कहानी - रुतबे की दीवार -रमेश शर्मा

SHARE:

" अंग्रेजवा आज रिटायर्ड हो रहा है। नौकरी में जब तक रहा तब तक तो अपने को वायसरॉय से कम नहीं समझा इसने ! खूब सताया सबको ! आज के बाद क्या ...

" अंग्रेजवा आज रिटायर्ड हो रहा है। नौकरी में जब तक रहा तब तक तो अपने को वायसरॉय से कम नहीं समझा इसने ! खूब सताया सबको ! आज के बाद क्या करेगा। अपनी बीबी को तो सता नहीं पाएगा। सिर कूट देगी इसका। कोई नहीं मिलेगा सताने को तो इसे नींद नहीं आएगी रातों में , फिर गाना गाता रहेगा..... मुझे नींद न आए ,नींद न आए, मुझे चैन न आए, चैन न आए ...." -- तरह-तरह की बातें और ही-ही हा-हा के हंसने की आवाजें शौचालय के भीतर से आ रही थीं । शौचालय हाल के ठीक पीछे था जहां विदाई समारोह का आयोजन चल रहा था। हाल में पीछे की तरफ बैठे कुछ लोग खुसूर-फुसूर करने लगे तो उनमें से बहुतों को समझने में देर नहीं लगी कि मंगलू चपरासी आज फिर शौचालय में बैठकर साहब के सम्मान में कसीदे पढ़ रहा है। उसे बार-बार शौचालय जाने की आदत थी। साहब के चेम्बर का काल बेल बजने पर भी वह वहां से जल्दी उठने का नाम नहीं लेता था। एक बार डायरेक्टर साहब ने उसे गुस्से में माँ-बहन की गाली देकर निलम्बित कर दिया था। बड़ी मुश्किल से यूनियन बाजी के बाद उसकी बहाली हो सकी थी। तब से मंगलू आए दिन शौचालय में बैठकर साहब को गाली देने लगता था। एक बार इसी चक्कर में उसे पुलिस पकड़कर भी ले गई थी और उसे थाने में दिन भर बैठा दिया गया था। उसके बाद साहब के प्रति उसके मन में विद्रोह और बढ़ गया था।

"काय करही निलम्बित तो करे सकही ,कर डारे साले हर ( क्या कर लेगा ,निलम्बित ही तो कर सकेगा , तो कर ले साले )" बात बात में मंगलू को कई बार ऐसा कहते हुए लोग सुनते।

वैसे मंगलू था बड़ा मजेदार।उसकी दिलेरी के किस्से भी कम मजेदार नहीं थे।

"आज मेरे बचपन के दोस्त रामखिलावन के घर नतनीन पैदा हुई है , मैं भी दादा बन गया !" - कहते कहते ठीक एक तारीख को अपनी तनख्वाह में से दो हजार रूपये की मिठाई मंगलू ने ऑफिस में बंटवा दिया था !उसके भीतर कुछ बातें घर कर गईं थीं इसलिए साहब के पास जाने से वह हमेशा परहेज करता| कहीं कोई मनहूसियत भरी बात वे न कर दें इसलिए उनके पास मिठाई लेकर वह आज भी नहीं गया ! मिठाई की भरी प्लेट रामकली के हाथों उसने भिजवा दी , साहब ने पहले तो गटागट सब पेट में डाल लिया फिर पूछने लगे " अरे ये मिठाई किस खुशी में रामकलीइइइ....... ?"पूछते-पूछते उनके चेहरे पर जो शरारती मुस्कान उभरी कि उसके अर्थ रामकली भलीभांति जान गई ! ढलती उम्र में भी उनकी आदत जस की तस बनी हुई थी ! कमसीन और सुंदर देहयष्टि वाली रामकली ने ठेठ छत्तीसगढ़ी में उन्हें कह दिया -" मैं का जानव साहब , मंगलू हर भिजवाय हे त लाय हव ( मैं क्या जानूँ साहब ,मंगलू भिजवाया है तो मैं लाई हूँ ) !" अपने गोल-गोल वृत्ताकार कूल्हों को मटकाती हुई जब रामकली वापस मुड़ी तो उनकी छेड़तीनजरें उसके कूल्हों से टकराकर भीतर ही भीतर उन्हें घायल कर गईं ! रामकली थी कि उनकी पकड़ में आती ही नहीं थी वरना वे तो कब से उसकी ताक में लगे थे । मंगलू के पास जाकर उसने बड़ी ढिढाई से कहा - "बड़ रसिया हे डोकरा (बड़ा रसिया है डोकरा) ! सब्बो दांत मन झड़त जात हे फेर मोला देखत-देखत जवान होय के भरम पाले हवे (दांत सब झड़ने लगे पर मुझे देख देख कर जवान होने का भ्रम पाल रखा है )!" रामकली की बातें सुन मंगलू ही-ही कर पहले तो जोर-जोर से हँसा फिर नतनीन के आने की खुशी का विस्तार कर रामकली को पूरे दो सौ रूपये का नोट देते हुए कहने लगा - "जाओ आज तुम भी अपनी पसंद का खाओ-पीओ !"

