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व्यंग्य कहानी - यमलोक और यमदूत - डॉ. विवेक गुप्ता

यमलोक और यमदूत

यमराज सिर पकड़ कर बैठे थे. मुद्रा बेहद गंभीर थी.

“क्या हुआ प्रभु ? आज सिर कैसे पकड़ा हुआ हैं ?”, चित्रगुप्त ने यमराज से पूछा.

“चित्रगुप्त जी, धरती से यमलोक आने वालों की संख्या निरंतर बढ़ती ही जाती है. काम बहुत ज्यादा हो गया है. चैन की साँस लिए हुए बहुत समय हो गया है. काम की अधिकता के चलते, कई दिनों से परिवार की शक्ल भी नहीं देख पाया हूँ”, यमराज ने निराशा भरे स्वर में उत्तर दिया.

“क्या करें प्रभु, काम तो करना ही है, हमें तो धरती के लोगों की तरह ओवरटाइम भी नहीं मिलता”’ चित्रगुप्त ने सांत्वना देते हुए कहा.

“देखो चित्रगुप्त अभी बाहर फ़ैसला करने के लिए कितने लोग बचे हुए हैं’’, यमराज ने चित्रगुप्त को आदेश दिया.

चित्रगुप्त, बचे हुए लोगों की संख्या देखने के लिए यमलोक के दरवाज़े पर निकलते हैं. थोड़ी देर बाद भागते हुए अंदर आते हैं. “क्या हुआ चित्रगुप्त ? थोड़ा साँस ले लो. ऐसा क्या देख लिया बाहर ? बाहर कितने लोग बचे हैं ?”, यमराज ने चित्रगुप्त को रोकते हुए पूछा.

चित्रगुप्त के स्वर में आश्चर्य है, “प्रभु, प्रभु, प्रभु, यमलोक के बाहर भारी भीड़ है. मृत्युलोक से लोग आते ही जा रहे हैं. अब तो बाहर पैर रखने की भी जगह नहीं बची है. यमदूत भी आत्माओं को धरती से ढो-ढो कर बेहाल हैं”.

यमराज भी आश्चर्यचकित हैं, “क्या? ढो-ढो कर थक गये हैं? !!! परंतु यमदूत तो बहुत ज्यादा हैं. फिर क्यों थकते हैं?”

“प्रभु, कहाँ ज्यादा हैं....ज्यादा तो किसी समय में हुआ करते थे. अब जो यमदूत रिटायर होते जा रहे हैं, उनकी जगह कोई नया यमदूत भर्ती ही नहीं किया जा रहा”.

“नई भर्ती नहीं हो रही !!! क्या मतलब है ? नए यमदूतों की भर्ती के लिए ब्रह्मा जी को लिख कर क्यों नहीं भेजते ? यमलोक को यमदूतों की आवश्यकता है. ब्रह्मा जी जल्दी से जल्दी नई भर्ती की आज्ञा दें”.

“भेज चुका हूँ प्रभु, कईं बार ब्रह्मा जी को नई भर्ती के लिए लिख कर भेज चुका हूँ. परंतु ब्रह्मा जी ने तो ख़जाने में पैसे की कमी का रोना रो कर पहले ही यमलोक का बजट कम कर दिया है. ब्रह्मा जी ने बोला है जो यमदूत बचे हैं उन्हीं से काम चलाओ. उन्होंने नई भर्ती करने से बिल्कुल मना कर दिया है. इसलिए जो बचे हैं उन्हीं से काम चला रहे हैं”.

“फिर कैसे काम चलेगा चित्रगुप्त जी ?” यमराज ने सवाल दागा.

“देखतें हैं प्रभु कब तक चलता है”, चित्रगुप्त ने उत्तर दिया.

“कितने दिन पुराने फ़ैसले लंबित पड़े हैं चित्रगुप्त जी?”

चित्रगुप्त अपनी पुस्तक के पन्ने पलटने लगते हैं, उँगलियों पर जमा-घटाव-गुणा-भाग करने के बाद यमराज को बताते हैं, “प्रभु लगभग एक महीने पुराने फ़ैसले लंबित पड़े हैं”.

