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हनुमान मुक्त का व्यंग्य - सदाचार का ओवरकोट

सदाचार का ओवरकोट

रानी ने दरबारियों से कहा कि प्रजा द्वारा हमें दिए गए जनमत से लग रहा है कि प्रजा पूर्ववर्ती शासन में बहुत दुखी थी। शासक एवं उसके नुमाइंदों ने बहुत भ्रष्टाचार फैला रखा था कोई भी सुखी नहीं था।

तुम्हें कहीं भी भ्रष्टाचार नजर आए तो उसे तुरंत हमारे सामने हाजिर करो।

दरबारियों ने रानी की बात सुनकर गर्दन नीची कर ली ।रानी के समझ नहीं आया कि दरबारियों ने ऐसा क्यों किया है ?उनकी बातों की अवहेलना कैसे की है ।

अभी तक तो मंत्रिमंडल का गठन बाकी है ।इतने सारे आयोगों के अध्यक्ष पद खाली हैं ।बहुत सारी सरकारी नियुक्तियां होना बाकी है ।फिर भी इन्होंने अवज्ञा कैसे की ?

रानी ने अपनी आंखों से चश्मा हटाया और जोर से बोली ,"सुना नहीं ,मैंने तुमसे क्या कहा ?

रानी की आवाज का मर्म समझकर दरबारी बोला," रानी साहिबा, हमने आपकी बातों को सुन भी लिया और समझ भी लिया है। हम आपकी आज्ञा का उल्लंघन नहीं कर रहे हैं दरअसल बात यह है कि हमने अपनी आंखों में काला लैंसफिट करवा रखा है।हमें सब कुछ काला ही काला नजर आता है।

रानीको बात समझ नहीं आई। बोली," साफ-साफ बताओ तुम कहना क्या चाहते हो?

हुजूर !सबसे पहले जब आप ने भ्रष्टाचार को देखकर हमसे कहा था कि देखो भ्रष्टाचार चारों ओर फैल रहा है ,जाकर जनता को बताओ कि भ्रष्टाचार ने किस कदर राज्य का अमन चैन सब कुछ नष्ट कर दिया है तब जाकर हमने जनता को सब कुछ बता दिया। हमको और जनता को आप पर विश्वास था कि आपको जो भी दिखता है सही दिखता है ।

पहले हमने अपनी आंखों से भ्रष्टाचार को शासन के चारों ओर देखने की कोशिश की थी,लेकिन वह तो हमें सभी जगह बैठा हुआ नजर आया हम तो समझ रहे थे कि भ्रष्टाचार हमारे घरों में बिल्कुल भी नहीं है लेकिन वहां भी बैठा था ।उसे अपने घरों में देखकर हम थक गए हम समझ गए कि हमारी आंखों में खराबी आ गई है जो भ्रष्टाचार हमें अपने घरों में भी दिखाई देता है हमने तुरंत आंखों में लेंस फिट करवा दिए उसके बाद से हमें कुछ नहीं दिखता आपकी आंखों से आप देखकर जो बताती है वही हमारे लिए सच होता है प्रजा को भी हम वही सब कुछ बताते हैं।

प्रजा को आप पर और हम पर पूरा विश्वास है अब आप ही बताइए कि हमें भ्रष्टाचार कहां से नजर आएगा ?

रानी दरबारियों की बात सुनकर बोली। ठीक है ,अब तक तुम हमारी आंखों से देख।ते हुए आ रहे थे। अब अपनी भी आंखें खोलो और अपनी आंखों में लगे काले लेंसों को हटाकर आंखों को दुरस्त करवाओ।

" लेकिन ऐसा करने पर हमें सभी जगह भ्रष्टाचार नजर आएगा ,हमारे अपने घरों में भी वह बैठा दिखेगा ।

"तो ठीक है। तुम्हारे घरों में भ्रष्टाचार दिखें भी तो उसे सदाचार का ओवरकोट पहना देना सिर्फ तुम्हें ही पता होना चाहिए कि सदाचार के अंदर भ्रष्टाचार बैठा हुआ है।" वैसे भी गर्मी पड़ रही है। पब्लिक सोच भी नहीं पाएगी कि ओवरकोट क्यों पहन रखा है ?

