नाका - विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका. 

विविध विधाओं में से चुनकर पढ़ें -

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---

यहाँ की विशाल ऑनलाइन लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोज कर पढ़ें -

 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com  रचनाकार के वाट्सएप्प नंबर 8989162192 (कृपया कॉल नहीं करें, कॉल रिसीव नहीं होगी, तथा इसका उपयोग केवल प्रकाशनार्थ रचना भेजने के लिए ही करें) पर भी वाट्सएप्प से रचनाएँ अथवा रचना पाठ के वीडियो प्रकाशनार्थ भेजे जा सकते हैं. अधिक जानकारी के लिए यह पृष्ठ [लिंक] देखें.

--

भानु झा की ग़ज़लें व शेर

1
सफात उसमें अजीब का है
चराग पर वो गरीब का है ।


पता नहीं कौन गुल खिलाए
कि आज मौसम अजीब का है ।


वो मेरा भी तो रकीब है जो
रकीब मेंरे हबीब का है ।


अहम् नहीं जिसके वो अता है
कि खेल सारा नसीब का है ।


2

कहते कहते वो अटका था
उसको डर जाने किसका था ।


आब की आस सहरे में
आँख से आंसू टपका था ।


हाथ तो सबने फैलाए
एक सा हाल सबका था ।


गोद में एक बच्ची थी
और माथे पे मटका था ।


राह पे फिर न आ पाया
राह से जो वो भटका था ।


3


सीधी राह कोई भी नहीं आता है
अब लोगों का वासीला बदल जाता है ।


दिल के टूटने पे इतना ही कहना है
अपने ही किए की दिल सजा पाता है ।


दावत कोई यहाँ छक के उड़ाता है और
कोई पट्टी शिकम पे बांध सो जाता है ।


जब भी जिन्दगी हद पार कर जाती है
कोई रावण उठा के उसको ले जाता है ।


कोई अपना मुखौटा रंगने के वास्ते
कई चेहरे की लाली को चुरा लाता है ।


5


गो बहुत ही सावधानी बरत रहे हैं हम
फिर भी कोई कहे कहाँ पे गलत रहे हैं हम ।


एक कमरे में सिमट सी गयी है जिन्दगी
आज कल बहुत किफ़ायत बरत रहे हैं हम ।


फूल पत्ती जैसे अहसास  के भी साथ अब
आज किस कदर ये सख्ती बरत रहे हैं हम ।


कोई क्या जवाब भेजे हमारे ख़त का भी
एक बेपता व बेनाम ख़त रहे हैं हम ।


6


बस लकीर पिटते थे निकल गये थे सांप
लाठी भी न टूटती और मार देते सांप ।


वो मदारी की पिटारी में बंद सारे सांप
दांत के बगैर फुफकारते ही रहते सांप ।


एक धीमा जहर होता है यारों रक्स भी
दिल पे मेरे अक्सर लोटते ही रहते सांप ।


जिनको हमने अपने सर आँखों पे बिठाया है
आस्तीन के हमारे वो आज निकले सांप ।


7


नहीं हूँ मैं तमाम में
अलग हूँ मैं निजाम में ।


सभी यहाँ पे नंगे हैं
सियासती हमाम में ।


ए जम्हूर तू होश कर
इन्हें रख तू लगाम में ।


बुरा हाल है मुल्क का
खलल रख तू निजाम में ।


8


जब कभी उम्मीद से वो रही होगी
बेटे की उम्मीद ही सबने की होगी ।


सबकी ताने तोहमत ही सही होगी
जब कभी भी बेटी को वो जनी होगी ।


औरतों के गम का अहसास है उसको
उसको बेटी की फिकर भी रही होगी ।


9

मेरा अपना शानी यहाँ आप होना
किसी और का मुझपे कोई छाप होना ।


उलझते रहे ख़ुद व ख़ुद से यहाँ
यहाँ अपनी पेचीदगी आप होना ।


ख़ुदा भी न जिनको समझ पाया हो
भला हमको क्या उनका कोई नाप होना ।


10

अपने दिल को गर हर कोई फिर से राह पे लाए
फिर तो यार ये दुनिया भी हसीन बन जाए ।


जिस्म को सजाए कोई चेहरा लाख चमकाए
कोई क्या कहे गर ये दिल ही मैला रह जाए ।


हम तो एक ज़माने से उनसे मिल नहीं पाए
ये नहीं कि वो हमको याद भी नहीं आए ।


दोस्त यार से जब भी कोई मिलने को जाए
अपने कोई गिले शिकवे साथ में नहीं लाए ।


एक उम्र हाले दिल का बयां नहीं होता
कोई भी मेरी ढलती उम्र पे नहीं जाए ।


11

ख्याल रिश्ते का है, उनसे कुछ नहीं कह पाता
ये मत समझिए हमे कहना ही नहीं आता ।


बिछड़ने के तो निकलते हैं रोज लाख बहाने
जरा सा मिलने का कोई सबब निकल नहीं पाता ।


मैं मिलने को तो हमेशा मिल आता हूँ उनसे
कशिश ही वो नहीं होती करार ही नहीं आता ।


--

आदमपुर, भागलपुर, बिहार

2 टिप्पणियाँ

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.