यह सुनकर यमराज आग़-बबूला हो जाते हैं, “क्या मतलब है एक महीने से ? हमने तो पिछले कई वर्षों से एक भी छुट्टी नहीं ली है. लगातार काम करता ही जाता हूँ. फिर इतने दिनों के फ़ैसले कैसे लंबित हैं? कल मेरे पास जिस सेठ धर्मदास का केस आया था, वह तो परसों ही मरे थे”.

“प्रभु, मृत्युलोक में जनसंख्या बहुत बढ़ गयी है. इंसानों ने अपनी संख्या इतनी बढ़ा ली है कि ये बढ़ती हुई जनसंख्या अब इंसानों के लिए ही समस्या बनती जा रही है. हस्पताल, स्कूल, रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड, कहीं भी जगह नहीं है. प्रभु, यह बात इंसानों को भी पता है कि उनकी समस्याओं का मूल कारण, उनकी बढ़ती हुई जनसंख्या है. परन्तु फिर भी इंसान इस ओर ध्यान नहीं दे रहा”,चित्रगुप्त ने समस्या के मूल कारण की तरफ यमराज का ध्यान आकर्षित करने का प्रयास किया.

“यह बात तो सही कही चित्रगुप्त जी, हमने धरती पर इंसान को भरपूर संसाधन उपलब्ध कराए हैं. पंरतु इंसानों ने अपनी संख्या, इतने विस्फोटक रूप से बढ़ा ली है कि अब हमारे दिए संसाधन, उन्हें कम पड़ रहे हैं. धरती का क्षेत्रफ़ल तो निश्चित है परंतु इंसानों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है. आप बात न बदलें. सेठ धर्मदास के केस पर रोशनी डालें”

“प्रभु, इंसान बड़ा ही चालाक प्राणी है, वह हर जगह अपनी जान-पहचान निकाल कर, अपने काम दूसरों से पहले करवा लेता है. सेठ धर्मदास ने आठ नं. यमदूत से जान-पहचान निकाल ली. आठ नं. यमदूत, सेठ धर्मदास की बीवी का दूर का रिश्तेदार निकला. वैसे तो यमदूत काफ़ी कामचोर होते हैं, दूसरों की बात भी कम ही मानते हैं, अपने अफसरों की भी नहीं सुनते, मनमर्जी से काम करते हैं”.

“ऐसे-कैसे अपनी मनमर्जी कैसे करते हैं, चित्रगुप्त जी?”

“प्रभु अब गिनती के ही यमदूत बचे है, इस बात का लाभ उठाकर रिश्वत भी लेते हैं और अपनी मनमानी करते हैं. आठ नं. यमदूत की रिश्तेदारी सेठ धर्मदास की पत्नी से निकल आई तो उसने आकर मुझसे व्यक्तिगत आग्रह किया कि सेठ धर्मदास का मुकद्दमा जल्दी से सुना जाए”.

“तो आपको उसे मना कर देना चाहिए था. लगता है इंसान अपनी भ्रष्टाचार की बीमारी को, यमलोक में भी अपने साथ ही ले आया है”. यमराज ने गरजते हुए कहा.

“क्षमा करियेगा प्रभु, सोचा तो मैंने भी था कि मना कर दूंगा, पर फिर सोचा कि हमें इन्हीं यमदूतों से काम लेना है तो इनके कहने से एक-आध केस बीच में घुसा देने में कोई बुराई नहीं है. और फिर प्रभु इन दुष्ट यमदूतों की यूनियन बहुत ताकतवर है, इनमें बड़ी एकता है”.

“कौन है इनकी यूनियन का नेता ? उस पर काम का बोझ लाद दो, अपने आप सारी हेकड़ी निकल जाएगी यूनियनबाज़ी की...”

“क्या काम लाद दें प्रभु, एक नंबर का निक्कमा है, ब्रह्मा जी का रिश्तेदार है, सिफ़ारिश से नौकरी पा गया है यमलोक में. कुछ भी काम नहीं आता”.

“तो उसको निकल बाहर करो, किसने रोका है ?”

