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पुस्तक समीक्षा सात सौ सतहत्तर : नैतिकता का पाठ - डॉ0 हरिश्चन्द्र शाक्य, डी0 लिट्0

पुस्तक समीक्षा

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सात सौ सतहत्तर : नैतिकता का पाठ

- डॉ0 हरिश्चन्द्र शाक्य, डी0 लिट्0

'सात सौ सतहत्तर' उत्तर प्रदेश के जिला हरदोई में जन्मे तथा वर्तमान में कानपुर में निवास कर रहे कवि डॉ0 अशोक कुमार गुप्त 'अशोक' का 777 दोहों का सद्यः प्रकाशित दोहा संग्रह है। दोहा साहित्य की अति प्राचीन विधा है। अपभ्रंश काल में भी दोहा रचा जाता था। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने 'हिन्दी साहित्य का इतिहास' में लिखा है ''पहले जैसे 'गाथा' या 'गाहा' कहने से प्राकृत का बोध होता था वैसे ही पीछे 'दोहा' या 'दूहा' कहने से अपभ्रंश या लोक प्रचलित काव्य भाषा का बोध होने लगा। इस प्रचलित काव्य भाषा में नीति, श्रृंगार, वीर आदि की कविताएँ तो चली ही आती थीं, जैन और बौद्ध धर्माचार्य अपने मतों की रक्षा और उसके प्रचार के लिए इसमें उपदेश आदि की रचना करते थे। प्राकृत से बिगड़ कर जो रूप बोल चाल की भाषा ने ग्रहण किया वह भी आगे चलकर पुराना पड़ गया और काव्य रचना के लिए रूढ़ हो गया। 'अपभ्रंश नाम उसी समय से चला।' आचार्य शुक्ल ने यह भी लिखा है, ''वज्रयान शाखा में जो योगी सिद्ध के नाम से प्रसिद्ध हुए वे अपने मत का संस्कार जनता पर भी डालना चाहते थे। सिद्धों के सबसे पुराने सरह (सरोज वज भी नाम) हैं जिनका काल डॉ0 विनयतोश भट्टाचार्य ने विक्रम संवत् 690 निश्चित किया है।''

सरह को सरहपा भी कहा जाता है। उनका लिखा एक दोहा दृष्टव्य है-

घोर अघारे चन्द्रमणि, जिमि उज्जोअ करेइ।

परम महासुह एखु कणे, दुरिय अशेष हरेइ।।

वर्तमान छंद शिल्पी श्री राजेन्द्र वर्मा ने अपनी पुस्तक 'रस-छन्द-अलंकार और काव्य विधाएँ' में दोहे का शाब्दिक अर्थ दुहना अर्थात् शब्दों से भावों को दुहना बताया है। इसे दूहा या दोहरा भी कहते हैं। 'ढोला मारू रा दूहा' अपभ्रंशकाल की प्रमुख रचना है। राजेन्द्र वर्मा बताते हैं, ''पुराने ग्रंथों 'पृथ्वीराज रासो', 'हम्मीर रासो' आदि में दोहे को दूहा कहा गया है, जिनमें इसका मात्रा विधान अधिकांशतः 13/11 ही है। भक्ति काल में दोहा कबीर, जायसी, तुलसी, रहीम की तथा रीतिकाल में यह बिहारी की प्रमुख विधा रहा है। आधुनिक काल में दोहा खूब लिखा जा रहा है।

आलोच्य पुस्तक में कुल सात सौ सतहत्तर दोहे संग्रहीत किए गए हैं जिनमें वंदना के 21, श्रृंगार के 43, भक्ति के 65, धर्म के 76, परिवार के 98, समाज के 109, आडम्बर के 65, राजनीति के 109, नीति के 54 तथा विविध विषयों के 137 दोहे हैं। कविवर श्री चंद्रभान 'चन्द्र' ने पुस्तक की सारगर्भित भूमिका लिखी है।

कविवर डॉ0 अशोक कुमार गुप्त 'अशोक' सनातन हिन्दू धर्म के कट्टर समर्थक हैं। हिन्दू धर्म के तैंतीस कोटि देवी-देवताओं अवतारवाद, वेदों, पुराणों, पूजा-पाठ आदि में उनकी गहरी आस्था है। उनकी आस्था के कतिपय दोहे प्रस्तुत हैं-

राम-राम रट कर करो, तुम प्रभु पर विश्वास।

श्रद्धा से सब काम हों, पूरी होगी आस।।

बरसाना ब्रजधाम में, चहुँदिशि आठों याम।

सकल सृष्टि में गूँजता, राधा जी का नाम।।

कंठ गरल विधु सिर बसे, बिच्छू सोहे कान।

जो शिव की पूजा करे, वह पाए वरदान।।

कण-कण में कान्हा बसे, वृन्दावन के बीच।

राधा रानी की कृपा, रही सृष्टि को सींच।।

साईं तेरा आसरा, हर मुश्किल का अस्त्र।

जैसे तन को ढाँकता, कोई नूतन वस्त्र।।

धर्म और आध्यात्म में तो डॉ0 अशोक कुमार गुप्त 'अशोक' की आस्था है किन्तु धर्म की आड़ में जो आडम्बर और पाखंड हैं उनमें उनका कोई विश्वास नहीं है। आडम्बर और पाखंड की पोल खोलने वाले उनके कतिपय दोहे प्रस्तुत हैं-

