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श्रीरामकथा के अल्पज्ञात दुर्लभ प्रसंग विभिन्न श्रीरामकथाओं में सीताजी का चूड़ामणि प्रसंग -डॉ. नरेन्द्रकुमार मेहता

श्रीरामकथा के अल्पज्ञात दुर्लभ प्रसंग

विभिन्न श्रीरामकथाओं में सीताजी का चूड़ामणि प्रसंग

अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं

दनुजवनकृ शानुं ज्ञानिनामग्रण्यम्।

सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं

रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि।।

श्रीराम. च. मा. सुन्दरकाण्ड श्लोक-3

अतुल बल (शक्ति) के धाम, सोने के पर्वत (सुमेरू) के समान कान्तियुक्त शरीर वाले, दैत्यरूपी वन (को ध्वंस करने) के लिये अग्रिरूप, झानियों में अग्रगण्य, सम्पूर्ण गुणों के निधान, वानरों के स्वामी, श्रीरघुनाथजी के प्रिय पवनपुत्र श्री हनुमान जी को मैं प्रणाम करता हूँ।

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण में सीताजी का चूड़ामणि प्रसंग

हनुमान जी ने सीताजी को विश्वास कराने के लिए कि वे श्रीरामजी के दूत हैं, उन्हें श्रीरामजी के शारीरिक चिन्हों, गुणों एवं नर-वानर की मित्रता की सम्पूर्ण कथा कही। हनुमान जी को ऐसा लगा कि सीताजी का उन पर विश्वास हो गया तब उन्होंने कहा-

वानरोऽहं महाभागे दूतो रामस्य धीमत:।

रामनामांकित चेदं पश्य देव्यगुलीयकम्।।

वा. रा. 5-36-2

महाभागे! मैं परम् बुद्धिमान भगवान् श्रीराम का दूत वानर हूँ। देवि! यह श्रीराम नाम से अंकित मुद्रिका है, इसे लेकर देखिये। श्रीराम की मुद्रिका लेने के बाद सीताजी ने कौए (जयन्त) का प्रसंग सुनाकर श्रीराम के शौर्य का प्रसंग भी उन्हें बताया ताकि श्रीराम हनुमान जी का उनसे भेंट कर आने का पूरा-पूरा विश्वास हो जाये। तत्पश्चात्-

ततो वस्त्रगतं मुक्त्वा दिव्यं चूड़ामणिं शुभम्।

प्रदेयो राघवायेति सीता हनुमते ददौ।।

वा.रा. 5-38-66

सीताजी ने कपड़े में बंधी हुई सुन्दर दिव्य चूड़ामणि को खोलकर निकाला और इसे श्री रामचन्द्र को दे देना कहकर हनुमान जी के हाथ पर रख दिया। चूड़ामणि देने के पश्चात् सीताजी हनुमान जी से बोली- मेरे इस चिन्ह को भगवान श्रीरामचन्द्र जी भली भाँति पहचानते हैं।

मणिं दृष्ट्वा तु रामौ वै त्रयाणां संस्मरिष्यति।

वीरो जनन्या मम च राज्ञो दशरथस्य च।।

वा. रा. 5-39-2

इस मणि को देखकर वीर श्रीरामचन्द्रजी निश्चयपूर्वक ही तीन व्यक्तियों का- मेरी माता का मेरा तथा महाराज दशरथ का एक साथ स्मरण करेंगे।

श्रीरामचन्द्र को हनुमान जी ने चूड़ामणी दी तब श्रीराम उस मणी को अपनी छाती से लगाकर रोने लग गये। उनको रोता देखकर लक्ष्मणजी भी रो पड़े। आँसू भरे नेत्रों से श्रीराम ने सुग्रीव को इस चूड़ामणि को देखकर इस प्रकार कहा-

