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कहानी -- आफरीन --- अरुण अर्णव खरे

कहानी

आफरीन

--- अरुण अर्णव खरे ---

मिसेज रचना त्रिवेदी पिछले तीन दिनों से ठीक से सो भी नहीं पा रहीं थी जबसे उन्हें बेटे नीरज और बहू आफरीन के आने की खबर मिली थी | वह बहुत बेचैन थीं - बेटे ने परिवार की मान-मर्यादा, शान, परम्परा और संस्कारों के विरुद्ध जाकर एक मुस्लिम लड़की से शादी की थी | नीरज को कितना समझाया था उन्होंने -- स्वर्गीय पापा का वास्ता भी दिया था -- पास-पड़ोस और नाते-रिश्तेदारों में हुई लव-मेरिज की विफलताओं के उदाहरण दिए थे - पर नीरज सदा एक ही बात दोहराता रहा था - "माँ, आफरीन वैसी नहीं है - वह सबसे भिन्न है - आप मेरा विश्वास कीजिए -- उससे बेहतर जीवनसाथी मुझे दूसरा नहीं मिल सकता -- मुसलमान होना अपराध तो नहीं है ना माँ - जन्मने के लिए परिवार का चयन किसी के हाथ में कहाँ होता है, आप उससे मिलेंगी तो आपको भी लगेगा -- आपके बेटे ने आपके लिए वैसी ही आदर्श बहू चुनी है जिसकी आपने कल्पना की है --"

बेटे का कोई तर्क रचना को डिगा नहीं पाया था -- वह बेटे के विवाह में भी शामिल नहीं हुई थी - दोनों ने कोर्ट मेरिज की थी - बाद में उसे मालूम चला था -- दोनों का निकाह भी हुआ था - तबसे उनका मन बहुत खट्टा हो गया था - एक ही बात उसके मन को हमेशा रुई सा धुनती रहती थी - आफरीन ने उनके बेटे को उनसे छीन लिया है -- उसके घरवालों ने षड़यन्त्र करके नीरज का धर्म भ्रष्ट कर दिया है - उन्हें समाज में किसी को मुँह दिखाने लायक भी नहीं छोड़ा -- |

हिन्दु रीति-रिवाजों को छोड़ कर नीरज के निकाह करने की खबर ने उन्हें बहुत आहत किया था - जिस बेटे को उन्होंने कितनी मुश्किलों में लाड़-प्यार से पाला था उसने एक विधर्मी के चक्कर में पड़ कर उन्हें ही एक प्रकार से त्यागने का फैसला कर लिया था | इसके बाद से वह ना तो किसी रिश्तेदार के यहाँ गईं थीं और ना ही किसी सखी-सहेली के यहाँ - कॉलोनी में भी घर से निकलना लगभग बन्द कर दिया था - वह घर में सिमट कर रह गईं थी | बद्री काका ने तो उनसे सारे सम्बन्ध तोड़ने का फरमान सुना दिया था -- सुमन दीदी ने भी उन्हें कितनी बातें सुनाईं थी और तो और उनकी प्रिए सहेली लता गौतम एक बार भी उनका हालचाल जानने तक नहीं आई थी -- नीरज के एक रिश्ते ने कितने रिश्तों पर पूर्ण विराम लगा दी थी | यदा-कदा बेटी पूर्वा और दामाद जी आ जाते थे हालचाल जानने -- पूर्वा तो एक बार आफरीन से मिल भी आई थी -- लौटने पर वह भी नीरज के रंग में सराबोर लगी थी उन्हें -- आफरीन की तारीफ में उसके पास शब्द कम पड़ जाते थे - तबसे आफरीन उन्हें किसी जादूगरनी जैसी लगने लगी थी - काले जादू के बारे में उन्होंने सुना तो था पर अब उसका असर महसूस कर रहीं थी |

नीरज और आफरीन ने साथ ही विद्यापीठ से इलेक्ट्रोनिक्स में इंजीनियरिंग की थी और संयोग से दोनों का केम्पस सेलेक्शन भी एक रोबोटिक्स कम्पनी में हो गया था | पढ़ते समय नीरज ने अनेक बार आफरीन का जिक्र किया था परन्तु मिसेज त्रिवेदी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि बात इतनी आगे तक बढ़ जाएगी | अति सम्मानित ब्राह्मण कुल तथा अपनी सात्विकता और आदर्शों के लिए जाने जानेवाले परिवार का कुलदीपक एक दिन मुसलमान बहू लेकर आएगा, यह कल्पना कर ही वह सिहर गईं थी |

