पुस्तक समीक्षा सात सौ सतहत्तर : नैतिकता का पाठ - डॉ0 हरिश्चन्द्र शाक्य, डी0 लिट्0

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पुस्तक समीक्षा सात सौ सतहत्तर : नैतिकता का पाठ - डॉ0 हरिश्चन्द्र शाक्य, डी0 लिट्0 'सात सौ सतहत्तर' उत्तर प्रदेश के जिला हरदोई में जन...

पुस्तक समीक्षा

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सात सौ सतहत्तर : नैतिकता का पाठ

- डॉ0 हरिश्चन्द्र शाक्य, डी0 लिट्0

'सात सौ सतहत्तर' उत्तर प्रदेश के जिला हरदोई में जन्मे तथा वर्तमान में कानपुर में निवास कर रहे कवि डॉ0 अशोक कुमार गुप्त 'अशोक' का 777 दोहों का सद्यः प्रकाशित दोहा संग्रह है। दोहा साहित्य की अति प्राचीन विधा है। अपभ्रंश काल में भी दोहा रचा जाता था। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने 'हिन्दी साहित्य का इतिहास' में लिखा है ''पहले जैसे 'गाथा' या 'गाहा' कहने से प्राकृत का बोध होता था वैसे ही पीछे 'दोहा' या 'दूहा' कहने से अपभ्रंश या लोक प्रचलित काव्य भाषा का बोध होने लगा। इस प्रचलित काव्य भाषा में नीति, श्रृंगार, वीर आदि की कविताएँ तो चली ही आती थीं, जैन और बौद्ध धर्माचार्य अपने मतों की रक्षा और उसके प्रचार के लिए इसमें उपदेश आदि की रचना करते थे। प्राकृत से बिगड़ कर जो रूप बोल चाल की भाषा ने ग्रहण किया वह भी आगे चलकर पुराना पड़ गया और काव्य रचना के लिए रूढ़ हो गया। 'अपभ्रंश नाम उसी समय से चला।' आचार्य शुक्ल ने यह भी लिखा है, ''वज्रयान शाखा में जो योगी सिद्ध के नाम से प्रसिद्ध हुए वे अपने मत का संस्कार जनता पर भी डालना चाहते थे। सिद्धों के सबसे पुराने सरह (सरोज वज भी नाम) हैं जिनका काल डॉ0 विनयतोश भट्टाचार्य ने विक्रम संवत् 690 निश्चित किया है।''

सरह को सरहपा भी कहा जाता है। उनका लिखा एक दोहा दृष्टव्य है-

घोर अघारे चन्द्रमणि, जिमि उज्जोअ करेइ।

परम महासुह एखु कणे, दुरिय अशेष हरेइ।।

वर्तमान छंद शिल्पी श्री राजेन्द्र वर्मा ने अपनी पुस्तक 'रस-छन्द-अलंकार और काव्य विधाएँ' में दोहे का शाब्दिक अर्थ दुहना अर्थात् शब्दों से भावों को दुहना बताया है। इसे दूहा या दोहरा भी कहते हैं। 'ढोला मारू रा दूहा' अपभ्रंशकाल की प्रमुख रचना है। राजेन्द्र वर्मा बताते हैं, ''पुराने ग्रंथों 'पृथ्वीराज रासो', 'हम्मीर रासो' आदि में दोहे को दूहा कहा गया है, जिनमें इसका मात्रा विधान अधिकांशतः 13/11 ही है। भक्ति काल में दोहा कबीर, जायसी, तुलसी, रहीम की तथा रीतिकाल में यह बिहारी की प्रमुख विधा रहा है। आधुनिक काल में दोहा खूब लिखा जा रहा है।

आलोच्य पुस्तक में कुल सात सौ सतहत्तर दोहे संग्रहीत किए गए हैं जिनमें वंदना के 21, श्रृंगार के 43, भक्ति के 65, धर्म के 76, परिवार के 98, समाज के 109, आडम्बर के 65, राजनीति के 109, नीति के 54 तथा विविध विषयों के 137 दोहे हैं। कविवर श्री चंद्रभान 'चन्द्र' ने पुस्तक की सारगर्भित भूमिका लिखी है।

कविवर डॉ0 अशोक कुमार गुप्त 'अशोक' सनातन हिन्दू धर्म के कट्टर समर्थक हैं। हिन्दू धर्म के तैंतीस कोटि देवी-देवताओं अवतारवाद, वेदों, पुराणों, पूजा-पाठ आदि में उनकी गहरी आस्था है। उनकी आस्था के कतिपय दोहे प्रस्तुत हैं-

