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व्रत उपवास उचित या अनुचित - शशांक मिश्र भारती


व्रत उपवास क्या हैं भारत विविधताओं का देश हैं। यहां पर दुनियां के लगभग सभी धर्म और सम्प्रदाय पाये जाते हैं। हर वर्ग समुदाय के अपने व्रत उपवास आदि होते हैं। जिनको समय समय पर बड़ी श्रृद्धा और विश्वास से रखा जाता है। यह धीरे धीरे एक नियम या कहूं सामाजिक मर्यादा का रूप ले लेते हैं जिनका पालन करना अनिवार्य सा लगने लगता है। पर वास्तव में ऐसा नहीं हैं। अगर हम हम उपवास शब्द के अर्थ पर जाये ंतो यह वह नियम- धर्म है जिसमें सम्बन्धित व्यक्ति द्वारा किसी दिन विशेष या समय में भोजन का अवकाश रखा जाता है। इसके परम्परा और अपनी अपनी धारणा के अनुसार कई रूप हो सकते हैं। कुछ लोग जल भी नहीं लेते हैं। कुछ केवल जल ही लेते हैं। कुछ फलाहार करते हैं कुछ केवल दो बार लौंग का सेवन करते हैं। उपवास की प्राचीनता पर जाये तो केवल वायु के सेवन के विवरण भी मिलते हैं। समय के साथ-साथ समाज देश व्यक्ति उसकी मान्यतायें विश्वास बदलते हैं। ठीक उसी प्रकार व्रत उपवास के तरीके भी बदलते हैं। आज की पीढ़ी और पहले की पीढ़ी के इस विधान या नियम के पालन के तौर तरीकों में काफी अन्तर आ गया है। कुछ उपभोक्ता वाद आधुनिकता सोशल मीडिया का भी प्रभाव है।

उचित या अनुचित अगर हम इनके उचित या अनुचित पर विचार करें तो अधिक दिनों तक कोई रखे तो भले ही नुकसान हो अन्यथा ऐसा कुछ नहीं लगता। आजकल के जागरूक समाज में किसी को यह सब करने के लिए बाध्य भी नहीं किया जा सकता। आजकल जो लोग व्रत उपवास रख रहे हैं तो सबसे बड़ा उनका भावनात्मक लगाव है कहीं न कहीं अपने धर्म सम्प्रदाय के प्रति विश्वास को मजबूती भी देता है। हां जहां जैसी मान्यताएं प्रथाएं लोकाचार रीतिरिवाज होते हैं। वहां के निवासी वैसे ही ढंग से व्रत उपवास या रोजे आदि रखते देखे जाते हैं। इनको रखने या न रखने के लिए परम्परा है। हां जो रखते हैं उन्हें आत्म सन्तुष्टि अवश्य मिलती है। मन प्रसन्नता से भर जाता है। घर परिवार के लोगों का नजरिया भी ऐसे व्यक्ति के प्रति बदलता है।

लाभ व्रत उपवास से नियमित या अधिक भोजन करने से होने वाली व्याधियों से निपटने में सहायता मिलती है। पाचन तंत्र मजबूत होता है। यह धार्मिक भावना के पालन के अतिरिक्त का लाभ होता है। शरीर अपने आपको अच्छी तरह से तैयार कर लेता है। इसीलिए नियमित रूप से उपवास रखने वालों का स्वास्थ्य भी अच्छा रहता है। भारतीय सनातन धर्म हिन्दू में तो बदलते मौसम के साथ उपवास रखने की परम्परा है जिसको नवरात्र के नाम से जाना जाता है। साल में तीन बार रखने का विधान पर दो बार तो धर्म जन रखते ही हैं। माह में दो बार एकादशी व्रत निर्जला एकादशी आदि आदि। जिनको वैदिक ऋषियों ने काफी मनन के बाद समाज धर्म को दिया ।

विज्ञान की दृष्टि अब यह बात आज के चिकित्सा वैज्ञानिक भी स्वीकार करते हैं कि उपवास हमको धार्मिक और सामाजिक सन्तुष्टि ही नहीं देते अपितु मन और तन को आराम देकर हमारा आत्मबल भी बढ़ाते हैं स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी है। उपवास के बाद और अधिक स्फूर्ति से हम अपने कार्य को करने में समर्थ होते हैं। चिकित्साविज्ञान के अनुसार लाभों की बात करें तो श्वसन किया दिल की बीमारियों इन्द्रिय की क्षमता वृद्धि, आंतों मूत्राशय की सफाई स्मरणशक्ति का लाभ होता है।

उपवास का समापन यदि कोई लम्बा उपवास रखता है तो उसे हल्के भोज या रस से उपवास तोड़ना चाहिए। तुरन्त ही भारी और गरिष्ठ भोजन न शुरू कर दे। धीरे धारे जैसे जैसे भूख लगने लगे। अपने खान पान बदलता रहे और सामान्य स्थिति में लेआये तभी वह उपवास के बाद के लाभों का भरपूर आन्दं उठा पायेगा।

निष्कर्ष तो यह हुई एक पन्थ दो काज वाली बात कि धार्मिक भावना के पालन के साथ-साथ हम अपने स्वास्थ्य का भला भी कर लेते हैं। अतः सभी को उपवास या व्रत को अपने लिए उचित मानते हुए माह में दो नहीं तो कम से कम एक तो रखना ही चाहिए। जिससे होने लाभ आपको कितना प्रसन्नता प्रदान करेंगे आप कल्पना नहीं कर सकते।

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