रचना के मन में नीरज और आफरीन के आने को लेकर कोई उत्साह नहीं था | दोनों ने झुककर जब उनके पैर छुए तब भी उन्होंने ना तो अशीर्वाद देने को हाथ उठाया और ना ही हमेशा की तरह अपने कलेजे के टुकड़े को गले लगाया | एक उचाट सी नजर आफरीन पर डाली - आसमानी जार्जट की साड़ी में लिपट कर चाँद ही जमीन पर उतर आया था जैसे - तो रूप के इसी जाल में उलझाया है इसने भोले-भाले नीरज को -- कितना असहाय लगने लगा है बेचारा --

उस रात भी उन्हें बहुत देर तक नींद नहीं आई -- नीरज, आफरीन और उनके स्वयँ के इर्द-गिर्द बुन चुके मकड़ जाल में उलझीं वह बाहर निकलने का रास्ता तलाशती रहीं | उनके परिचितों में हुए कितने ही प्रेम-विवाह उनकी आँखों में तैरते रहे -- मिसेज माथुर का मुरझाया हुआ चेहरा उनकी नजरों से हट ही नहीं रहा था -- जिनके बेटे प्रणव ने एक मलयाली लड़की से शादी की थी | शादी के दो माह के भीतर ही शशि ने मिसेज माथुर का जीना मुश्किल कर दिया था -- बेचारी छोटी-छोटी चीजों को तरसतीं रहती थी | प्रणव सब समझता था लेकिन शशि के आगे भीगी बिल्ली बना रहता था | मिसेज माथुर के चेहरे का नूर ही चला गया था -- उनके पास बेटे के साथ रहने के अतिरिक्त कोई दूसरा विकल्प नहीं था अतएव वह शशि की हर ज्यादती सहने को अभिशप्त थीं | उनके पति एक आशियाना तक आड़े समय के लिए नहीं बना पाए थे -- रही-सही कसर उनकी बीमारी ने पूरी कर दी थी - बचत के नाम पर जो कुछ था, बीमारी लील गई | मिसेज माथुर को देखते ही वह अक्सर खुद को अन्दर तक भीगा महसूस करने लगती थीं - इकलौता बेटा, वह भी कितना नालायक - कहाँ जाएँ इस उमर में बेचारी - ना उनके पीहर में कोई था और ना ही ससुराल में कोई अपना कहनेवाला |

दिशा गजरेवाले की बेटी नयना की शादी का भी कितना दुखद अन्त हुआ था | उसने घर से भागकर अपने असमिया मित्र से विवाह किया था किन्तु डेढ़ साल में ही गौहाटी से उसके ना रहने की खबर आ गई थी | मंजु नौटियाल के बेटे ने भी गैर समाज में शादी की थी लेकिन उनकी बहू सिमरन आहूजा बमुश्किल एक साल ही उनके साथ रही और पूरे परिवार को दहेज-प्रताड़ना की धाराओं में अन्दर कराकर चली गई | बेचारे कितने पापड़ बेलने के बाद छूटे थे | बेटे संतोष का इलाज आगरा के मनोरोग चिकित्सालय में चल रहा है - पति लकवे का शिकार होकर घर में ही घिसटते रहते हैं | ज्यादा दूर क्यूं जाएँ - उनके फुफेरे भाई के बेटे विनय ने तो एक सजातीय लड़की से ही प्रेम-विवाह किया था - पर दोनों में शुरु से ही नहीं बनी | तीन साल तक दोनों किसी तरह रिश्ते को ढोते रहे अब कोर्ट में तलाक की सुनवाई चल रही है |

प्यार के रिश्तों की जितनी निगेटिविटी उनके आसपास बिखरी थी वह डरते हुए उन सबको उलट-पुलट कर देख रहीं थी | उन्हें एक भी ऐसा रिश्ता याद नहीं आ रहा था जो इन सब विद्रूपताओं से परे सुख और आनन्द के हिण्डोले में बैठा आसमान नाप रहा हो | उनके पड़ोसी भटनागर और उनकी विजातीय पत्नि चंचल सुखवानी को वो याद करना ही नहीं चाह रहीं थी जो पिछले पन्द्रह सालों से बड़े ही प्रेम पूर्वक जीवन व्यतीत कर रहे हैं | उनकी बेटी पूर्वा की सहेली सोनिया भी बंगाली शुभेन्दु घोष से विवाह कर पिछले आठ सालों से सुखपूर्वक रह रही है -- पर ये सारे रिश्ते उनके अवचेतन मन में कहीं गहरे में छुप कर बैठे थे |

