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यात्रा संस्मरण - झीलों की नगरी उदयपुर की सुनहली यादें - रमेश शर्मा

बी टी आई ग्राउंड शंकर नगर स्थित राज्य शैक्षिक अनुसंधान परिषद् रायपुर के गेस्ट हॉउस में हमने रात बिताई और अलसुबह एअरपोर्ट के लिए निकल पड़े। रायपुर से बी आर साहू , दुर्ग से दादू लाल जोशी और बेमेतरा से दिनेश गौतम सहित हम चार लोग थे। नया रायपुर की ओर जाने वाली चौड़ी चौड़ी चिकनी कोलतार की सड़क पर हमारी कार दौड़ी चली जा रही थी। इंदौर के लिए हमारी फ्लाइट सुबह नौ बजे थी पर चेक आउट के हिसाब से हमें एक दो घंटे पहले पहुंचना था। एयर पोर्ट भी दस बारह किलोमीटर दूर था। सुबह सुबह मेरी नजर चिकनी और चौड़ी सड़क के साथ साथ किनारों पर बने बड़े बड़े भवनों , माल्स पर जाकर ठहर जाती। न जाने इसके लिए कितने किसानों की जमीनें छीनीं गई होंगी। जिन खेतों पर हरी-भरी फसलें होनी थीं उन जगहों को इन बड़े-बड़े भवनों और माल्स ने घेर लिया था। दादू ने जब कहा कि कितने सुन्दर दृश्य हैं , तब मुझे लगा कि इन चीजों को भी हम अलग अलग नजरिए से देख सकते हैं। किसी को ये सुन्दर लग सकते हैं तो किसी को ये दृश्य किसानों की पीड़ा को महसूस करने का अवसर भी देते हैं। सत्ताईस गावों के किसानों की जमीनें छीने जाने की कहानी नया रायपुर की बसाहट में कहीं दब सी गई थी जिसे आज अचानक मैं महसूस करने लगा था। एयर पोर्ट पर जब हम पहुंचे तब वहां चहल पहल बढ़ चुकी थी। वह गणतंत्र दिवस के पहले का दिन था । थोड़ी देर बाद राज्य शैक्षिक अनुसंधान परिषद् रायपुर में पदस्थ सुधीर श्रीवास्तव ,विद्यावती चंद्राकर के साथ नवमी कक्षा हेतु विज्ञान और अंग्रेजी विषय के लिए तैयार हो रही छत्तीसगढ़ बोर्ड की किताब पर काम कर रहे लेखक लेखिकाओं की टीम वहां पहुंची। हम सभी कुल सत्रह लोग थे जिन्हें इंदौर होते हुए उदयपुर जाना था। एयर पोर्ट के चमचमाते फर्श पर ट्राली के ऊपर अपने सामानों को लादे स्त्री पुरुष आते जाते दिख रहे थे। सत्रह के समूह में हमारे बीच एक ऐसे शख्स भी थे जिनके पास कोई आई डी उस वक्त नहीं थी जिसके कारण सेक्युरिटी की ओर से उस शख्स को रोका जा रहा था। बहुत सामूहिक अनुनय विनय के बाद किसी तरह उस भले मानुस ने हमारी बात मान ली और हम सबको जाने दिया। सामूहिक प्रार्थना की ताकत को उस दिन मैंने करीब से महसूस किया था।