"मोर बाप असन सुघर लागथस कका तैंहर ( आप मेरे पिता जैसे अच्छे लगते हो काका ) !" रामकली की बात सुन इस बार मंगलू हँसा नहीं बल्कि थोड़ी गम्भीर मुद्रा में रामकली के सर पर हाथ रखकर एक बाप की तरह आशीर्वाद देते हुए कहने लगा " एकर से बच के रइबे बेटी नई तो तोरो जिनगी ए अंग्रेज हर बिगाड़ दिही ( इससे बच के रहना बेटी, नहीं तो यह अंग्रेज तुम्हारी भी जिन्दगी खराब कर देगा )!"

मंगलू की बातें रामकली खूब समझती थी। माला का किस्सा भी कईयों के मुंह से सुन चुकी थी रामकली। उसके इस ऑफिस में नियुक्ति के पहले की घटना थी वह । माला अब यहाँ नहीं है, पर उसके किस्से इस ऑफिस के जर्रे जर्रे में टंगे हुए लगते हैं। ऑफिस में क्लर्क थी माला। इस बात की खूब चर्चा थी कि वह बिनब्याही माँ बनने वाली थी। धीरे धीरे परिस्थितियाँ इस कदर होने लगीं थीं कि उसका ऑफिस आना असंभव हो गया। दबी जुबान में लोग कहने लगे थे कि माला, डायरेक्टर साहेब के बच्चे की माँ बनने वाली है।

"क्या साहेब! ये मैं क्या सुन रहा हूँ आपके बारे में ! माला मेडम के बारे में कुछ तो सोचिए ! बेचारी अब तो कहीं की नहीं रही ! आपने तो कहीं का नहीं छोड़ा उसे ! आठ महीने बाद बेचारी की शादी होने वाली थी और अब यह बच्चा ......!"- मंगलू ने सबकुछ खरी खरी कह दी थी साहेब को। इस बात का असर ठीक उल्टा हुआ। माला अब उन्हें गले की फांस की तरह लगने लगी।

"यह माला भी अब परेशानी का कारण बनते जा रही ! अब तो किसी न किसी तरह इसे यहाँ से हटाना ही पड़ेगा!"-साहेब के दिमाग में शातिराना बातें आने लगीं।

