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देशभक्ति काव्यगीतों का संकलन - रतन लाल जाट

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1.काव्यगीत-"वीर-धर्म”              पुरुष हूँ, पुरुषार्थ मेरा कर्म है। वो हिम्मत है, इस दुनिया को झकझोर दूँ मैं॥ मेरा उत्सव, प्राणों ...

1.काव्यगीत-"वीर-धर्म”
            
पुरुष हूँ, पुरुषार्थ मेरा कर्म है।
वो हिम्मत है, इस दुनिया को झकझोर दूँ मैं॥

मेरा उत्सव, प्राणों की वेदी पर।
त्याग ऊर बलिदान का हमसफर॥

मेरा उत्साह संगिनी की वाणी में।
जिसके लिए कुर्बान हूँ मैं॥

कर्मठ हूँ, अग्नि-पथ पर भी।
पीछे नहीं हटूँगा मैं कभी॥

तेरी रक्षा ही मेरा पुण्य-पर्व है।
निभाना है मुझको फर्ज साथ तेरे॥

मेरा धर्म अन्याय का विरोधी।
जिसको देख ना सकूँगा मैं कभी॥

मुझे संतोष मंजिल पर है नहीं।
कठिन-पथ पर ही परख मेरी॥

यही मेरा सच्चा आनन्द है।
तभी मेरा जीवन सफल है॥

मेरा क्रोध बादलों की गर्जना से भारी।
और आसमां में चमकती बिजली की भाँति॥

यही है वीर-धर्म की निशानी।
कोई निभाये, तो बन जाये बलिदानी॥
- रतन लाल जाट


2.काव्यगीत- आजादी का दिन

दिन आजादी का, कितना पावन है?
इस दिन की कीमत का, आज कौन मोल चुकाये?
झाँसी की रानी, हजारों थी उसके साथ।
फिरंगी से मर्दानी ने, ली टक्कर खास॥

कितने लाल थे हिन्दू को प्यारे?
जिनको भेंट मिले थे फाँसी और फन्दे।
कई हुए थे भगतसिंह, माँ के आँचल में।
जिन्होंने सबकुछ किया है त्याग रे॥
दिन आजादी का, कितना पावन है?

आज सरहद पे जमीं, बर्फ पिघलने लगी।
मानो रहकर मौन, वो जताती है शोक।
उन वीरों का, बलिदानों का।
शहादत हर उन नन्हें-मुन्नों की याद है।
जिनको दूर फेंका था, अपनी माँ की गोद से॥
उस दूधमुँह को,कई दिनों तक दूध नसीब ना हुआ रे।
दिन आजादी का, कितना पावन है?

जब माँ भी कारावास में थी इंकलाब के नाम पे।
बाहर बच्चे उनके लगाते थे नारे भूखे-प्यासे।
तब पिता को मिल चुकी थी शहादत।
अब उनके नाम ही लिखी थी इबादत॥
हर हिन्दुस्तानी की यही एक कहानी है।
दिन आजादी का, कितना पावन है?

फिरंगी की गोली ने जख्म कर दिया था।
चाकू-छुर्री से काट दिये थे, हाथ-पैर, सिर उनका॥
गिरायी थी बुन्दें अपने रक्त की उन्होंने।
सींच गई थी लहू से वतन की माटी ये॥
दिन आजादी का, कितना पावन है?
कुछ ना छिपाया, जी-जान से लुटाया।
पाने को आजादी, बजाया बिगुल क्रान्ति का॥
सबके दिनों में एक उमंग है,
आज आँखों से भी खून बरसे।
रणचण्डी-सी हुँकार भरे,
लगते हैं सब दिवाने॥
दिन आजादी का, कितना पावन है?

देश के वीरों को है नमन,
इस माटी को भी है सब समर्पण।
ना कोई मौत से बचाये,
सब अपना जोर आज लगाये।
वतन ने कितना कुछ दिया है?
थोड़ा तो आज हम भी लूटा दें॥
दिन आजादी का, कितना पावन है?
- रतन लाल जाट

3.काव्यगीत- “हिन्दुस्तान जीते”
                  
हिन्दुस्तान जीते, जीते सारा जहाँ।
नाम उसका लिखें, हम आसमाँ॥
रति-रति उसके लिए जुटाने को,
सारे हिन्दुस्तानी जान अपनी लुटा दो।
फिर भी उसके आगे,
अपने को बड़ा ना समझो॥
जगी है धरती,
चलो, आज दिखा दें,
हम हैं हिन्दुस्तानी।
ताकत अपनी लगा दें,
जीतने को बाजी॥
हिमालय ऊपर चढ़के,
तिरंगा फहरायें।
सूखे मरूस्थल में भी,
ऐसा बाग लगायें॥
पूरब से पश्चिम,
उतर से दक्षिण।
पहाड़ से पठार,
थार से मैदान॥
हर कहीं, हैं हिन्दुस्तानी॥
रगों-रगों में बहता है,
खून बलिदानों का।
हिन्दुस्तानी का जोश भर दें,
मुर्दे में भी जीवन नया॥
कलियुग का महाभारत,
हम जीत लेंगे॥
फौज हमारी सबसे हैं बड़ी।
अस्त्र-शस्त्र में भी,
हम आगे हैं हिन्दुस्तानी॥
यदि हम चलें, दुनिया सजाने।
तो आ जायें, संग अपने कई सारे॥
यहाँ-वहाँ हर कहीं, आसमाँ से धरती।
सब ठौर पे तेरी, धाक है हिन्दुस्तानी॥
यू एस ए अपना,
लन्दन भी है अपनी।
चले चाइना भी अपने साथ,
और दामन थामें हैं जापान॥
फिल्मों में भारत, खेलों में इण्डिया।
बॉलीवुड का जलवा, क्रिकेट का धमाका॥
हिन्दुस्तान जीते, जीते सारा जहाँ।
- रतन लाल जाट 

4.काव्यगीत-"मेरे देश, तमन्ना है मेरी”
                    
मेरे देश, तमन्ना है मेरी।
एकबार फिर वापस आऊँ,
मरने के बाद भी॥
इस धरती पर,
सच्चा वीर बन।

हिमालय की चोटी पर चढ़के,
मैं कश्मीर की घाटी में।
सर्दभरी हवाओं के बीच,
बर्फ की चट्टानों पे।
नित आधी रात को जगकर,
खड़ा-खड़ा देखूँ मैं,
अपना सारा हिन्दुस्तान
मेरे इस दिल की, हसरत है यही।
मेरे देश, तमन्ना है मेरी।।

जून की गर्मी में,
दोपहर के एक बजे।
मरूधरा के चारों तरफ,
पहरा दूँ नंगे पाँव मैं॥
यदि जरूरत पड़ जाये,
तो दक्खन के सागर की,
  लहरों को तैरकर,
भारत माँ के चरणों का,
दर्द भरा काँटा,
बाहर निकालके फेंक दूँ।
तब तक मुझको रूकना है नहीं।
मेरे देश, तमन्ना है मेरी।।