मणिरत्नमिदं दत्तं वैदेह्या: श्वशुरेण मे।

वधूकाले यथा बद्धमधिकं मूर्घ्रि शोभते।।

अयं हि जलसम्भूतो मणि: प्रवरपूजित:।

यज्ञे परमतुष्टेन दत्त: शक्रेण घीमतां।।

इमं दृष्ट्वा मणिश्रेष्ठं तथा तातस्य दर्शनम्।

अद्यास्म्यवगत: सौम्य वैदेहस्य तथा विभो:।।

वा. रा. 5-66-45-6

श्रीराम ने सुग्रीव से कहा- मेरे श्वसुर राजा जनक ने विवाह के समय वैदेही को यह मणिरत्न दिया था, जो उसके मस्तक पर आबद्ध होकर बड़ी शोभा पाता था। जल से प्रकट हुई यह मणि श्रेष्ठ देवताओं से पूजित है। किसी यज्ञ में बहुत सन्तुष्ट (प्रसन्न) हुए बुद्धिमान इन्द्र ने राजा जनक को यह मणि दी थी। सौम्य (सुग्रीव) इस मणिरत्न का दर्शन करके आज मुझे मानो अपने पूज्य पिता और विदेहराज जनकजी का भी दर्शन मिल गया हो, ऐसा अनुभव हो रहा है। यह मणि सीताजी के लिये दिव्य रूप से शोभित होती थी। आज इसे देखकर ऐसा जान पड़ा है मानो सीताजी ने मुझे मिल गई है।

श्रीरामचरितमानस में सीताजी का चूड़ामणि प्रसंग

मानस में चूड़ामणि प्रसंग अत्यन्त ही संक्षिप्त में वर्णित है तथा उसमें चूड़ामणि सीताजी को कब किसने दी? इस प्रसंग का उल्लेख नहीं है किन्तु अन्य श्रीरामकथाओं (रामायणों) में इस प्रसंग का वर्णन बड़े ही रहस्यमय ढंग से हैं। हनुमान जी द्वारा सीताजी को श्रीराम की अंगूठी देने के पश्चात् उन्होंने सीताजी को अभिज्ञान के रूप में देने का कहा यथा-

मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा। जैसे रघुनायक मोहि दीन्हा।।

चूड़ामनि उतारि तब दयऊ। हरष समेत पवनसुत लयऊ।।

श्रीराम.च. मा. सुन्दरकाण्ड 27-1

हनुमान जी ने कहा हे माता! मुझे कोई चिन्ह पहिचान-अभिज्ञान के रूप में दीजिये, जैसे श्रीराम ने मुझे आपको अँगूठी देने को दी थी। यह सुनकर सीताजी ने चूड़ामणि उतार कर उन्हें दी। हनुमान जी उसको हर्षपूर्वक लेकर श्रीराम के पास चले गये। सीताजी ने हनुमान जी को गुप्त रहस्य जयन्त के द्वारा किये गये चोंच द्वारा उन्हें आहत करने का भी बताया ताकि इन दो प्रसंगों के द्वारा श्रीराम को पूर्ण विश्वास हो जावें कि हनुमान जी सीताजी से ही मिलकर आये हैं।

नेपाली भानुभक्त रामायण में चूड़ामणि प्रसंग

सीताजी के चूड़ामणि प्रसंग को नेपाल तुलसी संतकवि भानुभक्त ने ही अपनी भाषा में इस प्रकार कहा-

यति सुनि अधिदेखिन केशपाशमा धन्याको।

मणि झिकि दिइहालिन् रामको मन् पन्याको।।

मणि दिइ फिरि भनछिन चित्रकूट्मा भयाको।

शरण परि नजर दी काग बाँची गयाको।।

नेपाली भानुभक्त रामायण - सुन्दरकाण्ड-76

हनुमान जी ने सीताजी को श्रीराम के दूत के रूप में अँगूठी दी तथा कहा कि अब यहाँ अधिक रुकने से कोई कार्य सिद्ध नहीं होगा। अत: शीघ्रातिशीघ्र मैं यहाँ से श्रीराम के पास पहुँचना चाहता हूँ। समय व्यर्थ ही व्यतीत न हो जाये। इतना सुनकर सीताजी ने पूर्व से ही केशपाश में धारण किये हुए मणि को निकाला, जो कि श्रीराम के मन को अधिक प्रिय थी, उसे उतार कर हनुमान जी को अभिज्ञान स्वरूप दे दी। चूड़ामणि देकर चित्रकूट में घटित एक घटना सुनाने लगी। यह घटना एक शरण में आये हुए कौए की उनकी (श्रीराम की) कृपा दृष्टि द्वारा बच जाने के प्रसंग अथवा विषय की थी।

