कहानी - दलित की बेटी - डॉ. विवेक गुप्ता

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दलित की बेटी सूरज रोज़ की तरह अपनी रोशनी से संसार को रोशन कर रहा है. दिन चढ़ते-चढ़ते सूरज की लालिमा की ठंडक, अब चुभन में बदलने लगी है. बस्ती के...

दलित की बेटी

सूरज रोज़ की तरह अपनी रोशनी से संसार को रोशन कर रहा है. दिन चढ़ते-चढ़ते सूरज की लालिमा की ठंडक, अब चुभन में बदलने लगी है. बस्ती के लोग रोज़ की तरह अपने दैनिक कामों में व्यस्त हो चले हैं. झुग्गियों की चिमनियों से धुआं निकल कर सूखे आसमान में बादल बना रहा है. ऐसा लगता है मानो यह धुआं सूरज को चुनौती दे रहा हो कि मैं तुम्हे ढक कर तुम्हारे ताप से बस्ती को मुक्ति दिलाऊंगा. धुंए के बादल क्षणिक ही सही, पर सूरज के ताप को कुछ देर तो अपने भीतर समा ही लेते हैं. जुम्मन चाचा रोज़ की तरह फटा कुर्ता-पायजामा पहन कर मजदूरी पर चल पड़ें हैं. मजदूरी कभी मिलती है, कभी ऐसे ही शाम को खाली हाथ लौटना पड़ता है. कांख में एक छोटी सी पोटली में चाची ने दोपहर के लिए रोटी-प्याज और गुड़ बांध दिया है. साग-सब्जी कहाँ मय्यसर है. कभी साल-दो-साल में ब्याह-शादी में, सब्ज़ी-पूड़ी-मिठाई नसीब होती है. यहाँ बस्ती में सबका हाल जुम्मन चाचा जैसा है. तन ढांपने के लिए चीथड़े हैं और खाने के लिए सूखी रोटी-प्याज और गुड़, पीने के पानी के नाम पर गटर का पानी है. सिर्फ नाम के लिए नल हैं क्योंकि उनमें पानी महीने-दो महीने में एक-आध बार आता है, वो भी वक्त-बेवक्त. बिजली के खंभे एक सरकार ने चुनावी साल में लगवा दिए थे, फिर पिछली सरकार ने चुनावी साल में बिजली के बल्ब और एक-एक पंखा, बस्ती के हर घर में पहुंचा दिया. पर इन बल्बों की रोशनी और पंखे की हवा का इस्तेमाल, कभी बस्ती के लोग ढंग से नहीं कर पाए. क्योंकि चुनावी साल में बिजली ने नेताजी के साथ जो दौरा किया, फिर उसके बाद उसके दर्शन भी, नेताजी की तरह कभी नहीं हो पाए. एक पुराना बिजली का खंभा जरुर था जो किसी बूढ़े स्वतंत्रता सेनानी की तरह आज़ाद भारत की यह दुर्दशा अपनी आँखों से देखता, पर आंसू न बहा सकता था. शाम होते ही इस खंभे पर बल्ब जल जाता और सूरज की पहली किरण के साथ ही, फिर बस्ती के लोगों की ज़िन्दगी में उजाला करने के लिए शाम की प्रतीक्षा करता. सरकारों ने इस बस्ती की ओर कभी ध्यान नहीं दिया. यह एक दलित बस्ती है जिसकी दुनिया, बाकी शहर से अलग थी. यहाँ आज़ादी के 70 साल बाद भी बुनियादी सुविधाओं का टोटा है. बस्ती की याद नेताओं को सिर्फ चुनाव में आती है जब बस्ती की हवा में उड़ने वाली वोटों की खुशबू, इन नेताओं को अपनी तरफ खींच लाती है. इन्हीं विचारों में खोई हुई कमली की तन्द्रा अचानक टूटी, उसने देखा कि माई चाय लेकर खड़ी है. ‘ले कमली चा पी ले, आज तेरी जिनगी का सबसे जरूरी दिन है. “पुचकार कर माँ ने, कमली के सर पर हाथ फेरा, ‘जल्दी से तैयार हो जा कमली, तुझे जाना भी तो है, वो लोग आते ही होंगे.’

‘ठीक है माई’ कमली ने कहा. चाय पीती हुई कमली अतीत की धुंध में खो गयी.

