वाई फ़ाई का रूठना - रुचि प जैन

SHARE:

आज सुबह उठते से ही घर में कुछ अलग तरंगें सी महसूस हो रही थी। मौसम भी बहुत सुहावना था। बारिश की बूँदे जो खिड़की के काँच पर गिर कर नीचे सरक रह...

आज सुबह उठते से ही घर में कुछ अलग तरंगें सी महसूस हो रही थी। मौसम भी बहुत सुहावना था। बारिश की बूँदे जो खिड़की के काँच पर गिर कर नीचे सरक रही थी, उन्होंने मन को अहोदालित कर दिया और कुछ गुनगुनाने का मन करने लगा। मन पंख लगा उड़ान भरने ही वाला था कि एक वज़नदार वाणी रुपी बाण ने उड़ान पर विश्राम लगा दिया। "वाह आज मुस्कुराने की फ़ुरसत मिल गई , कौन याद आ गई, याद रखना मैं ही तुम्हारे पल्ले पड़ी हूँ और पड़ी रहूँगी "। ये ओर कोई नहीं मेरी श्रीमती  थी मैंने अपनी भावनाओं को क़ाबू में रखते हुए कहा " अरे तुम कुछ भी बोलती हो, देखो ना मौसम कितना सुहावना हो रहा है। "उसने चाय का कप मेरी ओर बढ़ाते हुए कहा " हाँ मौसम पन्द्रह दिनों से ऐसा ही है, पर आपको काम और लेप्टोप से फ़ुरसत मिले तब न । चलो आज तुमसे तारीफ़ सुन मौसम भी प्रसन्न होगा"। क्या करूँ मेरा तो जीवन ही ऐसा है सुबह से शाम दफ़्तर में बॉस का हुकुम बजाता हूँ, फिर तुम्हारा और समय बचता है तो कुछ लिख कर अपना शौक़ पूरा कर लेता हूँ। पलटवार तो होना ही था , पर कुछ जल्दी ही हुआ" हाँ हम तो जैसे हीरे मोतियों  के बीच। बैठे है"। जैसे ही मैं कुछ कहने को पत्नी की ओर  मुडा तो देखा कि उसके हाथ में मोबाईल नहीं था " अरे तुम्हारा मोबाईल कहाँ है"। वो रहा "उसने कोने में पड़ी मेज़ की तरफ़ इशारा करते हुए कहा " भूल गए कल से वाई फ़ाई  नहीं चल रहा । "अरे रूठने का काम तो वाईफ का होता है  आज वाई फ़ाई रूठ गया" यह कहते ही मेरे चेहरे पर एक लम्बी मुस्कान आ गई और मेरे अधर कुछ कहने को खुले"    