हमारी उड़ान शुरू हो चुकी थी। धरती से दूर और दूर होते आदमी को जैसा अनुभव होना चाहिए वैसा ही अनुभव सबको हो रहा होगा या नहीं मैं इसी उधेड़ बुन में खोया हुआ था कि ठीक उसी वक्त एक रोबोट सी लगने वाली भावहीन चेहरे की गोरी सी किशोर वय की सुन्दर लड़की जो एयर होस्टेज थी, ने मेरा ध्यान आकृष्ट किया। "प्लीज टाइट योर बेल्ट" उसके इस कथन से मैं थोड़ा झेंप सा गया और मैंने कमर पर लटके बेल्ट का हुक लगा लिया। ये लडकियां पूरी तरह प्रशिक्षित लग रहीं थीं। शायद किसी यात्री के चेहरे से चेहरा मिलाकर बात न करने और अपने चेहरे पर मुस्कराहट न लाने कि इन्हें सख्त हिदायत दी गई थी ! इन होनहार लड़कियों के चेहरों को देखकर इस बात को साफ़ साफ़ महसूसा जा सकता था। मेरे हिसाब से अपनी मानवियता को ये लडकियां अपने भीतर इसलिए छुपाईं हुई थीं क्योंकि यही मानवियता कभी कभार लड़कियों के लिए मुसीबत बन जाया करती है , जबकि कोई सिरफिरा लड़कियों की मुस्कराहट को उनकी कमजोरी मान कर उनसे छेड़खानी पर उतर जाता है। धरती से हजारों किलोमीटर दूर आकर कोई लड़की इस तरह की मुसीबतें भला कैसे झेल सकती है मैं इसी बात को महसूस कर रहा था। इन लड़कियों में गजब की स्फूर्ती थी और ये लगातार कुछ न कुछ बोलते करते हुए हमारा ध्यान आकृष्ट कर रहीं थीं। मुझे लगा कि इन लड़कियों के लिए रोज की यह सच्चाई है , यात्री बदल जाते होंगे पर ये लडकियां इसी तरह धरती से हजारों किलोमीटर दूर उड़ते हुए एक मछली नुमा डिब्बे में इसी तरह व्यस्त रखती होंगी अपने को। इंडिगो की यह फ्लाइट जब इंदौर पहुंची तब दिन के ठीक साढ़े दस बज रहे थे। रायपुर से इंदौर पहुँचने में हमें डेढ़ घंटे लग गए। जब एयर पोर्ट से हम सभी बाहर आए तो हमारे लिए टाटा इनोवा और बारह सीटर ट्रेवलर की व्यस्था विद्या भवन उदयपुर की ओर से की गई थी। उस दिन अचानक आसमान में बदली छा गई थी। लगता था बारिश अब होगी तब होगी। हम एयर पोर्ट के बाहर निकले तो इंदौर शहर के बाहर बनीं चमचमाती चौड़ी चौड़ी सड़कें वहां भी हमारा इन्तजार कर रही थीं। बड़े बड़े विशालकाय भवनों के बीच से गुजरते हुए अरविंदो मेडिकल इंस्टिट्यूट और अरविंदो डेंटल कालेज के आलिशान दैत्याकार भवनों पर मेरी नजर ठहर गई। अचानक मुझे मध्यप्रदेश में चल रहे व्यापम घोटाले की याद हो आयी जिसके चलते प्राइवेट मेडिकल कालेजों में दाखिले को लेकर पूरे देश में तरह तरह के सवाल खड़े हो रहे थे। मेरे मन में भी कभी विचार आया करते थे कि यदि मेरे पास पचास लाख रूपये होते तो मैं भी इन संस्थानों में अपनी बेटी का दाखिला करवा लेता । मेरे शहर के कुछ लोगों ने ऐसा करवाया भी था। कालान्तर में मुझे यह समझ में आने लगा कि ऐसे संस्थानों से निकले हुए डॉक्टर जिन्दगी भर उस पैसे की भरपाई में लग जाते हैं और उनके जीवन का मकसद सिर्फ पैसे बनाना भर रह जाता है। मैं अपनी बेटी को पैसे बनाने की मशीन बनते हुए कभी देखना नहीं चाहता था। भले ही वह डॉक्टर क्यों न बने पर देश दुनिया समाज की जरूरतों के हिसाब से उसे जीवन जीते हुए देखने की मेरी प्रबल इच्छा थी जो कि ऐसे संस्थानों से कभी वह सीख नहीं सकती थी जहां सिर्फ पैसा ही सब कुछ था।

हम शहर के बाहर रिंग रोड पर चल रहे थे जहां इक्के दुक्के रेस्टोरेंट नजर आ रहे थे। कुछ दूर आगे जाकर हम एक रेस्टोरेंट के सामने रुके। हम सबको देखकर वेटर बाहर आ गया। उसने इस तरह हमारा स्वागत किया जैसे बहुत दिनों बाद अपने परिजनों से वह मिल रहा हो। सच कहूँ तो उसके इस चकित कर देने वाले व्यवहार से हम सभी मजबूरी में वहां रूक गए। अन्दर जाने के बाद महसूस हुआ कि वहां नास्ते की कोई ख़ास व्यवस्था नहीं है। दरअसल वहां उस वक्त तैयारी चल रही थी और वह रेस्टोरेंट अपने दोपहर को आने वाले मेहमानों के लिए सज धज रहा था। हम समय से पहले आ धमकने वाले मेहमानों की तरह थे जिसके लिए वह तैयार नहीं था। फिर भी वेटर ने बड़े मनोयोग से हम सबके लिए पोहे की व्यस्था की जो बहुत स्वादिष्ट था मानों उसने अपना सारा प्यार अपनी सारी ताकत उस पोहे को तैयार करने में झोंक दी हो। हम सबने खूब डटकर नास्ते का आनंद लिया और फिर वहां से निकलते ही हमारी गाड़ी सड़कों पर घंटों बिना थके दौडती रही।