उपदेशों की आड़ में, गंदे लुच्चे काम।

चेलों के मस्ती चढ़ी, बाबा हैं बदनाम।।

बाबाओं के कृत्य से, बड़े-बड़े हैं मौन।

जन-जन को क्या फल मिले, कहो जानता कौन।।

सुविधा भोगी हो गये, जब से बाबा संत।

प्रेम-मेल-सद्भाव का, होता जाता अंत।।

गंगा तट पर दिख रहे, तिलक फूल गलहार।

दान पुण्य करते फिरें, घटतौले बटमार।।

बाबा की चेली बनी, जब से भोली बाल।

उसके अभिभावक हुए, तब से बहुत निहाल।।

व्यभिचारी करने लगे, जब से दौलत दान।

बाबा मालामाल है, निष्फल है वरदान।।

कर्म और भाग्य दोनों में ही कवि का विश्वास है। गीता के कर्म के सिद्धान्त के अनुसार कवि मानता है कि जो जैसे कर्म करता है उसे वैसा ही फल प्राप्त होता है-

फल वैसा ही मिलेगा, जैसा होगा कर्म।

चूल्हा यदि ठंडा हुआ, चाय न होगी गर्म।।

कर्म नीचता का करे, मिलता दण्ड तुरंत।

एक आँख का आज तक, फिरता दुष्ट जयंत।।

भाग्यवादी बनकर कवि कहता है-

सृष्टि रचयिता ने लिखा, मेरा भाग्य विशेष।

श्रद्धा मेरी मातु है, पितु विश्वास महेश।।

मोक्ष प्राप्त करने हेतु या यों कहें कि सुख प्राप्त करने हेतु मनुष्य मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारा, मठ व तीर्थ स्थानों में भटकता फिरता है। उसे मोक्ष मिल पाता है या नहीं यह तो वही जाने किन्तु कविवर डॉ0 अशोक कुमार गुप्त 'अशोक' माँ-बाप को जीवित तीर्थ मानते हैं-

जीवित तीरथ हैं यहाँ दोनों जननी-बाप।

जिस संतति पर हो कृपा, चमके अपने आप।।

संयुक्त परिवारों के बिखरने की त्रासदी आज हर परिवार झेल रहा है। स्वार्थपरता के युग में परिवार आज परिवार नहीं रह गए हैं। यदि इक्का-दुक्का संयुक्त परिवार हैं भी तो उन्हें स्वर्ग नहीं कहा जा सकता। पारिवारिक विसंगतियों के अनेक चित्र डॉ0 अशोक ने उकेरे है जिनमें से कतिपय यहाँ प्रस्तुत हैं-

ननद न झाडू मारती, सास न करती काम।

बहू खट रही रात दिन, फिर भी है बदनाम।।

रिश्ते सब बौने हुए, पैसा है सिरमौर।

पिता-पुत्र करते नहीं, एक-एक का गौर।।

अनपढ़ घर में सास है, बहुअर बी0ए0 पास।

हुकुम चलाती बहू नित, सास बन गई दास।।

बहू नहीं अब चाहती, सास ससुर का साथ।

जरा-जरा सी बात पर, पीट रही है माथ।।

बहुओं को मिलने लगे, यदि बेटी सा प्यार।

घर-घर में सुख चैन हो, बदल जाय संसार।।

पाश्चात्य सभ्यता के अन्धानुकरण तथा फैशन के नंगनाच से कवि का मन व्यथित है। इन सबके चलते अब हिन्दुस्तान भी हिन्दुस्तान नहीं रहा है। डॉ0 अशोक कुमार गुप्त 'अशोक' के कतिपय दोहों में यह सब देंखे-