बिन माथे हाथों में, तलवार उठाके,
लड़ता रहूँ  मैं दुश्मन से।
जब तक नहीं, जान निकल जाये॥
मैं खून अपना, बहाता रहूँ,
इस अनमोल धरा पे।
बार-बार मिले जन्म यहीं।
मेरे देश, तमन्ना है मेरी।।
- रतन लाल जाट

5. काव्यगीत- “वतन पे जान लगा”
                   
जा के तू, वतन पे जान लगा।
चल सामने, दुश्मन के छक्के छुड़ा॥
सीमा पे मचलती है देश की शान।
कर दे, कर दे, तू अपना नाम॥
माँगे कुर्बानी,आज माँ यह भारती।
कीमत इसकी चुकानी, देंगे हम कुर्बानी॥
आया है लुटने को दुश्मन यहाँ,
ना है डर, लड़के तू उसको भगा।
दुश्मन से जा, आज टकरा॥
जा के तू, वतन पे जान लगा।
चल सामने, दुश्मन के छक्के छुड़ा॥

रगों में बस रवानी है,
सीने में खून जवानी है॥
दिल अपना है हिन्दुस्तानी,
सिर काटकर देते हैं कुर्बानी॥
माँगे कुर्बानी, आज माँ यह भारती।
कीमत इसकी चुकानी, देंगे हम कुर्बानी॥
हौसला बढ़ाने को, हिमालय से आयी।
हवा चली है, रंग गुलाल वो उड़ाती॥
रेत संग आँधी-तूफां।
झरने दिखाते हैं जादू, खून-सा॥
मैदानों में लहराती, पँखुड़ियाँ फसलों की।
जैसे भाला या हो कटारी॥
माँगे कुर्बानी, आज माँ यह भारती।
कीमत इसकी चुकानी, देंगे हम कुर्बानी॥

मैया गीत सुनाती है,
आजादी हमको ना गँवानी है।
होगी जीत हमारी,
हम भी तेरे साथी हैं॥
गूँजे गगन, अपनी हुंकारों से।
काल चले, अपने पीछे-पीछे॥
हिम्मत नहीं दुश्मन में,
जो करे हमसे मुकाबला।
जा के तू, वतन पे जान लगा।
चल सामने, दुश्मन के छक्के छुड़ा॥
सीमा पे मचलती है देश की शान।
कर दे, कर दे, तू अपना नाम॥
माँगे कुर्बानी,आज माँ यह भारती।
कीमत इसकी चुकानी, देंगे हम कुर्बानी॥
- रतन लाल जाट

6.काव्यगीत-"जब देश को घेरा है”
                    
जब देश को घेरा है,
दुश्मन ने आकर,
धावा बोला है॥
देश की सीमा पे,
खड़ा है पहरा।
आँचल लहराये,
भारत माँ अपना॥

अपने लाल को,
सुनाती है लोरियाँ वो॥
आज आँसू बहाती है,
दुश्मन के आघातों से, भारत माँ।
अरे! चैन कैसे? लहू हिन्दुस्तानी है,
और देश में है साया दुश्मन का॥
देश की सीमा पे,
खड़ा है पहरा।
आँचल लहराये,
भारत माँ अपना॥
जब देश को घेरा है,
दुश्मन ने आकर,
धावा बोला है॥

आँखों में है खून नहीं,
करों में कृपाण नहीं।
कौन कहेगा हिन्दुस्तानी?
सब धिक्कारेंगे तुमको,
क्यों नहीं हो हिन्दुस्तानी॥
कभी मचते थे घमासान यहाँ।
वीर धरते थे केसरिया-बाना॥
देश की सीमा पे,
खड़ा है पहरा।
आँचल लहराये,
भारत माँ अपना॥
जब देश को घेरा है,
दुश्मन ने आकर,
धावा बोला है॥

तलवारें चमकती,
बन्दूकें छुटती थी।
भाला देता था अकेला,
देश की सीमा पे पहरा।
देश की सीमा पे,
खड़ा है पहरा।
आँचल लहराये,
भारत माँ अपना॥
जब देश को घेरा है,
दुश्मन ने आकर,
धावा बोला है॥

रातों नींद ना आती,
आग से वो खेलते थे।
जमे हिम-नद के बीच फँसे,
वो वीर स्तुति करते थे॥
व्यर्थ न जायेगा, खून वीरों का।
एक वीर, सौ-सौ कायरों की जान लेगा॥
भारत माँ ने सबकुछ हमको लुटाया।
तो आज देते हमको, कभी जोर ना आयेगा॥
देश की सीमा पे,
खड़ा है पहरा।
आँचल लहराये,
भारत माँ अपना॥
जब देश को घेरा है,
दुश्मन ने आकर,
धावा बोला है॥

जब कभी होता था हंगामा भारी।
देवपूज्य नारी, रूप बदलती माँ भारती॥
देखा नहीं होगा, क्रोध वो हमारा।
आसमां को रूलाके, जो सागर को सूखा दे।
हम जलते अंगारों पे,
जादू दिखाते हैं ऐसे।
गोली अपने सीने से टकराके,
हो जाती चकनाचूर है॥
जब देश को घेरा है,
दुश्मन ने आकर,
धावा बोला है॥
देश की सीमा पे,
खड़ा है पहरा।
आँचल लहराये,
भारत माँ अपना॥
- रतन लाल जाट

7. काव्यगीत- "देश के प्रति”                  
             
जब देश के प्रति,
बलिदान करने का,
अवसर आया था।
तब मेरे देश की धरती ने,
फल-फूल सब अपने लुटाये थे।
अम्बर भी देख रहा था,
उस वक्त सब कुछ ये।
तब सोच-समझने के बाद,
आया था उसको याद।
देश के प्रति, कुछ करने का जज्बा।
और उसकी आँखों से,
होने लगी थी अमृत-वर्षा॥
जब देश के प्रति………………॥

उस पावन अवसर की बेला में,
मैंने देखा था, गली-गली में।
अपने देश के, नन्हें-मुन्ने को।
जो खून के लथपथ हाथों से,
बना रहा था खिलौने॥
तब मेरे देश की धरती ने,
फल-फूल सब अपने लुटाये थे।
जब देश के प्रति………………॥

तब पास जाकर मैंने पूछा।
तो उसने बतलाया था-
“पापा गये हैं लड़ने,
माँ बैठी जेल में।”
और फूल-से चेहरे पर,
हीरे-सी चमकती आँखों में,
आँसू भरकर वो बोला,
“मैं अपने देश की मिट्टी से,
बनाऊँगा चरखा और बन्दूकें।
फिर वो ले जाकर दूँगा,
मम्मी-पापा को।
तब पापा मेरे,
मार गिरायेंगे दुश्मन को॥
और मेरी माँ, कात-बुनकर कपड़ा
पहनायेगी मुझको॥”
बात सुनकर उस नन्हें की,
चल गया मैं भी।
सीमा पर दुश्मन से लड़ने को।
काटकर लटका दी थी अम्बर में,
कई दुश्मनों की गर्दनें।
और नदी बहा दी थी हमने,
उनके खून से॥
तब मेरे देश की धरती ने,
फल-फूल सब अपने लुटाये थे।
जब देश के प्रति………………॥

