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रोचक आलेख - अच्छे दिन - डा. सुरेन्द्र वर्मा

कई दिन हो गए सोचते हुए कि अच्छे दिन आ जाएं लेकिन कमबख्त अभी तक नहीं आ पाए। रोजमर्रा की तरह वही दिन आ जाता है जिसे अच्छा दिन तो हरगिज़ नहीं कहा जा सकता। पता नहीं कब और कैसे आवेंगे अच्छे दिन !

मेरे मित्र ने मुझसे पूछा, आज का दिन कैसा गुज़रा? बस गुज़र गया जैसे तैसे। उन्होंने दूसरा सवाल दागा, कुछ बुरा तो घटित नहीं हुआ? बुरा? हाँ बुरा तो कुछ घटित नहीं हुआ। तो क्यों चिंता करते हो? बिना कुछ बुरा घटित, यदि दिन गुज़र जाए तो वह दिन अच्छा ही कहा जाएगा। मस्त रहो।

अच्छे दिन आवेंगे, यह सबसे आसान नारा है। कौन है जिसके कभी न कभी अच्छे दिन नहीं आते। घूरे के भी दिन फिर जाते हैं। फिर इंसान घूरे से बदतर तो है नहीं। कभी न कभी उसके भी दिन अच्छे आ ही जाते हैं। अत: अच्छे दिन की भविष्य वाणी आसानी से की जा सकती है। इसमें जोखिम जैसी कोई चीज़ है ही नहीं। बेशक, अच्छे दिन आवेंगे।

अच्छे दिन आवेंगे, जुमला बड़ा आश्वस्त करने वाला है। निराशा को परे ढकेल कर यह अच्छे दिन की उम्मीद दिलाता है। कहा है न, सारी दुनिया उम्मीद पर कायम है। यह उम्मीद ही हमें ज़िंदा रखती है। अच्छे दिनों की आशा रहती है तो हम हाथ पर हाथ धरे बैठे नहीं रहते। अगले दिन के लिए सुखद सपने देखते हैं। सपने को साकार करने का भरसक प्रयत्न करते हैं।

अच्छे दिन का आना या न आना बहुत कुछ व्यक्ति-सापेक्ष भी है। पिछले साल फेल होने वाला बच्चा इस वर्ष यदि पास हो जाए तो उसके तो अच्छे दिन आ ही गए। मरणासन्न व्यक्ति यदि स्वस्थ होने लगे और दवा-दारू उस पर असर करने लगे तो भी यही समझना चाहिए कि उसके अच्छे दिन आ रहे हैं। आपकी कोई खोई चीज़ अचानक मिल जाए तो यह भी अच्छे दिन आ जाने का ही तो यह उदाहरण है ! वरना निराश होकर बैठे ही रह जाते।

किसी एक गीत की पंक्ति है “दिन आए दिन जाए, यही आना-जाना ज़िंदगी को ज़िन्दगी बनाए !” दिन बेशक आते जाते रहते हैं और कोई भी दिन अपने आप में न अच्छा होता है और न ही बुरा। यह तो हमारी मानसिकता है जो तय करती है कि दिन कैसा रहा / कैसा रहेगा / या कैसा है ?

अच्छे दिन आवेंगे, इसमें शायद एक भाव यह भी निहित है कि पिछले दिन अच्छे नहीं थे। साथ ही इसमें आशा और विश्वास भी निहित है कि बुरे दिन हमेशा नहीं रहते। इत्मीनान रखें, बुरे दिनों को जाना ही है और अच्छे दिन आवेंगे। और यदि पिछले-दिन, मान लीजिए, किसी कदर अच्छे ही थे तो अब बेहतर दिन आवेंगे। सोच तो हमेशा सकारात्मक ही होना चाहिए। हारा हुआ खिलाड़ी बार बार इसी उम्मीद से खेलता रहता है कि अगली बार क्या पता वह जीत ही जाए, और उसके अच्छे दिन आ जावें। आदमी निराश नहीं होता। मौत की दहलीज़ पर पड़ा आदमी भी ज़िंदगी की उम्मीद कायम रखता है। उसे भी यह सोचने का हक़ है कि रात के बाद सुबह ज़रूर होगी।

अच्छे दिनों की उम्मीद में आदमी न जाने जितने दुःख सह लेता है। आदमी ज़िंदगी भर खटता रहता है और अच्छे दिनों की आशा उसे दुख सहन करने की शक्ति प्रदान करती है।

अच्छे दिन आएँगे – एक नारा है ; एक आश्वस्ति है ; एक संकल्प है ; प्रयत्न के लिए एक प्रेरक है। और यदि ऐसा कुछ नहीं है, तो, ज़ाहिर है, यह महज़ एक जुमला भर बन कर रह जाता है। कोशिश करें कि ऐसा न हो। अच्छे दिनों की उम्मीद एक सार्थक प्रयत्न बन कर उभरे और हमें अपने बुरे दिनों से निजात दिलाने में सफल हो सके।

डा. सुरेन्द वर्मा

१०, एच आई जी / १, सरकूलर रोड – प्रयागराज -२११००१

1 टिप्पणियाँ

  1. सार्थक, संदेशात्मक, प्रेरणात्मक बेहतरीन रचना ।

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