जब से छोटे हो गये, नर्तकियों के वस्त्र।

पुरुष यहाँ पर मर रहे, बिना अस्त्र अरु शस्त्र।।

ऐसा बढ़ा समाज में, नंगेपन का खेल।

टॉप खींचती हर समय, जींस कर रही मेल।।

धोती को वनवास है, मौन सूट सलवार।

गाँव गली में हो रही, जींस टॉप की मार।।

अधनंगी दिखने लगीं, बालाएँ हर ठौर।

नंगापन कहिए इसे, या फैशन का दौर।।

चुनरी में मुँह छिप गये, दिखते नयन निशान।

बाप सके ना लाड़ली, अपनी ही पहचान।।

पिज्जा, बर्गर, सैण्डबिच, खाते चाऊमीन।

नया इण्डिया हो रहा, हिंगलिश का शौकीन।।

आज की भ्रष्ट राजनीति पर भी कवि ने जमकर प्रहार किया है-

कितने नेता हो गये, लम्पट चोर लबार।

लोकतंत्र बदनाम है, कैसे होय सुधार।।

नेता चतुर सुजान है, गहे मलाई माल।

जनता बकरी के सदृश, होती सदा हलाल।।

हर कोई है चाहता, पद पैसा सम्मान।

चाह विभीषण की लिए, नेता हुए महान।।

नेता बिकने को खड़ा, आज बीच बाजार।

जोड़ तोड़ करके बने, लूटमार सरकार।।

भव्य भवन से पूछती, कुटिया एक सवाल।

ऊँचा उठने के लिए, चली कौन सी चाल।।

प्रस्तुत पुस्तक में संग्रहीत समस्त दोहों के कला पक्ष पर यदि हम विचार करें तो हम पाते हैं कि समस्त दोहों की भाषा आम बोलचाल की खड़ी बोली है जिसमें हिन्दी में प्रचलित अंग्रेजी के शब्द भी आए हैं। कवि ने दोहा छंद का बखूबी निर्वाह किया है। विभिन्न अलंकार भी सहजता में ही आ गये हैं। इन दोहों में आये कतिपय अलंकार दृष्टव्य हैं-

अनुप्रास-

1. मनमोहन मधुमय महक, मन्द-मन्द मुस्कान।

चितचोरी चितवन चतुर, चटक चपल चहकान।

2. नटवर-नटखट-नागनथ, जगत नचावन हार।

3. कुहू-कुहू कोयल करे, आम गया बौराय।

4. कूड़ा कचरा खा रहे, कलयुग में सब लोग।

पदमैत्री-

1. खटर-पटर करती यहाँ,

2. चित्त- वित्त संयम रहे,

3. धर्म-कर्म की बात को,

4. लेन-देन की देश में,

5. तन-मन निर्मल रह सके

पुनरुक्ति प्रकाश-

1. चप्पा-चप्पा छानकर,

2. मन्द-मन्द मुस्कान कर,

3. निहुरे-निहुरे मत चलो

4. जब-जब बरसा जोर से

वीप्सा-

1. समय-समय की बात है, समय-समय की बात।

मानवीकरण-

1. भव्य भवन से पूछती, कुटिया एक सवाल।

2. नींद नदारद रात की, नहीं दिवस को चैन।

विरोधाभास-

1. आँखें होते हुए भी हुआ, अन्धा यह इन्सान।

2. मुखर मंथरा मौन है, देख लोग बिंदास।

उपमा-

1. बिल्ली चूहे सा दिखे, सास बहू का मेल।

2. लक्ष्मण रेखा सदृश है, आडम्बर की रेख।

3. गुरु हिरदय सागर सदृश, अनुचर सरित समान।

रूपक-

1. स्वारथ के आधार पर, बनता कपट-मकान।

पशुता पछताने लगे, पनपे पाप-दुकान।।

यमक-

1. हारे तो भी हार है, जीते पर भी हार।

अन्त में निष्कर्षतः यही कहा जा सकता है कि कवि डॉ0 अशोक कुमार गुप्त 'अशोक' ने रीतिकालीन सतसई परम्परा को पुनर्जीवित करके कुछ नया करने का प्रयास किया है। उन्होनें पुरानी बीन के द्वारा नूतन राग प्रस्तुत करके पाठकों को मानव मूल्यों के प्रति सजग करते हुए नैतिकता का पाठ पढ़ाया है समाजोपयोगी पुस्तक प्रस्तुत करने के लिए कवि निश्चय ही साधुवाद का पात्र है। प्रस्तुत कृति हिन्दी साहित्याकाश में अपना कोई न कोई स्थान अवश्य बनाएगी ऐसा मेरा विश्वास है। मेरी कवि को शुभकामनाएँ।

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समीक्ष्य कृति- सात सौ सतहत्तर (दोहा संग्रह)

रचयिता- डॉ0 अशोक कुमार गुप्त 'अशोक'

प्रकाशक- निखिल पब्लिशर्स एण्ड डिस्टीब्यूटर्स

37, 'शिवराम कृपा' विष्णु कॉलोनी शाहगंज, आगरा

मूल्य- 100 रूपये

पृष्ठ- 80

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समीक्षक - डॉ0 हरिश्चन्द्र शाक्य, डी0लिट्0

शाक्य प्रकाशन, घंटाघर चौक

क्लब घर, मैनपुरी - 205001 (उ0प्र0)

स्थाई पता- ग्राम कैरावली, पोस्ट तालिबपुर

जिला- मैनपुरी (उ0प्र0)


ई मेल -

harishchandrashakya11@gmail.com

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