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कहानी - चीलिंग सेंटर --- अरुण अर्णव खरे

कहानी

चीलिंग सेंटर

--- अरुण अर्णव खरे --

दिनकर बड़ी उम्मीदों के साथ अपनी पहली नौकरी का नियुक्ति-पत्र लेकर रतनगढ़ आया था | ज्वाइनिंग को लेकर वह बहुत उत्साहित था | उसके मन में कितनी ही भावनाएँ हिलोरें ले रहीं थी -- कितने ही अरमान इन्द्रधनुषी रंगों में सराबोर होने को बेताब हुए जा रहे थे -- वर्षों से संजोए सपने पंख लगाकार आसमान में विचरने की स्वच्छन्दता चाह रहे थे | जब उसने अपनी ज्वाइनिंग रिपोर्ट चीलिंग सेण्टर के मैनेजर वासुदेव पाठक को दी तो उन्होंने गर्मजोशी से उससे हाथ मिलाया और नई नौकरी की शुभकामनाएँ दी | ऑफिस के लोगों से परिचय कराया और फिर शिफ़्ट इंचार्ज आशुतोष सिकरवार को साथ लेकर पूरे प्लाण्ट की कार्यप्रणाली समझाई |

दिनकर को चीलिंग सेण्टर में काम करते हुए एक माह हो गया था - कितना कुछ घट गया था इस बीच - उसकी जिन्दगी और सोच की दिशा ही बदल गई थी - क्या-क्या सोचकर आया था वह और क्या-क्या करना पड़ गया था उसे | कितना मुश्किल है नौकरी में रम पाना - पापा क्यूँ हमेशा चिन्तित दिखते थे अपनी नौकरी को लेकर - उसे समझ में आने लगा था | केवल तीस दिनों में ही उसकी सारी धारणाएँ ध्वस्त हो गईं थी - ईमानदारी, सच्चाई और अच्छा आचरण -- सब व्यर्थ की बातें हैं -- किताबी हैं -- उसे समझ में आ गया था - भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हैं - भ्रष्ट लोग कितने बलशाली हैं -- उफ -- सोच कर ही दिल काँपने लगता है अब तो | जो भी सिस्टम से बाहर अपनी राह खोजने निकला वह फिर कहीं का नहीं रहा - पिछले एक माह में ही उसने कितना कुछ महसूस कर लिया था | महाजन सर का यह कथन - " जिन्दगी में आगे बढ़ने के लिए प्रेक्टिकल होना बहुत जरूरी है" हर काल में कितना प्रासंगिक और सार्थक है, इन दिनों में उसने शिद्दत से महसूस किया था | उसे याद हो आया पहले ही दिन का घटनाक्रम -- कैसे उसे शाम को नाइटशिफ्ट के इंचार्ज के रूप में कार्य करने का आदेश थमा दिया गया था | आदेश देख कर ही उसका सिर घूम गया - पहली-पहली नौकरी, ना कार्य करने का अनुभव, नया प्लाण्ट, नई जिम्मेदारी - उसे ध्यान हो आया रवि अंकल का वह कथन जो उन्होंने उसे समझाते हुए कहा था - "बेटा, तुम तो मेकेनिकल इंजीनियर हो फिर डेरी की नौकरी क्यूँ करना चाह रहे हो -- डेरियों का वातावरण अच्छा नहीं है तुम्हें बहुत सम्हल कर काम करने की जरूरत होगी -- वहाँ डेरी टेक्नॉलॉजिस्ट की ही चलती है -- सारे मैनेजर भी डेरी बेकग्राउण्ड वाले ही होते हैं इंजीनियरिंग वालों को तो मौका ही नहीं मिलता ऊपर तक जाने का -- तुम्हें भी जल्दी यह सब समझ में आ जाएगा - मेरी मानो तो जितनी जल्दी हो सके तुम दूसरी नौकरी ढूँढ़ लेना" -- उस समय उसे रवि अंकल की बात सुनकर बहुत दुख पहुँचा था | वह डेरी से सीनियर प्लाण्ट सुप्रिंटेण्डेण्ट के पद से रिटायर हुए थे और उसके पापा के क्लासमेट थे | उन्हें वह क्या बताता कि नौकरी पाना क्या इतना आसान है -- पिछले एक साल से वह नौकरी की तलाश कर रहा है अब जाकर उसकी तलाश पूरी हुई है -- उसको शुभकामनाएँ देना तो दूर अंकल उल्टा उसे डरा रहे हैं | सोच-सोच कर वह परेशान हो ही रहा था कि मैनेजर पाठक की आवाज ने उसकी एकाग्रता भंग की - "मि० दिनकर, डोंट वरी -- आई हेव आलरेडी इंस्ट्रक्टेड मि० आशुतोष टू ज्वाएन यू इन नाइट टिल यू गेट एकस्टम्ड आफ द वर्किंग आफ द प्लाण्ट"

