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पकोडे-तलइया बनाम शब्द-तलइया - सुरेन्द्र बोथरा

पकौड़े-तलइया बनाम शब्द-तलइया

--भूतनाथ

बेरोजगार युवाओं को उकसाने के लिए नेताओं, मीडिया और अन्य शब्द।

तलैयों द्वारा पकौड़ा तलने वालों की और उनके रोजगार की जो छीछालेदर पिछले दिनों शुरू हुई वह आज तक चालू है। पहले तो उस जमात के लोग इसे सामयिक छींटाकशी मानकर चुप रहे। पर जब वह इतनी बढी कि आज भी मौके-बेमौके जिसे देखो वही, जहाँ देखो वहीं, उनके पावन और जनहितकारी पेशे को राजनीतिक बहस का मुद्दा बनाने से नहीं चूकता, तो हद पार हो गई। उनकी गरम कड़ाही के खौलते तेल पर अकारण पानी के छींटे मारने वालों से तंग आकर पकौड़े से जुडे और पकौड़े से उठे लोगों की भाईबन्दी ने एक चर्चा का आयोजन किया, शहर की एक नामी होटल में।

इस आयोजन में खोमचे वाले, ठेले वाले, दुकान वाले आदि ही नहीं स्वयं उस होटल का मालिक भी सक्रिय भाग ले रहा था क्योंकि उसने भी अपने कैरियर की शुरूआत घर में कड़ाही और बाज़ार में खोमचे से ही की थी। आज वह अपनी लगन व मेहनत के बल पर इस मुकाम पर पहुंचा था।

चार्चा कुछ इस प्रकार चल रही थी—

पकौड़े वाला (प.वा.) एक — एक ज़मीन से जुडे नेता ने रोजगार की समस्या को सुलझाने के लिए युवाओं को पकौड़े बनाने का काम करने का सुझाव दिया तो दूसरे ने उसका घोर विरोध कर दिया कि यह भी कोई रोजगार हुआ, बरसों की पढाई और बदले में कोई अच्छी सी नौकरी तो नहीं बस यह कड़ाही, सरासर अन्याय है। चलो बात आई-गई हो गई। हमें क्या फरक पड़ता है, ग्राहक तो हमारे दोनों ही हैं। तकलीफ तो तब होती है जब ये नेता लोग और इनके चापलूस मीडिया वाले हमारे पावन पेशे की ही बेइज्जती करने पर उतारू हो जाएं।

प.वा. दो— अरे भाई ये वे लोग ही हैं जो श्रम का आदर करने के भाषण दे-दे कर और हमारे पकौड़े-समोसे खा-खा कर ही नेता और पत्रकार बने हैं। क्या इन्हें यह असलियत भी पता नहीं कि भारत के प्रत्येक शहर में कम से कम एक ऐसा धनवान मिल जाएगा जिसने पकौड़े तलने से अपना रोजगार शुरू किया था।

प.वा. तीन— ये भूल जाते हैं कि पकौड़े वालों को नीचा दिखा कर ये चूल्हे, कड़ाही आदि ही नहीं तेल और बेसन की भी बेइज्जती करते जा रहे हैं। अन्न के अपमान करने का फल आज नहीं तो कल अवश्य ही भोगेंगे।

प.वा. चार— बस यही क्यों, इन बेचारों को तो यह भी अंदाज नहीं है कि इन्होंने पकौड़े पर प्रहार कर किस-किस पर प्रहार नहीं किया। पकौड़े बनाने की कला तो पाक शास्त्र की पहली सीढी है, उस पर प्रहार तो पाक-कला पर प्रहार है और पाक-कला का लोप हुआ कि आदमी तत्काल जानवर बना। बिना पका तो जानवर ही खाते हैं। है कि नहीं ?

प.वा. पांच (वह होटल मालिक)— भाइयों, आपको तो याद होगा कि कुछ वर्ष पहले मैंने भी तो आपकी ही तरह पकौड़े बनाने से अपना व्यापार शुरू किया था। आज मैंने अपनी लगन और मेहनत से उसी की कमाई से यह होटल खड़ी कर ली है। आज इनके जितने पढे-लिखे तो मेरे इस होटल में ही नौकरी करते हैं। यह उसी पकौड़े तलने का चमत्कार है। डिगनिटी आफ लेबर तो ये नहीं हम समझते हैं और मानते हैं; ये लोग तो बस शब्दों को तलना-भूनना जानते हैं। अपनी आपस की नोक झोंक में इनलोगों ने बर्र के छत्तों को छेड दिया है।