उड़ते पंछियों को देख मन भी उड़ान भरने लगा,

आगे को नहीं पीछे को चलने लगा।

बीती यादों को यूँही दोहराने लगा ,

टीवी की नहीं मनुष्यों की अनाज सुनने को मचलने लगा।

मैं कविता वाचन कर ही रहा था कि पत्नी का स्वर सुनाई दिया "बाथरूम का नल लीक कर रहा है ज़रा प्लम्बर को फ़ोन कर दीजिए "। फ़ोन लगाते लगाते सोचा क्यों न बिना वाई फ़ाई वाले घर का मुआयना कर लू। जैसे ही बच्चों के कमरे की ओर मुडा कि ठहाकों ने मुझे बरबस यादों में ढकेल दिया। जब हम अपने यार दोस्तों के साथ साइकिल पर सैर को निकल जाते और रास्तों को भी अपने ठहाकों से गुंजा देते। नमस्ते अंकल से मेरा ध्यान भंग हुआ , देखा मेरा बेटा और उसके कालोनी के दोस्त बैठे गुफ़्तगू कर रहे थे। " अरे तुम सब इतनी सुबह", मेरा सवाल मुझ पर ही बेक फ़ायर हो गया , "अंकल कालोनी में किसी के यहाँ भी वाई फ़ाई नहीं चल रहा है और आप लोग हमें डेटा पैकेज दिलाते नहीं तो सोचा सुबह सुबह गपें ही लगा ले"। "अच्छा है इसी बहाने तुम लोगों ने सुबह का सूरज तो देखा होगा  , नहीं तो आँख खुलते ही घुस जाते हो लेप्टोप में"। "क्या पापा आप भी मम्मी का डायलॉग दोहराने लगे" यह आवाज़ मेरे बेटे राहुल की थी। मैं कुछ कहने को उसकी ओर मुडा कि एक और स्वर सुनाई दिया " अंकल इस कारण से हमारा कितना काम रुका पड़ा है, प्लीज़ डेटा पैकेज दिलवा दीजिए आप डेड से रिक्युवेस्ट करेंगे तो वो मान जाएँगें"। मैंने गरदन हिलाते हुए कहा देखेंगे , पर अभी क्या बातें चल रही है"। सबने मायूस चेहरा बना कर कहा "कुछ नहीं अपने अपने स्कूल कॉलेज के क़िस्से सुना कर टाईम पास कर रहे है , दूसरे कॉलोनी का इंटरनेट कैफ़े ९:३० को खुलेगा"। मैं भी उन्हें अपने कॉलेज के क़िस्से सुनाने लगा, बच्चे भी उत्सुकता से मुझे सुनने लगे। हमारे ज़माने में अधिकतर बच्चे साइकिल पर आते थे, मैं भी साइकिल की सवारी ही किया करता था। एक दिन मेरी साइकिल पंचर हो गई, मेरे दोस्त राजीव और मैंने पंचर ठीक करवाना उचित न समझा और दूसरी सवारी खोजना बेहतर लगा। उस दिन मौसम बड़ा सुहावना था , आसमान में काले काले बादल छाए हुए थे। तभी हमें दूसरी सवारी मिल गई और वो थी ऊँट। " हे ऊँट पर कौन कॉलेज जाता है", कहते हुए मेरी पत्नी पकोड़े लिए कमरे में दाख़िल हुई।

बच्चों ने उसके हाथ से प्लेट लेते हुए कहा अंकल कनटिन्यू और मेरी ओर ताकने लगे। "अरे हमें भी पकोड़े खिलाओ फिर क़िस्सा आगे बढ़ाते है। मैंने गला खखारते हुए आगे कहना शुरु किया, "हमने ऊँट वाले को दस रूपए का नोट दिया और उससे कॉलेज छोड़ने का अनुरोध किया। ऊँटवाला तैयार भी हो गया , हम ऊँट की पीठ पर सवार हो शान से कॉलेज की ओर रवाना हुए। जैसे ही हम कॉलेज के गेट पहुँचे कि न जाने कैसे ऊँट से गिर पड़े , सामने से लड़कियों का झुंड आ रहा था । वे हमें गिरता देख ठहाके मार हँस पड़ा , हम शर्म के मारे वाँह से भाग खड़े हुए।     भागते भागते एक सीनियर से टकरा गए , वे बेचारा पास पड़े गोबर में गिरते गिरते बचा। बच्चे हँसते हँसते लोटपोट हुए जा रहे थे तभी मेरी बिटिया बोली "पापा आपने कभी हमें यह क़िस्सा नहीं सुनाया", "बेटा फ़ुरसत कहाँ होती है"। "किसके पास " ये बॉउंसर पत्नी के तरफ़ से आया पर बेटे ने बात संभालते हुए कहा "अब वो सब छोड़ो क़िस्सा मज़ेदार है कनटिन्यू करे। फिर क्या था तीन चार सीनियर छात्रों ने हमें दबोच लिया और शुरु हुई हमारी रैगिंग  । उस समय ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे हम दो मासूम चूहों पर ख़ूँख़ार बिल्लियाँ टूट पड़ी हो। हम पर सवालों की बौछार होने लगी नाम पता वगैरह पूछ कर, जो सबसे बड़ा सवाल का गोला हमारी तरफ़ आया वो था तुम दोनों भाग क्यों रहे हो। सच बताने में बहुत संकोच हो रहा था पर कुछ ओर सूझ नहीं रहा था, इसलिए मन मार कर हमने उन्हें सच बता ही दिया। सुनते ही उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक आ गई, जो मानो कह रही हो "बेटा अब तुम गए , हमें साल भर के लिए दो कठपुतलियाँ मिल गई"। हम सुन्न से खड़े थे कि तभी किसी की आवाज़ ने हमारी तन्द्रा भंग हुई, देखा सीनियर छात्र हँसते -हँसते लोट -पोट हुए जा रहे थे। फिर उन में से एक भारी भरकम आवाज़ में बोला, " आज से तुम हमारे सेवक नकटे बालकों , हमारी तो नाक ही कटा दी कल से पाँच दिनों तक कॉलेज ऊँट पर ही आना और गिरना नहीं "। कुछ ठहरते हुए दूसरा लड़का बोला "पाँच दिन बाद हमसे आ कर मिलना फिर सोचते है कि आगे क्या करना है"। ऐसा कह कर वे सब वहाँ से हँसते हुए चल दिए, हम भारी दिल से वहीं बैठ गए। फिर हमने अपनी क्लास अटेन्ड की पर पूरा दिन हमारे मुँह से एक शब्द नहीं निकला। संगी साथी छेड़ने भी लगे "क्या बात है भाई दोनों आज मुँह पर फेविकॉल लगा के आए हो , जो इतनी चुप्पी साध रखी है"। हम बस ना में अपना सिर हिला रहे थे क्योंकि मन में तो यह उधेड़ धुन चल रही थी कि घर पर इस घटना को कैसे बताए।