उसे तुम्हारे अंदर सिर्फ सदाचार दिखेगा भ्रष्टाचार नहीं ।

याद रहे प्रजा को भ्रष्टाचार पहले की योजनाओं में और सरकारी कार्मिकों में ही नजर आना चाहिए।

हमें बहुत दूर तक जाना है प्रजा को भी वहीदिखना चाहिए जो तुम दिखाना चाहते हो।

सभी ने हां में हां मिलाई। अब वे अपनी आंखों में लगा लैंस हटवाने आंखों के डॉक्टर के पास पहुंच गए ।

डॉक्टर उनको देखते ही समझ गया ,बिना कुछ कहे ही उनकी आंखों से लेंस हटा दिए ।

डॉक्टर ने उनसे लेंस हटाने की अपनी फीस मांगी।

फीस की बात सुनते हीं दरबारी भड़क गए।

तुम्हारी इतनी हिम्मत हम से पैसा मांग रहेहो।

डॉक्टर ने हाथ जोड़कर उनसे माफी मांगी और बोला ,मैं समझ रहा था कि तुम्हारी आंखों से काला लेंस हट गया है अब तुम भ्रष्टाचार हटाने की शुरुआत भी अपने आप से करोगे ।मुझे गलतफहमी थी अब आप आराम से जाओ ।

दरबारी वहां से निकल लिए ।

अब वे नंगी आंखों से भ्रष्टाचार की खोज कर रहे थे प्रजा को भी बता रहे थे कि अगर उन्हें भ्रष्टाचार नजर आए तो अवश्य बताएं।

जिस ऑफिस में भी भ्रष्टाचार को ढूंढने जाते शाम को उस ऑफिस का ऑफिसर उनके घर पर उन्हें हाजिर मिलता। वहां उनके सदाचार की ओवरकोट के नीचे छिपे भ्रष्टाचार की गंध उसे लग जाती ।गंध को सूंघते ही वह समझ जाता कि यहां उसका काम हो जाएगा। उसका काम हो भी जाता और वह खुश होता हुआ अपने ऑफिस को लौट आता।

दरबारियों का यह नित्य कर्म था और अफसरों का नित्य धर्म।

कर्म और धर्म की अच्छी पट रही थी सदाचार के नीचे छिपा भ्रष्टाचार खूब फल-फूल रहा था। प्रजा सब कुछ देख रही थी वह जब भी दरबारियों से भ्रष्टाचार के दिखने की बात करती ,दरबारी त्वरित कार्रवाई करते हुए भ्रष्टाचार को साथ लाने की अफसरों को ताकीद कर देते ।

शाम को अफसर और भ्रष्टाचार साथ आते जुगलबंदी होती ।प्रजा समझती दरबारी बहुत चुस्त है ,दुरुस्त है ।उनकी कहते ही भ्रष्टाचार को बुलवा लेते हैं। दरबारी सदाचार का ओवरकोट पहने भ्रष्टाचार को छुपाए बेधड़क घूमते रहते ।

कुछ दिनों बाद वे रानी के दरबार में हाजिर हुए।

रानी ने उनसे वही प्रश्न दोहराया," भ्रष्टाचार कहां कहां देखा है ।"

सभी दरबारियों ने एक साथ समवेत स्वर में उत्तर दिया,

" नहीं महारानी।

आपके राज गद्दी पर बैठते ही भ्रष्टाचार एकदम गायब हो गया उसने अपना राज्य छोड़कर अन्यत्र कहीं डेरा डाल दिया है ।कहीं भी भ्रष्टाचार नजर नहीं आया।

सदाचार के अंदर छिपा भ्रष्टाचार दरबारियों की बात सुनकर बार-बार उछल कूद मचा रहा था। इससे ओवरकोट हिल रहा था ।

रानी साहिबा सब कुछ देख रही थी ,उन्होंने भी ओवरकोट पहन रखा था। रानी दरबारियों की बात सुनकर बहुत खुश हुई ।सभी दरबारियों को धन्यवाद देकर उन्हें भ्रष्टाचार की खोज करने अपने-अपने क्षेत्रों में भेज दिया।

हनुमान मुक्त

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