधन का त्योहार जो था। अलसुबह ही वो नहा-धोकर तैयार होकर अपनी बहिन मधु से राखी बंधवाने के लिए उसके पास पहुंच गया। मधु ने अपने भाई मोहन की कलाई पर राखी बांधकर चंदन का तिलक लगाकर विधिवत आरती उतारकर मुंह मीठा कराया। तत्पश्चात मोहन अपनी बहिन से बोल पड़ा- तुझे उपहार में क्या चाहिए, बहिन !मधु ने कहा- आज जो मैं मांगूगी, वो आपको देना पड़ेगा। मोहन ने कहा- मैं जान पर खेलकर भी तेरी मांग पूरी करूंगा एक बार मांगकर तो देख। मधु ने कहा- भईया, वादा करो कि जितना मान-सम्मान आप हमको देते हो, उतना ही मान-सम्मान आप दूसरी लड़कियों को भी देंगे। कोई मेरे भईया को लफंगा कहे यह मुझसे सहन नहीं होता। रमेश ने कहा- बस, इतनी सी बात। तेरे से वादा करता हूं कि तुम्हारा ये वचन मरकर भी नहीं टूटना दूंगा। दोनों भाई-बहिन की आंखों से गंगा-यमुना बहने लगी।

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देवेन्द्रराज सुथार

स्थानीय पता - गांधी चौक, आतमणावास, बागरा, जिला-जालोर, राजस्थान। 343025

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शीर्षक

          "छोटा नन्नू"


'छोटा नन्नू'आज कुछ उदास सा था...,उसे समझ नहीं आ रहा था।
क्या करे...??क्या न करे...??
उसे घर के सभी लोगों से प्यार है।
पापा-मम्मी,दादा-दादी, बडे वाले दादी और दादा,जिन्हें पापा ताऊ जी,ताई जी बोलते है।
और एक और थी न वो जो उसे बहुत लाड़ करती थी ....बूढ़ी मां अरे!...वो दादा की मम्मी।
पर आज सुबह वह सो कर उठा .....तो सब रो रहे थे ।
अरे.. !!वो जो बूढ़ी मां थी न ।
अरे ..!वही ..कितना प्यार करती थी ।
आज बस चुपचाप सोई हुई थी।
मम्मी ने कहा," पैर छू ले नन्नू "।
तो वह पैर छूकर ,जाकर कान में कहने लगा ,"बूढ़ी माँ -आज एक रुपया दोगी ना"। यह सुन सभी और जोर -जोर से रोने लगे .........पता नहीं क्यो?
पर सब क्यो...? सब क्यो रो रहे थे ?
सब तो परेशान थे बूढ़ी माँ से ......।जब-तब खाना खाते - खाते कपड़े गंदे कर लेती थी.....,कभी दादी और कभी बड़ी दादी को दवा के लिए तंग करती थी......।
कभी बताती थी ।पेट दर्द है...,कभी दिल मे...,सब परेशान थे ......उससे।
फिर अब सो गई तो क्यो ...??तो क्यो...??
रो रहे है....ये सब ,बड़े लोग ....पता नही -गंदे होते है......या अच्छे?? ये बड़े लोग..।
"फिर भी आज छोटा नन्नू बहुत उदास था....."।
चेतना शर्मा ,nayi  -41,police colony ,sarswati vihar

   Near  n.s.p. police station

         New delhi -110034

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1- पूंछ-कटा आदमी

बहुत-बहुत पुरानी बात है। तब आदमजात के भी पूंछ होती थी। तब एक बड़े बादशाह थे, जिसके पास ढेरों कुर्सियां होती थी, एक दिन उसने एक को एक कुर्सी देदी। कुर्सी पाने वाला अकड़ में चलता, विजयी भाव दिखाता, अपनी पूंछ का परचम लहराते कुर्सी पर जा बैठा। उसने बैठते ही पहला बयान यह दागा- देखा, मैंने बहादुरी के बदौलत पाई है यह कुर्सी।

उसकी बात पर लोगों ने तालियां बजाना शुरू कर दिया। सब बजा रहे थे, केवल एक को छोड़कर। वह एक कोने में कुछ कुत्तों के साथ बैठा था। ताली, जय जयकार, बधाई का दौर खत्म होने पर उस कुर्सीधारी ने उस कुत्ताधारी को अपने पास बुलाया और पूछा- तुमने तालियां क्यों नहीं बजाई?