गायत्री-मन्त्र की मुग्ध करने वाली आवाज को सुनकर सुबह जब उनकी नींद खुली तो वह विस्मय से पूजाघर की ओर लपकी | आफरीन पूजाघर के बाहर द्वार पर आँख बन्द कर बैठी मन्त्रोच्चार कर रही थी | कुछ देर वह आफरीन के शहदीले-स्वर में खुद को डूबता महसूस करती रहीं -- फिर जैसे अचानक उनकी चेतना लौट आई -- वह सोचने लगीं - सच में कितनी बड़ी जादूगरनी है ये लड़की - उन्हें रिझाने के लिए क्या-क्या यत्न सीख कर आई है - शाम को जब वह घर आई थी तो माथे पर बड़ी सी बिन्दी, मांग में सिन्दूर, गले में मंगलसूत्र और हाथ की कलाई में पूजा का कलावा -- कितना दिखावा कर रही है ये हिन्दु रीति-रिवाज अपनाने का | नीरज को कमरे में बुलाकर उन्होंने साफ-साफ कह दिया - "तुम लोगों को जब तक रहना है रहो - पर अपनी दुल्हिन से कह दो वह ना तो पुरखों के पूजाघर में जाए और ना ही किचन के अन्दर - उसे जो चाहिए वह जनकिया से माँग ले और मुझे रिझाने के लिए ज्यादा नाटक करने की जरूरत नहीं है -- मैं नहीं आने वाली उसके झाँसे में -- और हाँ -- इस घर में मेरे रहते माँस-मच्छी नहीं आएगी"

नीरज उनका हाथ अपने हाथ में लेकर पास ही बैठ गया - "माँ, मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ आफरीन ऐसा कोई काम नहीं करेगी जिससे आपको जरा सा भी दुख हो -- आपने देखा ना माँ -- वह पूजाघर के अन्दर नहीं गई, आपकी अनुमति के बिना वह वहाँ जा भी नहीं सकती, यह उसे ध्यान था - किचन में भी वह तभी जाएगी जब आप उससे कहेंगी -- वह जबसे मेरे सम्पर्क में आई है मैने उसका वह निर्मल स्वरूप देखा है जो दुनिया में कम ही देखने को मिलता है आजकल -- वह प्रेम, त्याग, ममता और कर्तव्य की विलक्षण मूर्ति है माँ -- हर धर्म का मन से आदर करती है -- मैने उसके मुँह से कभी किसी की बुराई नहीं सुनी - उसे हमेशा सबकी मदद करने को तत्पर देखा है माँ -- मुझे ऐसी जीवनसंगिनी मिली है -- यह मेरे पूर्वजन्मों का सुफल ही है |

रचना नीरज की ओर देखे जा रहीं थी - कितनी दूर निकल गया है नीरज -- आफरीन ने उसे किस तरह अपने रूपजाल में बाँध लिया है -- लगता है अब वे कहीं नहीं है उन दोनों की जिन्दगी में -- | नीरज अब भी उनका हाथ पकड़े अतीत में खोया बोलता चला जा रहा था - " "माँ, जब हम दोनों ने शादी करने का निर्णय लिया था तो हमें पता था कि दोनों के परिवार आसानी से राजी नहीं होंगे -- आफरीन तो बिना आपकी अनुमति के शादी करना नहीं चाहती थी -- उसके घरवालों ने बड़ी हुज्जत के बाद शादी की हामी तो भर दी थी लेकिन इस शर्त के साथ कि दोनों को निकाह करना होगा" -- कहते हुए नीरज रुक गया और माँ की ओर देखने लगा - "मैं तो तैयार था पर आफरीन नहीं चाहती थी कि मैं ऐसा कुछ करूँ -- तब मैने ही उसे समझाया था -- सभी धर्म तो एक ही हैं -- ईश्वर को पाने का रास्ता है धर्म -- हमारा निकाह हुआ -- शायद ऐसा पहली बार हुआ होगा जब एक हिन्दु लड़के का निकाह हुआ हो -- आफरीन ने जोर देकर मेरे धर्म परिवर्तन का विरोध किया था -- जिसके आगे उसके परिवार को झुकना पड़ा था -- वह तो हिन्दु रीत-रिवाजों से शादी की पक्षधर थी -- किंतु माँ आपके ना आने के कारण हमने कोर्ट मेरिज करने का फैसला किया -- माँ मैं आफरीन से बहुत प्यार करता हूँ - मैं उसे नहीं छोड़ सकता था -- आप पर तो मुझे विश्वास था कि आप आफरीन से मिलेंगी तो उसे जरूर अपना लेंगी -- वह है ही इतनी मासूम और प्यारी --"

सूर्यास्त के बाद रचना ने अपने कमरे में आफरीन को मगरिब की नमाज पढ़ते देखा | नीरज भी उसकी बगल में बैठा उसका साथ दे रहा था | वह ठाकुर जी की आरती की तैयारी कर रहीं थी | उनकी आँखों में नमी उतर आई | किसी तरह उन्होंने आरती प्रज्जवलित की और धीरे-धीरे ओम जय जगदीश हरे गाने लगीं -- तभी एक शहदीली आवाज भी उनके स्वर में आ घुली | आफरीन मगरिब की नमाज समाप्त कर पूजाघर की चौखट पर खड़ी थी | नीरज पूजाघर के अन्दर चला आया था |

