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पंकज और पलक के लिखाई की कहानी- चंद्रभान सिंह मौर्य

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बच्चों के लिखना सीखने की कहानी वाकई बहुत ही रोचक और कठिन दोनों तरह की होती है रोचक तब जब वह अपने मन से खुले भाव से कुछ भी लिखने व बनाने में होते हैं, और कठिन  इसलिए कि जब हम उन्हें जैसा लिखा है वैसे लिखने की ओर प्रेरित करते हैं। मेरे कुछ अनुभव है जो इस सवाल से धूल हटाने मे मददगार साबित हो सकते हैं बात उस दिन की है जब मैं पहली बार किसी प्राथमिक विद्यालय में पहुंचा जहां एक छोटे से विद्यालय का प्रांगण और भवन था| प्रांगण में काफी सारे बच्चे खेल रहे थे उसी बीच कुछ बच्चों से प्रथम बार मिलकर बात करने का भी अवसर मिला| उन्हीं बच्चों में से एक बच्ची पलक और एक बच्चा पंकज भी था पलक तो शुरुआती दिनों से ही बहुत बोलती है जबकि उसकी अपेक्षा पंकज कुछ कम बोलता था फिर धीरे-धीरे समय बीतता गया और हम एक दूसरे से पढ़ने लिखने के दरमियान और खाली समय में बातें किया करते थे उनके घर के बारे में, उनकी पसंद के बारे में, और उनकी ना पसंद के बारे में। शुरुआती दिनों में जब मैं बच्चों से बात करता तो उन्हें एक झिझक होती मुझसे बात करने में लेकिन धीरे-धीरे बच्चे मेरे साथ सहज और स्वतंत्र अनुभव करने लगे और फिर अपनी बात भी बिना झिझक के रख पाते थे|

एक दिन की बात है जब मैं बच्चों के बातचीत के बाद ही उन्हें उससे संबन्धित चीजों को कॉपी पर चित्र बनाने को कहता हूँ| तब डामेश्वर सबसे पहले लिखने के लिए कलम थामता है और कुछ चित्र बनाने का प्रयास करता है क्योंकि मैंने उसे स्वयं से कोई चित्र बनाने को कहा| उसी बीच सभी बच्चे उसके चित्र को अलग-अलग भाव व अंदाज में देखते हैं जिन्हें देखकर मैं यही समझ पा रहा था कि पलक को लिखने से संबन्धित प्रक्रिया जैसे चित्र बनाना काफी पसंद है जबकि पंकज को लिखना उतना अच्छा नहीं लगता| अतः इस तरह धीरे-धीरे बच्चों की पसंद और नापसंद पर मेरी समझ बननी शुरू होती है| फिर मैं बच्चों के खाने-पीने की चीजों के बारे में पूछता हूं तो वह बहुत सारे स्थानीय छत्तीसगढ़ी के खानपान की सामग्री का नाम बताते हैं और फिर मैं इन्हीं नामों को एक चार्ट पर लिखकर दूसरे दिन कक्षा में लाता हूँ| जब मैं उस चार्ट को लाया तो सबसे पहले बच्चों को चार्ट देखने और स्वयं से लगाने के लिए दिया, जिसे बच्चे बहुत ही खुशी के साथ उसे दीवार पर चिपका देते हैं| और बहुत ध्यान से देखते हैं उन गोल-मटोल, लंबे-चौड़े, बड़े-बड़े शब्दों को जिसमें लिखा था फरा, बड़ा, चीला, मुठिया आदि| इस तरह सभी बच्चे उन शब्दों को देख रहे थे और मैं बच्चों को देख रहा था तभी पलक अपना सिस(कलम) और कॉपी लेकर लिखने में लग जाती है उस चार्ट के लिखे शब्दों को, लेकिन पंकज कहीं और नजर गड़ाए हुए था वह चार्ट के बगल में ही लगे “नाम चार्ट” को देख रहा था जिस नाम चार्ट में एक जगह उसका भी नाम था तब मुझे ऐसा लगता है कि वह यह सोच पा रहा था कि मेरा नाम भी इस तरह लिखा जाता है जैसे यह खाने के सामान के नाम लिखे हैं या फिर यह भी हो सकता है कि पंकज और कुछ सोच रहा हो।

