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यशु जान की कविताएँ

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1.घनघोर अशुद्धियां
पढ़ने में मज़ा तो है आता इन छाओं में,
घनघोर अशुद्धियां हैं तेरी कविताओं में

पहली अशुद्धि सच लिखना,
है दूसरी इनका ना बिकना,
चोर ना छिप सकता है इनके गांव में,
घनघोर अशुद्धियां हैं तेरी कविताओं में

तीसरी अशुद्धि चुभते शब्द,
इनमें सब कुछ है उपलब्ध,
जो होना चाहिए देश के इन युवाओं में,
घनघोर अशुद्धियां हैं तेरी कविताओं में

और पांचवीं इनमें देश-भक्ति,
छटी तेरे गुरुदेव की शक्ति,
छिपा बहुत कुछ है इनकी अदाओं में,
घनघोर अशुद्धियां हैं तेरी कविताओं में

सातवीं इनका जोश दिखाना,
आठवीं सच पर मर मिट जाना,
यशु जान तू मरेगा सब खताओं में,
घनघोर अशुद्धियां हैं तेरी कविताओं में,
पढ़ने में मज़ा तो है आता इन छाओं में
2.थक गया हूँ
थक गया हूँ मैं तेरे बहाने सुनकर,
अब ना ज़िंदा रह सकूंगा ताने सुनकर

मेरा दिल भी दिल ही है,
छोटी सी महफिल ही है,
इस दिल पे क्या बीती ना जाने सुनकर,
थक गया हूँ मैं तेरे बहाने सुनकर,
अब ना ज़िंदा रह सकूंगा ताने सुनकर

हो गया सारा ग़ैर ज़माना,
बंद किया है आना जाना,
दुख होता है बंद पड़े हैं मैखाने सुनकर,
थक गया हूँ मैं तेरे बहाने सुनकर,
अब ना ज़िंदा रह सकूंगा ताने सुनकर

तेरा सच या उनका झूठ,
ज़हर ही मिल जाये दो घूँट,
कैसे होगा उनकी बात ना मानें सुनकर,
थक गया हूँ मैं तेरे बहाने सुनकर,
अब ना ज़िंदा रह सकूंगा ताने सुनकर

अपने दिल दिमाग़ की मान,
हुआ बहुत अब यशु जान,
हम तो अब हैरान हैं उनके पैमाने सुनकर,
थक गया हूँ मैं तेरे बहाने सुनकर,
अब ना ज़िंदा रह सकूंगा ताने सुनकर

3.रखो लाज मेरी गुरु नानक
रखो लाज मेरी गुरु नानक,
मेरा परिचय ना खास,
मैं आपका आप हो मेरे,
रहूँ बन चरणों का दास

माया का मैं रोगी लोभी,
उच्च कोटि का वस्तु भोगी,
मुझे इस बवंडर से बचावो,
मेरी एक ही है अरदास,
रखो लाज मेरी गुरु नानक

काली बदली मुझपे छाई,
दुश्मन हुआ है भाई-भाई,
करो उपाय ऐसा सद्गुरु,
टूटे ना मोरी आस,
रखो लाज मेरी गुरु नानक

खेल करे कोई जानबूझकर,
मोहे सताए सूझबूझकर,
यशु जान की विनती सुनो,
बुरा ना होये आभास,
रखो लाज मेरी गुरु नानक,
मेरा परिचय ना खास,
मैं आपका आप हो मेरे,
रहूँ बन चरणों का दास


4.राम-राम करते
राम-राम करते मेरा,
तन ही हुआ राम,
बोलो क्या करूँ,
मन,आँखों में राम मेरे,
राम चारों धाम,
बोलो क्या करूँ,
राम-राम करते मेरा

मैं नाचूँ दीवानी होकर,
मात-पिता सब राम,
राम भक्ति मेरी शक्ति,
जप्ती सुबह-शाम,
राम संग सीता लक्ष्मण,
हनुमान जी प्रणाम,
बोलो क्या करूँ,
राम-राम करते मेरा

रावण जैसे दुष्ट का भी,
तोड़ा था अभिमान,
तेरे भक्त की भक्ति आगे,
क्या है मेरा दाम,
तेरे लिए सारे सम हैं,
ख़ास हो या आम,
बोलो क्या करूँ,
राम-राम करते मेरा