रात में जनकिया को तेज बुखार हो आया था - उससे बिस्तर से उठा नहीं जा रहा था | नीरज ने उन्हें सुबह की चाय देते हुए पूँछा - "माँ, आपकी इजाजत हो तो आफरीन को खाना बनाने को बोल दूँ - जनकिया चाची को लगता है -- मलेरिया हो गया है - उसे डॉक्टर को दिखा लाता हूँ "

रचना को असमंजस में देख नीरज बोला - "माँ, आफरीन ने तो पिछले दस-बारह वर्षों से नॉनवेज को छुआ भी नहीं - जब वह स्कूल में थी तभी विद्यासागर महाराज के प्रवचन सुन कर उसने नॉनवेज त्याग दिया था -- जो आप कहेंगी वह आपके लिए बना देगी"

"नहीं-- मैं अपने लिए खिचड़ी बना लूँगी -- हाँ तुम लोग अपने लिए जो चाहे बनवा लो" - रचना ने कहा | नीरज को लगा कि वर्फ कुछ-कुछ पिघल रही है |

तीन दिन ऐसे ही गुजर गए | इतवार को नीरज को वापस जाना था | जाने से दो दिन पहले पूर्वा उनसे मिलने आई | आफरीन से वह पहले से ही प्रभावित थी | रचना के मन से भी कुहाँसा छँटा तो था पर वर्षों से जमी काई एकाएक नहीं हटती | आफरीन को किचन में काम करने की इजाजत तो उन्होंने पहले ही दे दी थी - निर्जला एकादशी वृत के दिन उन्होंने आफरीन के साथ पूजाघर में पूजा भी की थी | उस दिन पहली बार उन्होंने पैर छूते समय आफरीन के सिर पर हाथ फेरा था और नीरज को गले लगाया था | इस सबके बावजूद आफरीन को लेकर उनके पूर्वाग्रह बरकरार थे |

उस दिन रचना का सिर भारी हो रहा था - शायद मन में चल रही उथल-पुथल से वह बेचैन थीं | साल भर बाद नीरज ने उनके पास आने की हिम्मत जुटाई थी पर वह एक भी दिन पूरी सहजता से उससे नहीं मिलीं थी | पूर्वा उनका सिर दबाते हुए कह रही थी - "परसों भाई चला जाएगा -- पता नहीं फिर कितने दिनों बाद आएगा -- माँ आप उसे माफ क्यूं नहीं कर देतीं -- आफरीन को अपना लीजिए -- आपकी खुशी तो सबकी खुशी में ही है - जब तक आप उन्हें माफ नहीं करेंगी तब तक दोनों अपना सामान्य जीवन भी शुरु नहीं करेंगे"

"क्या कहना चाहती हो तुम पूर्वा" - रचना ने थोड़ा विस्मय से पूछा |

"माँ -- आपको मालूम नहीं है - दोनों ने शादी अवश्य की है पर दोनों के बीच आज भी पति-पत्नी का रिश्ता नहीं है -- भाई और आफरीन ने निश्चित किया है - जब तक माँ का आशीर्वाद नहीं मिल जाता वे दोस्त की तरह रहेंगे " - पूर्वा की बात सुनकर रचना अविश्वास से उसकी ओर देखने लगीं | दोनों ने ये बात तो उन्हें बताई ही नहीं -- नीरज ने भी इस बात का जरा भी भान उन्हें नहीं होने दिया था - अरे वह स्वयँ भी तो ये समझ पाने में असफल रहीं थीं | पहली बार उन्होंने प्रेम की निर्मल धारा में स्वयँ को भीगता महसूस किया -- प्रेम की निश्छ्लता ने उन्हें अन्दर तक तर-बतर कर दिया - उनका मन अधीर हुआ जा रहा था -- वह दोनों के सच्चे प्रेम की ऊष्मा को महसूस क्यूँ नहीं कर सकीं थी -- वह इतनी कठोर कैसे हो गईं जो प्रेम के उज्जवल स्वरूप को पहिचान नहीं पाईं -- उनका मन कर रहा था कि अभी आफरीन का माथा चूम कर उसे गोदी में भर ले | फिर कुछ सोचते हुए पूर्वा से बोली - "कल तेरे भाई की शादी है - पूरे रीति-रिवाजों के साथ - रात में बहुत से काम करने है -- मण्डप सजाना है, परिचितों को बुलाना है -- कल नई बहू घर में आएगी - आफरीन, हमारी भाग्यलक्ष्मी बनकर"

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अरुण अर्णव खरे

डी-1/35 दानिश नगर

होशंगाबाद रोड, भोपाल (म०प्र०),

पिन: 462026

मोबा०: 9893007744 ई मेल: arunarnaw@gmail.com

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