जिस माला से प्यार भरी बातें करते वे थकते नहीं थे वही अब उनकी दुश्मन हो चली थी। माला इनदिनों छुट्टी पर थी। भविष्य की दुहाई देते हुए उन्होंने उसे किसी तरह बहलाया -फुसलाया। फिर एक दिन एक निजी नर्सिंग होम में मोटी रकम अदा कर गुप्त रूप से उसका एमटीपी करवा दिया। उनके लिए बच्चे का रोना अब खत्म हो गया था फिर भी उन्हें लगा कि इसके बावजूद माला उनके लिए सरदर्दी का कारण बन सकती है। वे अब किसी तरह माला को इस ऑफिस से हटाना चाहते थे। एकदिन वे पुरानी फाइलें ढूँढने लगे। फाइलें तो उनकी कमीशनखोरी जैसे काले कारनामों के जीवंत दस्तावेज थे। ये गड़बड़ियाँ मातहतों पर दबाव पूर्वक वे खुद करवाते थे। इन फाइलों पर कलम तो पहले बाबुओं की ही चलती थी और सारी मलाई साहेब के हिस्से आता था। फंसे तो बाबू ही फंसे। इन्हीं फाइलों में से एक फ़ाइल को उन्होंने खोज निकाला था जिस पर नोटशीट में माला के दस्तखत थे। तीन लाख रुपयों की गड़बड़ी थी इस फ़ाइल में जो उन्होंने खुद करवाई थी। आज इसी फ़ाइल को आधार बनाकर माला पर कड़ी कार्यवाही हेतु उन्होंने मंत्रालय को लिख दिया था। माला तुरंत निलम्बित कर दी गई। वह रोज आकर उनसे विनती करती । अपने संबंधों की दुहाई देती। पर उन्हें तो उसे यहां से किसी तरह हटाना ही था। निलम्बन ही एक जरिया था उसे हटाने का। माला अब यहाँ से चली गई पर उसे लेकर ऑफिस में कुछ दिनों तक बातें होती रहीं। दो साल बाद विभागीय जांच खत्म होने के उपरान्त माला की किसी दूसरे शहर में बहाली की खबर भी एक दिन आई थी , उस दिन फिर माला इस ऑफिस में लोगों की जुबान पर ज़िंदा हो उठी थी। शौचालय में बैठ कर मंगलू ने साहेब के ऊपर उस दिन भी कसीदे पढ़े थे और अचानक लोग आज उसे भी याद कर बैठे थे।

हाल में विदाई समारोह अपनी समाप्ति की ओर था। औपचारिक समाप्ति उपरान्त ऑफिस से निकलते-निकलते एक सोच साहब के दिलों-दिमाग में अचानक आक्रमण करने लगी " तो मुझे सरकार की ओर से आज रिटायर्ड कर दिया गया ! " रिटायर्ड शब्द ने एक उथल-पुथल मचा दी उनके मन में ! उनके दिमाग ने एक अर्थ खोज लिया ,रि-टायर्ड याने फिर से थका हुआ, कभी सोचा ही न था उन्होंने इस तरह , सोचना शब्द उनके जीवन की डिक्शनरी में दरअसल था ही नहीं !

आज ऑफिस की गाड़ी उन्हें अंतिम बार उनके घर तक छोड़ने जा रही थी ! ड्राईवर भी वही शिवमंगल जो वर्षों से उन्हें घर से ऑफिस और ऑफिस से घर तक लाता ले जाता रहा था। उनके रिटायर्ड हो जाने से उसे कोई फर्क पड़ा हो ऐसा तो कतई उसके हाव-भाव से उन्हें लग नहीं रहा था। उसे भी उन्होंने कहाँ छोड़ा था कभी कि कोई आत्मीयता उसे उनकी तरफ खींचती ! अब जब अचानक सोचने की यह बीमारी आज उनके ऊपर आक्रमण करने लगी तो उन्हें याद आया कि शिवमंगल के पार्ट फाइनल की रकम के लिए भी उन्होंने उसे कितना तड़पाया था ! उसकी बेटी की शादी को बस 45 दिन बचे थे और वह बेचारा उन्हें अपना बॉस समझ पार्ट फाइनल की रकम निकल जाने के लिए सहायता करने की गुहार कई बार लगा चुका था ! वे बस इतना भर कहते "अरे जॉइंट डायरेक्टर साहब को इस सम्बन्ध में मैं कई बार कह चुका हूँ , वे ध्यान ही नहीं दे रहे हैं !" उन्होंने दरअसल हर बार उससे झूठ ही बोला। वे चाहते तो तुरंत ये काम हो जाता पर वे चाहते नहीं थे ! बिना पैसे के कभी उन्होंने किसी का काम कब किया था कि वे शिवमंगल का करते ! समय जब केवल 15 दिन रह गया और ये साहब उसे तब भी यही जवाब देते रहे तो शिवमंगल को थोड़ा गुस्सा आ गया। एक दिन गुस्सा और खिसियाने का भाव लेकर वह जॉइंट डायरेक्टर के ऑफिस में खुद पहुँच गया। जॉइंट डायरेक्टर उसे चेहरे से पहचानते तो थे , उनके ड्राईवर के छुट्टी में जाने पर एक दो बार उनकी गाड़ी की ड्राईवरी भी उसने कर रखी थी।