सुर्जे के यहाँ चौथी लड़की पैदा हुई तो घर में किसी को ज्यादा ख़ुशी नहीं हुई. बेटी पैदा होने की खबर सुनकर सुर्जे का दिल बैठ गया. उसे भविष्य की चिंता सताने लगी. अम्मा ने सुर्जे के कंधे पर हाथ रखकर कहा, ‘सुर्जे, क़िस्मत फूटी हुई है तेरी तो, कैसी लुगाई लायो है, चौथी भी लड़की जनी है या ने. यो तो अच्छा हुआ कि पहलकी तीन को राम जी ने अपने पास बुला लिया. नहीं तो तू बेचारा कहाँ से करता इतनी लड़कियों का’. “ कोई बात ना अम्मा, लड़की तो ठीक है ना? अब आ गई है तो.....”-सुर्जे ने अनमने भाव से अम्मा से कहा. “का ठीक है...इसे भी राम जी उठा ही लेता तो ठीक था स्यापा निबटता. चल अब उठ”- अम्मा ने गुस्से में कहा. “इसके ब्याह के खर्चे के पर्चे मेरी आँखों के सामने नाच रहे हैं. कहाँ से लाऊंगा इसे ब्याहने का खर्च”- रुआंसा होकर सुर्जे ने अम्मा से कहा.

दादी ने नई मेहमान का नाम ‘कमली’ रखा क्योंकि नन्ही परी की आँखों में नटखटपन कुछ ज्यादा था. सुर्जा थक-हार कर काम से लौटता तो नन्ही आँखों की चमक और उसकी किलकारियाँ, सुर्जे की पूरे दिन की थकान हर लेती. परंतु अगले ही पल सुर्जे को, उसकी शादी का ख्याल आ जाता और वह नन्ही परी को बिस्तर पर पटक कर, बीड़ी के सहारे कमली के ऊपर भविष्य में होने वाले खर्चों को भूलने की कोशिश करता. नज़रें चुरा-चुरा कर कमली को देखता. कभी-कभी जब कमली और सुर्जे की नज़रें मिल जाती तो ऐसा लगता कि मानों पूछ रही हो – “बापू, मेरा क्या कसूर ?. मैं तो तेरी हूँ, तेरा अपना खून. गिला तो उस जमाने से कर, जो बिना दहेज छोरी को ब्याह कर नहीं ले जाता”. कमली को अपने सवालों का जवाब कभी नहीं मिला. बहुत कोशिश के बाद भी सुर्जे की बीवी की गोद फ़िर कभी हरी नहीं हो पाई. सुर्जा अब निराश रहने लगा. सुर्जा अब झुग्गी में भीतर न घुसता था. रात में रोटी खा कर झुग्गी के बाहर ही बीड़ी फूंकता रहता और बीड़ी फूंकते-फूंकते ही सो जाता. सुबह जल्दी उठकर मजदूरी ढूंढने के लिए निकल जाता. कमली और बापू की मुलाकात को काफ़ी लंबा समय हो गया. कमली बड़ी हुई, उसने कभी अपने बापू को देखा ही नहीं क्योंकि कब बापू आते, कब चले जाते, उसे पता ही न चलता. बाकी बच्चों को उनके बापू के साथ खेलते, कंधे पर घूमते देखकर, अपने बापू की शक्ल का अंदाज़ा लगाने की कोशिश करती.

