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वाई फ़ाई का रूठना - रुचि प जैन

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आज सुबह उठते से ही घर में कुछ अलग तरंगें सी महसूस हो रही थी। मौसम भी बहुत सुहावना था। बारिश की बूँदे जो खिड़की के काँच पर गिर कर नीचे सरक रह...

आज सुबह उठते से ही घर में कुछ अलग तरंगें सी महसूस हो रही थी। मौसम भी बहुत सुहावना था। बारिश की बूँदे जो खिड़की के काँच पर गिर कर नीचे सरक रही थी, उन्होंने मन को अहोदालित कर दिया और कुछ गुनगुनाने का मन करने लगा। मन पंख लगा उड़ान भरने ही वाला था कि एक वज़नदार वाणी रुपी बाण ने उड़ान पर विश्राम लगा दिया। "वाह आज मुस्कुराने की फ़ुरसत मिल गई , कौन याद आ गई, याद रखना मैं ही तुम्हारे पल्ले पड़ी हूँ और पड़ी रहूँगी "। ये ओर कोई नहीं मेरी श्रीमती  थी मैंने अपनी भावनाओं को क़ाबू में रखते हुए कहा " अरे तुम कुछ भी बोलती हो, देखो ना मौसम कितना सुहावना हो रहा है। "उसने चाय का कप मेरी ओर बढ़ाते हुए कहा " हाँ मौसम पन्द्रह दिनों से ऐसा ही है, पर आपको काम और लेप्टोप से फ़ुरसत मिले तब न । चलो आज तुमसे तारीफ़ सुन मौसम भी प्रसन्न होगा"। क्या करूँ मेरा तो जीवन ही ऐसा है सुबह से शाम दफ़्तर में बॉस का हुकुम बजाता हूँ, फिर तुम्हारा और समय बचता है तो कुछ लिख कर अपना शौक़ पूरा कर लेता हूँ। पलटवार तो होना ही था , पर कुछ जल्दी ही हुआ" हाँ हम तो जैसे हीरे मोतियों  के बीच। बैठे है"। जैसे ही मैं कुछ कहने को पत्नी की ओर  मुडा तो देखा कि उसके हाथ में मोबाईल नहीं था " अरे तुम्हारा मोबाईल कहाँ है"। वो रहा "उसने कोने में पड़ी मेज़ की तरफ़ इशारा करते हुए कहा " भूल गए कल से वाई फ़ाई  नहीं चल रहा । "अरे रूठने का काम तो वाईफ का होता है  आज वाई फ़ाई रूठ गया" यह कहते ही मेरे चेहरे पर एक लम्बी मुस्कान आ गई और मेरे अधर कुछ कहने को खुले"    

उड़ते पंछियों को देख मन भी उड़ान भरने लगा,

आगे को नहीं पीछे को चलने लगा।

बीती यादों को यूँही दोहराने लगा ,

टीवी की नहीं मनुष्यों की अनाज सुनने को मचलने लगा।

मैं कविता वाचन कर ही रहा था कि पत्नी का स्वर सुनाई दिया "बाथरूम का नल लीक कर रहा है ज़रा प्लम्बर को फ़ोन कर दीजिए "। फ़ोन लगाते लगाते सोचा क्यों न बिना वाई फ़ाई वाले घर का मुआयना कर लू। जैसे ही बच्चों के कमरे की ओर मुडा कि ठहाकों ने मुझे बरबस यादों में ढकेल दिया। जब हम अपने यार दोस्तों के साथ साइकिल पर सैर को निकल जाते और रास्तों को भी अपने ठहाकों से गुंजा देते। नमस्ते अंकल से मेरा ध्यान भंग हुआ , देखा मेरा बेटा और उसके कालोनी के दोस्त बैठे गुफ़्तगू कर रहे थे। " अरे तुम सब इतनी सुबह", मेरा सवाल मुझ पर ही बेक फ़ायर हो गया , "अंकल कालोनी में किसी के यहाँ भी वाई फ़ाई नहीं चल रहा है और आप लोग हमें डेटा पैकेज दिलाते नहीं तो सोचा सुबह सुबह गपें ही लगा ले"। "अच्छा है इसी बहाने तुम लोगों ने सुबह का सूरज तो देखा होगा  , नहीं तो आँख खुलते ही घुस जाते हो लेप्टोप में"। "क्या पापा आप भी मम्मी का डायलॉग दोहराने लगे" यह आवाज़ मेरे बेटे राहुल की थी। मैं कुछ कहने को उसकी ओर मुडा कि एक और स्वर सुनाई दिया " अंकल इस कारण से हमारा कितना काम रुका पड़ा है, प्लीज़ डेटा पैकेज दिलवा दीजिए आप डेड से रिक्युवेस्ट करेंगे तो वो मान जाएँगें"। मैंने गरदन हिलाते हुए कहा देखेंगे , पर अभी क्या बातें चल रही है"। सबने मायूस चेहरा बना कर कहा "कुछ नहीं अपने अपने स्कूल कॉलेज के क़िस्से सुना कर टाईम पास कर रहे है , दूसरे कॉलोनी का इंटरनेट कैफ़े ९:३० को खुलेगा"। मैं भी उन्हें अपने कॉलेज के क़िस्से सुनाने लगा, बच्चे भी उत्सुकता से मुझे सुनने लगे। हमारे ज़माने में अधिकतर बच्चे साइकिल पर आते थे, मैं भी साइकिल की सवारी ही किया करता था। एक दिन मेरी साइकिल पंचर हो गई, मेरे दोस्त राजीव और मैंने पंचर ठीक करवाना उचित न समझा और दूसरी सवारी खोजना बेहतर लगा। उस दिन मौसम बड़ा सुहावना था , आसमान में काले काले बादल छाए हुए थे। तभी हमें दूसरी सवारी मिल गई और वो थी ऊँट। " हे ऊँट पर कौन कॉलेज जाता है", कहते हुए मेरी पत्नी पकोड़े लिए कमरे में दाख़िल हुई।