मेरे घर में आओ बनके,
मेरी देह के प्राण,
आपके चरणों में ही बैठूं,
दो ऐसा वरदान,
तू ही सबका भाग्य विधाता,
कह गया ये यशु जान,
बोलो क्या करूँ,
राम-राम करते मेरा


5.कविता आपको हिला देगी

पूरे जहान में छोर मचा देगी ,
मेरी ये कविता आपको हिला देगी ,
कुछ सवाल करूँगा ,
जवाब भी दूंगा ,
लिख़ने से पीछे ना हटूंगा ,
सारी बात समझा देगी ,
मेरी ये कविता

परीक्षा लेती है जो हमारी ,
कौनसी चीज़ है सबसे भारी ,
नेता लोग हैं उसे उठाते ,
थोड़े दिनों में भूल भी जाते ,
जो अपने घर में उनको प्यारी ,
ऐसी चीज़ है ज़िम्मेदारी ,
तोल सकें ना फिर भी भारी ,
बड़ी है भारी ज़िम्मेदारी ,
देखना उलझनों में फसा देगी ,
मेरी ये कविता

जिसके पास गुणों की खान ,
मुट्ठी में कर लेता जान ,
मन माला की फेरे तस्वी ,
ख़ुदा से ऊंची उसकी पदवी ,
जिसका कोई ना अंत-शुरू ,
उसको बोलते पूर्ण गुरु ,
वही बताए नर्क - पुरु ,
ऐसे होते हैं पूर्ण गुरु ,
उलझी गुत्थी को सुलझा देगी ,
मेरी ये कविता

होते हुए भी जो ना है ,
छूते हैं फिर भी है क्षय ,
प्राणी सिर्फ़ है दुःख ही पाता ,
और किसी का कुछ ना जाता ,
ख़ुदा ने हमें बनाकर खेला ,
कहते हैं जिसे दुनिया का मेला ,
कठपुतली हम यशु वो अकेला ,
कैसा है ये जगत झमेला ,
कर कुछ ना कुछ ग़ुनाह देगी ,
मेरी ये कविता आपको हिला देगी ,
मेरी ये कविता


6.सरकारों के झोल

मेरा सिर झुक गया शर्म से ,
देखकर भूख से तड़पता इंसान को ,
ज़ुबान बाहर आ गई मेरे हलक से ,
ग़रीबी के हालात में देख निकलती जान को
 
सरकार कहती है खज़ाना ख़ाली है ,
ये कहना जनता के मुँह पे गाली है ,
मैंने तो हर चीज़ पे कर चुकाया है ,
साबुन , तेल या मेरी कमाई माया है ,
फिर भी खज़ाना इनका ख़ाली पाया है ,
कैसी समस्या घेरे है हिंदुस्तान को ,
मेरा सिर झुक गया शर्म से
 
सरकारी तनख़्वाह समय पर आती ,
मज़दूर की मज़दूरी घटती ही जाती ,
क्या बताऊं मिट्टी में मिल गई जवानी ,
सरकारें कर रही हैं अपनी मनमानी ,
जनता को मूर्ख समझे जनता है ज्ञानी ,
भूल गए आज़ादी के उस वरदान को ,
मेरा सिर झुक गया शर्म से
 
फ़िल्मी सितारे करोड़ों में कमाते भाई ,
हवाई जहाज़ों में घूमें इतनी है कमाई ,
वो बच्चा भला किसे सुनाए अपना दुखड़ा ,
चुराता पकड़ा जाये जो रोटी का टुकड़ा ,
देखने वाला होता है उसका मासूम मुखड़ा ,
कोई तो हल बता मौला यशु जान को ,
मेरा सिर झुक गया शर्म से
 
  यशु जान ( प्रसिद्ध लेखक और असाधारण विशेषज्ञ )

 
   
 
  7.यारों की याद
यारों की याद में हर शाम जी लेते हैं,
ना-ना करते भी एक जाम पी लेते हैं

