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रोचक आलेख - गप-शप - डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

आप माने या न माने, अंग्रेज़ी का शब्द ‘गॉसिप’ (gossip), हिन्दी के ‘गपशप’ से ही आया है। गपशप ही अंग्रेज़ी में ढलते ढलते ‘गॉसिप’ बन गया। यह गप नहीं है, इस बारे में गंभीरता से विचार करना चाहिए।

आखिर गप होती क्या है ? इसका अर्थ मन-बहलाव के लिए की जाने वाली इधर उधर की बातचीत से लगाया जाता है। वैसे यदि अच्छी खाने की थाली सामने हो तो भला कौन उस स्वादिष्ट खाने को गपक नहीं लेगा। हर खिलाड़ी गेंद को गपकने में माहिर होता है। लेकिन ज़ाहिर है, खाना गपकना और गेंद गपकना अलग अलग बातें हैं। इनके बीच हम घपला नहीं कर सकते। गेंद खाई नहीं जा सकती। ( हाँ, खेल की बात भिन्न है, तड़ी-मार खेल में तो गेंद (की मार) भी खाई जाती है।)

गप वास्तविक नहीं होती। यह झूठ बात है। पर एक सज्जन पूछ रहे थे, कि गप झूठ बात है या गप वास्तविक नहीं होती, यह झूठ बात है। सर चकरा देने वाला प्रश्न है। दोनों ही बातें सही हो सकती हैं, और गलत भी। प्रश्न की समझ पर निर्भर करता है।

कहा गया है कि गप ‘लड़ाई’ जाती है। पर गप किससे लड़ती है, या लड़ाई जाती है, आज तक कोई बता नहीं सका। कहा तो यह भी जाता है की गप उडाई जाती है, पर गप उड़ाते समय क्या उसकी डोर उड़ाने वाले के हाथ में रह पाती है। उड़ी तो उड़ी। फिर उसे नियंत्रित करनेवाला कोई नहीं रहता। उड़ते-उड़ते वह कब क्या रूप ले ले, कोई नहीं बता सकता। गप तो गप है। बहुरूपिया है।

कहा जाता है, गप मारी जाती है। पता नही उसे हाथ में लेकर मारते हैं या फेंककर मारते हैं ? क्या वह इतनी हलकी होती है की उसे हाथ से उठा लिया जाए ? गप का भार नापने का अभी तक कोई पैमाना तो बना नहीं है। शायद कभी विज्ञान इस दिशा में भी काम करे। पर अभी तो विज्ञान भी चुप है।

यह भी कहा गया है कि गप हांकी जाती हैं। गप न हुई ताँगे में जुटा घोड़ा हो गई। और कोचवान उसे हांकता है। क्या गप कोचवान के हवाले कर दी गई है ? गप का प्राथमिक मूल्य तो उसकी आज़ादी है। उसे भला कौन हांक सकता है ? गप से उसकी आजादी छीन लीजिए, गप समाप्त हो जाएगी। जीते जी बे मौत मर जाएगी।

लोग गप लगाते हैं। कहाँ लगाते हैं, किस पर लगाते हैं, कोई नहीं जानता। क्या कोई दीवार है जिसपर लोग गप चिपका देते हैं। या कोई खूँटी है जिसपर गप टांग दी जाती है ? गप के सम्बन्ध में ऐसी बातें करना भले दिलचस्प हो लेकिन वाजिब तो कतई नहीं है।

गप आप चाहें मारे या लगाएं, हांकें या लड़ाएं – इससे गप के उसके अपने स्वभाव में कोई अंतर नहीं आता,   वह बनी गप ही रहती है। सच तो यह है कि गप को परिभाषित करना बिलकुल असम्भव है। जब तक आप उसे परिभाषित करेंगे गप आगे बढ़ जाएगी। उससे पार पाना नामुमकिन है।

गप है तो गपोडी भी हैं। गपोड़ियों के न बिना हम गप की कल्पना भी नहीं कर सकते। सच तो यह है कि बिना गपबाजों के गप संभव ही नहीं है। गपोड़ीजन ही गप का निर्माण करते हैं और उसको जीवंत करते हैं वरना पडी रहे बेचारी कहीं अनजानी, अनकही अनसुनी।

गप दो तरह की होती है। एक गप खालिस गप होती है। आप चाहें तो इसे निखालिस भी कह सकते हैं। बात एक ही है। इसका कोई आधार नहीं होता। निराधार गप, ‘गप के लिए गप’, गप का श्रेष्ठतम रूप है। दूसरी तरह की गप बात को नमक-मिर्च लगा कर कहना है, गप इसमें भी सम्मिलित है। पर यह बात में लिपटी हुई होती है। निखालिस नहीं होती। बात का यह अतिशयोक्त रूप है। इसमें कल्पना और यथार्थ का एक संतुलित सम्मिश्रण होता है।

कहते हैं चाट खाने वाला ,चाट खाने में अपना वक्त और अपने ही पैसे बर्बाद करता है। लेकिन गप का चटोरा भले किसी के पैसे बर्बाद न करे, वक्त सिर्फ अपना ही बर्बाद नहीं करता है। गपियाते वक्त दूसरों का वक्त भी बर्बाद करके ही रहता है।

हर क्षेत्र की गप अलग अलग तरह की होती है। राजनैतिक गप साहित्यिक गप से अलग किस्म की होती है। राजनैतिक गप अल्प-जीवी होती है। लेकिन साहित्यिक गप चिर-जीवी है। जब तक साहित्य रहता है वह उसमें अपना डेरा जमाए रहती है।

- डा. सुरेन्द्र वर्मा

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड,

प्रयागराज – २११००१

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