प.वा. छः— आपने तीर निशाने पर मारा है। इन्हें तो शायद यह अंदाज़ ही नहीं है कि हमारी जमात कितनी बडी और ताकतवर है। इसमें पाक-कला के आधार पर जितने भी उद्योग-व्यवसाय पनपे हैं वे सभी शामिल हो जाते हैं। अर्थात आज अंगरेजी में शैफ कहाने वाले भी हमारी जमात में हैं; मैं इसी होटल में मुख्य शैफ हूँ। हमारे बिना एक घंटे भी जिनका काम नहीं चल सकता वे होटलों के कार्पोरेट-मालिक भी तो आडे-तिरछे हमारी ही जमात में शामिल माने जाएंगे।

प.वा. सात— भाई साहब! आपने ठीक ही कहा। इस प्रकार हमारी जमात में नीचे में खोमचे वाले, थडी वाले, हलवाई वगैरह से बढ़ते-बढ़ते ऐसे भी लोग शामिल हैं जो होटलों के मालिक होने के साथ अखबारों व टीवी चैनलों के मालिक भी होंगे। हमारी पहुंच बहुत ऊंची है, हम बिफर जाएं तो इन स्वकथित शब्दजीवियों और मीडिया प्रतिनिधियों का तबादला किसी होटल की किचन में करवा सकते हैं।

प.वा. छः— अरे! यही क्यों हम रोजगार देने वाले तो अपने प्रभाव से इन नौकरी करने वालों की छुट्टी भी करवा सकते हैं।

प.वा. चार— भाई साहब! हमारी जमात में तो इससे भी अधिक ताकतवर लोग शामिल हैं जिनके हुकम के नीचे तो नेता भी नाचते हैं।

सब प.वा. एक साथ— वो कौन ?

प.वा. चार— जैसे हम अपने पकौड़े तलने के चूल्हे के मालिक हैं वैसे ही देश के लगभग सभी पारिवारिक चूल्हों की मालिक परिवारों की महिलाएं हैं। जब ये हमारी ठिठोली करने वाले लोग अपने ड्राइंगरूम में बैठे पकौड़े तलने वालों की मजाक कर रहेहोते हों उसी समय उनकी रसोई की मालकिन यदि पकौड़े ही तल रही हो तो क्या उसकी मखौल नहीं उडती ? सोचिये कि इनकी बेसिरपैर की बातें सुन कर यदि वे नाराज हो गईं तो क्या ये सब माफी मांगते दिखाई नहीं देंगे।

प.वा. पांच— अरे बस भी कीजिये, आप तो जूते में कांटी ठोकने के लिए दस किलो का हथौडा इस्तेमाल कर रहे हैं। जूता ही चिथडा हो जाएगा, हम कहाँ यह चाहते हैं। आप जो कह रहे हैं वह तो अपने आप होने ही वाला है। आप क्या समझते हैं किहमारे घरों की महिलाएं कुछ नहीं कर रही होंगी। देखिये, आज की बातों से यह साफ हो गया कि हम श्रमजीवी बडे समर्थ हैं। इन लोगों की कोशिशें हमारी अस्मिता और मान को छू भी नहीं सकतीं। इनसे उलझना हमारी शान के ख़िलाफ है। इनका इलाज है - इनकी अवहेलना कर देना, ब्लैक-लिस्ट में डाल देना। ये तो अपने आप ही चुप हो जाएंगे। चिन्ता छोडिये आज की चर्चा का समापन एक छोटी सी पकौड़ी जैसे प्रस्ताव को पारित करके ही कर देते हैं—

“आज के बाद हमारी जमात के सभी लोग इन पकौड़ा विरोधी शब्दों को काग़ज पर उतारने वालों को ‘शब्द-तलइया’ और वैसे ही शब्दों को भाषण में भूनने वालों को ‘शब्द-भुनइया’ कह कर पुकारा करेंगे।) समर्थन स्वरूप हाल में गूंज उठा— ‘शब्द-तलइया’,‘शब्द-भुनइया’ हाय! हाय!

(नोट— हमारी इस तकरीर को पढ कर एक मित्र ने कहा— बडी बेसिरपैर की हाँकते हैं आप तो। हमने तपाक से जवाब दिया— बेसिरपैर की नहीं तथ्यों पर आधारित है भाई। तेरह अगस्त 2018 के टाइम्स आफ इंडिया में खबर छपी थी कि हाल में नौकरी पानेवालों में 77 प्रतिशत होटल मैनेजमैंट वाले हैं और इंजीनियरिंग वाले केवल 40 प्रतिशत। पकौड़े तलने के व्यवसाय की महत्ता से क्या अब भी इनकार करेंगे आप?)

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सुरेन्द्र बोथरा, 3968 रास्ता मोती सिंह भोमियान, जयपुर-302003

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