राम-राम रट कर करो, तुम प्रभु पर विश्वास।

श्रद्धा से सब काम हों, पूरी होगी आस।।

बरसाना ब्रजधाम में, चहुँदिशि आठों याम।

सकल सृष्टि में गूँजता, राधा जी का नाम।।

कंठ गरल विधु सिर बसे, बिच्छू सोहे कान।

जो शिव की पूजा करे, वह पाए वरदान।।

कण-कण में कान्हा बसे, वृन्दावन के बीच।

राधा रानी की कृपा, रही सृष्टि को सींच।।

साईं तेरा आसरा, हर मुश्किल का अस्त्र।

जैसे तन को ढाँकता, कोई नूतन वस्त्र।।

धर्म और आध्यात्म में तो डॉ0 अशोक कुमार गुप्त 'अशोक' की आस्था है किन्तु धर्म की आड़ में जो आडम्बर और पाखंड हैं उनमें उनका कोई विश्वास नहीं है। आडम्बर और पाखंड की पोल खोलने वाले उनके कतिपय दोहे प्रस्तुत हैं-

उपदेशों की आड़ में, गंदे लुच्चे काम।

चेलों के मस्ती चढ़ी, बाबा हैं बदनाम।।

बाबाओं के कृत्य से, बड़े-बड़े हैं मौन।

जन-जन को क्या फल मिले, कहो जानता कौन।।

सुविधा भोगी हो गये, जब से बाबा संत।

प्रेम-मेल-सद्भाव का, होता जाता अंत।।

गंगा तट पर दिख रहे, तिलक फूल गलहार।

दान पुण्य करते फिरें, घटतौले बटमार।।

बाबा की चेली बनी, जब से भोली बाल।

उसके अभिभावक हुए, तब से बहुत निहाल।।

व्यभिचारी करने लगे, जब से दौलत दान।

बाबा मालामाल है, निष्फल है वरदान।।

कर्म और भाग्य दोनों में ही कवि का विश्वास है। गीता के कर्म के सिद्धान्त के अनुसार कवि मानता है कि जो जैसे कर्म करता है उसे वैसा ही फल प्राप्त होता है-

फल वैसा ही मिलेगा, जैसा होगा कर्म।

चूल्हा यदि ठंडा हुआ, चाय न होगी गर्म।।

कर्म नीचता का करे, मिलता दण्ड तुरंत।

एक आँख का आज तक, फिरता दुष्ट जयंत।।

भाग्यवादी बनकर कवि कहता है-

सृष्टि रचयिता ने लिखा, मेरा भाग्य विशेष।

श्रद्धा मेरी मातु है, पितु विश्वास महेश।।

मोक्ष प्राप्त करने हेतु या यों कहें कि सुख प्राप्त करने हेतु मनुष्य मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारा, मठ व तीर्थ स्थानों में भटकता फिरता है। उसे मोक्ष मिल पाता है या नहीं यह तो वही जाने किन्तु कविवर डॉ0 अशोक कुमार गुप्त 'अशोक' माँ-बाप को जीवित तीर्थ मानते हैं-

जीवित तीरथ हैं यहाँ दोनों जननी-बाप।

जिस संतति पर हो कृपा, चमके अपने आप।।

संयुक्त परिवारों के बिखरने की त्रासदी आज हर परिवार झेल रहा है। स्वार्थपरता के युग में परिवार आज परिवार नहीं रह गए हैं। यदि इक्का-दुक्का संयुक्त परिवार हैं भी तो उन्हें स्वर्ग नहीं कहा जा सकता। पारिवारिक विसंगतियों के अनेक चित्र डॉ0 अशोक ने उकेरे है जिनमें से कतिपय यहाँ प्रस्तुत हैं-

ननद न झाडू मारती, सास न करती काम।

बहू खट रही रात दिन, फिर भी है बदनाम।।

रिश्ते सब बौने हुए, पैसा है सिरमौर।

पिता-पुत्र करते नहीं, एक-एक का गौर।।

अनपढ़ घर में सास है, बहुअर बी0ए0 पास।

हुकुम चलाती बहू नित, सास बन गई दास।।

बहू नहीं अब चाहती, सास ससुर का साथ।

जरा-जरा सी बात पर, पीट रही है माथ।।

बहुओं को मिलने लगे, यदि बेटी सा प्यार।

घर-घर में सुख चैन हो, बदल जाय संसार।।

पाश्चात्य सभ्यता के अन्धानुकरण तथा फैशन के नंगनाच से कवि का मन व्यथित है। इन सबके चलते अब हिन्दुस्तान भी हिन्दुस्तान नहीं रहा है। डॉ0 अशोक कुमार गुप्त 'अशोक' के कतिपय दोहों में यह सब देंखे-