तब हँसकर मुसकायी थी,
माटी मेरे देश की।
प्यारी-सी दुल्हन बनके,
नाच रही थी घर-आँगन में।
तब मेरे देश की धरती ने,
फल-फूल सब अपने लुटाये थे।
जब देश के प्रति………………॥
- रतन लाल जाट

8  काव्यगीत- “खुली हवा है”
         
खुली हवा है, खुला आसमाँ।
आजाद वतन है, आजाद हर इन्साँ॥

यह सुबह खिली,
खुशियाँ बिखरी।
ऐसी नहीं कोई गली,
जहाँ ये ना गयी॥
देखो, आज अपने वतन की शान।
सारे जहाँ में, इसकी है अलग पहचान॥
ऐसा देश है, भारतवर्ष हमारा।
खुली हवा है, खुला आसमां॥

झुमती कलियाँ,
लहराती बगियाँ।
नाचती नदियाँ,
गुनगुनाता झरना॥
ऊँचे पर्वत, समतल मैदान।
कोई शहर या छोटा-सा गाँव॥
सब मगन है, अपने वतन में।
वो तन से और मन लगाके॥
कमर कसके खड़े हैं,
देने को कुर्बानियाँ।
खुली हवा है, खुला आसमाँ।
आजाद वतन है, आजाद हर इन्साँ॥
- रतन लाल जाट

9. काव्यगीत- “हमको प्यार हैं शहीदों से”
             
हमको प्यार हैं शहीदों से,
जिनको प्यारा था वतन ये।
इस वतन के वास्ते,
चली थी तलवारें-बन्दूकें॥

आज हम पूजा करें,
इन ढ़ाल-कटारों की।
जिनके बल पे हमने,
आजादी ये पायी है॥
हमको प्यार हैं शहीदों से………॥

इस वतन के दिवानों को,
जान से प्यारा ये वतन था।
उन्होंने सीना तानके,
खायी थी गोलियाँ॥
ऐसी गजब उनकी कहानियाँ है।
हमको प्यार हैं शहीदों से………॥

निडर होके वो, चढ़ गये थे फाँसी॥
अमर नाम लिखाके, मर गये बलिदानी॥
आओ, आज उनसे हम भी सीखें।
हमको प्यार हैं शहीदों से………॥

आज ये पावन पर्व आया,
शहीदों को तुम सलाम करना।
यदि जरूरत पड़े, तो अपना
जीवन भी कुर्बान कर देना॥
यही हमारा उनके प्रति नमन है।
हमको प्यार हैं शहीदों से…………॥
- रतन लाल जाट

10. काव्यगीत- “मेरे देश की वो जमीं है"
                
मेरे देश की, वो जमीं है।
जहाँ खून की, नदी बही है॥
इस मुल्क पे इतनी, मुश्किलें आयी कि-
इन्सानियत यहाँ, कुचल दी गयी थी॥

कितने आये? दूर-देशों से।
हिन्दुस्तान लुटा, आपस में फूट डलवाके॥
लड़वाया था, भाई को भाई से।
नाम हिन्दुस्तान को जोड़ा, हिन्दू से॥
ऐसी चाल चली थी उन्होंने।
हिन्दू-मुस्लिम को कर दिया,
अलग एक-दूजे से॥
मेरे देश की वो जमीं है………………॥

सोना पाकर भी वो ना थके।
मानवता में जहर घोल गये॥
अब समझ लो,
इन चेहरों को।
आज भी हमारे बीच,
खड़े हैं जो॥
यही मुझको कहना है।
मेरे देश की वो जमीं है………………॥

ना लन्दन का होगा, ना ही वो पाकिस्तानी।
हम में से ही उठेगा, बनकर वो एक विदेशी॥
जिसकी रगों में खून होगा हिन्दुस्तानी।
फिर भी लूटमार करेगा वो हमारा अपनी ही॥
कभी सच ना हो जाये बात ये।
मेरे देश की वो जमीं है………………॥

हम सोच ना सकेंगे,
यह हो रहा है क्या?
मेरा वतन, ऐसा रंगीन-
सियार कैसे बन गया?
अब तक ना किसी ने जाना है।
मेरे देश की वो जमीं है………………॥

पैसा जिनको प्यारा है,
वतन से उनको नफरत जगे।
उस पैसे के पीछे, सब अपने पराये हैं,
जो घर-बार छोड़ के, इस वतन को लुटते हैं॥
मेरे देश की वो जमीं है………………॥

खाया-पीया और ऐश कर गये।
दूसरे मुल्क का बन धोखेबाज निकले॥
आज समझ लो, हवा में जहर कितना?
पानी में बदबू क्यों, आग के गोलों से सूरज झूलसता॥
ऐसी थिति है हमारी, फिर उनको कहाँ मिलेगी?
जो राख करके इस माटी की, सो गये हैं नींद चैन की॥
अपने वतन के खातिर दिल में जोश जगा लें।
मेरे देश की वो जमीं है………………॥
- रतन लाल जाट

11.काव्यगीत- “मैं हूँ उस देश का वीर”
              
मैं हूँ उस देश का वीर।
जहाँ हुए थे कई शहीद॥
उन शहीदों का बलिदान।
कर गया है हमको आजाद॥
इस आजादी का मोल हम।
चुका सकेंगे ना जन्म-जन्म॥

अगले जन्म भी मैं,
बनूँगा फिर हिन्दुस्तानी।
अपने वतन के खातिर,
लगा दूँगा जान की बाजी॥
यही एक मेरे दिल की है पीर।
मैं हूँ उस देश का वीर॥

यह वतन जान से प्यारा,
जिसकी मिट्टी है मेरी माता।
माँ! तेरा लाल है सच्चा,
जो कभी दूध नहीं लजायेगा.॥
दुश्मन से हमेशा लेंगे जीत।
मैं हूँ उस देश का वीर॥

दुश्मन को तेरी सरहद में,
घुसने दूँगा ना कभी मैं।
दिन-रात लगाऊँगा पहरा,
मरके भी इस वतन के॥
आज कसम खाओ मेरे मीत।
मैं हूँ उस देश का वीर॥
- रतन लाल जाट


12. काव्यगीत-“देखो, आज इन नन्हें-मुन्नों को”
                         
देखो, आज इन नन्हें-मुन्नों को।
कितनी शान से कदम?
बढ़ाये जा रहे हैं वो॥
वतन की राह पे, बलिदान अपना करने को।
देखो, आज इन नन्हें-मुन्नों को॥

हाँ, देखो। चेहरा उनका निडर है।
रंग साहस का वो भरके॥
अपने नन्हें-हाथों में,
बन्दूक उठाके चले जा रहे हैं वो॥
देखो, आज इन नन्हें-मुन्नों को………॥

एक वेश हैं उनका,
रंग आजादी का भरा।
जिनकी कोई कौम है नहीं,
नाम वो एक हिन्दुस्तानी का॥
ये बच्चे कल का है सपना।
किसी एक का नहीं, सारे भारत का॥
सोचो, आज इनका जोश वो।
देखो, आज इन नन्हें-मुन्नों को………॥

फूलों से ज्यादा कोमल हैं,
सौ पराग जितनी खुशबू उनमें।
हरवक्त मुस्कान चेहरे पे,
गम कभी ना दिखता है॥
हर वक्त हँसना आता है उनको।
देखो, आज इन नन्हें-मुन्नों को………॥

