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व्यंग्य :चुनावी मौसम में" गिरगिटिया रंग" - राजेन्द्र मोहन शर्मा

रंगों की दुकान पर सबसे ज्यादा बिक रहा है गिरगिट का रंग। चीन ने इस बार गजब का रंग उतारा है एक ही रंग में सारे रंगों की फितरत है। दरअसल में चीन वही सब कुछ करता है जो वह जीता है।
भारत से दोस्ती पाकिस्तान से दुश्मनी, पाकिस्तान से दोस्ती भारत से दुश्मनी। पता ही नहीं चलता कि कब उसका चोला किस रंग में रंगा हो। इसी लिए उसने भारत को निर्यात किए जाने वाले रंगों में इस बार सबसे ज्यादा सामग्री भेजी है गिरगिटिया रंग की ।


गिरगिट यह देखकर हैरान परेशान हो गए किसी ने हमारा भी अंतरराष्ट्रीयकरण भी कर दिया है। अगर नेक इरादे से चीन से यह काम कर रहा होता तो गिरगिट भैया को कोई आपत्ति नहीं थी। गिरगिट अपनी मैडम को समझा रहा था डियर हम तो अपनी हिफाजत के लिए नेचर से तालमेल करने के लिए अपनी सुरक्षा के लिए रंग बदलते हैं। लेकिन चीन तो खुद रंग बदलता है मौका देखकर अपनी खराब नियत के कारण और रंगों के पैकेट को गिरगिटिया नाम दे रहा है। चीन ने अच्छा काम नहीं भारत के प्रति नकारात्मक रवैया दिखा कर।


झुरमुटों के पीछे छिपे गिरगिट ने समझा था कि भारत में चीन के इस गिरगिटिया रंगों के माल को खरीदने वाला कोई नहीं होगा। लेकिन साहब कमाल हो गया सबसे पहले उन नेता जी ने माल खरीदा जो कल तक यह कह रहे थे कि भाजपा में जाते ही सारे स्याह रंग सफेद हो जाते हैं। पता लगा 20 साल तक यह सज्जन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के निजी सचिव रहे थे और अब कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शरणागति पाई है। पता नहीं ये अपना कौन-सा रंग बदलना चाहते हैं वहां जा कर। लेकिन ऐसे दर्जनों नेता है जो अपने सारे काले कारनामे भगवा रंग में रंगवाने के लिए बेताब हुए जा रहे हैं।
उधर दूसरे रंगों को छोड़कर कांग्रेस के तिरंगे की शरण पाने वालों की भी कमी नहीं है। लगता है सारी पार्टियों ने गिरगिटिया रंगों को अपना लोगो बना लिया है। सही भी है काला ,पीला, सफेद हरा ,नीला कोई सा भी रंग हो गिरगिटिया चोला धारण करो और फिर किसी भी पार्टी में छलांग लगा कर कहो हम ने अन्तर आत्मा की आवाज पर पारी बदली है ।


पारी बदली है तो फिर भोली जनता नेताजी के किसी रंग को कैसे याद नहीं रखती। नेता जी उन्हें हर रंग में भिगोते हैं । ऐसे ही जैसे मां को अपना लाडला किसी भी मेकअप में हो अच्छा लगता है मतदाता को भी नेताजी किसी भी रंग में हों भले लगते हैं।


होली का मौसम इस बार कुछ ज्यादा ही लंबा जाने वाला है। अबकी बार 3 महीने तक चलने वाली होली कई रंगों के साथ आप को आनंदित करेगी । आप काले रंग के शौकीन हैं तो नेताजी के काले कारनामे देखिए,  हरे रंग के शौकीन हैं तो इनके द्वारा जंगलों की कटाई के ठेकों के चिट्ठे बांचिए। अगर आप लाल रंग के शौकीन हैं तो फिर सड़कों पर बहने वाले खून की किसी भी गड्ढे में नापतोल कर लीजिए । सफेद रंग के शौकीन हैं तो नेताजी की आत्मसमर्पण की मुद्रा देखिए। गोया नेताजी को किसी भी रंग से परहेज़ नहीं है और वे मतदाताओं के किसी भी वर्ग को नाराज भी नहीं करना चाहते।
वे कहते हैं गिरगिट को बदनाम करने की जरूरत नहीं। धरती पर गिरगिट है तो हम हैं। आसमान के इंद्रधनुषी रंगों की तरह चटख कर हम आपको इंद्रधनुषी आभा का एहसास तो नहीं करा सकते हैं। लेकिन पंचायत से लेकर संसद तक प्राणी रक्षा और पर्यावरण मित्र के नाम पर गिरगिट के प्रतिनिधि बनकर , पर्यावरण प्रेमी अवश्य कहलाएंगे। आपको हमारा जो रंग पसंद आए वही स्वीकार कर लीजिए । असल में हम नेता हैं और नेता का कोई रंग नहीं होता नेता का सिर्फ वह रंग होता है जिस रंग में जनता उसे देखना पसंद करती है। इसका मतलब समझ गए ना आप तरकीब से नेता जी ने जनता पर भी गिरगिट रंग चिपका दिया है।


भोली जनता नेताजी के बहकावे में आ गई कभी वह सर्जिकल स्ट्राइक में लाल रंग खोजती है। कभी राफेल में बारूदी रंग तलाशती है। कभी किसानों के साथ नाइंसाफी में बर्बाद फसलों की हरियाली नापती है और कभी बैंकों के गफलों में काले कारनामे देखती है।


लेकिन चीन का मकसद पूरा हो गया। वह आपको ऐसी होली खिला रहा है जिसमें आप चारों तरफ से सिवाय खीजने के कुछ भी हासिल नहीं कर पा रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अजहर मसूद हमें चिड़ा रहा है और चीन की गोद में बैठ कर खूनी होली खेल रहा है। राष्ट्रीय मंचों पर गिरगिटिया रंग हमें धोखा दे रहे हैं। लगता है लगातार धोखा खाते रहना हमारा प्रिय राष्ट्रीय शगल है। जिसे हम जानबूझकर वैसे ही स्वीकार कर सकते हैं जैसे शराब की हर बोतल पर लिखा होता है नशा हानिकारक है लेकिन पीने वाला कहां रुकता है। नशाखोर शराबी लीवर की बीमारी से परेशान हो कर डाक्टर के पास इलाज के लिए गया। डाक्टर ने सारा माजरा समझा , समझाते हुए कहा तुम्हें पता है शाराब आदमी को धीरे धीरे मार देती है। शराबी खुश हो गया चलो फिर तो ठीक है डाक्टर साहब अपने को भी मरने की जल्दी नहीं है। लोकतंत्र का डाक्टर सिर पकड़ कर बैठा है परे करे तो क्या करे। ऐसे ही मतदाता भी नेता जी के इस गिरगिटिया बदलाव से बखूबी परिचित लेकिन उसे भी नेता जी का यह रंगीन नृत्य बहुत भाता है ,  बिना पैसे का मनोरंजन किसे बुरा लगता है।

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राजेन्द्र मोहन शर्मा
rms.jpr54@gmail.com

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