उसने यह सुनकर कुछ रिलेक्स्ड महसूस किया -- चार दिनों में उसने प्लाण्ट की कार्य प्रणाली काफी कुछ समझ ली - स्टाफ से भी उसका परिचय हो गया था | इतने समय में उसे अहसास हो गया था कि नौकरी करना आसान काम नहीं है | उसे खुद को प्रूव करने के लिए बहुत मेहनत करनी होगी - नौकरी ज्वाएन करने के पहले अफसरी के जो सपने सँजोए थे उनके लिए यहाँ कोई अवसर नहीं है - यहाँ का काम बिल्कुल अलग तरह का है | स्टाफ से काम कराने से लेकर समय पर दूध की सप्लाय सुनिश्चित करने तक बहुत सारी जिम्मेदारियाँ उसके कन्धों पर आ गई थी | इण्डेपेण्डेंट चार्ज सम्हालने के पहले ही दिन उसका बॉयलर ऑपरेटर यासीन से पंगा हो गया | वह समय पर उपस्थित नहीं हुआ -- उसने उसको अब्सेण्ट कर दिया | यद्यपि उसकी अनुपस्थिति में प्लाण्ट ऑपरेटर सुमेर सिंह ने बॉयलर चालू कर लिया था और सभी कण्टेनर्स को स्टीम वॉश भी कर दिया था | यासीन ने देरी से आने के बाद भी उससे मिलने की जरूरत नहीं समझी और उसके सामने से एक भद्दी सी गाली देते हुए चला गया | वह उस समय केमिस्ट से कितना मिल्क पॉवडर मिलाया जाना है, की जानकारी ले रहा था | उसने यासीन को गाली देते हुए सुन तो लिया था लेकिन उस समय अनसुना करना ही उसे बेहतर लगा | अंकल की बात उसे याद आ गई थी कि डेरी में बहुत नेतागिरी है और उसे कई परीक्षाओं से रोज गुजरना होगा |

इस बात को चार दिन हो गए | यासीन भी समय पर आने जाने लगा था -- लेकिन उसके लिए चुनौतियों की कमी नहीं थी | उस दिन वह रात को तीन बजे अचानक ही अपने चेम्बर से उठ कर प्लाण्ट की और चला आया था - देखा - रामरतन, सिया चरन, मनसुख और जग्गी जग में दूध लेकर पी रहे थे | उसने चारों को डाँट दिया - साथ ही इसका पैसा उनके वेतन से वसूल करने की धमकी दी | यासीन पास ही खड़ा यह सब देख रहा था | जब वह चेम्बर की ओर वापस लौट रहा था उसके कानों में यासीन की आवाज पड़ी - "नया-नया मुल्ला बना है ज्यादा प्याज खाएगा ही - अरे कुछ नहीं होगा, तुम लोग ऐसी घुड़कियों से डरो मत -- ऐसे कितने ही निकाल दिए हैं अबतक नीचे से"

उसके तन वदन में आग लग गई लेकिन वह कुछ सोचकर चुप रहा आया | अगले दिन फिर उसके सामने विकट स्थिति उत्पन्न हो गई | वह केमिस्ट अजीत सक्सेना के रजिस्टर के पन्ने पलट रहा था - जिसमे वह प्रतिदिन सोसायटीवार आनेवाले दूध का फेट परसेण्टेज दर्ज करता था - अचानक एक इण्ट्री पर उसकी नजरें ठिठक गईं | उसे गड़बड़ी की आशंका हुई | कल ही उसके सामने रायला मण्डल और फुलबाड़ी सोसायटीज से आने वाले दूध की जाँच सक्सेना ने की थी तो उसमे निकले फेट और रजिस्टर में दर्ज फेट में आधे किलो का अन्तर था | स्पष्ट था सक्सेना द्वारा सोसायटीज को लाभ पहुँचाने के लिए उनका फेट पर्सेण्टेज बढ़ाकर अंकित किया जा रहा था | उसे मिल्क पॉवडर के रजिस्टर में भी गफलतबाजी लगी -- हर दिन ४०-५० किलो पॉवडर की खपत अधिक दर्शाई जा रही थी | सक्सेना से पूँछा तो उसने हँसकर टालने की कौशिश की | जब उसके विरुद्ध कार्यवाही करने की धमकी दी तो वह उल्टा उसके काम में दखल ना देने की सीख देने लगा | उसने रात में ही मैनेजर के नाम पूरा विवरण लिखते हुए सक्सेना के विरुद्ध उचित कार्यवाही करने के लिए एक पत्र लिख डाला | उसे उम्मीद थी कि मैनेजर जरूर उचित कार्यवाही करेंगे पर तीन दिन बाद भी मैनेजर ने कोई कार्यवाही नहीं की | उसे लगने लगा कि इस काम में मैनेजर की भी मिली भगत हो सकती है |

