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पतंगा - ओम प्रकाश अत्रि की कविताएँ

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१. कविता -- 'पतंगा'

मुझे
हर मनुष्य
पतंगा दिख रहा है,
अपनी
आदत से
लाचार होकर
दुनिया के
झंझावातों में
फंसता जा रहा है ।
जल जाता है
लोभ में
पतंगे की तरह
जब
अपने ही
रास्ते से
भटक जाता है ।
जलती है
चारों ओर
द्वेष के
दीपक की लव
जिसमें
वह
जलने को
दौड़ा चला जाता है ।
डर
नहीं लगता है
उसे
किसी खतरे से
क्योंकि
वह
खतरे को
पंतगे की
तरह
भांप नहीं पाता है ।
उसे
मतलब के सिवा
कुछ भी
दिखता नहीं है ,
बस
अपने ही
रौ में
परवाना बना फिरता है ।
वह
नहीं सोचता है
अपने
जीवन के बारे में ,
हो गया है
अब वह
पक्का स्वार्थी
इसी लिए
स्वार्थ बस
पतंगे की भांति
पंख फड़-फड़ाकर
जीवन को खोता है।

२. कविता--'नक्सलवाड़ी'

जिन
हाथों में
कभी होती थी
कुदालें ,
उन
हाथों ने
बन्दूकें उठा ली ।
जिन
हाथों से
कभी
जमीन को
खोदकर
कोयला निकाला है ,

वही
हाथ अब
कहलाते हैं
नक्सलवाड़ी ।
अपनी ही
भूमि पर
जो
मजदूरी करते थे ,
जाने क्या
वजह थी
जो
जंगल में
पनाह ली ?
रही होगी
जीवन की
कोई
कठिन समस्या ,
हो गया
होगा
भूख से
उनका
बद से
बद्तर जीवन ।
छिन
गयी होंगी
उनकी
अपनी ज़मीने ,
लुट गयी
होंगी
खुशियां
उनके
हरे-भरे
जीवन से ।
थक
गए होंगे
हाथ
गुलामी
करते-करते ,
उठने
लगी होगी
असह्य पीड़ा
काम की मार से।
सह नहीं
पाए होंगे
चाबुक की
मार,
दासत्व से
मुक्ति
के लिए
भूख की
शान्ति के लिए
अपनाए होंगे
जरुर
नक्सलवाड़ी की रांह ।

३.कविता -  नोटों की सुगन्ध

बैठे हैं
एसी रूम में
टांगों के ऊपर
टांगें चढ़ाए ,
लेते हैं
हर पल
चाय की चुस्की
मुँह को
फैलाए ।
चिलचिलाती
धूप में
जब कोई
आता है
फरियाद लेकर ,
दूर से ही
काटने को
बैठे हैं
सीना फुलाए ।
बौराया
कुत्ता
समझकर
दुत्कार
देते हैं ,
कहते हैं
कि
नहीं
हो पाएगा
तेरा काम
क्योंकि
साहब हैं
इस समय
चार दिन की छुट्टी पर ।
देखता
रहता है
वह
अपनी
आँखों से
साहब को
केबिन में सोते हुए ,
पर
क्या करे
उसके
मुँह से
कुछ निकलता नहीं है ।
आते हैं
एक सज्जन
नेताओं के
चोले में ,
उनके
नोटों की
सुगंध पाकर
साहब
झट से
जाग जाते हैं ।
काम
हो जाता है
फौरन ,
वह
बाहर
खड़े-खड़े
भाग्य को कोसता है ।
आती है
उनके लिए
चाय की प्याली ,
वह
इधर-उधर
झांक कर
पानी तलाशता है ।
एक
काम करा के
एसी गाड़ी में
बैठकर
फुर्र हो जाता है
दूसरा
खाली हाथ
तपती दोपहरी में
सायकिल
घोटकर
घर को लौट जाता है ।


   ४.कविता--'पिपरमिंट'

जब से
आयी है
पिपरमिंट
किसानों के
जीवन में ,
तबसे
छिन गयी है
उनके
दोपहर की नींद ।
नहीं
मिलती है
फुरसत
इत्मिनान से
रोटी खाने की ,
और
न ही
फुरसत है
एक दूसरे के
ढिंग बैठकर
बतलाने की ।
दिन-रात
उसी के
बारें में
सोचते हैं ,
कड़ी
धूप में
उसी के
पीछे
जीवन खपाते हैं ।
हर
किसान को
बस
पिपरमिंट
दिखती है
उसके सिवा
उसे
कुछ नहीं
दिखता है ।
सुबह से
लेकर
शाम तक
पिपरमिंट-पिपरमिंट
रटता है ,
बीबी-बच्चों
को भी
खेत में
भिड़ाए रहता ।
जब से
आयी है
यह
खेत की
सौत बनकर ,
तबसे
किसान की
आयु भी
घटने लगी है ।
खेत को
पल भर
सांस नहीं
लेने देती ,
और
ऊपर से
हर लेती है
सारी उर्वरा शक्ति ।
किसान के
साथ-साथ
खेती को भी
दुह लेती ,
और
नष्ट कर
देती है
खेती की घास-फूस ।

५. कविता-- ' दो-दो परीक्षाएं '

बड़ा
दबाव
महसूस करता है
जब
दो-दो
परीक्षाएं
पड़ती हैं
परीक्षार्थी के ऊपर ।
जवाब
देने लगता है
साहस ,
बुद्धि भी
बिचलन से
काम नहीं करती है ।
क्षीण
हो जाती है
सारी
मन:स्थिति ,
शरीर का
रक्तचाप भी
रह-रहकर
बढने लगता है।
एक तरफ
सफलता की
हलचल है ,
दूसरी तरफ
हजारों
मीलों की
दूरी है ।
नहीं
छोड़ना
चाहता है
किसी भी
हालत में
दोनों परीक्षाएं
पर
क्या करे
समय पर
न कोई
चलती ट्रैनें हैं ।
दोनों
परीक्षाओं के
भवर में
पड़ा है ,
दोनों
परीक्षाएं
आगे
बढ़ने के खातिर
उसके जीवन में
सबसे जरूरी हैं  ।

      
 
- ओम प्रकाश अत्रि
शिक्षा - नेट/जेआरएफ(हिन्दी प्रतिष्ठा ),शोध छात्र विश्व भारती शान्तिनिकेतन (प.बंगाल )
पता- ग्राम -गुलालपुरवा,पोस्ट-बहादुरगंज, जिला- सीतापुर (उत्तर प्रदेश)
ईमेल आईडी- opji2018@gmail.com

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