बच्चों ने उसके हाथ से प्लेट लेते हुए कहा अंकल कनटिन्यू और मेरी ओर ताकने लगे। "अरे हमें भी पकोड़े खिलाओ फिर क़िस्सा आगे बढ़ाते है। मैंने गला खखारते हुए आगे कहना शुरु किया, "हमने ऊँट वाले को दस रूपए का नोट दिया और उससे कॉलेज छोड़ने का अनुरोध किया। ऊँटवाला तैयार भी हो गया , हम ऊँट की पीठ पर सवार हो शान से कॉलेज की ओर रवाना हुए। जैसे ही हम कॉलेज के गेट पहुँचे कि न जाने कैसे ऊँट से गिर पड़े , सामने से लड़कियों का झुंड आ रहा था । वे हमें गिरता देख ठहाके मार हँस पड़ा , हम शर्म के मारे वाँह से भाग खड़े हुए।     भागते भागते एक सीनियर से टकरा गए , वे बेचारा पास पड़े गोबर में गिरते गिरते बचा। बच्चे हँसते हँसते लोटपोट हुए जा रहे थे तभी मेरी बिटिया बोली "पापा आपने कभी हमें यह क़िस्सा नहीं सुनाया", "बेटा फ़ुरसत कहाँ होती है"। "किसके पास " ये बॉउंसर पत्नी के तरफ़ से आया पर बेटे ने बात संभालते हुए कहा "अब वो सब छोड़ो क़िस्सा मज़ेदार है कनटिन्यू करे। फिर क्या था तीन चार सीनियर छात्रों ने हमें दबोच लिया और शुरु हुई हमारी रैगिंग  । उस समय ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे हम दो मासूम चूहों पर ख़ूँख़ार बिल्लियाँ टूट पड़ी हो। हम पर सवालों की बौछार होने लगी नाम पता वगैरह पूछ कर, जो सबसे बड़ा सवाल का गोला हमारी तरफ़ आया वो था तुम दोनों भाग क्यों रहे हो। सच बताने में बहुत संकोच हो रहा था पर कुछ ओर सूझ नहीं रहा था, इसलिए मन मार कर हमने उन्हें सच बता ही दिया। सुनते ही उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक आ गई, जो मानो कह रही हो "बेटा अब तुम गए , हमें साल भर के लिए दो कठपुतलियाँ मिल गई"। हम सुन्न से खड़े थे कि तभी किसी की आवाज़ ने हमारी तन्द्रा भंग हुई, देखा सीनियर छात्र हँसते -हँसते लोट -पोट हुए जा रहे थे। फिर उन में से एक भारी भरकम आवाज़ में बोला, " आज से तुम हमारे सेवक नकटे बालकों , हमारी तो नाक ही कटा दी कल से पाँच दिनों तक कॉलेज ऊँट पर ही आना और गिरना नहीं "। कुछ ठहरते हुए दूसरा लड़का बोला "पाँच दिन बाद हमसे आ कर मिलना फिर सोचते है कि आगे क्या करना है"। ऐसा कह कर वे सब वहाँ से हँसते हुए चल दिए, हम भारी दिल से वहीं बैठ गए। फिर हमने अपनी क्लास अटेन्ड की पर पूरा दिन हमारे मुँह से एक शब्द नहीं निकला। संगी साथी छेड़ने भी लगे "क्या बात है भाई दोनों आज मुँह पर फेविकॉल लगा के आए हो , जो इतनी चुप्पी साध रखी है"। हम बस ना में अपना सिर हिला रहे थे क्योंकि मन में तो यह उधेड़ धुन चल रही थी कि घर पर इस घटना को कैसे बताए।