"साहब मैं क्या करूं बताइये ? मेरी बेटी की शादी 15 दिन बाद है और मेरा पार्ट फाइनल का पैसा अभी तक नहीं निकला !" बोलते-बोलते वह रूआंसा हो उठा। बड़े साहब जो दिन-दिन भर फाइलों में डूब कर बर्फ हुए जा रहे थे, उसका मजबूरी से सना हुआ चेहरा देख उनकी स्थिति भी पिघलती हुई बर्फ जैसी होने लगी। सारे फ़ाइल को उन्होंने एक तरफ इस तरह सरका दिया जैसे आज वे इन्हें छुएंगे ही नहीं। काटो तो खून नहीं , जैसे उनसे कोई अपराध हो गया हो। चाहते तो फोर्थ क्लास एम्प्लोयी को डांट कर भगा सकते थे पर उनकी भद्रता ने ऐसा करने से उन्हें रोके रखा ।

" अरे ! किसी ने बताया नहीं इसके बारे में , न ही तुम्हारी फ़ाइल पहुंची अब तक मेरे पास " एक गहरा अफ़सोस उनके चेहरे को भिगो गया !

वे भले आदमी थे इसलिए शिवमंगल का काम जल्द हो गया पर वह समझ गया कि सारा खेल अपने ही डायरेक्टर साहब का था ! उन्होंने ही उसकी फ़ाइल रोक रखी थी और हमेशा झूठ बोलते रहे ! रोज का साथ था, फिर भी उसने उनसे इस सम्बन्ध में कभी कोई शिकायत नहीं की , उनसे बोलने का कोई फायदा भी न था क्योंकि इतने सालों में अब वह पूरी तरह जान गया था कि वे ऐसे अहंकारी और खुदगर्ज आदमी हैं जिसे दूसरों के सुख दुःख से कोई लेना-देना ही नहीं है।

एक बार शिवमंगल, साहब के चक्कर में मार खाते खाते भी बचा था। हुआ यह था कि ये जनाब शाम को ऑफिस से लौटते वक्त आए दिन विनोदिनी झा के घर घंटों रूक जाते। घर के अन्दर घुसते तो फिर निकलने का नाम ही न लेते। विनोदिनी झा उन्हीं की स्टेनो थी। यही कोई चालीस-बयालीस की उम्र की खूबसूरत महिला। सुडौल और उजली देह। गठी हुई देहयष्टि। जनाब तो उस पर लट्टू थे ही। उन दोनों के किस्से कहानियाँ ऑफिस में कईयों की जुबान से वह सुन चुका था। मंगलू ने तो साहब को एक बार विनोदिनी प्रसंग में ही औरतखोर तक कह दिया था। उस दिन से साहब को वह फूटी आँख नहीं सुहाता था। विनोदिनी फ्लेट में अपने पति के साथ रहती थी। उसका पति शहर में ही प्राइवेट नौकरी पर था और रात दस के बाद ही घर लौटता था । आज भी जनाब दो घंटे बाद जब विनोदिनी के घर के दरवाजे को अड़ाते हुई सीढ़ी से वापिस उतर रहे थे कि अचानक विनोदिनी झा के पति से उनका आमना-सामना हो गया। वह आज अचानक समय से दो घंटे पहले आ धमका था। बहुत दिनों से वह इस ताक में था कि उसे रंगे हाथ पकड़ सके। विनोदिनी के पति से शायद उनकी पहले भी कभी कहा सुनी हुई होगी तभी तो वे जनाब से उलझ पड़े थे -- "तुम मेरे घर क्या करने गए थे, मैंने पहले भी तुमसे कहा है कि मेरे घर कभी मत आया करो ! " कहते कहते उन्होंने साहब को नीचे धकिया दिया था। जब जनाब को कुछ नहीं सूझा तो उनसे कह दिया कि मेरे ड्राईवर शिवमंगल ने विनोदिनी को लिफ्ट दिया है, मैं तो तैयार ही नहीं था आने को , जब आया तो विनोदिनी नहीं मानी , चाय पर उसने जबरदस्ती बुला लिया , कहते कहते उन्होंने जबरदस्ती वहीं से जोर की आवाज दी "क्यों भाई शिवमंगल सही कह रहा हूँ न मैं " सुनकर विनोदिनी का पति ड्राईवर की ओर लपका था। इस बीच उन्हें मौका लग गया और वे कार के भीतर जा बैठे। शिवमंगल ने उस दिन जाना कि यह आदमी बहुत झूठा और मक्कार भी है। किसी तरह मुश्किल से गाड़ी स्टार्ट कर दोनों वहां से रफू चक्कर हुए थे। जनाब के साथ शिवमंगल भी उस दिन मार खाते खाते बच गया था। पड़ती तो उस दिन दोनों को खूब पड़ती।