हम गाड़ी में बैठे बैठे झपकी ले रहे थे। जनवरी में कडाके की ठण्ड पड़ रही थी । बाहर बहुत ठंडी हवाएं चल रहीं थीं| क्लाउडी वेदर तो था ही पर अचानक बारीश की फुहारें भी शुरू हो चुकीं थीं जो थमने का नाम नहीं ले रहीं थीं । हम दोपहर डेढ़ बजे के आस पास मंदसोर शहर के बाहर बनी रिंग रोड से होकर गुजर रहे थे जहां गांजा और अफीम की खेती से लहलहाती फसलें चारों तरफ दीख रहीं थीं। इन फसलों को देखकर थोड़ी देर के लिए एक अजीब तरह की मनःस्थिति से मैं गुजरने लगा था। सरकार भी खुले आम किस तरह देश दुनिया को नशे के कारोबार में धकेल रही है। आजीविका के नाम पर हम उन चीजों को भी स्वीकृति दे देते हैं जो हमारा ही नाश करती रहती हैं और हमें पता भी नहीं चलता। शराब अफीम गांजा आम तौर पर दुनिया के तमाम अपराधों का कारण होते हुए भी हमारी सरकारें इन्हें आय का सबसे बड़ा श्रोत मानती हैं। सच कहा जाए तो इसका ईमानदारी से विकल्प खोजने की कोशिश उनकी ओर से होती ही नहीं है और ये चीजें धडल्ले से चली आ रही हैं।

चलो अब कहीं भोजन कर लिया जाय , साहू सर ने ऐसा कहते हुए मेरी मन की बात कह दी और हम सभी फुहारों से बचते हुए ढाबे की तरफ बढ़ गए। बारिश हो रही थी और ढाबा बहुत साफ़ सुथरा भी नही था बावजूद इसके हम सारे लोगों ने यहाँ वहां बैठकर दोपहर का भोजन किया और फिर वहां से निकल पड़े।

उदयपुर पहुँचते पहुँचते रात के नौ बज चुके थे। वहां पहुँचते ही उदयपुर शहर ने अपनी खूबसूरती का आभाष दे दिया था। हमें विद्या भवन के कृषि अनुसंधान केंद्र के गेस्ट हाउस में रुकवाया गया था। मित्र पुष्पराज वहां व्यवस्था में लगे हुए थे। पहुँचते ही कमरों की व्यवस्था करवा दी गई थी। मित्र दिनेश गौतम और मुझे एक कमरे में ठहराया गया था।

हम सारे थके हुए थे। फ्रेश होकर हम सबने एक साथ डिनर किया और अपने अपने कमरों में सोने चले गए। ज्यों ज्यों रात गहरा रही थी ठण्ड भी गहराने लगा था। हरेक के बेड में दो दो कम्बल और एक रजाई देखकर ही मैं समझ गया था कि यहाँ कडाके की ठण्ड पड़ती होगी। वैसे भी राजस्थान सर्दी के लिए बदनाम है इस बात को मैं पहले से जान रहा था। उस रात ऎसी नींद आई कि सुबह उठकर हमने विद्या भवन में गणतंत्र दिवस समारोह का तरोताजगी से आनंद लिया। ये पहला अवसर था कि मैं राष्ट्रीय समारोह में अपने विद्यालय से बाहर था। सड़क पर वैसे ही बच्चे आ जा रहे थे जैसे कि मेरे शहर में आते जाते दीखते थे। यहाँ मैं छत्तीसगढ़ बोर्ड की नवसृजित कक्षा नवमी की हिन्दी किताब को अंतिम रूप देने के सिलसिले में अपने समूह के साथ काम करने के लिए आया हुआ था। हमें यहाँ पूरे दस दिन रूकना था। सुबह हर रोज बस हमारे गेस्ट हाउस पर आती और हम सभी नहा धो कर वहीं नास्ता करते और बस में विद्या भवन के लिए निकल जाते। विद्या भवन करीब चार पांच किलोमीटर दूर था। किताब पर समूह वर्क करते हुए दोपहर हो जाती फिर लंच होता। लंच के बाद फिर हम सभी काम पर जुट जाते और शाम हो जाती। सुबह और शाम के दरमियान दिल्ली यूनिवर्सिटी के रिटायर्ड भाषा वैज्ञानिक रमाकांत अग्निहोत्री जी के साथ हमारे हिन्दी समूह की कई बार बैठकें होती। रचनाओं के चयन को लेकर मतभेद उभरते, बहसें होती। कभी हम निर्मला पुतुल की कविताओं पर उलझ जाते तो कभी निलेश रघुवंशी की किसी कविता को लेकर हमारे बीच बहुत बहस होती। अंततः किसी नतीजे पर हम पहुँचते और पाठ चयन के बाद अभ्यास माला पर हमें अगले दिन काम करना होता था। शाम को बस दोबारा हमें लेने आती और हम अपने गेस्ट हाउस की ओर निकल पड़ते।