बहरहाल  राजीव और मैं घर की ओर रवाना हुए तब हमने एक साथ पुछा अब क्या करना है, दरअसल उस समय माता पिता का एक अजीब सा ख़ौफ़ हुआ करता था। पिता जी तो हिटलर होते थे माँ को तो गिड़गिड़ा कर मना लेते थे। राजीव बोला "मेरे पिता जी तो पैसे देंगे नहीं तीन चार लाफे मारेंगे और पॉकेट मनी भी बंद कर देंगे , तू अपने पिता जी से बात कर ज़्यादा से ज़्यादा डाँटेंगे ही पर देखना ऊँट की सवारी के लिए पैसे दे देंगे । मैं अपनी पॉकेट मनी से बाद में तुझे पैसे दे दूँगा "। "अरे बात ये नहीं है पर बिल्ली के गले में घन्टी बाँधे कौन"। मेरी बात सुनते ही राजीव बोला , "चलो हम दोनों आन्टी की मदद् लेते है"। घर पहुँच कर हमने माँ को सारी बात बताई और उन से आग्रह किया कि वे पिता जी से पैसे दिलाने में हमारी मद्द करे। हमारी क़िस्मत पर तो जैसे पत्थर पड़े थे, पिता जी पीछे खड़े हो कर हमारी सब बात सुन रहे थे। अब क्या था ज्वालामुखी फूटना ही था हमारे साथ माँ भी पिता जी के ग़ुस्से का शिकार हो गई । पिता जी का एक बहुत ही प्रिय डॉयलाग था" तुम माएँ ही बच्चों को लाड़ प्यार में बिगाड़ती है"। पिता जी की डाँट जले पर नमक का काम कर रही थी, हमने पिता जी से पैसे की उम्मीद छोड़ दी। जब पिता जी ग़ुस्सा करके चले गए तब  हमने फिर माँ का दामन थामा। किसी तरह हमने माँ को मना कर थोड़े पैसे का जुगाड़ किया। एक पड़ाव पार करने के बाद दूसरा मुश्किल पड़ाव भी पार करना था , "वो क्या था अंकल , अरे उस ऊँटवाले को भी तो मनाना होगा " ये मेरी बेटी थी। सही कहा अब सबसे बड़ा काम ऊँटवाले को मनाना था। वो भी हमारी मजबूरी भाँप गया और अनापशनाप पैसे बोलने लगा । बड़ी मुश्किल से उसके हाथ पाव जोड़ कर उसे १५०रु में मनाया। बच्चे भी मेरे क़िस्सों पर जी भर के हँस रहे थे, इस समय मुझे अपने दादा दादी के साथ बिताए लम्हे याद आ रहे थे। जब हम चचेरे भाई बहन रात को दादा दादी को घेर कर बैठ जाते और वो हमें कहानियाँ और चुटकुलों के साथ -साथ हमारे पिता जी के बचपन के क़िस्से भी सुनाते थे। मैं इन विचारों में खोया हुआ खा कि तभी मुझे बेटे ने झँझोड़ते हुए कहा , "पापा कहाँ खो गए कुछ और क़िस्से सुनाइए "। तभी कमरे में पत्नी का आगमन हुआ बोली " मैं सुनाती हूँ इनके बचपन के क़िस्से बहुत ही शरारती ग़ुस्सैल थे, हमेशा सासुमाँ से डाँट खाते रहते"। मैं इशारे से उसे चुप रहने को कह रहा था , पर वो मुझे देख कर भी अनदेखा कर रही थी।