" भाग गया शाला, नहीं तो आज खूब सड़काया होता, सब आशिक मिजाजी निकाल देता, जब देखो मेरी पत्नी पर बुरी नजर रखता है !" विनोदिनी के पति की उग्र आवाज कुछ देर तक कार का पीछा करती रही जिसे सुन शिवमंगल उस दिन सहम गया था।

"आप तो अच्छा फंसा देते हैं साहब ! आशिक मिजाजी का शौक आप फरमाएं और मार किसी और को खानी पड़े !" आते आते शिवमंगल ने उस दिन उन्हें खूब खरी खोटी सूना दी थी।

"हद है यार ! ड्राईवर सामने हो और साहब को मार खानी पड़े, ये कहाँ का न्याय है बताओ भला !" वे अचानक गुस्से में आ गये थे। उनके इस अजीब तर्क को सुन शिवमंगल दंग रह गया था।

" हद है ,मार खाने में भी वर्ग भेद ! इस आदमी से तो बात करना ही बकवास है!" -वह मन ही मन कुढ़ते हुए उस दिन चुप रह गया था।

समारोह खत्म हो चुका था। ड्राईवर शिवमंगल गाड़ी ले आया ! वे विदाई समारोह में पहनाये गए माला गिनने में लगे थे। एक बैग में उन्हें इस तरह ठूंस रहे थे जैसे इन मालाओं को देख-देख कर ही उनके बाक़ी दिन कटेंगे। वे मनुष्यता की कसौटी पर कभी प्रेक्टिकल नहीं हो सके थे । उन्हें पता ही नहीं था कि उनके आने वाले दिनों की तरह माला में गुंथे हुए फूल भी कल मुरझा उठेंगे।

ऑफिस के लगभग सारे लोग अपने-अपने घरों को जाने लगे थे ! किसी के मन में यह इच्छा नहीं हो रही थी कि जाते-जाते औपचारिक रूप से ही सही ,अपने रिटायर्ड बॉस के जाते तक वे रूक जाएं ! जबसाहब के रूदबे का सूर्य उठान पर था तो उसकी पीड़ा देने वाली तपिस लोगों को रह-रह कर जलाती रही थी इसलिए डूबते सूर्य को जाते-जाते प्रणाम कर लेने की इच्छा किसी में नहीं बची थी ।

ड्राईवर ने आम दिनों की तरह कार का दरवाजा खोल दिया ! वे बैठ गये। अब कार सड़क पर दौड़ने लगी थी। उनका सरकारी बंगला ऑफिस से लगभग सात किलोमीटर दूर था !

घर जाते हुए वे फिर सोच में डूबने लगे थे ! तरह-तरह की बातें उनके दिलों-दिमाग में आने-जाने लगीं थीं !

जब लोग उनके यहाँ फरियाद लेकर आते और कहते कि साहब कभी हमारे बारे में भी सोचिए ... आपको सरकार ने असीमित अधिकार दे रखे हैं माय बाप ! हम कोई बड़ी समस्या लेकर भी नहीं आए हैं , बस छोटी-छोटी समस्याएं हैं हमारी , आप अगर मन से थोड़ा सोचेंगे तो हमारी आधी समस्याएं वैसे ही दूर हो जाएंगी !