गुजराती गिरधरकृत रामायण में सीताजी का चूड़ामणि प्रसंग

अन्य श्रीरामकथाओं के ही समान यह प्रसंग भी इस रामायण मे सुन्दरकाण्ड में वर्णित है। गिरधर रामायण में हनुमान जी द्वारा लंका दहन के पश्चात् अध्याय 11 में सीताजी से मिलकर लौटाने के समय, श्रीराम के लिये चिन्ह (अभिज्ञान) माँगने और आज कोई गुप्त बात कहने का कहा-

माटे मात मुंने कंई आपो एंधाणी, छानी वात कहो आज जी,

त्यारे वेणी तणो मणि छोड़ी आप्यो, आ तुं लेई जा कपिराज जी।

छानी वात कहेजे प्रभुने, रहेतां चित्रकूट मोझार जी।

लक्ष्मणजी वनमांहे गया ता, फल लेवा एक वार जी।

रघुपति ना खोलमां शिर मुकी, निद्रा करी में जाण जी,

त्यारे मारा ललाटे प्रभुए, केसर-आड करी निरवाण जी,

ए वात अंतरनी कहेजे वीरा, मारा घना करी परणाम जी,

वानर सैन्या लई रघुपति, क्यम आवशे आणे ठाम जी।

गिरधर रामायण सुन्दरकाण्ड-11-8-9-10-11

हनुमान जी के ऐसा कहने पर सीताजी ने वेणी में से मणि (चूड़ामणी) निकालकर उन्हें दी तथा कहा- हे कपिराज! तुम यह ले जाओ। इसके बाद प्रभु से यह गुप्त बात कहना, चित्रकूट में रहते हुए एक बार लक्ष्मणजी वन में फल लेने गये हुए थे। यह समझो कि उस समय मैं श्रीरघुपतिजी की गोद में सिर रखे लेटी थी। तब मेरे ललाट पर प्रभु ने निश्चय ही केसर का आड़ा तिलक अंकित किया था। हे भाई, यह अन्दर की (अर्थात गुप्त) बात मेरी तरफ से श्रीराम को प्रणाम करके कहना। यह भी बताओ कि श्रीरघुपतिजी वानर-सेना को लेकर इस स्थान पर कैसे आएँगे? इस रामायण में केसर का तिलक सीताजी के ललाट पर लगाने की कथा अन्य रामायणों में से भिन्न है।

तेलगु श्रीरंगनाथ रामायण में सीताजी का चूड़ामणि प्रसंग

तेलुगु भाषा में उपलब्ध रामायणों में श्रीरंगनाथ रामायण प्रथम तथा अत्यन्त ही लोकप्रिय रचना है। यह द्विपद शैली में लिखा गया प्रथम विशालकाय महाकाव्य है। इसमें अनेक ऐसे भी प्रसंगों का वर्णन है जो कि वाल्मीकि जी ने कहीं भी उनकी रचना की ही नहीं है। ये प्रसंग मूलकथा की घटनाओं को अधिक तर्कसगंत एवं मनोवैज्ञानिक भी सिद्ध करते हैं तथा काव्यसौन्दर्य में चार चाँद लगा देते हैं। अत: सीताजी के इस चूड़ामणि प्रसंग को सुधी पाठकों के लिये प्रस्तुत किया जा रहा है।

यह प्रसंग इस रामायण में सुन्दरकाण्ड में पद्यांश 600-630 में बड़े ही रोचक व सजीव रूप से वर्णित है-