“ऐसा नहीं हो सकता प्रभु, उसके सिर पर सीधा ब्रह्मा जी का हाथ है. अभी कुछ दिन पहले मैंने उसे एक काम करने के लिए बोला था. काम नहीं किया, उल्टा यमदूतों से हड़ताल करवा कर सारा काम ठप्प करा दिया. बहाना बनाया कि महंगाई बहुत है, तनख्वाह और महंगाई भत्ता बढ़ाया जाए. हड़ताल के चलते काम का बैकलॉग तीन महीने तक जा पहुंचा था. इनकी हड़ताल के चलते आत्माओं को बहुत कष्ट पहुंचा और उन्हें नाहक तीन महीने का इंतज़ार करना पड़ा. हड़ताल खत्म करने की मेरी व्यक्तिगत प्रार्थना का भी यूनियन के प्रधान पर कोई असर नहीं पड़ा. यमलोक में आत्माओं की भीड़ लग गई. फिर इन आत्माओं ने हंगामा कर दिया. कुछ आत्माएं ब्रह्मा जी तक जा पहुंची थी. फिर उनके हस्तक्षेप के बाद ही हड़ताल खत्म हो पाई”.

“यमलोक में इतना कुछ हो गया. हम कहाँ थे उस समय ?”

“प्रभु आप अपने परिवार के साथ मौज-मस्ती करने के लिए छुट्टी पे गए हुए थे. लाख कोशिश के बाद भी आप से संपर्क नहीं हो पाया”, चित्रगुप्त ने यमराज को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की.

यमराज ने बड़ी चालाकी से चित्रगुप्त की बात का उत्तर देते हुए कहा, “परंतु यमदूतों की माँग तो सर्वथा उचित थी, आजकल महंगाई इतनी अधिक बढ़ गयी है कि इतनी कम तनख्वाह में गुज़ारा करना बड़ा मुश्किल है”.

“महंगाई तो बहुत है प्रभु, परंतु इन दुष्टों ने अपनी जरूरतें इतनी असीमित कर ली हैं कि इनकी तनख्वाह चाहे जितनी बढाओ, इन्हें कम ही पड़ती है.आजकल हर चीज़ में दिखावा हो गया है, इस दिखावे के चक्कर में अंधाधुंध खर्चे होते हैं”.

“बात तो ठीक है चित्रगुप्त, जरूरतें अगर सीमित रहें तो घर का खर्च बहुत कम पैसों से भी चल सकता है. परंतु जरूरतों के पीछे भागने की अंधी दौड़ और भौतिकतावादी चकाचौंध ने सबको पागल बना दिया है. आज भौतिकता ने हमें अपना गुलाम बना लिया है. खैर जाने दो, अब इस भीड़ का क्या किया जाए, कुछ तो उपाय सुझाओ. ऐसे तो हम दोनों पर काम का बोझ बढ़ता ही जाएगा”.

“मुझे तो कुछ नहीं सूझता प्रभु. कैसे इतनी भीड़ का निबटारा होगा?”.

“प्रभु की जय हो, प्रणाम चित्रगुप्त जी”, यमलोक के गंभीर माहौल में अचानक एक आवाज़ गूंजी.

“आ गया दुष्ट, यूनियन लीडर. कामचोर कहीं का. इतनी तेज़ आवाज़ है, दोनों को डरा दिया इसने”, चित्रगुप्त मन-ही-मन बुदबुदाए.

“क्षमा कीजिए प्रभु, मैं काफ़ी देर से आपकी बातचीत चोरी-छुपे सुन रहा था”. यूनियन लीडर ने कड़क आवाज़ में कहा.

“यह क्या हिमाकत है, हमारी बातें चोरी छुपे सुनते तुम्हें लज्जा नहीं आती ? पहले भी तुम्हारी कईं शिकायतें मिल चुकी हैं कि तुम यमलोक से जाने-आने वाली फाइलों को चोरी-छुपे पढ़ते हो”, यमराज का चेहरा लाल हो गया.

“माफ़ कर दें माईबाप, मुझे माफ़ कर दें”, यूनियन लीडर दोनों हाथ जोड़कर गिड़गिडाने लगा.

“ठीक है, ठीक है, अब तुमने हमारी बातें सुन ही ली हैं तो तुम ही इस समस्या का कुछ उपाय सुझाओ” यमराज ने थोड़ा नर्म होकर कहा.

“उपाय तो है, प्रभु”, “तो जल्दी कहो, लीडर”, यूनियन लीडर ने भांप लिया कि यमराज मजबूर हैं और उसके झांसे में आ सकते हैं. यमराज की चमचागिरी की खीर खाने का यही मौका है. लीडर मन-ही-मन मुस्कुराते हुए धीमे से बोला, “प्रभु, धरती पर योग्यता मापने के लिए आजकल प्रतियोगी परीक्षा का चलन हो चला है. किसी भी प्रकार की योग्यता जांचने के लिए प्रतियोगी परीक्षाएं आयोजित की जाती हैं”, “प्रतियोगी परीक्षा ?”, यमराज ने टोकते हुए सवाल फेंका.

