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राजेन्द्र मोहन शर्मा की 2 लघुकथाएँ

1 कांधे झुके झुके


      "ये जो तेरे कांधे तिल है वो मेरा दिल है ..."होले होले गुनगुनाते हुए मिस्टर भट्ट फिजियोथैरेपिस्ट के रिसेप्शन के सोफे पर रिलैक्स होकर अधलेटे से आंखें मूंदे हुए बैठे थे।
तभी नर्स ने मिस्टर भट्ट का कंधा हल्के से थपथपाया। भट्ट साहब ने धीरे-धीरे आंखें खोली।
नर्स मुस्कुराकर कहा "मैडम के कंधे पर तिल तो कोई नहीं है हां वहां शोल्डर फ्रोजेन जरूर पकड़ में आया है।" फिर कुछ रूक कर बोली " बताएं आगे क्या करना है ?"
सीधे खड़े होकर अपने कंधे उचकाने की असफल चेष्टा की भट्ट साहब ने। नर्स ने इसी बीच अब तक की जांच पड़ताल का बिल उनके हाथ में थमा दिया।
उन्होंने सीधे रिसेप्शन कान्टर पर अपना हाथ बढ़ाया और बिल रख कर अपनी पिछली पॉकेट से पर्स निकालने की असफल कोशिश की। हाथ ने पर्स तक जाने के लिए इन्कार कर दिया।
उन्होंने ने नर्स को नजदीक बुलाया "ऐसा करें आपको थोड़ी परेशानी तो होगी लेकिन मेरा पर्स निकाल दे प्लीज "। नर्स ने भट्ट साहब को गौर से देखा।
उसने आहिस्ता से पर्स निकाल कर उन्हें थमाते हो कहा "सर! आप को भी सोल्डर फ्रोजन लगता है।"
                " हां हां मेरा नंबर भी थेरेपी के लिए आएगा। लेकिन दो-तीन महीने बाद। अभी तो मैडम का हिलना डुलना जरूरी है। हम एक पेंशन में तो दोनों के कंधे एक साथ नहीं हिला सकते। "
कहकर फीकी हंसी के साथ भट्ट साहब ने अपनी आंखें फेर ली और रूमाल निकाल कर चश्मा पहुंचने लगे। नर्स आंखें पोंछते हुए इतना ही बोल पाई " मैं क्या कहूँ मेरे पापा के हाथ भी हिल नहीं पा रहे हैं क्योंकि मैं उन्हें यहाँ ला नहीं पा .....।"
भट्ट जी धीरे उसकी ओर धीरे से धूमे और पूरी मुस्कुराहट बिखेरते हुए बोले " कोई नहीं , अगली बार हम साथ आएंगे...." और वे जोर से फफक पड़े। किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था , तभी डाक्टर की आवाज गूंज उठी " नैक्सट "।

          2 . हाजरी रजिस्टर


छोटे साहब तमकते हुए बड़े साहब के कमरे धुसे और जोर से साहब के टेबिल पर हाजरी रजिस्टर पटकते हुए बोले " मुझ से यह अनुशासनहीनता बरदाश्त नहीं होगी , ऐसे नहीं चल सकता।"
साहब ने हंसते हुये पूछा " क्या हुआ सक्सेना जी , इतना गुस्सा आपकी सेहत के लिए ठीक नहीं है। "
             " आप की ढिलाई ने सारा दफ्तर बिगाड़ रखा है , मिसेज मारवाहा आज फिर 10 मिनट लेट हैं। टोका तो टसुए बहाने लगी , मैं ने छुट्टी लगा ही आज की।" सक्सेना जी सरपट बोले जा रहे थे। इतनी देर मे मारवाहा मैडम भी अन्दर आ गई। सक्सेना जी तुनक कर उठ खड़े हुए और जाते जाते गुर्रा गए "आप ने छुट्टी कैन्सिल की तो फिर आप जाने "।
             "हां बताइए क्या हुआ ?" साहब ने सहजता से पूछा। वे सुबकते हुए फूट पड़ी बेटे की बीमारी, सासू मां के बरताव और मि. मारवाहा की आदतों के चिट्ठे के बीच बस इतना ही बोल पाई "और सक्सेना साहब कहते हैं कब से इंतजार कर रहा हूँ.......।"
साहब ने रुमाल निकालकर पसीना पोंछा। सैक्रेटरी साहब ने ठीक ही कहा था " मि. तलखण्डे दफ्तर में लक्कड़ बग्धे क्यों पाल रखे हैं। तुम से कुछ नहीं होता तो मुझे बताओ।"
अभी दिन आधा भी नहीं गुजरा था कि सक्सेना साहब सींखे निपोरते हुए साहेब के चैम्बर में दाखिल हुए। पीछे पीछे चपरासी ट्रे में काफी के दो प्यालों के साथ समोसे लेकर हाजिर था। साहब अनमने से देखते रह गए थे। बहुत आग्रह पर काफी पी कर कप सरका दिया। सक्सेना जी ने काफी के साथ दोनों समोसे साफ किए।
रूमाल से मुंह पौंछ कर उठते हुए सुचना के लहजे मे फरमाया "सर , कुछ अरजेन्ट काम आ गया है सो अभी निकलना पड़ेगा "। साहब के उत्तर से पहले ही सक्सेना जी ये गए वो गए।
आदतन सक्सेना जी अपनी कुर्सी मे धंसे चपरासी को हांक रहे थे।" निर्मल कितनी बार कहा है हाजरी रजिस्टर इधर उधर मत रखा करो , अब खड़ा खड़ा क्या देख रहा है जल्दी बता कहां रख दिया "।
               "  रजिस्टर तो बड़े साहब ने मंगवाकर अपनी टेबिल पर रखवा लिया है और कहा है आज से सभी लोग वहीं हाजरी करेंगे "। निर्मल बोला
               " क्या ?" सक्सेना जी सातवें आसमान से नीचे आ गिरे। तेजी से साहब के कमरे की ओर लपके लेकिन वहां तो हाजरी करने वालों की कतार लगी थी। जूनियर्स ने सक्सेना जी को मिसेज मारवाहा के पीछे कतार में अपनी बारी का इन्तजार करते देखा तो वे अपनी हँसी को कंठों में धँसाने की असफल कोशिश करते दिखे।
उधर साहब किसी से फोन पर बात करते हुए कह रहे थे " लक्कड़ बग्धे के दांत उखाड़ लिए हैं साहब।" इसी के साथ मिसेज मारवाहा ने कृतज्ञता से संकेतात्मक झुककर अभिवादन किया। सक्सेना जी ज्यों ही सामने पड़े साहब ने बस इतना ही कहा " अब ठीक है मि. सक्सेना !"
आं उं हां ना के अस्पष्ट अस्फुट स्वरों के अधूरे से समुच्चय के साथ सक्सेना जी कमरे से बाहर निकल गए। आज पूरा दफ्तर अदृश्य भय के साए से मुक्ति के एहसास में डूबा था और साहब इत्मीनान से फाइलें निपटाने में। सब सक्सेना की का बी पी अचानक शूटअप होने से वहां कुछ काम नहीं हो रहा था।

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राजेन्द्र मोहन शर्मा
            D 130 सैक्टर 9
चित्रकूट जयपुर
rms.jpr54@gmail.com

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