हनुमान जी (अनिल नन्दन) ने देखा कि सीताजी (अवनीतनूजा) उन पर विश्वास नहीं कर रही है तब उन्होंने तरू से उतरकर सीताजी को प्रणाम किया। हाथ जोड़कर कहा हे कल्याणी! आप मुझ पर विश्वास करे, मैं आपके पति का प्रिय सेवक हूँ। राजा श्रीराम ने भी यह सोच-विचार कर कि तुम्हें विश्वास हो, यह अगूँठी देकर मुझे भेजा है। इतना सब कुछ सुनने के बाद भी सीताजी को पूरा विश्वास न हुआ। उन्हें यह राक्षस माया लगी। सीताजी ने श्रीराम की अँगूठी लेने के पश्चात् हनुमान जी से अनेक प्रश्न किये तथा उनसे सुग्रीव-श्रीराम मित्रता का वृत्तांत सुनने के पश्चात् ही अपना शिरोरत्न (चूड़ामणि) उन्हें देने का मन बनाया। हनुमान जी ने सीताजी के कहने पर अपना विशाल रूप भी दिखाया तथा सीताजी के आशीर्वाद उपरान्त पुन: यथा स्थिति हो गये। अंत में सीताजी ने सामने खड़े हुए हनुमान जी को प्रेम से निकट बुलाकर साड़ी की भीतरी छोर में बन्धी चूड़ामणि (शिरोरत्न) को शीघ्र ही खोलकर उन्हें बड़ी प्रीति से श्रीराम को अभिदान (पहिचान) के रूप में दे दिया। इस रामायण में इस प्रकार चूड़ामणि केशपाश से उतारने के स्थान पर साड़ी के भीतरी छोर से हनुमान जी को देना वर्णित है।

तमिल कम्ब रामायण रचियता महर्षि कम्बन में सीताजी का चूड़ामणि प्रसंग

महर्षि कम्बन ने महर्षि वाल्मीकि की रामायण के कथा-प्रबन्ध और चरित्र प्रवाह को वैसे ही स्वीकार कर वर्णित किया है, किन्तु यत्र-तत्र काल देश और सभ्यता-संस्कृति के अनुसार परिवर्तन भी किया है। उदाहरण स्वरूप बाली की मोक्ष प्राप्ति के उपरान्त तारा को सुग्रीव की पत्नी न बनाकर महर्षि ने उसको विधवा ही रहने दिया। इसी तरह सीताजी के चूड़ामणि प्रसंग में भी अन्य रामायणों से कुछ अंशों में यहाँ परिवर्तन परिलक्षित होता है। सुन्दरकाण्ड के पद्यांश 552 में हनुमान्जी ने सीताजी को बताया कि श्रीराम ने उन्हें एक दिव्य मुँदरी दी और कहा कि इसमें उनका सत्यनाम अंकित है। यह मुँदरी दुर्लभ कारीगरी से युक्त है। इसे तुम सीताजी को दे देना। सीताजी ने उस मणि-मुँदरी को हाथ में ले लिया। उनका मन शांत शीतल हुआ। सीताजी ने हनुमान जी से कहा कि तुम उनके दूत बनकर आये और सामर्थ्य से मुझे प्राणवान बनाया। ऐसे तुम्हें प्रत्युपकार में क्या दे सकूँगी।

इतना कहने के पश्चात् सीताजी ने हनुमान जी को अभिज्ञान के रूप में उन्हें बताया कि - पूर्व में एक दिन जब वह गगनचुंबी चित्रकूट पर्वत पर श्रीराम के साथ रह रही थी तब एक कौआ आया और अपने तीक्ष्ण नाखून रूपी तलवार से उनके (सीताजी के) वक्ष: स्थल को नोचने लगा। उसे देखकर श्रीराम ने गुस्से में भरकर पास ही पत्थरों के बीच उगी रही एक दर्भ (घास) को ब्रह्मास्त्र के रूप में अभिमंत्रित किया और उस भयंकर अस्त्र को उस पर छोड़ा। हे हनुमान्! तुम यह प्रसंग श्रीराम से अवश्य धीरे से कहना।

