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रोचक आलेख - ज़ुबान और जुमले - डा. सुरेन्द्र वर्मा

किसी को ज़ुबान देना वादा करना है। किन्तु वादे तोड़े जा सकते हैं। कुछ का तो यहाँ तक कहना है कि वादे तोड़ने के लिए ही किए जाते हैं। लेकिन वादा करना और जुबान देने में फर्क है। जुबान तोडी नहीं जा सकती। उसे तोड़ ही नहीं सकते। अगर वादा तोड़ा नहीं गया तो समझिए जुबान दी गई थी। जुबान देना कोई साधारण वादा नहीं है। यह ‘वचन’ है। प्राण जाएं पर वचन न जाई ! आखिर जुबान दी गई है ! निभाना ही होगा।

ज़बान से जो भी बोला जाता है, सामान्यत: वाक्यों में ढल कर आता है। वाक्य को उर्दू में जुमला भी कहते हैं। लेकिन कई बार जुमले निरर्थक होते हैं और वे केवल “जुमले” बन कर रह जाते हैं। बेमतलब के बेईमान वाक्य, झूठे वादों की तरह, महज़ ’जुमले’ होते हैं। धोखा देने के लिए बोले जाते हैं। बहलाने और बरगलाने के लिए बोले जाते हैं। चुनाव के वक्त नेताओं के बड़े-बड़े बोल, बेचते समय अपने माल की झूठी-सच्ची तारीफ़, अपनी उपलब्धियों का बढ़ा चढ़ा कर गान - ये सब काफी-कुछ ‘जुमले’ भर होते हैं। इनमें सच्चाई कम ही होती है। अतिशयोक्ति अधिक होती है। लेकिन लोग धोखा खा जाते हैं। धोखा देने के लिए ही तो वे बोले जाते हैं। वरना जुमले बोले ही क्यों जाएँ !

जुबान तो जुबांन है। बोलने के लिए बनी है। उससे आप कुछ भी बोलें। अच्छा बोलें, बुरा बोलें। झूठ बोलें, सच बोलें। मीठा बोलें, कडुवा बोलें। यह आप पर निर्भर करता है। ज़बान तो सिर्फ एक शस्त्र है। इसे कैसे भी चलाएं। ज़बान को तो बस चलाना-भर है। ज़बान सार्थक / निरर्थक कुछ भी बोल सकती है। वह सार्थक बात भी कर सकती है और ‘जुमले’ भी बोल सकती है। ज़बान और जुमलों का बड़ा घनिष्ट सम्बन्ध है। लेकिन यह एक उभय-मुखी, दोहरी वृत्ति का, दुविधा में डालने वाला सम्बन्ध है।

‘जुमले’ भी आखिर बोले तो ज़ुबान से ही जाते हैं। लेकिन जुमले जुबान नहीं देते। कोई वादा नहीं करते कि जिसे निभाया जा सके। वे सार्थकता का केवल आभास भर देते हैं। वे सच को न केवल विकृत करते हैं बल्कि उसे ढंक भी देते हैं। माया का यही तो काम है। जुमलों की अपनी ही माया होती है।

शास्त्रार्थ करने की मुझमें योग्यता नहीं है और न ही शस्त्र चलाने की हिम्मत। ऐसे में क्या किया जाए ? एक ही सहारा है। जुमलेबाजी पर उतर आना। कभी कभी यह जुअलेबाज़ी खूब काम करती है और आप इससे अपना काम निकाल लेते है। कभी यह असफल भी हो जाए तो भी आपका कुछ बिगड़ता नहीं, आप जहां के तहां बने रहते हैं।

इलेक्शन आने पर जुमलेबाजी के भाव खूब बढ़ जाते हैं। पक्ष और विपक्ष का हर आदमी जुमलेबाजी शुरू कर देता है। अच्छी तरह जानते हुए कि यह जुमलेबाजी है और जुमलेबाजी के सिवा और कुछ नहीं है, इसके जाल में लोग फँस ही जाते हैं। सोच विचार के बिना ही, सिर्फ जुमलों से प्रभावित होकर अपना वोट अक्सर गलत जगह खपा आते हैं। भोले हैं बेचारे, क्या करें? जुमले बाजों की चतुराई कहाँ से लाएं ?

ज़बान और जुमलों में एक अंतर्संबंध है। जुमलों की अभिव्यक्ति के लिए एक जुबान चाहिए और जुबान को भी कहने के लिए कुछ न कुछ तो चाहिए ही, फिर वे ‘जुमले’ ही क्यों न हों। यह पारस्परिक निर्भरता ही उनके अंतर्संबंध को परिभाषित करती है। हम अपनी ज़बान को बोलने के लिए प्रशिक्षित करते हैं। हम उसे कुछ इस तरह प्रशिक्षित कर सकते हैं कि वह बिना किसी हिचकिचाहट जुमले बोलने में दक्ष हो जाए। अगर ऐसा नहीं हो पाता तो जुबान लड़खड़ाने लगती है। सच बोलना बहुत कठिन होता है, लेकिन झूठ बोलना भी कोई सरल काम नहीं है। इसके लिए भी खासी कोशिश की दरकार है।

डा. सुरेन्द्र वर्मा

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड – प्रयागराज

1 टिप्पणियाँ

  1. सही भी है, जुमले और जुवान एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं, बेहतरीन लेख ।

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