क्योंकि तुमने झूठ बोला है। तुमने यह कुर्सी बहादुरी से नहीं, खुशामद से ली है।

लेकिन मैं जब भी बड़े बादशाह के पास होता, तब वहां कोई और नहीं होता था। तुम्हें यह सब कैसे पता चला?

मैं दूर से देखता। जब तुम्हारी पूंछ दांये बांये हिलती तो मतलब था कि तुम चिरौरी कर रहे हो। जब तुम्हारी पूंछ दोनों टांगों के बीच में होती, तब, तुम्हें बादशाह किसी बात पर डांट रहा होता और तुम डर रहे होते।

इतना कहकर वह अपने कुत्तों के साथ चला गया। कुर्सी धारी को पूंछ की इस चुगलखोरी पर बड़ा गुस्सा आया। उसने पूंछ को काटकर फेंक दिया। दूसरे लोग भी ऐसा करने लगे। एक दिन सारे आदमी बिना पूंछ के हो गये।

दंड सिर्फ पूंछ को ही मिला।

2- आधुनिक

राममिलाप का दोस्त बरसों बाद घर आया। दोस्त को देखकर राममिलाप खिल गया। दोस्त ने पूछा-कैसे हो? बेटे परवाह करते हैं?

हां, हां, सुबह तो थोड़ी देर, पर शाम को बहुत देर मेरे पास बैठते हैं। बहुएं भी पूरा ध्यान रखती हैं।

अच्छी बात हैं पर सुबह शाम के अलावा बाकी का समय कैसे काटते हो?

फिर उसने राममिलाप के आस पास देखा। कुछ धार्मिक किताबें, पास में ही कपड़ों की कतरनों का ढेर। इन कतरनों से रस्सी बनाने का राममिलाप का पुराना शौक हैं। पहले तो इन्हीं रस्सियों से घर की चारपाइयां बुनी जाती थी।

दोस्त ने हंसते हुए कहा-राममिलाप अब ये रस्सियां क्या काम आती हैं? इनसे अब कोई चारपाई नहीं बुनता है।

हाथों की वरजिश का यह सबसे उत्तम साधन है।

क्या यार राममिलाप, तुम तो पोंगापंथी बने हुए हो। हाथों की वरजिश के लिये कई किस्म की गेंद आती है, दूसरे यंत्र भी होते है। कुछ आधुनिक बनो..... खैर तुम्हें नहीं बनना तो मत बनो। पर अपने बेटों को आधुनिक होने से मत रोकना।

उस दिन बेटों को आधुनिक होने का आशीर्वाद मिल गया। धीरे-धीरे बेटों ने सुबह शाम पिता के पास बैठना कम कर दिया। फिर बिल्कुल बंद कर दिया। अब तो पूरी तरह आधुनिक हो गये हैं, पिता को वृद्धाश्रम में छोड़ आये हैं।

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(गोविन्द शर्मा)

ग्रामोत्थान विद्यापीठ, संगरिया - 335063

जिला हनुमानगढ़ (राजस्थान)

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साहित्यम मासिक इ पत्रिका -केवल फेस बुक पर प्रकाशित –संपादक यशवंत कोठारी ,86,लक्ष्मी नगर ,ब्रह्मपुरी बाहर ,जयपुर-३०२००२ ,ykkothari3@gmail.com,संपादन -व्यवस्था –अवैतनिक

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रचनाकार: साहित्यम् इ पत्रिका –वर्ष १ अंक 6 - संपादक - यशवंत कोठारी
साहित्यम् इ पत्रिका –वर्ष १ अंक 6 - संपादक - यशवंत कोठारी
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