यहाँ अन्य रामायणों से भिन्न एक प्रसंग सीताजी ने हनुमान जी को सुनाया। ऐसा ही प्रसंग रामकथा $कामिल बुल्के के ग्रंन्थ में सुन्दरकाण्ड में पृष्ठ 412 में प्राप्त होता है यथा सीताजी ने हनुमान जी को बताया कि वे एक कोमल शुक को अपने ही प्राणों के समान पाल रही थी सीताजी ने श्रीराम से पूछा कि राजा! इसको किसका नाम दूँ? तब श्रीराम ने कहा- अकलंक मेरी माता केकयतनया का नाम रख लो। उन पर अपना अतिशय मातृप्रेम प्रकट करते हुए उन्होंने जो कहा था, वह सत्यवचन, सत्यनिष्ठ हनुमान्! उनसे कहना। इतना सब कुछ कहने के बाद सीताजी ने सोचा कि अब आगे कहने के लिये शेष कुछ नहीं है। तब उन्होंने अपने वस्त्र में बँधा ज्योति पुंजों में शीर्षस्थ सूर्य के समान सुशोभित चूड़ामणि अपने कर कमल में लिया। हनुमान जी भी इसे देखकर आश्चर्यचकित रह गये। मानो सातों लोको का अंधकार अन्तर्धान हो गया।

सीताजी ने हनुमान जी को अन्त में कहा वह अन्य रामकथाओं से अधिक मार्मिक एवं हृदयस्पर्शी है। सत्य यशस्विनी सीताजी ने कहा खोजते-खोजते आकर तुमने मुझे प्राणदान जीवनदान दिया है। हे उत्तम! यह चूड़ामणि मेरी आँख की पुतली के समान है। बहुत दिनों से वस्त्र में बाँधे रखा था। यह सर्वश्रेष्ठ अभिज्ञान (चिन्ह) है लो इसे यह कहकर देवी ने उसे हनुमान जी को दे दिया। हनुमान जी ने नमस्कार करके चूड़ामणि को ले लिया। उन्हें रूलाई आ गई और वे कई बार रोये भी। फिर हनुमान जी ने सीताजी की तीन बार परिक्रमा की, उनसे आशीर्वाद लेकर चले गये।

सभी रामायणों में सीताजी के चूड़ामणि अभिज्ञान तथा अन्य गुप्त प्रसंगों के जानने के पश्चात् इनका सार यह है कि श्रीराम एवं सीताजी के मध्य पूर्व प्रसंग ही उनके जीवन की साँसे बनकर वियोग में उन्हें सान्त्वना - धैर्य प्रदान करती रही। सीताजी को श्रीराम की अँगूठी प्राप्त होने पर उन्हें ऐसा आभास हुआ कि श्रीराम उनके पास ही विराजमान है तथा सीताजी की चूड़ामणि श्रीराम की लीलाओं में उन्हें स्मरण कराती रही कि सीताजी उनके निकट हैं। वैसे आभूषणों का स्वयं का कोई मूल्य नहीं होता है।

भर्त्ता नाम परं नार्या: शोभनं भूषणादपि।

वा. रा. सुन्दरकाण्ड 16-26

वस्तुत: नारी के लिए उसका पति किसी भी आभूषणों से कहीं अधिक शोभा वाला होता है। किन्तु उक्त प्रसंग में चूड़ामणि नामक आभूषण तथा कुछ प्रसंग ने ही श्रीराम को वास्तविक सीता का परिचय दिया। श्रीराम को इस बात का पूर्ण विश्वास हो गया कि अशोक वाटिका में जो भद्र महिला बैठी है वह श्रीराम की अर्धांगिनी सीताजी ही हैं।

प्रेषक

डॉ. नरेन्द्रकुमार मेहता

'मानसश्री, मानस शिरोमणि, विद्यावाचस्पति एवं विद्यासागर

सीनि. एमआईजी-१०३, व्यास नगर,

ऋषिनगर विस्तार, उज्जैन (म.प्र.)

पिनकोड- ४५६ ०१०

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