अपना यह तिरंगा लेके,
भारत माँ की गोदी में।
नाचते हुए गा रहे गीत आजादी के,
जोश सभी का बढ़ाये जा रहे हैं वो॥
देखो, आज इन नन्हें-मुन्नों को………॥

देखकर इन नन्हों को
हर हिन्दुस्तानी का दिल
भर गये हैं जोश से वो।
जिसको वतन के खातिर कुछ है करना,
तो इनसे आकर मिले वो॥
किस तरह से? प्राणों की कुर्बानी देना है हमको।
देखो, आज इन नन्हें-मुन्नों को………॥
- रतन लाल जाट

13. काव्यगीत- “हम हिन्दुस्तानी”
              
हम हिन्दुस्तानी-२, दुनिया का ताज हैं।
नाम हमारा सुनके, दिलों में सबके खुशियाँ छा जाये॥
सबसे ऊपर अपना हिन्दुस्तान है।
मान जिसका सदियों से सारे संसार में॥

अपने रस्ते पे चलते हैं,
हिन्दुस्तानी तन-मन लगाके।
चलते रस्ते वो कभी,
किसी से नहीं झगड़ते हैं॥

उल्टे वो गिरते को संभालके,
चोट पर उनके मरहम करते हैं।
हम हिन्दुस्तानी-२, दुनिया का ताज हैं।
नाम हमारा सुनके, दिलों में सबके खुशियाँ छा जाये॥

कभी खुदा के नाम पर,
ना लड़ते हैं हिन्दुस्तानी।
मानव को देवता मानकर,
करते हैं उसकी पूजा-आरती॥

ऐसा प्यारा देश है मेरा,
नाम उसका हिन्दुस्तान है।
हम हिन्दुस्तानी-२, दुनिया का ताज हैं।
नाम हमारा सुनके, दिलों में सबके खुशियाँ छा जाये॥

नीले-नीले गगन के,
चम-चम करते सितारों में।
चाँद के संग सज-धजके,
नाम वो मुझको हिन्दुस्तान नजर आये॥
यह देश हिन्दुस्तान, जिसकी कई हैं शान।-२
पहला नाम हिमालय, जो सबसे ऊपर है।
अगला नाम आता, गीत गाती नदियों का है।
जो दिन-रात बहती, कल-कल करती गंगा-यमुना है॥
हम हिन्दुस्तानी-२, दुनिया का ताज हैं।
नाम हमारा सुनके, दिलों में सबके खुशियाँ छा जाये॥

सपने में भी बुरे की चाहत नहीं।
मरते वक्त भी दिल से प्यार कम नहीं॥
दुश्मन को जिन्दा हम कभी छोड़ते नहीं।
चाहे क्यों ना हमको चढ़ना पड़ जाये फाँसी॥
उसके परिजनों के खातिर भले ही बाद में।
हम अपना सारा जीवन लगा देते हैं॥
हम हिन्दुस्तानी-२, दुनिया का ताज हैं।
नाम हमारा सुनके, दिलों में सबके खुशियाँ छा जाये॥

हमको बुरे से कोई नफरत नहीं।
लेकिन हम कभी बुरे बनते नहीं॥
दुर्जन के संग रहकर भी,
बदल देते हैं उसकी ही जिन्दगी॥
पाप से खुद बचते हैं।
पापी अपने आप मर जायेगा॥
बस, यही मानकर बैठे हैं,
क्योंकि नाम हिन्दुस्तानी हमारा॥
सभी धर्मों का सार हमको,
कान पकड़के स्वीकर है।
यदि जग-हित में प्राण जायें,
तो हमको ना कोई गुमान है॥
हम हिन्दुस्तानी-२, दुनिया का ताज हैं।
नाम हमारा सुनके, दिलों में सबके खुशियाँ छा जाये॥

अपना लघु जीवन मानकर,
कभी स्वार्थ-सिद्ध हम करते नहीं।
हमने तो जीवन अमर जानकर,
बस, लक्ष्य साधा है परमार्थ में ही॥
पल-पल हमको उस रब का डर है
हम हिन्दुस्तानी-२, दुनिया का ताज हैं।
नाम हमारा सुनके, सबके दिलों में खुशियाँ छा जाये॥
- रतन लाल जाट

14. काव्यगीत- “जब हिन्दुस्तान में”
                   
जब हिन्दुस्तान में, पहला संग्राम मचा था।
तब हर वीर था निडर, क्योंकि उसको यही एक विश्वास था॥
कि- भारत माँ के वीर कभी मरते हैं नहीं।
मरकर भी वो हो जाते हैं अमर सभी॥
और नाम उनका लिखा जाता है।
हमेशा अम्बर के चाँद-सितारों में॥

अपने वीरों ने उस दिन ठानी थी कुर्बानी।
तन-मन से जी-जान अपनी लगा दी थी॥
माँ के आँचल को बेदाग रखा।
दुश्मन के हाथ इसको जाने से रोका॥
जब हिन्दुस्तान में, पहला संग्राम मचा था।
तब हर वीर था निडर, क्योंकि उसको यही एक विश्वास था॥

अपने हमवतन भाई सीना तानके,
नम आँखों से एकदिन हमको याद करेंगे॥
आजादी का ताना बुनकर,
अपनी लाशें दी बिछा।
जान अपनी गँवाकर,
हमवतन की जान ली बचा॥
जब हिन्दुस्तान में, पहला संग्राम मचा था।
तब हर वीर था निडर, क्योंकि उसको यही एक विश्वास था॥

उस वक्त जिसने भी देखा था,
होते हुए यह संग्राम।
तो फिरंगी से लड़ने को,
हिन्दू के साथ आ मिले मुसलमान॥
सिक्ख अपना सिर था।
दिल अपना मराठा॥
राजपूतों की आन-बान
और हर नन्हें की शान॥

जो अपनी माता का हाथ पकड़के,
आये गये थे मैदान में युद्ध करने।
तब संग्राम हुआ, फिरंगियों को मारा।
बस, लड़ते ही रहे, जब तक मर गये ना॥
जब हिन्दुस्तान में, पहला संग्राम मचा था।
तब हर वीर था निडर, क्योंकि उसको यही एक विश्वास था॥

हार-जीत से मोह उनको नहीं था।
वीरों का लड़ते रहना एक यही धर्म था॥
मरते दम तक वो रूके नहीं।
भारत माँ से कभी दूर गये नहीं॥
जगमगाते हैं वो आसमां में बनकर सितारा।
जब हिन्दुस्तान में, पहला संग्राम मचा था।
तब हर वीर था निडर, क्योंकि उसको यह एक विश्वास था॥
- रतन लाल जाट

15.काव्यगीत- “मेरा भारत देश”
           
जन-जन का प्यारा है,
मेरा भारत देश।
तन-मन-धन सब हम,
करते हैं तुझको पेश॥

नीले-नीले गगन में,
सूरज ने अपनी किरणें
लाल-लाल फैलाई है।
केसर-चन्दन की
सुगन्ध छायी है॥
जन-जन का प्यारा है,
मेरा भारत देश……………

धरती माँ का लाल है तू,
तिरंगा तेरी पहचान है।
सबका सिरमौर है भारत,
विश्व-वन्दनीय पूज्य गुरू है॥
जन-जन का प्यारा है,
मेरा भारत देश……………

इस देश के वीर शहीद,
जिनका नाम अमर है।
आसमाँ में छाये बादल,
उनको नमन करते हैं॥
जन-जन का प्यारा है,
मेरा भारत देश…………………


मेघों से होती है बरसात।
जो आँसू चढ़ाकर करते हैं याद॥
चमकती ये बिजली।
मानो तलवार है उनकी॥
बादलों का गर्जन,
देश की वेदी पर
शंखनाद करता है।
जन-जन का प्यारा है,
मेरा भारत देश……………….