बहरहाल  राजीव और मैं घर की ओर रवाना हुए तब हमने एक साथ पुछा अब क्या करना है, दरअसल उस समय माता पिता का एक अजीब सा ख़ौफ़ हुआ करता था। पिता जी तो हिटलर होते थे माँ को तो गिड़गिड़ा कर मना लेते थे। राजीव बोला "मेरे पिता जी तो पैसे देंगे नहीं तीन चार लाफे मारेंगे और पॉकेट मनी भी बंद कर देंगे , तू अपने पिता जी से बात कर ज़्यादा से ज़्यादा डाँटेंगे ही पर देखना ऊँट की सवारी के लिए पैसे दे देंगे । मैं अपनी पॉकेट मनी से बाद में तुझे पैसे दे दूँगा "। "अरे बात ये नहीं है पर बिल्ली के गले में घन्टी बाँधे कौन"। मेरी बात सुनते ही राजीव बोला , "चलो हम दोनों आन्टी की मदद् लेते है"। घर पहुँच कर हमने माँ को सारी बात बताई और उन से आग्रह किया कि वे पिता जी से पैसे दिलाने में हमारी मद्द करे। हमारी क़िस्मत पर तो जैसे पत्थर पड़े थे, पिता जी पीछे खड़े हो कर हमारी सब बात सुन रहे थे। अब क्या था ज्वालामुखी फूटना ही था हमारे साथ माँ भी पिता जी के ग़ुस्से का शिकार हो गई । पिता जी का एक बहुत ही प्रिय डॉयलाग था" तुम माएँ ही बच्चों को लाड़ प्यार में बिगाड़ती है"। पिता जी की डाँट जले पर नमक का काम कर रही थी, हमने पिता जी से पैसे की उम्मीद छोड़ दी। जब पिता जी ग़ुस्सा करके चले गए तब  हमने फिर माँ का दामन थामा। किसी तरह हमने माँ को मना कर थोड़े पैसे का जुगाड़ किया। एक पड़ाव पार करने के बाद दूसरा मुश्किल पड़ाव भी पार करना था , "वो क्या था अंकल , अरे उस ऊँटवाले को भी तो मनाना होगा " ये मेरी बेटी थी। सही कहा अब सबसे बड़ा काम ऊँटवाले को मनाना था। वो भी हमारी मजबूरी भाँप गया और अनापशनाप पैसे बोलने लगा । बड़ी मुश्किल से उसके हाथ पाव जोड़ कर उसे १५०रु में मनाया। बच्चे भी मेरे क़िस्सों पर जी भर के हँस रहे थे, इस समय मुझे अपने दादा दादी के साथ बिताए लम्हे याद आ रहे थे। जब हम चचेरे भाई बहन रात को दादा दादी को घेर कर बैठ जाते और वो हमें कहानियाँ और चुटकुलों के साथ -साथ हमारे पिता जी के बचपन के क़िस्से भी सुनाते थे। मैं इन विचारों में खोया हुआ खा कि तभी मुझे बेटे ने झँझोड़ते हुए कहा , "पापा कहाँ खो गए कुछ और क़िस्से सुनाइए "। तभी कमरे में पत्नी का आगमन हुआ बोली " मैं सुनाती हूँ इनके बचपन के क़िस्से बहुत ही शरारती ग़ुस्सैल थे, हमेशा सासुमाँ से डाँट खाते रहते"। मैं इशारे से उसे चुप रहने को कह रहा था , पर वो मुझे देख कर भी अनदेखा कर रही थी।

