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व्यंग्य आलेख - वादे ही वादे - डा. सुरेन्द्र वर्मा

वादों के दो छोर होते हैं। एक छोर पर वे वादे होते हैं जो केवल करने के लिए किए जाते हैं। निभाए कभी नहीं जाते। वादों का दूसरा छोर वह होता है जो बिना कोई वादा किए ही बात निभा ले जाता है। शायद इसीलिए जो वादे किए जाते हैं उनपर लोगों का विश्वास धीरे धीरे उठाता जा रहा है।

बात को सुलझाने के लिए पहले लोग संवाद की तलाश में रहते थे। वाद विवाद होता था लेकिन इस वाद-विवाद की परिणिति संवाद में संभव हो पाती थी। धारणा-प्रतिधारणा के संघर्ष से संवाद जन्म लेता था। अब लोगों के पास न इतना समय है न इतना धैर्य कि संवाद के लिए इंतज़ार करें। संवाद की जगह अब वादे किए जाते हैं। निभ गए तो निभ गए नहीं तो सुभान-अल्लाह !

वादे कई तरह के होते हैं। कुछ बाबाओं के वादे होते हैं जिनसे वे अपने भोले भाले भक्तों का शोषण करते हैं। कुछ वादे बाज़ार के होते हैं। किसी वस्तु को बेंचने के लिए उसकी उपयोगिता संबंधी अनेक प्रकार के वादे किए जाते हैं, ज़रूरी नहीं सब सही हों। लेकिन इन दोनों प्रकार के वादों को अब लोग समझने लगे हैं। आसानी से इनके चक्कर में नहीं आते। ये वादे जब पूरे नहीं होते तो, वादा-खिलाफी के विरुद्ध लोग उठ खड़े होते हैं। ऐसे में वादाखिलाफी करने वालों की खैर नहीं रह पाती। बाबाओं के झूठे दावों और भ्रामक विज्ञापनों के खिलाफ तो अब कानून भी बन गए हैं। लेकिन अभी तक नेताओं के झूठे वादों के खिलाफ कोई कानून नहीं बन पाया है सो हमारे नेता धड़ल्ले से से झूठे वादे करते रहते हैं, भोली जनता को बरगलाते रहते हैं और साफ़ बच जाते हैं।

चुनावों के दौरान वादों की जुमलेबाजी बस देखते ही बनती है। कोई व्यक्ति / पार्टी चुनाव जीतने पर स्मार्ट फोन देने का वादा करता है तो कोई बेरोजगारों को कार देने की बात करता है। वे इतना भी नहीं सोचते कि बेरोजगार बेचारा कार लेकर उसका करेगा क्या ? पैट्रोल के पैसे कहाँ से लाएगा ? लेकिन वादा करने में भला क्या जाता है। वादा उठाया और कर मारा। भुगतने वाले भुगतें ! एक उम्मीदवार नेता ने तो हद ही कर दी। उन्होंने वादा किया कि यदि चुनाव जीत गए तो वे मतदाताओं को उनके घरों में दस लीटर शुद्ध-ब्रांडी मुफ्त में बाटेंगे, भले ही आप पीते न हों।

ऐसा नहीं है कि ये सभी वादे झूठे ही होते हों। कुछ वादे बेशक निभाए भी जाते है। लेकिन न भी निभाए जाएं तो कोई किसी का भला क्या बिगाड़ लेगा ? हमारे ठेंगे से !

चुनाव नज़दीक आते ही राजनैतिक दल जनता से ज्यादह से ज्यादह वोट पाने की होड़ में जुट जाते हैं। ऐसे समय में जनता को भरमाने के लिए नेताओं का बड़े बड़े वादे करना मामूली बात है। इन बड़े बड़े वादों से उनके भाषण सजे रहते हैं। वादे हैं वादों का क्या !

कोई वादा करता है कि गरीब परिवारों को सालाना सत्तर हज़ार रूपए समर्थन राशि के रूप में दिया जाएगा तो कोई किसानों के हित में बढ़-चढ़ कर वादा करता है। कोई राष्ट्रीय ग्रामीण योजना शुरू कर देने की बात कहता है। कोई अपनी सरकार बनाने के दस दिन के भीतर किसानों की क़र्ज़ माफी की बात करता है। वादों का यह सिलसिला बढ़ता ही चला जाता है। वादा करने में आखिर जाता ही क्या है ! उठाया और झट से कर मारा !

एक युग था जब सम्राट, राजा महाराजा अपने राज्य और प्रजा की रक्षा बाजुओं की ताकत से लड़कर करते थे और इस कर्तव्य और आदर्श के लिए अपने प्राण तक निछावर कर देते थे। तब तो वादों के लिए भी कहा जाता था – प्राण जाय पर वचन न जाई। लेकिन आज कल तो लड़ाई थोथे-वादों से लड़ी जाती है, वादे अब सिर्फ करने भर के लिए रह गए हैं। जो जितना लुभावना वादा करे, वही जनता को भरमा देता है। जनता भी बेचारी कितनी भोली है !

डा. सुरेन्द्र वर्मा

१०, एचआई जी / १, सर्कुलर रोड,

इलाहाबाद -२११००१

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