कमली थोड़ी बड़ी हुई तो उसने देखा कि एक दिन अचानक, उसके साथ खेलने वाले बच्चे रवि, मोहन और सूरज ने उसके साथ खेलने आना बंद कर दिया. उनके घर जाने पर कमली को पता चला कि तीनों स्कूल जाने लगे हैं. अब वो कमली के साथ खेलने कभी न आएंगे. कमली ने घर आकर माँ की ओर सवाल उछाला, “माई, ये ईस्कूल का होवे है ?”, “ मोए का पता कमली, मैं तो कभी नहीं गई सकूल. कल कोई मास्टर साब आए थे, कहंवे थे- नुक्कड़ पे सकूल खुला है, बाल्कन को भेज दीजो”’ माँ ने जवाब दिया. बाल मन की अभिलाषा ने कमली को स्कूल की तरफ खींचा. कमली भागी-भागी नुक्कड़ पे पहुंची तो देखा कि दो कमरे बने हुए थे. कमरों के चारों ओर चबूतरा बना था. दोनों कमरों की दीवारें दूधिया रंग से रंगी हुई थी. स्कूल की दीवारों के बीचों-बीच, दो जगह चौकोर काले रंग की पट्टी बनी हुई थी. कमली चबूतरे पर चढ़कर चारों तरफ देखने लगी. खुली खिड़की से झाँका तो देखती है कि रवि, मोहन और सूरज, तीनों बढ़िया पोशाक पहन कर बैठे हुए थे. काले पुते हुए चौकोर पट्टी पर एक मोटे चश्मे वाला आदमी कुछ लिख रहा था और डंडा रखकर तीनों को कुछ बता रहा था. शायद यही मोटे चश्मे और सफ़ेद कुर्ते-पायज़ामे वाले ही मास्टर साब थे. जब तक कमली पर मास्टर साब की नजर नहीं गयी, कमली वहीं खड़ी रही और क्लास में खो गई . “ए लड़की, क्या देख रही हो खिड़की से इधर आओ”, मास्टर साब ने कड़क आवाज़ में कहा. कमली, मास्टर साब की कड़क आवाज़ से एकदम डर गई और चबूतरे से छलांग लगाकर भाग खड़ी हुई, पीछे मुड़कर नहीं देखा और अपनी झुग्गी में जाकर ही साँस ली. झुग्गी में माई दोपहर का खाना बना रही थी. “ले खा ले, दिन भर भाग-दौड़, धमा-चौकड़ी. कुछ चूल्हे-चौके की अकल भी ले ले. कुछ सीख लेगी तो ससुराल में काम आवेगा”, माँ ने प्लेट में खाना डालते हुए कहा. खाना खा कर कमली सो गई. शाम को कमली सोकर उठी उसे बाहर वाले कमरे से कुछ आवाजें आ रही थीं. शायद कोई आया होगा. आँखें मलते हुए कमली ने दीवार के छेद से झाँका तो देखा कि मास्टर साब थे, माँ के साथ कुछ बात कर रहे थे. मास्टर साब लगातार कमली की माई को कुछ बताने की कोशिश कर रहे थे. गर्मागर्म बहस हो रही थी. पर किस बात पर ? कमली डर गई, कहीं उसकी शिकायत तो नहीं हो रही. कान लगाकर सुनने की कोशिश करने लगी. मास्टर साब, लगातार माई को, कमली को स्कूल भेजने के लिए मनाने की कोशिश कर रहे थे, “कोई खर्च नहीं है. कॉपी, किताब, वर्दी सब सरकार की तरफ से मिलता है. बच्ची को सिर्फ स्कूल आना है और पढ़ना है”. कमली की माँ ने नकारात्मक मुद्रा में कहा, “ ए मास्साब के करेगी पढ़ कै, करना तो मेरी तरह चूल्हा-चौका ही है और लड़की की जात कहाँ अकेली जावेगी, कौन ध्यान रखेगौ. ना मास्साब, हमें ना भेजना सकूल-वकूल.” मास्टर साब भी ठानकर आए थे कि आज कमली की माँ को मनाकर ही उठेंगे. जिद पर अड़ गए, धरना दे दिया. कमली की माँ ने मुसीबत को टालने के लिए अनमने भाव से कह दिया, “ठीक है मास्साब, इसके बापू से पूछकर बता दूंगी, वो कहेंगे, फिर लिख लेना इसका भी नाम सकूल में.” रात को कमली की माँ ने सुर्जे का मन टटोला तो उसने दो-टूक कह दिया, “तेरी लड़की है, जो समझ में आए कर” और दूसरी तरफ मुँह करके सो गया.