अगले दिन दोपहर को साबूलाल सेन मिलने आया | साबूलाल उसकी शिफ्ट का सबसे पुराना कर्मचारी था - वह ज्यादा पढ़ा लिखा तो नहीं था लेकिन प्लाण्ट से सम्बन्धित सारी जानकारी उसे थी | वह अपना काम पूरी जिम्मेदारी से करता था |

"साब आपसे एक बात कहनी है"- साबूलाल दबी जुबान से बोला |

"हां, साबू बोलो"

"साब आप यासीन -- सक्सेना जैसे लोगों के बीच में मत पड़ा कीजिए --"

"प्लाण्ट अच्छे से काम करे - सभी काम ईमानदारी से हों - सारे रिकार्ड सही रखे जाएं -- ये सब देखना मेरी जिम्मेदारी है -- मैं नहीं देखूँगा तो फिर कौन देखेगा - मेरा काम ही क्या है" - उसने कहा था - "मैं तो केवल अनुशासन में रहकर काम करने के लिए कहता हूँ"

"साब - मैं यह सब नहीं जानता -- पहले भी ऐसे ही काम होता था -- आप मुझे अच्छे लगे इसलिए आपसे कहने चला आया - आप समझदार हैं - बस आप मेरी इतनी बात मान लीजिए -- कुछ दिनों में आपको सब पता चल जाएगा" - साबू इतना कहकर चला गया लेकिन उसे अनेक अनसुलझे सवालों के बीच छोड़ गया |

अगले दिन फिर नई मुसीबत से उसका सामना हो गया | जिन दो टेंकरों से प्रतिदिन तीन-तीन हजार लीटर दूध दिल्ली भेजा जाता था उनमे उसे पाँच सौ लीटर दूध का एक गुप्त चेम्बर मिला था -- जिस कारण टेंकर में तीन हजार के स्थान पर साढ़े तीन हजार लीटर दूध भरा जाता था | मतलब हर दिन एक हजार लीटर दूध का गोलमाल किया जा रहा था | रिकॉर्ड बुक्स में यह गड़बड़ी प्लाण्ट की पाइप लाइन में डेड स्टोरेज और वेस्टेज के रूप में दर्शाई जाती थी | उस दिन उसने कोई हंगामा नहीं किया और चुपचाप फोन पर मैनेजर को सब कुछ बता दिया | मैनेजर ने सब ध्यान से सुना और फिलहाल टेंकर को जाने देने के लिए कहा | उस समय उसने टेंकर को जाने तो दिया लेकिन रिकॉर्ड बुक में टेंकर का पुन: फिजिकल वेरिफिकेशन कराने का नोट लगा दिया | वह दिनभर सोचता रहा -- मैनेजर ने आखिर क्यूँ कोई एक्शन नहीं लिया -- क्या मैनेजर की ईमानदारी दिखावा मात्र है -- वह भी सबसे मिला हुआ है -- और खूब गोलमाल कर रहा है --

शाम को प्लाण्ट पर जाने से पूर्व साबू उससे मिलने आ गया | आते ही बोला - "साब आपने मेरी बात नहीं मानी ना -- आप सबसे अकेले कैसे लड़ पाएँगे -- आप किसी दिन बड़ी मुसीबत में फँस जाएँगे"

"साबू - तुम मुझे मुसीबत से बचाना तो चाहते हो पर मैं क्या करुँ -- किससे मदद लूँ मैं -- मेरी समझ में कुछ नहीं आता" उसने साबू से कहा था |

"आपकी कोई मदद नहीं करेगा यहाँ - मैं भी नहीं कर पाऊँगा -- आपको पता है आपने आज जिन टेंकर की रिपोर्ट की है वे किनके हैं"

"किनके हैं --"

"चेयरमेन भैरूलाल गौतम के साले केशव राम के - सबको पता था कि टेंकर में ज्यादा दूध जा रहा है -- पर किसी ने कभी कुछ नहीं किया - यासीन उनका आदमी है - उसके भाई ने पिछले चुनाव में भैरूलाल के कहने पर किसी को ठिकाने लगाया था -- तबसे वह जेल में है -- यासीन भी पिछले मैनेजर से मारपीट के चक्कर में सस्पेण्ड हुआ था पर क्या हुआ -- वह एक हफ़्ते में ही बहाल हो गया और मैनेजर का ट्रांसफर कर दिया गया -- सक्सेना उसका पिछलग्गू है -- आप कैसे पार पाएँगे ऐसे लोगों से -- आपको कुछ हो गया तो क्या बीतेगी आपके घर वालों पर -- जैसे आशुतोष बाबू आँख बन्द करके रखते हैं आप भी तो वैसे रह सकते हैं --"