"आंटी आपको अंकल के बचपन के बारे में कैसे पता "ये सवाल हमारे पड़ोसी के बेटे राज का था। "बचपन में मेरा परिवार राहुल के दादा दादी का पड़ोसी था, राहुल की बुआ और मैं अच्छी सहेलियाँ थी"। मैंने बात टालने की गरज से मौक़े का फ़ायदा उठाते हुए कहा , "राहुल बुआ को फ़ोन कर कह दे कि माँ अब आपकी सहेली नहीं रही , देखो कह रही है हम सहेलियाँ थी पर अब नहीं है"। "आप भी कुछ भी मत बोलो ये मैंने कब कहा पत्नी ने नाराज़ होते हुए कहा"। आंटी आप कन्टीनयू करे अंकल की बात पर ध्यान न दे। मेरी पत्नी ने आगे कहना जारी रखते हुए कहा , "इनकी दादी जी शाम को सब बच्चों के लिए केसर बदनाम वाला आमरस बनाती थी, बच्चों में मैं भी शामिल थी। ये और इनके चचेरे भाई मोहन सारा आमरस पीने की ज़िद करते परसासुमाँ इन दोनों को डाँट देती। तब दोनों ने आमरस हड़पने की युक्ति सोची, बाज़ार से प्लास्टिक की छिपकली ले आए। शाम को जब दादाजी ने आमरस का भगोना मेज़ पर रखा तब ये दूर से निशाना साध कर छिपकली को आमरस में डालना चाहते थे। पर उसी समय मैंऔर राहुल की बुआ भागते हुए कमरे में घुसे और इनसे टकरा गए। इनका निशाना चूक गया । इनकी छिपकली आमरस में नहीं गिरी परन्तु एक असली छिपकली गिर गई। हम सब छिपकली -छिपकली चिल्लाते हुए बाहर भागे तो इन दोनों को लगा कि इनकी योजना सफल हुई। बहादुरी का ढोंग करते हुए बोले , "हम आमरस समेत छिपकली को गली में फेंक आते है"। जैसे ही घर से बाहर निकले कि भोगने के हिलने के कारण छिपकली आमरस से बाहर निकली।

चलती हुई छिपकली देख कर इन दोनों के होश उड़ गए घबराहट में भगोना दूर फेंका जो गली में सो रह कुत्ते के पास गिरा , डर के मारे कुत्ता गली के बाहर की ओर भागा और ये लोग चिल्लाते हुए घर के भीतर भागे। इसी बीच दादी जी को प्लास्टिक की छिपकली मिल गई उन्हें माजरा समझते देर न लगी, फिर से दोनों को ज़बरदस्त डाँट पड़ी। इस सबका ये हमें ज़िम्मेदार मानने लगे और हमसे बदला लेने की योजना बनाने लगे। एक दिन दोनों भाई  मुझ से और बुआ से बोले तुम्हें हम जादू से दिन में तारे दिखाते है। हमारी उत्सुकता देख कर बोले , "एक टब लाओ उसे आधा पानी से भरो और उसे आधी धूप और आधी छाया में रखो। फिर आँख बंद करके टब के चार चक्कर सूरज तारे बोलते हुए लगाओ"। हम इनकी बातों में आ गए और इनके बताए अनुसार करने लगे। दोनों ने चुपके से पानी में लाल मिर्ची पाउडर मिला दिया। अब हमें आँखें खोल कर अपना मुँह पानी के पास लाने को कहा जिससे तारे दिखाई दे। हमने वैसा ही किया फिर देने ने पानी को हमारे मुँह पर उछाला, आँखों में मिर्ची का पानी जाते ही हम जलन से बिलबिला उठी और ज़ोर ज़ोर से रोने लगी। हमारा रोना सुन कर दादी बाहर आई , दोनो को डाँट पड़ी और हमें आँखों के डॉ क्टर के ले जाया गया। डॉक्टर अंकल ने हमारी आँखों में कोई आई ड्राप्स डाली जिससे थोड़ी देर में हमें आराम मिला।

फिर मैं यह कहते हुए वहाँ से उठा "बच्चों तुम को इन्टरनेट कैफ़े नहीं जाना क्या, मैं भी ज़रा चाय बना लू , तुम्हारी मम्मी तो खाना बनाने के मूड में नहीं है आज तो उपवास ही रखना होगा। बच्चे और क़िस्से  सुनने की ज़िद करने लगे, मैंने उन्हें कल का कह कर टाल दिया। और रसोईघर की ओर चल पड़ा , पीछे-पीछे मेरी पत्नी भी रसोई में आ गई। रसोई में से पकवानों की ख़ुशबू आ रही थी और वहाँ कई बर्तनों में कुछ रखा था। मैंने बर्तनों के ढक्कन उठा कर देखा उनमें गुलाबजामुन, मटर पनीर और कचौरी थे। मैं पत्नी की ओर मुड़ कर बोला"अरे आज वॉटसऐप नहीं किचन ऐप चल रहा है क्या"। वह खीरा टमाटर काट रही थी , बिना मेरी तरफ़ देखे उसने उत्तर दिया "हाँ  आज शर्मा जी , वर्मा जी और माथुर साहब का परिवार दोपहर को हमारे यहाँ खाने पर आ रहे है। अब वाईफाई नहीं चल रहा तो सोचा छुट्टी वाले दिन घर पर पार्टी रख ले। मिसेज़ माथुर , वर्मा और शर्मा अपने-अपने घर से कुछ न कुछ पकवान बना कर ला रही है"। आज इस बात का एहसास हो रहा है कि इंटरनेट ने हमें बहुत कुछ दिया है पर बहुत कुछ ले भी लिया है।

रुचि प जैन

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