दूर हिमालय से आती है,
ठण्डी-ठण्डी हवा ये।
लहराता यह तिरंगा,
जो भारत माँ का आँचल है॥
जन-जन का प्यारा है,
मेरा भारत देश……………….
तेरे चरणों को सदा,
सात समन्दर धोते हैं।
नीले-नीले गगन में,
सूरज ने अपनी किरणें
लाल-लाल फैलाई है,
केसर-चन्दन की
सुगन्ध छायी है॥
जन-जन का प्यारा है
मेरा भारत देश………………
- रतन लाल जाट

16.काव्यगीत-“देखो, मेरे देशवासियों!”
             
देखो, मेरे देशवासियों!
समझो, विदेशी चाल को।
अपनी ये जमीं कहीं
ऊसर ना हो जाये।
कहीं अपना ये अम्बर भी
फट ना जाये॥

देखो, मेरे देशवासियों!
समझो, विदेशी चाल को।
इस महकती हवा को
गन्दी ना होने देना।
इस मीठे पानी को
मैला ना होने देना॥

देखो, मेरे देशवासियों!
समझो, विदेशी चाल को।
ए मेरे हमवतन भाईयों!
आपस में मिल-जुलकर रहो॥

देखो, मेरे देशवासियों!
समझो, विदेशी चाल को।
तुम अपनी विरासत ना भूल जाना।
फिर कभी दूसरों की नकल ना करना॥

देखो, मेरे देशवासियों!
समझो, विदेशी चाल को।
अपना धर्म अपना कर्म निभाना।
स्वार्थ छोड़ परमार्थ अपनाना॥


देखो, मेरे देशवासियों!
समझो, विदेशी चाल को।
अपने शहीदों की तुम
भूल ना जाओ कुर्बानी।
हमारे महापुरूषों की
याद रखना वो बातें सभी॥

देखो, मेरे देशवासियों!
समझो, विदेशी चाल को।
करें वो काम,
जो अपनी आत्मा को भाये।
मर जायें जब
अपना वतन हमको बुलाये॥
- रतन लाल जाट

17.काव्यगीत- “लड़ेंगे-मरेंगे हम”
        
लड़ेंगे-मरेंगे हम,
अपनी धरती, अपना मुल्क।
कभी ना छोड़ेंगे हम,
इसके वास्ते हैं सब अर्पण॥

शहादत हमारी चारों तरफ फैली।
रक्षा धरती माँ की करना है जिम्मेदारी॥
अब ना हम कभी डरेंगे,
आज ही दुश्मन से टकरायेंगे।

आपस में मिलजुलकर,
धरती-आसमां तक करेंगे बगावत।
लड़ेंगे-मरेंगे हम,
अपनी धरती, अपना मुल्क।

आओ, मिल जाओ और लड़ो।
बस, क्रान्ति का नाम बोलो॥
दुश्मन को मार भगाओ।
आज नया इतिहास लिखो॥

धरती माँ के वास्ते
खून बहाकर कर्ज अपना चुकाओ।
भारत माँ, तेरी रक्षा।
करता रहूँगा, जब तक हूँ जिन्दा॥
जय भारत, जय भारत, जय भारत
लड़ेंगे-मरेंगे हम,
अपनी धरती, अपना मुल्क।
हाथ से हाथ मिला।
कंधे से कंधा मिला॥
आपस में भेदभाव भूल जा।
हम सबको मिलकर कुछ है करना॥
इसके वास्ते मर जायेंगे हम।
यही पाठ सबको पढ़ायेंगे अब॥
लड़ेंगे-मरेंगे हम,
अपनी धरती, अपना मूल्क।
कभी ना छोड़ेंगे हम,
इसके वास्ते सब अर्पण॥
- रतन लाल जाट

18. काव्यगीत- “चाहे मौत हो सामने”
        
चाहे मौत हो सामने,
हम ना किसी से डरेंगे।
निकल गये हैं जिस रस्ते पे,
अब ना किसी से रूकेंगे॥

डर है ना किसी का,
डरने वाला तो मर गया।
जीता है वही सिकन्दर,
वरना सारे हैं बन्दर॥
जीत हमारी है पक्की,
जब तक सत्य का साथ है।
उस दिन मुश्किल हो जाये जिन्दगी,
जब अपने मन में पाप भर जाये॥
चाहे मौत हो सामने…………………॥

काम हमारा सच्चा हो,
वादा अपना पक्का हो।
तन को छोड़ दिल का रिश्ता ये,
हरमोड़ पर एक-दूजे का  साथ है॥
चाहे मौत हो सामने…………………॥

नाम होगा अपना, याद करेगी दुनिया।
हम सब मर जायेंगे, फिर भी पीछे से पुकारेंगे॥
दिल से सच्चा प्यार करेंगे , तो बदल जायेगा संसार ये।
चाहे मौत हो सामने………………………॥
- रतन लाल जाट



19.काव्यगीत- “मैं वो लड़की हूँ।”
        
ए वतन के दिवानों,
मैं वो लड़की हूँ।
जो जाऊँगी सीमा पर,
अकेली लड़ने यूँ॥
एक-दूजे से तुम पूछोगे,
मेरा नाम क्या है?
कहती हूँ मैं बात सुनो,
भारत माँ की एक बेटी हूँ॥

मैं कलियों-सी हूँ, परियों की एक रानी।
हिन्दुस्तानी लड़की, जिसकी है अलग निशानी॥
हजारों उसके नाम जो,
आज मैं सुनाऊँ।
ए वतन के दिवानों,
मैं वो लड़की हूँ।

आज सुनाती हूँ एक कहानी,
पन्ना, तारा, जीजा, दुर्गा।
और हैं मीरा, हाड़ी, लक्ष्मी,
साथ इनके इन्दिरा-कल्पना॥
खुद अवतार थी वो,
इसके सिवाय क्या कहूँ?
ए वतन के दिवानों,
मैं वो लड़की हूँ।

पन्ना का बलिदान, तारा की मर्दांगी।
जीजा का लाल और दुर्गा की रखवाली॥
कन्हैया की प्यारी, वो मीरा थी,
राणा चूण्डा की हूँकार, हाड़ी रानी थी।
झाँसी की रानी, एक जलती आग थी॥
बेटी नेहरूजी की इन्दिरा वो,
कल्पना को अन्तरिक्ष परी का नाम दूँ।
ए वतन के दिवानों,
मैं वो लड़की हूँ।

गोली मैं चलाऊँगी,
तलवार अपनी उठाऊँगी।
भारत माँ की गोदी में,
हँसते-हँसते सो जाऊँगी॥
नाम करूँगी ऐसा जो,
अमरता को प्राप्त होऊँ।
ए वतन के दिवानों,
मैं वो लड़की हूँ।

माँ दुर्गा-काली-भगवती,
याद हैं सीता-सावित्री-पार्वती।
ज्ञान की देवी सरस्वती,
धन की शक्ति है लक्ष्मी॥

आज ध्यान करो इनका।
मस्तक नमन करो अपना॥
नारी को कम नहीं समझो,
करो पूजा उसकी और क्या कहूँ?
ए वतन के दिवानों,
मैं वो लड़की हूँ।
- रतन लाल जाट



20. काव्यगीत- “क्या हो गया है तुमको?”
          