"आंटी आपको अंकल के बचपन के बारे में कैसे पता "ये सवाल हमारे पड़ोसी के बेटे राज का था। "बचपन में मेरा परिवार राहुल के दादा दादी का पड़ोसी था, राहुल की बुआ और मैं अच्छी सहेलियाँ थी"। मैंने बात टालने की गरज से मौक़े का फ़ायदा उठाते हुए कहा , "राहुल बुआ को फ़ोन कर कह दे कि माँ अब आपकी सहेली नहीं रही , देखो कह रही है हम सहेलियाँ थी पर अब नहीं है"। "आप भी कुछ भी मत बोलो ये मैंने कब कहा पत्नी ने नाराज़ होते हुए कहा"। आंटी आप कन्टीनयू करे अंकल की बात पर ध्यान न दे। मेरी पत्नी ने आगे कहना जारी रखते हुए कहा , "इनकी दादी जी शाम को सब बच्चों के लिए केसर बदनाम वाला आमरस बनाती थी, बच्चों में मैं भी शामिल थी। ये और इनके चचेरे भाई मोहन सारा आमरस पीने की ज़िद करते परसासुमाँ इन दोनों को डाँट देती। तब दोनों ने आमरस हड़पने की युक्ति सोची, बाज़ार से प्लास्टिक की छिपकली ले आए। शाम को जब दादाजी ने आमरस का भगोना मेज़ पर रखा तब ये दूर से निशाना साध कर छिपकली को आमरस में डालना चाहते थे। पर उसी समय मैंऔर राहुल की बुआ भागते हुए कमरे में घुसे और इनसे टकरा गए। इनका निशाना चूक गया । इनकी छिपकली आमरस में नहीं गिरी परन्तु एक असली छिपकली गिर गई। हम सब छिपकली -छिपकली चिल्लाते हुए बाहर भागे तो इन दोनों को लगा कि इनकी योजना सफल हुई। बहादुरी का ढोंग करते हुए बोले , "हम आमरस समेत छिपकली को गली में फेंक आते है"। जैसे ही घर से बाहर निकले कि भोगने के हिलने के कारण छिपकली आमरस से बाहर निकली।

