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ओ मांझी रे - सुशील शर्मा की कविताएँ

सुशील कुमार शर्मा

बाल कवितायेँ
1 प्यारा तोता
सुशील शर्मा

टें-टें टें-टें तोता चिल्लाया।
छोटू भाग के मिर्ची लाया।
कुतर कुतर तोते ने खायी।
मिर्ची उसको बहुत लुभायी।

टें-टें टें फिर तोता बोला।
मांग रहा वो बर्फ का गोला।
गर्मी में गुस्सा वो होता।
नाचे ता था थैया तोता।

छोटू ने उसको पुचकारा।
तोता उसको लगता प्यारा।
दाना पानी खूब खिलाया।
ठन्डे पानी से नहलाया।

अरे हरे प्यारे से तोते।
काश हमारे पंख भी होते।
आसमान में हम उड़ जाते।
पर्वत के ऊपर चढ़ जाते।

तोता लेकिन बहुत उदास।
उसकी मम्मी नहीं थी पास।
तोते ने फिर टेर लगाई।
बात समझ छोटू को आई।

छोटू ने पिंजरे को खोला।
तोता उसके कान में बोला।
धन्यवाद ओ मेरे भाई।
कैद से मुझको मुक्ति दिलाई।

2 ओ मेरे प्यारे कम्प्यूटर

ओ मेरे प्यारे कम्प्यूटर।
कितने सुंदर कितने स्वीटर।
मोटे मोटे डेस्कटॉप हो।
पतले छोटे लेपटॉप हो।

हार्डवेयर तुम्हारा तन है।
सॉफ्टवेयर तुम्हारा मन है।
रेम तुम्हारा है मस्तिष्क।
मेमोरी है रोम की डिस्क।

इंटरनेट तुम्हारा खून।
फाइल में लिखते मजमून।
फोल्डर में फिर फाइल रखते।
ओपन इनको हम कर सकते।

की बोर्ड से अक्षर लिखते।
फाइल डिलीट हम कर सकते।
पेण्ट में जाकर चित्र बनाते।
रंगों से फिर उसे सजाते।

वर्ड में पापा कविता लिखते।
कभी भी उसको एडिट करते।
ईमेल से पत्र हम लिखते।
विज्ञापन से सब कुछ बिकते।

गूगल बाबा हमें बताता।
सुंदर सुंदर पाठ पढ़ाता।
नई जानकारी ले आता।
गूगल में बनवाओ खाता।

कम्प्यूटर में है सब संसार।
इससे चलता है व्यापार।
ऑनलाइन हर चीज है मिलती।
हर दुकान अब इससे चलती।

ओ मेरे कम्प्यूटर राजा।
अब तू हर दिल में साजा।
तेरे गुण मैं कैसे गाऊँ।
तेरे बिन अब चैन न पाऊँ।

---.
ओ मांझी रे
नवगीत
सुशील शर्मा

मांझी ले चल दूर वहाँ ,
जहाँ गगन का छोर है ।

पुष्पों को छूती समीर हो,
मन उससे मिलने अधीर हो।
सलिला के जल की कोलाहल ,
देख उसे मिलता मन को बल।
 
झूम झूम कर गीत प्रेम के
गाता गगन विभोर है ।

तारों के संग बातें करते,
सुमन प्रीत के मन में झरते।
अभिसारी रातों की बातें ,
प्यार भरी सपनों सी रातें।
रस परिपूरित सुरभित साँझ ,
मन मलयानिल किशोर है ।

तेरा मन भावन सत्संग,
मन में द्विगुणित मिलन उमंग।
मेरा मन होता है घायल,
बजती है जब  तेरी पायल।

तेरा ढरका सा ये आँचल
जीवन की प्रणय हिलोर है ।
--

गर्मी
बाल कविता
सुशील शर्मा

गर्मी बहुत तेज है मम्मी।
छत पर खेल रही क्यों निम्मी।
सूरज मामा का मुँह लाल।
मुँह पर ढकते सभी रुमाल।

सारी चिड़ियाँ चूँ चूँ करतीं।
प्यासी प्यासी क्यूँ वो फिरतीं।
रख दो मम्मी एक सकोरा।
साथ में दाना दुमका कोरा।

चिड़िया ने सब तिनके जोड़े
यहाँ घुसा कर वहाँ मरोड़े।
बुनकर एक घोंसला ताना।
लाई फिर वो चूजों को खाना।

गर्मी से हम सब बेहाल।
आइसक्रीम अब करे कमाल।
चलो आम तोड़े हम कच्चे।
करें धमाल सभी हम बच्चे।
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रोता सा ये शहर है देखो
नवगीत
सुशील शर्मा

रोता सा ये शहर है देखो,
रीते रीते गांव हैं।
न वो पनघट की मस्ती,
न बरगद की छांव है।

फटे हुए कपड़ों से रिश्ते ,
हर मन में दीवार है।
शब्द सभी तुतलाते लगते,
अभिव्यक्ति बीमार है।

कंधे सारे झुके झुके हैं,
लँगड़ाता हर पांव है।

चुप्पी सारी चुभन भरी हैं,
मौन भरा कोलाहल है।
टीस सिसकती मन के भीतर ,
जीवन बना हलाहल है।

सूख गया मन का हर कौना ,
धूप भरी हर छांव है।

न गौरैया न ताल तलैया,
पोखर ,झीलें सूखी हैं।
बना हुआ है बाप रुपैया ,
मन की बातें रूखी हैं।

न मोरों का नृत्य सुहाना ,
न कौवों की कांव है।
--
स्वागत है नववर्ष तुम्हारा
नवगीत
सुशील शर्मा

नए वर्ष में सजे हुए है,
हर द्वारे पर वंदनवार।
सुख के सुमन राह में बिखरे ,
आया ये अनुपम त्यौहार।

चैत प्रतिपदा शुरू गई,
अमराई अब महकी है।
नए वर्ष में मन की चिड़िया,
देखो चहकी चहकी है।

ज्योतिपुंज सूरज गरमाया,
मौसम का बदला व्यवहार।

पकी खड़ी गेहूँ की बाली,
खेतों में उजास बिखरी।
सुमन वृन्त नव किसलय लेकर,
पेड़ों की आभा निखरी।

फूला फूला सा पलाश है,
नए वर्ष का कर शृंगार।

चलो नेह के दीप जला कर ,
कलुष तमस को हम हर लें।
अनुपम ज्योतिर्मय जीवन हो ,
मन संकल्पों से भर लें।

प्रेम और सौहार्द भरा हो,
नए वर्ष पर यह संसार।

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