जब से छोटे हो गये, नर्तकियों के वस्त्र।

पुरुष यहाँ पर मर रहे, बिना अस्त्र अरु शस्त्र।।

ऐसा बढ़ा समाज में, नंगेपन का खेल।

टॉप खींचती हर समय, जींस कर रही मेल।।

धोती को वनवास है, मौन सूट सलवार।

गाँव गली में हो रही, जींस टॉप की मार।।

अधनंगी दिखने लगीं, बालाएँ हर ठौर।

नंगापन कहिए इसे, या फैशन का दौर।।

चुनरी में मुँह छिप गये, दिखते नयन निशान।

बाप सके ना लाड़ली, अपनी ही पहचान।।

पिज्जा, बर्गर, सैण्डबिच, खाते चाऊमीन।

नया इण्डिया हो रहा, हिंगलिश का शौकीन।।

आज की भ्रष्ट राजनीति पर भी कवि ने जमकर प्रहार किया है-

कितने नेता हो गये, लम्पट चोर लबार।

लोकतंत्र बदनाम है, कैसे होय सुधार।।

नेता चतुर सुजान है, गहे मलाई माल।

जनता बकरी के सदृश, होती सदा हलाल।।

हर कोई है चाहता, पद पैसा सम्मान।

चाह विभीषण की लिए, नेता हुए महान।।

नेता बिकने को खड़ा, आज बीच बाजार।

जोड़ तोड़ करके बने, लूटमार सरकार।।

भव्य भवन से पूछती, कुटिया एक सवाल।

ऊँचा उठने के लिए, चली कौन सी चाल।।

प्रस्तुत पुस्तक में संग्रहीत समस्त दोहों के कला पक्ष पर यदि हम विचार करें तो हम पाते हैं कि समस्त दोहों की भाषा आम बोलचाल की खड़ी बोली है जिसमें हिन्दी में प्रचलित अंग्रेजी के शब्द भी आए हैं। कवि ने दोहा छंद का बखूबी निर्वाह किया है। विभिन्न अलंकार भी सहजता में ही आ गये हैं। इन दोहों में आये कतिपय अलंकार दृष्टव्य हैं-

अनुप्रास-

1. मनमोहन मधुमय महक, मन्द-मन्द मुस्कान।

चितचोरी चितवन चतुर, चटक चपल चहकान।

2. नटवर-नटखट-नागनथ, जगत नचावन हार।

3. कुहू-कुहू कोयल करे, आम गया बौराय।

4. कूड़ा कचरा खा रहे, कलयुग में सब लोग।

पदमैत्री-

1. खटर-पटर करती यहाँ,

2. चित्त- वित्त संयम रहे,

3. धर्म-कर्म की बात को,

4. लेन-देन की देश में,

5. तन-मन निर्मल रह सके

पुनरुक्ति प्रकाश-

1. चप्पा-चप्पा छानकर,

2. मन्द-मन्द मुस्कान कर,

3. निहुरे-निहुरे मत चलो

4. जब-जब बरसा जोर से

वीप्सा-

1. समय-समय की बात है, समय-समय की बात।

मानवीकरण-

1. भव्य भवन से पूछती, कुटिया एक सवाल।

2. नींद नदारद रात की, नहीं दिवस को चैन।

विरोधाभास-

1. आँखें होते हुए भी हुआ, अन्धा यह इन्सान।

2. मुखर मंथरा मौन है, देख लोग बिंदास।

उपमा-

1. बिल्ली चूहे सा दिखे, सास बहू का मेल।

2. लक्ष्मण रेखा सदृश है, आडम्बर की रेख।

3. गुरु हिरदय सागर सदृश, अनुचर सरित समान।

रूपक-

1. स्वारथ के आधार पर, बनता कपट-मकान।

पशुता पछताने लगे, पनपे पाप-दुकान।।

यमक-

1. हारे तो भी हार है, जीते पर भी हार।

अन्त में निष्कर्षतः यही कहा जा सकता है कि कवि डॉ0 अशोक कुमार गुप्त 'अशोक' ने रीतिकालीन सतसई परम्परा को पुनर्जीवित करके कुछ नया करने का प्रयास किया है। उन्होनें पुरानी बीन के द्वारा नूतन राग प्रस्तुत करके पाठकों को मानव मूल्यों के प्रति सजग करते हुए नैतिकता का पाठ पढ़ाया है समाजोपयोगी पुस्तक प्रस्तुत करने के लिए कवि निश्चय ही साधुवाद का पात्र है। प्रस्तुत कृति हिन्दी साहित्याकाश में अपना कोई न कोई स्थान अवश्य बनाएगी ऐसा मेरा विश्वास है। मेरी कवि को शुभकामनाएँ।

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समीक्ष्य कृति- सात सौ सतहत्तर (दोहा संग्रह)

रचयिता- डॉ0 अशोक कुमार गुप्त 'अशोक'

प्रकाशक- निखिल पब्लिशर्स एण्ड डिस्टीब्यूटर्स

37, 'शिवराम कृपा' विष्णु कॉलोनी शाहगंज, आगरा

मूल्य- 100 रूपये

पृष्ठ- 80

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समीक्षक - डॉ0 हरिश्चन्द्र शाक्य, डी0लिट्0

शाक्य प्रकाशन, घंटाघर चौक

क्लब घर, मैनपुरी - 205001 (उ0प्र0)

स्थाई पता- ग्राम कैरावली, पोस्ट तालिबपुर

जिला- मैनपुरी (उ0प्र0)


ई मेल -

harishchandrashakya11@gmail.com

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. 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श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर 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रचनाकार: पुस्तक समीक्षा सात सौ सतहत्तर : नैतिकता का पाठ - डॉ0 हरिश्चन्द्र शाक्य, डी0 लिट्0
पुस्तक समीक्षा सात सौ सतहत्तर : नैतिकता का पाठ - डॉ0 हरिश्चन्द्र शाक्य, डी0 लिट्0
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