क्या हो गया है तुमको?
मेरे देश-निवासियों!
हिन्द देश के तुम वासी हो।
छोड़ो आज ये निद्रा अब तो जागो॥
दिन वो याद करो।
जब लिखी थी अमर-कहानी वो॥
सदियों का इतिहास बताये,
भारत सबसे महान है।
फिर कौन कहता है?
अमेरिका शक्तिशाली है॥

जन्म उसका हुआ अभी।
चन्द दिनों की है कहानी॥
आज ये पाकिस्तान,
बनकर आया आतंकी।
ना मालूम इसको,
कल तक था हमझोली वो॥
क्या हो गया है तुमको?
मेरे देश-निवासियों!

अब ना बचा है नामों-निशां वो।
अपने थे बन गये हैं पराये जो॥
आज चलकर आयी है, वो युद्ध की बेला।
हाथ में तू उठा तलवार, सामने दुश्मन खड़ा॥

रणवीरों के इस देश में,
कल के जन्म लेने वाले।
कई मूल्क कतार बनकर खड़े हैं वो॥
क्या हो गया है तुमको?
मेरे देश-निवासियों!
वो चालें अपनी चल रहे।
बम फोड़के खुद झुलस रहे॥
कायर! बाहर कुछ अलग कहते।
लेकिन अन्दर कुछ और छल है॥

अब घड़ी है, ईंट का जवाब पत्थर से दें।
आँख उठाये, तो सिर उसका काटके गिरा दें॥
वो छिपकर बम रखे, तो खुलेआम कत्ल कर दो।
यदि हिंसा को उत्तम समझे, तो ताण्डव मचा दो॥
क्या हो गया है तुमको?
मेरे देश-निवासियों!

हम एक सिंह के समान हैं।
जिसकी गर्जना से जग गूँजे॥
लथपथ खून से खेली थी, हमने खूब होलियाँ।
आज रंग देख गुलाल का, हम डर जायेंगे क्या?
धरती को अपनी माता,
समझकर करते हैं पूजा।
फिर भी हम माँ का आँचल वो,
दासता के बंधन में मैला होने दें क्यों?
क्या हो गया है तुमको?
मेरे देश-निवासियों!

अंतिम श्वाँस तक हम रक्षा करेंगे।
क्योंकि हम भारत माँ के लाल हैं॥
हिन्दुस्तानीहै जिसकी पहचान।
दुश्मन का वो करे कत्लेआम॥
जब भी आयेगी इस वतन पर संकट की बेला।
उस वक्त हाथ से हाथ मिलाकरलड़ेंगे हम योद्धा॥
युगों से करते आये हैं, संग्राम हम कई सारे।
सिर पर कफन बाँधकर,
केसरिया-बाना धारण करते हैं वो॥
क्या हो गया है तुमको?
मेरे देश-निवासियों!
कमर में कसी तलवार है।
हाथ में चमकता भाला है॥
फिर चेतक हो जायें सवार।
तो सुनो, रण-भेरी की तान॥
खून अपना खौल उठा तो
दुश्मन का छक्का छुटा वो।
क्या हो गया है तुमको?
मेरे देश-निवासियों!
हिन्द देश के तुम वासी हो।
छोड़ो आज ये निद्रा अब तो जागो॥
- रतन लाल जाट

21. काव्यगीत- "तिरंगा लहर-लहर लहराये"
                             
तिरंगा लहर-लहर लहराये,
मेरे वतन का नाम सबसे ऊँचा रहे।
रंग तीन इसके प्यारे,
कहना वो हमको कुछ चाहे॥

आन-बान-शान की पहचान है रंग केसरिया।
देखकर इसको आ जाये रगों में एक तूफान-सा॥
सत्य-अहिंसा का भाव सिखाता।
वो रंग सफेद है बीच जिसके चक्र-सा॥

हरियाली-खुशहाली रहे मेरे देश में।
रंग हरा अपनी जुबानी ये पुकार करे॥
तिरंगा लहर-लहर लहराये……………

इस वतन के खातिर,
जी-जान लगाकर।
नन्हें-मुन्नें बालक,
रूके थे कर्ज चुकाकर॥

माताओं ने माँ की रक्षा में,
अपना लाल, अपना प्यार दिया है।
तिरंगा लहर-लहर लहराये………………

देश पर जब कोई संकट आये।
हर भारतवासी अपना बलिदान करे॥
एक चमन खिलाने को, सर दस काट दें।
एक बुन्द पानी को, लहू की गंगा बहा दें॥

कभी ना झूके, कभी ना थमे,
मेरा तिरंगा, मेरा वतन आजाद रहे।
तिरंगा लहर-लहर लहराये…………………
- रतन लाल जाट

22.काव्यगीत- "इन तूफानों से टकराकर"
                        
इन तूफानों से टकराकर,
हम आगे बढ़ने वाले।
उन पर्वतों को चीरकर,
नयी डगर बनाने वाले॥

मौत डर जायेगी हमसे,
देखकर हौंसला अपना रे।
फिर कौन है ऐसा जो,
मुकाबला करने को आये रे॥

इन तूफानों से टकराकर,
हम आगे बढ़ने वाले……………॥

यदि टक्कर हमसे लेना हो।
तो पहले अपने दिल को पूछ लो॥
क्योंकि बिन दिल की बात सुने।
कभी किसी को जीत ना मिले॥

इन तूफानों से टकराकर,
हम आगे बढ़ने वाले……………॥

सच्चे सपने दिल के अरमान।
अच्छा-बुरा सब मालिक के हाथ॥
उसको जो भी मंजूर होगा।
हमको वो ही स्वीकार करना॥

आखिर श्वाँस तक मंजिल अपनी है।
आँखें खुली सामने संसार फैला है॥
 
इन तूफानों से टकराकर,
हम आगे बढ़ने वाले……………॥

अंधेरे में हम नयी रोशनी जला देंगे।
आँधियों में भी नैया कगार लगा देंगे॥
सत्य-प्रेम के नाम कुर्बानी करने वाले।
मनुज-मात्र के प्रति भाईचारा रखने वाले॥

इन तूफानों से टकराकर,
हम आगे बढ़ने वाले……………॥
- रतन लाल जाट

24.काव्यगीत- “दुनिया बदल देंगे”
                