चलती हुई छिपकली देख कर इन दोनों के होश उड़ गए घबराहट में भगोना दूर फेंका जो गली में सो रह कुत्ते के पास गिरा , डर के मारे कुत्ता गली के बाहर की ओर भागा और ये लोग चिल्लाते हुए घर के भीतर भागे। इसी बीच दादी जी को प्लास्टिक की छिपकली मिल गई उन्हें माजरा समझते देर न लगी, फिर से दोनों को ज़बरदस्त डाँट पड़ी। इस सबका ये हमें ज़िम्मेदार मानने लगे और हमसे बदला लेने की योजना बनाने लगे। एक दिन दोनों भाई  मुझ से और बुआ से बोले तुम्हें हम जादू से दिन में तारे दिखाते है। हमारी उत्सुकता देख कर बोले , "एक टब लाओ उसे आधा पानी से भरो और उसे आधी धूप और आधी छाया में रखो। फिर आँख बंद करके टब के चार चक्कर सूरज तारे बोलते हुए लगाओ"। हम इनकी बातों में आ गए और इनके बताए अनुसार करने लगे। दोनों ने चुपके से पानी में लाल मिर्ची पाउडर मिला दिया। अब हमें आँखें खोल कर अपना मुँह पानी के पास लाने को कहा जिससे तारे दिखाई दे। हमने वैसा ही किया फिर देने ने पानी को हमारे मुँह पर उछाला, आँखों में मिर्ची का पानी जाते ही हम जलन से बिलबिला उठी और ज़ोर ज़ोर से रोने लगी। हमारा रोना सुन कर दादी बाहर आई , दोनो को डाँट पड़ी और हमें आँखों के डॉ क्टर के ले जाया गया। डॉक्टर अंकल ने हमारी आँखों में कोई आई ड्राप्स डाली जिससे थोड़ी देर में हमें आराम मिला।

फिर मैं यह कहते हुए वहाँ से उठा "बच्चों तुम को इन्टरनेट कैफ़े नहीं जाना क्या, मैं भी ज़रा चाय बना लू , तुम्हारी मम्मी तो खाना बनाने के मूड में नहीं है आज तो उपवास ही रखना होगा। बच्चे और क़िस्से  सुनने की ज़िद करने लगे, मैंने उन्हें कल का कह कर टाल दिया। और रसोईघर की ओर चल पड़ा , पीछे-पीछे मेरी पत्नी भी रसोई में आ गई। रसोई में से पकवानों की ख़ुशबू आ रही थी और वहाँ कई बर्तनों में कुछ रखा था। मैंने बर्तनों के ढक्कन उठा कर देखा उनमें गुलाबजामुन, मटर पनीर और कचौरी थे। मैं पत्नी की ओर मुड़ कर बोला"अरे आज वॉटसऐप नहीं किचन ऐप चल रहा है क्या"। वह खीरा टमाटर काट रही थी , बिना मेरी तरफ़ देखे उसने उत्तर दिया "हाँ  आज शर्मा जी , वर्मा जी और माथुर साहब का परिवार दोपहर को हमारे यहाँ खाने पर आ रहे है। अब वाईफाई नहीं चल रहा तो सोचा छुट्टी वाले दिन घर पर पार्टी रख ले। मिसेज़ माथुर , वर्मा और शर्मा अपने-अपने घर से कुछ न कुछ पकवान बना कर ला रही है"। आज इस बात का एहसास हो रहा है कि इंटरनेट ने हमें बहुत कुछ दिया है पर बहुत कुछ ले भी लिया है।

रुचि प जैन

Email id ruchipjain11@yahoo.com

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: वाई फ़ाई का रूठना - रुचि प जैन
वाई फ़ाई का रूठना - रुचि प जैन
https://lh3.googleusercontent.com/-34-jW_Y_Ckc/W5eNDHKTy5I/AAAAAAABEK8/E7ETkLizxTgQ9SHzAnQrF9MAeWcU1wFDACHMYCw/snip_20171028131019_thumb?imgmax=800
https://lh3.googleusercontent.com/-34-jW_Y_Ckc/W5eNDHKTy5I/AAAAAAABEK8/E7ETkLizxTgQ9SHzAnQrF9MAeWcU1wFDACHMYCw/s72-c/snip_20171028131019_thumb?imgmax=800
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2019/04/blog-post_78.html
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/2019/04/blog-post_78.html
true
15182217
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy Table of Content