वापसी में बी. आर. साहू सर और दादू लाल जोशी सर को मैंने कभी बस में चढ़कर आते नहीं देखा। वे दोनों पैदल चलने का आनंद लेते और अपनी सेहत बनाते।

इन दस दिनों के दरमियान अक्सर हम सभी गेस्ट हाउस लौटने के बजाय शहर घूमने को निकल पड़ते। फ़तेह सागर झील की खूबसूरती हमें आकर्षित करती। झील के ठीक बीचोबीच बने टापू नुमा जगह में स्टीमर के जरिए जाने की व्यस्था थी। एक बार में करीब पचास के आसपास लोग जा सकते थे। टिकट लेकर हमारे समूह की महिलाएं और पुरुष वहां जा बैठे। उस भीड़ में कई नवविवाहित जोड़े भी दिख रहे थे जिनका पर्यटन के लिए इस झीलों की नगरी में आना हुआ था। उनकी आखों में जीवन के लिए कई सुनहरे सपने थे जो उस वक्त फ़तेह सागर के काले जल से टकरा कर उनकी आँखों में लौट लौट जा रहे थे। उन्हें देखकर मुझे भी अपने तेईस साल पुराने दिन याद आने लगे थे। उस दिन फ़तेह सागर झील का डरावना जल भी हमें आनंद लेने से नहीं रोक पाया था। किसी महिला ने पुरानी फिल्म का कोई प्यारा सा धुन छेड़ दिया था और सभी बेसूरे होकर गाने लगे थे।

वहां से निकल कर हाथी पोल मार्केट के लिए हम निकल पड़े थे। राजस्थानी बंधेज साड़ियों से वह मार्केट सजा हुआ दिखता था। चमचमाती रोशनी में नहाया हुआ शहर पर्यटकों को लुभाने लगता। यहाँ वहां घूमते विदेशी पर्यटकों को हम बड़े जिज्ञासु भाव से देखते। विदेशी महिलाएं साड़ियों में खूब जंचा करती। बाजार दूर दूर तक फैला हुआ था। हमारे समूह की महिलाएं इधर उधर टुकड़ियों में फ़ैल जाती और घंटों किसी दुकान में साड़ियाँ पसंद किया करतीं। हम सबको पुनः एक जगह ईकट्ठा होने में बड़ी मशक्कत करनी पड़ती और हम झल्लाते रहते। हाथी पोल जाने का क्रम कई दिनों तक चलता रहा। मित्र दिनेश गौतम जब भी जाते दो तीन हजार की बंधेज साड़ियाँ ले आते। उनकी देखा देखी मैंने भी तीन साड़ियाँ मोल ले लीं। कईओं के पास इतने सामान हो गए कि वापसी में फ्लाइट के हिसाब से उनका वजन ज्यादा था जो हमारे बीच चिंता का कारण बना हुआ था। दुनिया में कुछ ऐसे भी लोग होते हैं जो कुछ सोचते ही नहीं और किसी काम को करते चले जाते हैं। हमारे समूह में अली मेडम और बिना आई डी वाले सज्जन कुछ ऐसे ही लोगों में थे जिनके पास सामानों का अम्बार लग चुका था। इन सामानों में अचार से लेकर रजाई और कपडे तक थे जिसे फ्लाइट में ले जाना आसान नहीं था। उनके हिस्से की चिंता हमारे हिस्से आ गई थी और वे अब भी हाथी पोल बाजार के आकर्षण में डूबे हुए थे।