दुनिया बदल देंगे,
हम सब मिलकरके।
छोटी-छोटी बातें सुझाके,
सबका जीवन सजादेंगे॥

चाहे पाप कितना भी छोटा क्यों ना हो?
झूठ के कभी ना होते हैं पाँव चलने को॥
अंत जीत सत्य की है।
दुनिया बदल देंगे…………॥

झूठ एकदिन तो मिटाना है।
हमारे आगे उसको झूकना है॥
सच का दामन हम थामें।
हरकहीं अपना परचम लहरा देंगे॥
  दुनिया बदल देंगे……………॥

कम गहरी है जड़ मुश्किलों की।
शाखा भी फैली है इसकी थोड़ी-सी॥
बाकी हम सब है, फौज हिन्दुस्तान की।
आज ही उखाड़ देंगे, खरपतवार सारी॥
यही आज हमने कसम ली है।
दुनिया बदल देंगे…………॥

आ जाओ मेरे संग,
हाथ मिलाके चलो।
मंजिल अपनी है दूर,
लेकिन देखके मत डरो॥
वो सदा हमारे साथ है।
दुनिया बदल देंगे…………………॥
- रतन लाल जाट

25.काव्यगीत- “गुलशन के फूल ना सूखे”
                             
हमने घर-बार छोड़ा है।
गुलशन के फूल ना सूखे॥
इस वतन के वास्ते,
दुनियादारी हम जीत गये।

इसके नाम कभी, ना आने देंगे विपति।
मेरा वतन जिसको सौंपा, तन-मन दोनों अपना।
बूढ़े माँ-बाप को बेसहारा करके आ गये हम।
दुश्मन से लड़ने को भूल आये अपने सनम॥

उस रात को जब शादी हुई थी अपनी।
आ गया सन्देशा कि- लड़ाई चल गयी॥
सुहाग की रात को, जब वो सो गयी तो।
चुपके से निकल गया मै, कि- कहीं जाग ना जाये वो॥

घर में बच्चे कहते कि- मम्मी!
पापा कौन मेरे? बताओ तस्वीर उनकी॥
कब लौटेंगे वो जीत का सेहरा बाँधे?
कैसे पहचानेंगे? सिर पर टोपी और बन्दूक हाथ में होगी॥

कभी इस वतन के, अनमोल उपवन में।
कोई चमन सूख ना पाये, जो खिला है हर घर से॥
इस वतन के आगे सब छोड़ चलें।
माँ-बाप से बड़ा वतन को समझे॥
पत्नी और बच्चे प्यारे।
मगर वतन और भी प्यारा है॥
हमने घर-बार छोड़ा है………………॥
- रतन लाल जाट

26.काव्यगीत- “मैं जा रहा हूँ”
                                  
मैं जा रहा हूँ, अब ये वतन पुकारे।
ना भूलना शहादत, कसम तुमको प्यारे॥
जब तक जिगर में जान है।
दुश्मन से लड़ना ही शान है॥
हम वतन के नाम कर जायेंगे।
सब कुछ अपना सौंपकर रूकेंगे॥
मैं जा रहा हूँ, अब ये वतन पुकारे।
ना भूलना शहादत, कसम तुमको प्यारे॥

कर्ज पानी का, खून से आज चुकाना है।
हवा वतन की, आखिर श्वाँस तक प्यारी है॥
अपने लिए जीना, एक स्वार्थ लगता है।
छोड़कर अपने, परायों के खातिर मरना है॥
मजबूरी में सब कुछ सहन कर लिया जाता है।
मगर हिम्मत से आज हमको मौत गले लगाना है॥
मैं जा रहा हूँ, अब ये वतन पुकारे।
ना भूलना शहादत, कसम तुमको प्यारे॥

खाया-पीया खूब हमनें,
खेला-कूदा इसके आँचल में।
हँसी-खुशी हमको दी है इसनें,
प्राणों से खेलके दुश्मन मार दें॥

जन्मों बाद मौका है, अवसर आज खड़ा है।
क्यों चुपी साधे हूँ, दुश्मन आगे बढ़ रहा है॥
सीना दहक उठा है, आँखें शोला बरसाये।
काँप जायेगा कातिल ये, सुनकर अपनी हुँकारें॥
मैं जा रहा हूँ, अब ये वतन पुकारे।
ना भूलना शहादत, कसम तुमको प्यारे॥
- रतन लाल जाट

27.काव्यगीत- “किसी ने दम तोड़ा है”
                              
किसी ने दम तोड़ा है, रेत के गुब्बार में।
मर गया वो तोप आगे, जय हिन्द बोल के॥

चेहरे पे हँसी है, ना कोई गम दिल में।
माँ का लाल सोया है, माँ के आँचल में॥

जिस मिट्टी से ये तन बना था।
आज उसमें ही जाके मिल गया॥

आखिर श्वाँस कहके निकली।
दुश्मन को ना छोड़ना कभी॥

देखते ही देखते, जा पहुँचा गगनमण्डल में।
भारत माँ का सपूत जो, एक शहीद बनके॥

किसी ने दम तोड़ा है, रेत के गुब्बार में।
मर गया वो तोप आगे, जय हिन्द बोल के॥

धन-दौलत को इन्होंने ठोकर मारी।
ऐशो-आराम भूलकर गोली खायी॥

कफन बाँधकर निकल गया वीर।
गन उठाकर आग जैसे बरसाये तीर॥

दुश्मन से प्यार अच्छा नहीं।
कातिल को कभी माफ करना नहीं॥

डरकर मौत से चुप रहना नहीं।
हर हाल में झूककर घुटने टेकना नहीं॥

वीरों का धर्म सबसे ऊपर है।
मिलना पक्का इनको परम मोक्ष है॥

किसी ने दम तोड़ा है, रेत के गुब्बार में।
मर गया वो तोप आगे, जय हिन्द बोल के॥
- रतन लाल जाट
28काव्यगीत- “आजादी के आँसू"
                   
जब हजारों वीर-शहीद,
भारत माँ के लिये हुए कुर्बान।
फिर एकदिन उस शहादत के आगे।
आजादी का वो दिन आया दौड़े-दौड़े॥

जिसकी कीमत है ज्ञात नहीं,
गणितज्ञों ने दिखायी लाचारी।
जब यह आजादी,
हम सबकी मुस्कान बनी॥

जिस दिन अंग्रेजों ने हिन्दुस्तान छोड़ा था।
मृतप्रायः बनी हुई भारत माँ में नवप्राण आया॥

यह प्रभात का सूरज,
घोर-कालिमा को दूर करके।
अपनी स्वर्णिम किरणों के साथ,
वसुधा पर प्रकाश फैलाये॥

मेघों ने मूसलाधार बरसकर,
आसमां में जमीं धूल को मिटाया।
हिमगिरि की शीतल पवन,
सौरभमय बनाये परिवेश सारा॥

सूखे खेत-खलिहानों में,
एकबार पुनः हरियाली छायी।
कलियों पर जमीं बुन्दें,
आजादी का आँसू बन ढ़लक गयी॥

इस पावन पर्व की याद में,
स्त्री-पुरूष, बच्चे-बुढ़े तक।
सभी की आँखें नम हुई,
फिर भी है गौरवमय मुस्कान॥