“जी, प्रभु, यह एक लिखित परीक्षा होगी, जो इसमें पास होगा वह स्वर्ग जाएगा और जो इसमें फ़ैल होगा वह नरक जाएगा”

“परंतु ऐसा, कैसे हो सकता है”, चित्रगुप्त ने यूनियन लीडर को बीच में रोकते हुए कहा’ “प्रतियोगी परीक्षाओं में तो धांधली की बहुत खबरें आती हैं. इन परीक्षाओं में भ्रष्टाचार की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता. ऐसे तो गलत व्यक्ति स्वर्ग पहुँच जाएगा और सही व्यक्ति नर्क में चला जाएगा. अयोग्य भी पद पा जाएंगे”.

“सुझाव कुछ-कुछ जम तो रहा है चित्रगुप्त”, यमराज ने कहा.

“परंतु प्रभु......”चित्रगुप्त शंकित हैं.

“ज्यादा शंका-लघुशंका के चक्कर में मत पड़ो चित्रगुप्त. तुम तो केवल यह सोचो कि इस सब से यमलोक का पल्ला कैसे छुड़ाया जाए. कैसे भी इस भीड़ को यहाँ से भगाओ. सही-ग़लत इंसान पहुंचने की सरदर्दी स्वर्गाधिपति और नरकाधिपती को लेने दो. वो स्वयं झेलेंगे. वैसे भी सहस्त्रों वर्षों से हम ही काम करते आ रहे हैं और वो दोनों मजे से बैठे बैठे तनख्वाह लेते जाते हैं.फ़ैसला हो चुका है. अब प्रतियोगी परीक्षा आयोजित होगी”, यमराज ने दृढ़ता से कहा.

“परंतु प्रभु ब्रह्मा जी इसके लिए कभी नहीं मानेंगे”, चित्रगुप्त ने शंकित स्वर में कहा.

“उन्हें आप मुझ पर छोड़ दें. ब्रह्मा जी को कैसे मनाना है, यह मैं अच्छे से जानता हूँ”, यूनियन लीडर के स्वर में आत्मविश्वास था.

एक के बदले दो वोट से फ़ैसला हो चुका था. यमलोक के नोटिस बोर्ड पर नोटिस चिपकाया जा चुका था’ “यमलोक से स्वर्ग और नर्क जाने का फ़ैसला, प्रतियोगी परीक्षा के आधार पर होगा. जो परीक्षा पास करेगा, वह स्वर्ग जाएगा अन्यथा नर्क में जाना पड़ेगा. प्रतियोगी परीक्षा प्रतिदिन सूर्यास्त के पश्चात आयोजित की जाएगी. परीक्षा संचालक यमदूत यूनियन के लीडर होंगे”.

नोटिस पढ़कर चित्रगुप्त जी निराश थे, उनका मन ग्लानी से भरा था क्योंकि अब अयोग्य व्यक्ति भी स्वर्ग के लिए चुन लिए जाएँगे और सज्जन व्यक्ति को मृत्यु के पश्चात भी नर्क ही भोगना पड़ेगा. यह सब चित्रगुप्त की आँखों के सामने हो रहा था.

दूसरी ओर यमदूत यूनियन के लीडर अपने चमचों के साथ ज़ोर-ज़ोर से हंस रहे थे क्योंकि यह प्रतियोगी परीक्षा उन सबके भविष्य की उन्नति की असीम संभावना लिए हुई आई थी.

यमराज के चेहरे पर भी संतुष्टि का भाव खेल रहा था, उनका काम अब बगैर कोई मेहनत किए हो जाएगा. स्वयं को एक अच्छा प्रशासक सिद्ध करने की चमक उनकी आँखों में स्पष्ट देखी जा सकती थी. बहुत काम कर लिया. अब यमलोक में बैठकर आराम से हवा खाएंगे. “बगैर काम किए तनख्वाह लेने के मज़े मेरे भी नसीब में हैं ? शुक्रिया यूनियन लीडर”, यमराज बुदबुदाए और मंद-मंद मुस्कुराने लगे.

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