इन दस दिनों में बागौर की हवेली में राजस्थानी लोक कलाकारों का डांस का आनंद भी हमने लिया। रात की शुरुवात के साथ हवेली के भीतर प्रवेश करते ही बिलकुल स्थानीयता के साथ लोक की खुश्बू का एहसास होने लगा। कुर्सियों की कोई व्यस्था नहीं बल्कि आँगन के चारों तरफ दरी और उसमें बैठे देशी विदेशी पर्यटकों का समूह। जैसे पूरी दुनिया एक जगह सिमट कर आ गई हो। एक बीस साल का लड़का जो उस प्रोग्राम का एंकर था , एक बार हिन्दी में तो एक बार अंग्रेजी में नृत्य के सम्बन्ध में जानकारियाँ दे रहा था। राजस्थानी नृत्यों की ऎसी अद्भुत प्रस्तुती मैंने पहली बार देखी और चकित होकर रह गया। यद्यपि फोटोग्राफ लेने का वहां अतिरिक्त शुल्क था पर नियम तोड़ते हुए मैंने कुछ फोटो भी अपने मोबाइल से खींच लिए। उम्रदराज महिला ने जिस स्फूर्ति से गघरी के ऊपर सात आठ गघरी रखकर डांस किया वह अद्भुत था। हमने घंटे भर विदेशी शैलानियों के साथ नृत्य का आनंद उठाया और वहां से निकल पड़े। रात करीब आठ बज रहे थे ठीक उसी वक्त हम पिछौला झील के किनारे खड़े थे और झील के बीचोबीच जहां कभी रवीना टंडन की शादी हुई थी उस होटल को देख रहे थे। जगमगाती रंगबिरंगी रोशनी से नहाये महंगे होटलों की छाया पिछौला झील के जल पर अपनी अप्रतिम छवि से हमें सम्मोहित कर रही थी। उदयपुर की खूबसूरती यहीं आकर अपने शबाब पर थी जिसके हम साक्षी बने।

इन्हीं दस दिनों के दरमियान हमने नाथ द्वारा का भी भ्रमण किया। अरावली पहाड़ियों से होकर टेड़े मेढे पहाडी रास्ते पर बस की सवारी करते हुए कृष्ण की नगरी की ओर जाने का अपना एका अलग ही आनंद था जो आस्था से अधिक हमारे भीतर एक शैलानी का भाव जगा रहा था। नाथद्वारा भी प्राकृतिक सौन्दर्य से भरपूर है जहां गुजरात से वर्ष भर शैलानियों की भीड़ रहती है। वहां हमने नाथ जी के दर्शन किए और बाजार में घूमने का लुफ्त उठाया। उदयपुर से हमारी वापसी बारह बजे रात को थी। रात का सफ़र बाई रोड इंदौर तक फिर वहां से अगले दिन इंदौर से रायपुर के लिए दिन में डेढ़ बजे हमारी फ्लाइट थी। सड़क मार्ग से लौटते समय सुबह सुबह हम उज्जैन रुके और वहां स्नान कर महाकाल के दर्शन किए फिर हमारी यात्रा प्रारम्भ हुई। हमारी फ्लाइट समय पर थी। विद्या भवन से सड़क मार्ग से इंदौर तक हमें छोड़ने आये मित्रों ने हमें अलविदा कहा और हम रायपुर की ओर उड़ चले।

रमेश शर्मा 92 श्रीकुंज , बोईरदादर, रायगढ़ (छत्तीसगढ़) पिन 496001 ,

परिचय

नाम: रमेश शर्मा

जन्म: छः जून छियासठ , रायगढ़ छत्तीसगढ़ में .

शिक्षा: एम.एस.सी. , बी.एड.

सम्प्रति: ब्याख्याता

सृजन: दो कहानी संग्रह “मुक्ति” 2013 में तथा “एक मरती हुई आवाज” 2018 में एवं एक कविता संग्रह “वे खोज रहे थे अपने हिस्से का प्रेम” 2018 में प्रकाशित .

कहानियां: समकालीन भारतीय साहित्य , परिकथा, गंभीर समाचार, समावर्तन, ककसाड़, कथा समवेत, हंस, पाठ, परस्पर, अक्षर पर्व, साहित्य अमृत, माटी, हिमप्रस्थ इत्यादि पत्रिकाओं में प्रकाशित .

कवितायेँ: हंस ,इन्द्रप्रस्थ भारती, कथन, परिकथा, सूत्र, सर्वनाम, समावर्तन, अक्षर पर्व, माध्यम, मरूतृण, लोकायत, आकंठ, वर्तमान सन्दर्भ इत्यादि पत्रिकाओं में प्रकाशित !

संपर्क : 92 श्रीकुंज , शालिनी कान्वेंट स्कूल रोड़ , बोईरदादर , रायगढ़ (छत्तीसगढ़),

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