कितनों ने बहाये थे गुलामी में आँसू,
जो एक-एक बुन्द बन गये।
झरना, नदी और सागर,
पावन आजादी में शामिल हो गये॥
यह आँसू गिर गये हैं।
किन्तु अभी गाल पर निशान ना मिटे॥
पराधीनता ने हमको दीन कर दिया।
अब आया है उत्साह, साहस और वीरता॥
इन बेजोड़ अश्रु-मोतियों से,
एक प्यारी माला बन गयी।
उठाकर उसे हजारों हाथों में,
वीर-शहीदों को पहनायी॥
इन वीरों ने फाँसी को गले लगाया।
हँसते हुए गोली से बाँहे फैलाकर आलिंग्न किया॥

सौ-सौ बार हुआ था वाचन।
उस वक्त वन्देमातरम्-वन्देमातरम्॥
एक बेंत की मार देशभक्त सह गये।
लेकिन उसके आगे थक गये॥

किन्तु वो अटल रहे, अपने लक्ष्य के सामने।
एकदम मौत भी उनको, विचलित ना कर पाये॥

मरकर भी मातृभूमि के लिए,
पुनः मरने की कसम खायी।
अगले जन्म में भी उन्होंने,
भारत माँ का लाल होने की आस लगायी॥

स्वाधीन भारत में आज,
कौन है ऐसा वीर?
जो बहाने को तैयार,
आँसू की एक बुन्द॥

पवित्र पावन आजादी का मान।
बढ़ाने के लिए हम करें गान॥
ऐसा मेरा देश,
कौन इसका दुश्मन होगा?
भारत माँ का लाल,
तब कैसे शान्त बैठेगा॥

बहाये थे आजादी के आँसू जिन्होंने,
उसकी कीमत चुकायें खून से हम।
भारत माँ को जिन्दे-जी,
गुलाम नहीं देख सकते हम॥

चाहे प्राण निकल जाये।
स्वर्ग ढ़हकर नरक बन जाये॥
फिर भी हमारा प्यारा देश,
सबसे ऊँचा और महान् है॥
ऐसे वतन के वास्ते,
हम सौ-सौ जन्म वार दें।
मगर कभी भी दुश्मन को,
यारों, आँख ना उठाने दें॥
- रतन लाल जाट
29.काव्यगीत- “राणा की गाथा"
                 
तुम पलभर याद करो।
पहचानो उनकी छवि को॥
गाथा है शुरवीर की,
आन-बान-शान के खातिर।
प्राणों का बलिदान किया,
वह हैं रांणा संग्राम॥

जिस माता ने उस शिशु को पाला।
माता नहीं है वह धीर माता॥
दुन्दुभी की तान भरी कानों में,
सुनते ही चले राणा रणभूमि में।
वास्ते वतन के खातिर वे,
प्राणों की वेदी पर चले॥

कुर्बान हुए बिना किसी भय के,
लड़ते रहे राणा अपने भुजबल के।

धीरता का विनाश हो शौर्यता की अमरता।
लड़ते हुए राणा गुनगुनाते जुबां पर एक तराना॥
देह पर अगणित घाव के निशान बने।
वज्र-प्रहारों से शत्रु को बेधते-चीरते चले॥

भंग हुए कर-पद-नयन।
तब अभय हो उठे राजन्॥
और महाकोप से टूट पड़े।
दुश्मन की नैया डुबोने अड़े॥

नव-गूँज गूँज उठी थी रणधरा में।
तुम धन्य हुए राणा इस समर में॥
तुम्हारी है वीर-गाथा,
लड़े हैं अगणित संग्राम आपने।
युद्ध बना है एक निशान,
बन निकली थी पहचान जबसे॥
प्राणों का बलिदान किया,
वह हैं रांणा संग्राम।

पहचान लो जरा,त्याग राणा का।
रक्त की एक बुन्द गिरी,
गजभर की छाती तानी।

जन्म दिया था जिस माता ने।
हुँकार भरी थी उस क्षत्राणी ने॥
जिसकेआगे हिल उठे थे,
जड़-कंकाल सारे के सारे।
कंठ में कलरव वाणी,
फैलाये मानवता की कहानी।
रज-नभ जिसने चमकाया।
नव-ज्योति का प्रकाश फैलाया॥
युद्ध की ज्वाला जली,
नयी कली खिल उठी।
जन्मभूमि के रक्षक,
वो शौर्यता के वाहक।
जीते हैं अगणित संग्राम।
वह हैं राणा संग्राम॥
- रतन लाल जाट

30.काव्यगीत-“गूँज उठी यह ललकार"
                 
गूँज उठी यह ललकार हमारी,
वो तिरंगा है हमारा, यह मुल्क है हमारा।
इसकी छवि को निरख हमें,
तीन रंगों का है यह तिरंगा॥

देश के वीर कुर्बान हुए
वतन के खातिर मर मिटे।
उनके इस तूफां का एक भरोसा है हमें॥

तेरा उन्नत शिखर
मेघों से नहाता है।
पवन से लहराता
वतन हिन्दुस्तान है॥

अपना देश महान्,
कोई हिन्दू,कोई मुसलमान।
फिर भी कोई भेद नहीं।
हम वीर हैं हिन्दुस्तानी॥

आज वो दिन बीत-निकले।
यूँ ही हँसते हुए नहीं गुजरे॥

पाये थे फाँसी-फन्दे वीरों ने,
ताकि इस वतन का नाम बढ़े॥

सिरमौर है अपना वतन-ए-कश्मीर।
आये दिन याद करें, जो हुए थे शहीद॥
मुल्क के खातिर प्राण अर्पित किये।
ऐसे थे मेरे वतन के वीर परवाने॥

कितनी मुश्किल से पायी थी मंजिलें?
तोड़ डाली बेड़ियाँ मुल्क-साथियों ने॥
देखें, तो कौन देखें?
मालूम है किसको जुल्म अपने?
जिसे भोग चुके हैं हम,
अब याद रखेंगे बेमतलब।

कीमत खून से चुकायी है।
शहीद हुए हैं वीर बिना डर के॥
निर्भय हुआ था वो रक्षक
और दाग डाली थी गोली।
जो दुश्मन के सीने को
चीरकर आगे निकली॥

तब दुश्मन ने घायल होकर
मरते हुए बोले अंतिम वचन
हे भारत माता!
माफ करना जुल्म मेरा।
स्वीकार है यह मुझे,
अब ना कभी करूँगा मैं।

वह मंदिर है तू भारत माँ।
शिखर है हजार खंभों का॥
मेरे हिन्दुस्तानियों खींच दो भाग्य-रेखा।
गूँज उठे यह ललकार वापस दुबारा॥
गर्भ से उपजा था,
वह रत्न अनमोल था।
मेरे प्यारे वतन,
तू ही स्वर्ग, तू ही साथी।
सदा है महान्,
मेरे हिन्दू-हिन्दुस्तानी॥
- रतन लाल जाट

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इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,240,लघुकथा,1217,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,326,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,68,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1995,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,700,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,782,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,15,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,75,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,196,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,75,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi 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रचनाकार: देशभक्ति काव्यगीतों का संकलन - रतन लाल जाट
देशभक्ति काव्यगीतों का संकलन - रतन लाल जाट
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