उनकी बातें सुन वे मन ही मन कुढ़ते ,चिढकर वे उनके सामने ही उन्हें मूर्खकहकर गाली-गलौज पर भी उतर आते ! ऐसा कोई फरियादी नहीं था जो कभी खुश होकर उनके दरवाजे से लौटा हो !

"हूँह.....! सोचूँगा इस तरह इनके लिए फिर तो हो गया सब काम ! सोचते-सोचते मन के किसी कोने में इनके लिए अगर कहीं कोई सहानुभूति उत्पन्न हो गई फिर वह सख्ती इनके साथ कैसे बरत पाउँगा जिसे अब तक बरतता आ रहा हूँ , सख्ती और रूतबा ही तो अलग करती है मुझे इनसे , अगर वही नहीं बचेगी तो वजूद फिर क्या रहेगा मेरा ? कमाऊँगा कैसे ? कमाने के हथियार तो यही हैं। सख्ती दिखाओ , डराओ तो लोगों से पैसे निकलते हैं। कमाऊँगा नहीं तो मुंह फाड़े मंत्रियों तक क्या पहुचाउंगा? अपने बच्चों के लिए क्या रख पाउँगा?" उनके दिलों दिमाग में नकारात्मक बातें इसी तरह घर करती रहीं थीं।सोचने समझने को वे अपने लिए हमेशा खतरा मानते रहे थे।

एक बार उन्होंने अपनी पत्नी से मजाक करते हुए कहा भी था कि ज्यादा सोचने समझने से आदमी के भले और ईमानदार हो जाने का खतरा बढ़ जाता है !उसे इस रास्ते पर चलकर अपने लिए इतिहास में कोई जगह नहीं बनानी है , और इस नौकरी में लगने से पहले बाबूजी ने कहा भी था कि कुछ मत सोचो ! बस अच्छे से तैयारी में लग जाओ , बहुत रुतबा है ,सुविधाएं हैं, और बहुत पैसा है इस अफसरी में ! तब से उसका उद्देश्य सोचना नहीं बल्कि इस अफसरी को पाना ही रह गया !

घर लौटते हुए आज अचानक उन्हें लगा कि उनके हाथों से वह सब कुछ छूटने लगा है ...... सरकारी कार, सरकारी बंगला , रुतबा और चोर दरवाजे से जेब में आने वाला बहुत सारा रूपया !

कार अभी बंगले तक पहुँचने को ही थी कि अचानक उन्हें सोच-सोच कर पसीना आने लगा , गला सूखने लगा ! अफसरी का रूतबा खो जाने की मार उन पर बहुत भारी पड़ने लगी थी।

शिवमंगल गाड़ी रोको ....गाड़ी रोको !

"बस पांच मिनट की ही तो बात है साहब , घर तो आने वाला है !" आज इतने वर्षों बाद शिवमंगल ने एक तरह से उनकी बातों की अवहेलना की थी !

"अरे गाड़ी रोको नालायक !" कहते-कहते वे अपनी सीट पर लुढकने से लगे !

तब तक कार को घर के गेट पर लाकर शिवमंगल टिका चुका था ! उसने अचानक कार रोकी और क्या हुआ? क्या हुआ? कहकर उन्हें फिर पकड़कर संभालने लगा !

क्या हुआ ?क्या हुआ ? कहते-कहते उनकी पत्नी भी सुनकर बाहर आ गई

"इनकी तबियत ठीक नहीं , जल्द किसी डॉक्टर को दिखा दीजिए !"

"मैं भी साथ आती हूँ। उन्हें अभी मत उतारो। इसी कार में पास के डॉक्टर के यहाँ चलते हैं"-उनकी पत्नी ने शिवमंगल को लगभग आदेशात्मक लहजे में कहा ! तब तक वे भी किसी तरह कराहते हुए उठकर अपनी सीट पर बैठ गये थे !

