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लघुकथा - गतिपथ का मानचित्र - कुसुम पारीक

2011 (5) (Phone)

(चित्र - सोनम सिकरवार की कलाकृति)


अपनी आंखों की कोरों तक लुढ़क आए आँसुओ को पापा ने छुपाया नहीं ,और बरसों का रुका हुआ सैलाब उत्तरायण के सूर्य आने पर छंट रही कोहरे व सर्दी की तरह बह जाने दिया ।

"उन्होंने पूरी शक्ति से सौरभ को अपनी भुजाओं में समेट लिया था ,"

मैं भी पिता-पुत्र की पुनर्मिलन की इस घड़ी की साक्षी बनी ,इसका आनंद ले रही थी ।

कुछ  देर बाद थोड़ा संयत होते हुए ,पापा ने मुझे भी हृदय से लगा लिया व कहने लगे ,"मुझे नाज़ है, जो तुम मेरी बेटी हो ।"

मैंने स्नेह से पापा व सौरभ का हाथ पकड़ कर सोफे पर बैठाया व पानी लाने के बहाने रसोई की तरफ चल पड़ी ।

"मैं उस समय को कैसे भूल सकती हूं, जब मेरी मम्मी का बीमारी की वजह से असामयिक निधन हो गया था ,बचत का पैसा ,बीमारी  व हम बहन-भाइयों की शादी ब्याह का खर्च हो गया ।यह सब पापा को बुरी तरह तोड़ चुका था ।

थोड़े दिनों बाद ही सौरभ की एक विदेशी कंपनी में नौकरी लग गई थी,परन्तु  विदेशों सभ्यता की चकाचौंध में ,वह अपनी जमीनी सच्चाई व रीति रिवाज से दूर होता गया ,जैसे जैसे वह सफलता की ऊँचाइयाँ चढ़ता गया ,  हम सब से रिश्ता रखना व मिलना जुलना, उसे ढकोसले की तरह ही लगने लगे थे ।

"पाश्चात्य रहन सहन की चकाचौंध से वह हर रिश्ते से दूर होता गया।"

"लेकिन एक दिन वह भी आया जब पंछी के पर ऊँचाई पर उड़ते- उड़ते थकने लगते हैं  व सामने छा रहे ,अंधियारे का भान उसे वापिस घोंसले में लौटने के लिए मजबूर कर ही देता है ।"

इन वर्षों में पापा ने नियति का चक्र मान कर सन्तोष कर लिया था, व भगवद्  भजन ,ध्यान में ही अपना जीवन यापन करने लगे थे।

जब भी मैं  पापा के पास जाती या फ़ोन पर बात होती ,तब देखती थी कि वे सौरभ का नाम लेते ही भड़क उठते थे ।

मैं कहती ,कोई बात नहीं पापा ,कभी तो वह वापिस आएगा न ! 

वह गलत नहीं हो सकता, क्योंकि मुझे आपके दिए  संस्कारों पर पूरा  भरोसा है ।

"पापा एक सूखी-सी तिरस्कार की हंसी हंस देते ।"

मुझे भी पता था कि जो इंसान राखी तक को याद करने की ज़हमत नहीं उठाता ,उसका लौटना कैसे हो पाएगा ?  लेकिन फिर भी मैंने न राखी भेजना छोड़ा और न ही यदाकदा उसे फ़ोन करना ।

खिलती धूप की तरह, संस्कारों व अच्छी भावनाओं की जो डोर हम लोगों की एक दूसरे से जुड़ी हुई थी , उसी का फल था या उसकी अंतरात्मा का अहसास, सौरभ आज पापा के पास लौट आया था ।

मैं चाय लेकर आई, तब देखा कि पापा दोनों पोते-पोतियों को पास बैठाकर रामायण की चौपाई सुना रहे थे ।

"गुरु गृह गए पढ़न रघुराई ,अलप काल सब विद्या पाई " जैसे कभी मुझे व सौरभ को सुनाते थे ।

"आज  गतिपथ का मानचित्र , मुझे वहीं पर घूमता हुआ दिखाई दे रहा था ।"

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कुसुम पारीक

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