अगले दिन से कमली, रवि, मोहन और सूरज चारों स्कूल जाने लगे. कमली ने गज़ब का तेज़ दिमाग पाया था. मास्टर साब के एक बार बताने पर ही कमली दिमाग में बिठा लेती. मास्टर साब की आंखों में उम्मीद की चमक बढ़ने लगी. कभी-कभी खुद पर गर्व भी महसूस होता क्योंकि उन्होंने बस्ती के कीचड़ से हीरा खोज निकाला था. मास्टर साब को कमली की मोटी-मोटी आँखों में कुछ कर गुज़रने का जज़्बा दिखाई देने लगा. मास्टर साब की उम्मीद की पतंग बिना डोर के ही आसमान में उड़ चली. कमली का नाम, स्कूल के रजिस्टर में बदलकर ‘आशा’ कर दिया गया. परंतु हीरा जितना खूबसूरत होता है, उसकी खूबसूरती देखकर जलने वाले भी उतने ही ज्यादा होते हैं. कमली एक दिन रोती हुई स्कूल पहुंची. आंखों से आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे, आँखों से आंसुओं की झड़ी सी लगी थी. आँखों का गीलापन, गालों से होते हुए, पूरे चेहरे को भिगा रहा था. स्कूल का बस्ता और किताबें फट गई थीं. यह देखकर मास्टर साब का दिल दहल गया. दिमाग में हजारों सवाल, अनहोनी की आशंका, कुछ अप्रिय की आशंका से मास्टर साब का दिल बैठा जा रहा था. कमली के आँसू थे कि रुकने का नाम ही न लेते थे और मास्टर साब बार-बार पूछ रहे थे, “क्या हुआ आशा ? कुछ बोल, कुछ तो बोल मेरी बच्ची”. थोड़ा शांत होने पर कमली ने बताया, “बस्ती के बाहर दुकान चलाने वाले सूदखोर महाजन के लड़के और उसके दोस्तों ने....” कमली फिर रोने लगी, “उसके दोस्तों ने क्या मेरी बच्ची ?” “उन्होंने मेरे साथ धक्का-मुक्की की और मेरा बस्ता और किताबें फाड़ दी. मज़ाक भी उड़ाया. कहते थे ‘नीच जात कब से पढने लगी, उस पर भी नीच जात की लड़की’ वाह-भई-वाह, लगता है जमाना सच में बदल रहा है”. मास्टर साब ने चैन की साँस ली और कमली के सर पर हाथ फेरा, “मेरी बच्ची, मैंने तुम्हारा नाम ‘आशा’ इसलिए रखा है क्योंकि तुम उम्मीद की वो किरण हो जो समाज में सबसे दलित ‘स्त्री’ को कैद करने वाली चारदीवारी तोड़कर, स्त्री-मुक्ति की मिसाल बनोगी. औरत को नीच समझे जाने वाले नीचता के तिलिस्म को एक दिन तोड़ोगी. तुम इस समाज के लिए नई मिसाल बनकर उभरोगी और अगर तुम सशक्त बनोगी तभी इस गंदी बस्ती के लोगों के जीवन में कुछ बदलाव ला पाओगी. तुम बदलाव, संघर्ष और नई रोशनी की आशा हो. ये सब घटनाएँ तुम्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करेंगी. जैसे बाबा साहब ने अपने संघर्ष का लोहा पूरी दुनिया को मनवाया, तुम भी एक दिन उन्हीं की तरह अपनी बस्ती के लोगों के लिए संघर्ष करोगी, उनके जीवन में बदलाव लाओगी और अपने माँ-बाप का नाम रोशन करोगी. चलो अब पढ़ाई में जुट जाओ. मैं कल तुम्हें नया बस्ता, कॉपी और किताबें ला दूंगा. चल मेरी बच्ची”.

इसके बाद फिर कमली ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. फिर तो क्या दिन, क्या रात. कमली नुक्कड़ पर लगे खंभे की रोशनी में देर रात तक पढ़ती रहती. कब सुबह से शाम, शाम से रात और फिर अगले दिन का सूरज निकल आता, कमली को पता ही न चलता. समय पंख लगाकर उड़ता गया और कमली ने अपनी पढाई पूरी कर ली. अपनी पढ़ाई के बीच आने वाली सभी मुसीबतों का बड़ी ही बहादुरी के साथ, डटकर मुकाबला किया. कमली ने भारतीय प्रशासनिक सेवा की परीक्षा, प्रथम प्रयास में ही अच्छे अंकों के साथ पास कर ली और जिलाधिकारी के रूप में कमली को इसी ज़िले में नियुक्ति मिल गई.

आज आशा के दफ्तर का पहला दिन था. आशा तैयार होकर चाय पी रही थी तभी एक लाल बत्ती वाली गाड़ी दनदनाती हुई कमली की झुग्गी के बाहर आकर रुकी. आशा, दफ्तर जाने के लिए झुग्गी से निकली तो देखती है कि सुर्जा बाहर दहलीज पर बैठा है. बहुत समय बाद बेटी को देखकर सुर्जे के आँसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे. बाप-बेटी एक दूसरे के गले लगकर ख़ूब रोए. सुर्जे ने आशा के सर पे हाथ रखा और कहा, “बेटियां तो अपना नसीब खुद लिखना जानें हैं, लोग बेकार में लड़कियों की चिंता करते हैं”. पी.ए. की आवाज़ से आशा का ध्यान टूटा’ “मैडम वी आर गेटिंग लेट”. आशा डब-डबाई आँखों से गाड़ी में बैठ गई और शीशा नीचे कर बाहर देखने लगी. “अपना नसीब तो बदल लिया कमली, अब इस बस्ती और समाज का नसीब बदलने की बारी है”.

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रचनाकार: कहानी - दलित की बेटी - डॉ. विवेक गुप्ता
कहानी - दलित की बेटी - डॉ. विवेक गुप्ता
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