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सम सामयिक व्यंग्य - कन्जूस ने खरीदी सायकिल • सिंघई सुभाष जैन

चुनावी मौसम है। एक लोकसभा प्रत्याशी ने कहा है कि सायकिल (चुनाव चिह्न) पर हाथी (एक और चुनाव चिह्न) सवार होने पर सायकिल पंचर हो जायेगी। यह पढ़कर मेरा पड़ोसी बहुत खुश हुआ। गली में सभी लोग उसे कन्जूस कहते हैं। मैं उसे मितव्ययी कहता हूँ। यह मेरी मजबूरी है। दूरी नहीं पड़ोसी जो है। वह अखबार पढ़कर सियागंज गया और बिना कैरियर की लेडिज सायकिल खरीद लाया। उसे बोधि ज्ञान हो गया कि अधिक वजन होने पर सायकिल में पंचर हो सकता है।

खोजबीन से पता चला कि बिना कैरियर की लेडिज सायकिल इसीलिये खरीदी है ताकि किसी भी को आगे या पीछे बिठाने का ऑफर ना देना पड़े। अगर ऑफर दिया तो सामने वाला बुरा मान जायेगा- -- हमें पीछे का ऑफर क्यों ?  हमें तो आगे आने दो ना। पर आगे भी चान्स नहीं है. ऑफर का आशय लोकसभा सीट से जोड़ा जा सकता है। इसी बात को ध्यान में रखते हुये कन्जूस ने बिना कैरियर की लेडिज़ सायकिल खरीदी है। आगे कैसे करे ( बिठाये ) ? लेडिज़ सायकिल है । डण्डा नहीं है।

कन्जूस पड़ौसी अपने पिताजी से एक कदम आगे है। वे किसी को भी अपने से आगे क्यों होने दे।

पीछे कैरियर ना लगवाने का एक कारण बुआ जी भी हैं। उसकी बुआ बहुत भारी है। एक ही हैं। उनकी बुआ जी का व्यक्तित्व प्रबल है। अतएवं कन्जूस ने बिना कैरियर की लेडिज़ सायकिल खरीदी। वे अभी फुर्सत में हैं । सेवानिवृत हैं ।अतः सायकिल बहुत चला सकते हैं। सवारी खूब कर सकते हैं। कन्जूस ने दो घण्टे में ही चिन्तन कर डाला कि सायकिल के बहुत फायदे हैं। अनाज़ पिसवाने जैसे मामूली मगर जरूरी काम के लिये भी कोई सज्जन सायकिल उधार नहीं मांग सकता -  'भैया कैरियर नहीं है।'

अब कोई मेहमान वापस जाते वक्त नहीं कहता -  'बस स्टॉप तक सामान छौड़ आयो।' कैरियर नहीं है ,रखने की जगह नहीं है पहले ही दिख जाता है।

पहले कभी मोहल्ले के किसी परिवार के उधमी बच्चे को शहर में उसके अन्य रिश्तेदार के घर छोड़ने जाना पड़ता था। अब किसी को बैठाना - छोड़ना सब खत्म। और खास बात तो यह है कि

मेले , ठेले, बाज़ार  , माल व भीड़ में सायकिल पहचानना आसान।

-           • सिंघई सुभाष जैन

              " स्वाश्रय. भवन "

             41 -बी , बखतावरराम नगर

डाकघर के पीछे,  तिलकनगर

इन्दौर  452 018

मध्यप्रदेश

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