फिर धीरे-धीरे समय बीतता गया और हम एक दूसरे से घुलते-मिलते गए पंकज अपने बहुत सारे अनुभव को अपनी स्थानीय भाषा में मेरे बीच रखता और मैं बार-बार उसकी बातों को सुनकर हंसता और पूछता, कि यह क्या होता है मैं नहीं जानता। इसी तरह एक दिन पंकज “खोखलेन”  शब्द के बारे में मुझे बता रहा था पर मैं उसके स्थानी छत्तीसगढ़ी भाषा के इस शब्द को नहीं समझ पा रहा था लेकिन जब वह अपने हाथ के द्वारा खोदने के अनुभव अभिनय करते हुए बताता है तब झट से मुझे समझ में आ जाता है| तभी दूसरी कक्षा के कुछ बच्चे मुझे जेसीबी नाम से बताते हैं कि “खोखलेन” जेसीबी को कहते हैं| अब फिर मैंने पंकज के द्वारा ही बताएं अनुभव को एक चार्ट पर “शब्द चक्र” बनाकर लाया जिसमें तीन-चार चित्र और ढेर सारे शब्द चक्र बने हुए थे जैसे फुग्गा, मटका, तोता। मेंचका, आदि और फिर बच्चों के साथ मिलकर कक्षा में लगा देता हूं| उसके बाद उस पर बातचीत होती है फिर बच्चे लिखने की प्रक्रिया में आगे बढ़ते हैं तब पलक तुरंत कागज को लेकर चित्र बनाने लगती है और पंकज सभी बच्चों से थोड़ा अलग हटकर चार्ट से शब्दों को बड़े-बड़े अक्षरों में लिखने का प्रयास करता है| अक्सर मैं बच्चों को गोल आकृति में बैठता हूं ताकि वह समूह में एक दूसरे की मदद कर सकें और आपस में बात करते हुए अपनी समझ भी बना पाए। इसी बीच में बच्चों के गोले के भीतर कुछ चित्र बना देता हूं और उन चित्रों के नाम भी लिख देता हूं जैसे पेड़ का चित्र और उसका नाम, आम का चित्र और उसका नाम, घर का चित्र और उसका नाम।

कक्षा में और भी बच्चे थे जिनकी लेखन प्रक्रिया को मैं निरंतर अवलोकन कर रहा था और समझने की कोशिश कर रहा था कि बच्चे लिखने की ओर कैसे अग्रसर होते हैं उन्हें क्या लिखना अच्छा लगता है? जैसे कमल को “डीजे” बहुत पसंद है और वह डीजे का चित्र भी बहुत बनाता है और उसका नाम भी लिखता है क्योंकि उसके घर पर उसके पापा डीजे बजाने का काम करते हैं| और वह लिखने के दरमियान भी कुछ डीजे की तरह बड़बड़ाने का काम करता रहता है| इसी तरह वंदना है जिसका नामांकन कम उम्र होने के कारण स्कूल में नहीं हो पाया है पर वह पहली कक्षा में पढ़ती है और अपने स्तर अनुसार काफी आगे भी दिखाई देती है| एक दिन मैंने बच्चों के बीच गोल घेरे में एक कहानी सुनाई जिसका नाम था “हाथी की हिचकी” और फिर सभी बच्चे हिचकी लेकर बार-बार मजा भी लेते कि उन्हें हिचकी कैसे आती है? फिर हम हाथी के चित्र को बनाते हैं| और उस चित्र के नीचे हाथी लिख देते हैं तभी पलक मेरे हाथ से चाक लेकर लिखने के लिए श्यामपट्ट पर जाती है और हाथी लिखने का प्रयास करती है और फिर मैं देख कर अचंभित रह जाता हूं वह पूरे समझ के साथ बहुत ही साफ ढंग से हाथी लिखने में सफल हो पाई थी और हाथी की समझ तो उसे पहले से ही है उसे तो बस यह समझना था कि हाथी लिखते कैसे हैं? इसी बीच वंदना भी चाक लेकर श्यामपट्ट पर दो-तीन बार हाथी लिखती है और वह भी हाथी लिखने में सफल रहती है पर उसी के बगल में उसने चूहा भी लिख दिया जो उसके एक कदम आगे बढ़ने का भी प्रयास रहा| जो अभी भी जारी है और पंकज और पलक के साथ कक्षा के अन्य सभी बच्चे लिखने की कहानी पर समझ बनाने मैं निरंतर अग्रसर है।

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चंद्रभान सिंह मौर्य 

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