उस रात वह अपने चेम्बर में ही अनमना सा बैठा रहा - ना उसने सक्सेना से कुछ पूँछा और ना प्लाण्ट को देखने गया | सुबह दिल्ली जाने वाले दूसरे टेंकर आए थे -- वह देखकर अन्दर ही अन्दर खुश तो हुआ पर निर्विकार बना रहा -- उसने टेंकर में कोई रुचि नहीं दिखाई | सुमेर सिंह ने रोज की तरह उनमें दूध भरा और गेटपास देकर रवाना किया | दो दिन ऐसे ही बीत गए |

दोपहर को जब वह लंच लेकर होटल से लौट रहा था कि मैनेजर का सन्देश आ गया - तुरन्त आफिस में आने के लिए | मैनेजर बहुत गुस्से में था - "आप ऐसे काम करेंगे -- इस तरह आँख बन्द करके प्लाण्ट चलाएँगे -- पता भी है क्या हुआ है आपकी शिफ्ट में --"

वह हक्का-बक्का था - शब्द उसके गले में अटक गए थे | मैनेजर ने बात चालू रखी - "सुबह से दूध फटने की शिकायतें आ रहीं हैं - पूरा तीस हजार लीटर दूध आपकी लापरवाही की भेंट चढ़ गया - लाखों के इस नुकसान की भरपाई कौन करेगा - आपकी नौकरी जाएगी सो अलग -- हमारे लिए भी मुसीबत खड़ी कर दी आपने"

उसे शोकॉस नोटिस मिल गया | कई दिनों तक वह विक्षिप्त सा रहा आया - क्या करे वह, नौकरी को बाय-बाय कह दे - पर क्या गॉरण्टी है -- उसे जल्द दूसरी नौकरी मिल जाएगी - नई नौकरी में भी उसे इन सब चुनौतियों का सामना नहीं करना पड़ेगा - वह हार नहीं मानेगा - वह हार कैसे मान सकता है - घर में सब कितने खुश थे उसकी नौकरी लग जाने के बाद - पापा ने कितनी मुश्किल से लोन लेकर उसे पढ़ाया था -- एक साल से वह ही लोन की किश्त भर रहे थे - अब उसे मौका मिला है पापा का हाथ बँटाने का -- तो वह भाग जाना चाहता है -- और लोग भी तो नौकरी कर रहे हैं -- वह क्यूँ सबके काम में दखल देता है -- सबके साथ मिलकर काम क्यूँ नहीं करता -- वह प्रेक्टिकल क्यूँ नहीं होना चाहता -- सारी व्यवस्था ठीक करने का सारा ठेका उसका तो है नहीं -- मैनेजर को भी सब पता है -- उसने शिकायत भी की थी पर उन्होंने भी कुछ कहाँ किया था - एक बार भी उससे चर्चा नहीं की -- अब दोबारा उससे कोई गलती हुई तो नौकरी गई -- क्या मुँह लेकर जाएगा वापस घर - पापा ने भी तीस साल नौकरी की है - उन्होंने भी सब कुछ सहा ही होगा पर नौकरी तो करते ही रहे ना -- वह भी करेगा नौकरी -- अच्छे से करेगा -- सबको साथ लेकर चलेगा वह -- किसी से कोई पंगा नहीं -- सबका दोस्त बन कर रहेगा वह --

कई दिनों बाद वह रात में घूमते हुए प्लाण्ट की ओर चला आया था | सब अपने काम में व्यस्त थे | उसने सिया चरन को इशारे से बुलाया, कहा - "बहुत थकान सी लग रही है -- तुम चाय नहीं पिलाओगे आज"

सियाचरन अविश्वास से उसका मुँह ताकने लगा | कुछ देर में वह चाय बनाकर उसके चेम्बर में ले आया | साबू के चेहरे पर उभर आई हँसी उससे छुप नहीं सकी | सुबह केम्पस में फिर वही पुराने टेंकर दूध लेने आए हुए थे -- वह दूर खड़ा क्षितिज में धीरे-धीरे सूरज को ऊपर की ओर चढ़ते देख रहा था -- पर अन्दर एक सूरज डूब रहा था |

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अरुण अर्णव खरे

डी-1/35 दानिश नगर

होशंगाबाद रोड, भोपाल (म०प्र०),

पिन: 462026

मोबा०: 9893007744 ई मेल: arunarnaw@gmail.com

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