उनकी पत्नी की बातें सुन एकबारगी शिवमंगल के मन में यह खयाल आया कि चलो आज भर के लिए ऐसा कर दूँ ,पर उनके साथ काम करने वाले सहकर्मियों के साथ-साथ उसे भी उनके अमानवीय रूतबे के बोझ तले दबने का जो एहसास अब तक होता आया था, उस बोझ से मुक्त होने का एक पहला और अंतिम मौका आज उसके हाथ लगा था ! ऐसा करे कि न करे एक उहापोह के बीच कुछ देर वह फंसा रहा फिर उस बोझ को एक झटके में उसने उठाकर फेंकते हुए जवाब दिया - " नहीं मेडम ! साहब अब रिटायर्ड हो चुके हैं ! इस सरकारी गाड़ी के उपयोग की पात्रता अब उन्हें नहीं रही ! लौटने में देर होगी तो मुझे ऑफिस में जवाब भी देना पड़ेगा ! कोई ओला या ऊबर का केब मंगा लीजिए, न हो तो मैं मंगा देता हूँ !"

"चुपकर बदतमीज!" उनकी पत्नी का यह जवाब उसके लिए अप्रत्याशित नहीं था ! वह कई बार बेवजह उसे डांट चुकी थी , आज वजह बड़ी थी, पर इस डांटने में एक अजीब तरह की हताशा थी। वे कार की सीट पर बैठे-बैठे उन दोनों की बातें सुनते रहे !

ड्राईवर के इस जवाब ने उनके रुतबे की हरी-भरी जमीन को अचानक किसी बंजर जमीन में बदल दिया था ! कार से उतरकर जब सरकारी बंगले के लोहे के विशालकाय गेट को उन्होंने छुआ तो उन्हें एक परायेपन का एहसास हुआ। इसी बीच घर के बागीचे में काम कर रहे माली ने अचानक उन्हें आवाज दी "इस बंगले को भी अब खाली करना पड़ेगा साहेब !" यह सुनकर गाड़ी बेक कर रहे शिवमंगल को थोड़ी हँसी आ गयी।माली की बातें सुनकर और ड्राईवर की हँसी देखरिटायर्ड साहब को ऐसा लगा जैसे उनके रूतबे की दीवार भरभरा कर अचानक ढह गई हो !

****************************************

92 श्रीकुंज ,बीज निगम के सामने , बोईरदादर, रायगढ़ (छत्तीसगढ़), 496001

---

परिचय

नाम: रमेश शर्मा

जन्म: छः जून छियासठ , रायगढ़ छत्तीसगढ़ में .

शिक्षा: एम.एस.सी. , बी.एड.

सम्प्रति: ब्याख्याता

सृजन: दो कहानी संग्रह “मुक्ति” 2013 में तथा “एक मरती हुई आवाज” 2018 में एवं एक कविता संग्रह “वे खोज रहे थे अपने हिस्से का प्रेम” 2018 में प्रकाशित .

कहानियां: समकालीन भारतीय साहित्य , परिकथा, गंभीर समाचार, समावर्तन, ककसाड़, कथा समवेत, हंस, पाठ, परस्पर, अक्षर पर्व, साहित्य अमृत, माटी, हिमप्रस्थ इत्यादि पत्रिकाओं में प्रकाशित .

कवितायेँ: हंस ,इन्द्रप्रस्थ भारती, कथन, परिकथा, सूत्र, सर्वनाम, समावर्तन, अक्षर पर्व, माध्यम, मरूतृण, लोकायत, आकंठ, वर्तमान सन्दर्भ इत्यादि पत्रिकाओं में प्रकाशित !

संपर्क : 92 श्रीकुंज , शालिनी कान्वेंट स्कूल रोड़ , बोईरदादर , रायगढ़ (छत्तीसगढ़),

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: कहानी - रुतबे की दीवार -रमेश शर्मा
कहानी - रुतबे की दीवार -रमेश शर्मा
https://1.bp.blogspot.com/-W33IfKeyQEk/XKHq9VwwKxI/AAAAAAABOvc/lG4OfRdJhSUMyd0QR7HhMvSCwywtPos3ACK4BGAYYCw/s320/RAMESH%2BSHARMA-715321.jpg
https://1.bp.blogspot.com/-W33IfKeyQEk/XKHq9VwwKxI/AAAAAAABOvc/lG4OfRdJhSUMyd0QR7HhMvSCwywtPos3ACK4BGAYYCw/s72-c/RAMESH%2BSHARMA-715321.jpg
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2019/04/blog-post_32.html
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/2019/04/blog-post_32.html
true
15182217
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy Table of Content