वो बातें ही छेड़ते हैं दर्द देने वाली ऐसे,
कि नशे में हम उनका नाम ही लेते हैं

कभी-कभी हम ख़ुद को भूल जाते हैं,
वक़्त आने पर होश से काम भी लेते हैं

ख़ुदा जाने ये दोस्ती है कितनी गहरी,
ग़लत होते हुये भी हम ज़ुबान सी लेते हैं

यशु की जान उनकी जान में है यूं फसी,
उनकी बदज़ुबानी को शान मान जी लेते हैं



8. तुम क्या चीज हो


दफ़ा हो जाओ दुनियां से ,
तुम बदलने चले हो देश को ,
कोई शख़्स बदलना चाहे ना ,
तुम छोड़ो इस कलेश को ,
अभी तक खड़े हो छाती तानकर ,
बड़े ही बत्मीज़ हो ,
यहां अकबर जैसे हाथ हिलाते चले गए ,
तुम क्या चीज हो

यहां गिनती ज़्यादा बिकने वालों की है ,
कम गिनती देश पे मर - मिटने वालों की है ,
तुम मेरे दुश्मन नहीं भलाई के नाते बोलूं ,
तुम मेरे अजीज़ हो ,
यहां अकबर जैसे हाथ हिलाते चले गए ,
तुम क्या चीज हो

संविधान रचयता की मूर्ति के आगे जाकर ,
वापिस मुढ़ आते झूठी कसमें खाकर ,
बाहर - बाहर का है सम्मान ,
तुम भी होने वाले शहीद हो ,
यहां अकबर जैसे हाथ हिलाते चले गए ,
तुम क्या चीज हो

अब मनुवाद की बोली फैलने देंगे ना ,
जो मर्ज़ी हो जाए किसी से रिश्वत लेंगे ना ,
जो अंकुरित हो पौधा बनेगा ,
तुम यशु जान वो बीज हो ,
यहां अकबर जैसे हाथ हिलाते चले गए ,
तुम क्या चीज हो



9.हम नहीं डरेंगे,

हम नहीं डरेंगे,
कागज़ी तलवारों से,
बेतुके हथ‍यारों से,
सरकारी डाकुओं से,
तेज़धार चाकुओं से,
हम नहीं डरेंगे

चाहे कोई फरज़ी हो,
या सरकार की मर्ज़ी हो,
किसी के हाथ में नोट रहे,
कोई मांगता वोट रहे,
हम हैं देश के नागरिक,
नहीं सकते हैं जो बिक,
हम झुकेंगे नहीं मगर,
डट कर हम लड़ेंगे,
हम नहीं डरेंगे

जिस तरह का हो माहौल,
बनने देंगे ना माखौल,
हम भी हैं किसी माँ के बेटे,
दुख में भारत को क्यों देखें,
आज़ादी पर हुआ गुलाम,
देश बना जो हिन्दुस्तान,
नेताओं के जूते ही,
उनके सिर पर पड़ेंगे,
हम नहीं डरेंगे

सब हैं मेरे भाई - बहन,
चिंतन अब करेंगे गहन,
बाकी देशों की तरह,
अच्छा होगा रहन - सहन,
सब देशों से ऊंचा यारा,
ये है भारत देश हमारा,
यशु जान हम सब,
मिलकर ही चलेंगे,
हम नहीं डरेंगे


10.उन्नीस सौ सैंतालीस


उन्नीस सौ सैंतालीस से लेकर,
अब तक आगे पता नहीं कब तक,
जिस सरकार का पेट नहीं भरा,
वो आम आदमी का पेट क्या भरेगी,
जिस सरकार की पीढ़ीओं ने ,
मेहंगाई के सिवा कुछ ना किया,
वो अब आकर क्या करेगी

वही होगा जो सत्ता में आने के बाद होता है ,
जनता रूपी तोता पिंजरे में आने के बाद ही रोता है ,
पाँच साल ही मिलते हैं पाँच सौ साल नहीं ,
जो फ़िर कह देते हो ,
इस बार फ़्लानी सरकार ,
जनता की की हुई ग़लती का हर्जाना ,
आख़िर जनता ही तो भरेगी ,
उन्नीस सौ सैंतालीस से लेकर

रैलियाँ निकलेंगी जनता पछताएगी पाँच सालों में ,
सरकार आने के बाद जैसा ख़्याल था रह गया ख्यालों में ,
शेरों की खाल में भेड़िये हैं छुपे हुए,
जिनको मालूम नहीं है ,
ये सत्ता नहीं है सट्टा ,
यशु जान कहे देश के वासियों संविधान को ,
पढ़ो जानों सरकार हमसे डरेगी ,
उन्नीस सौ सैंतालीस से लेकर



11.सरकार
मेरी कविता के ऊपर कोई सरकार नहीं है,
मेरी कविता किसी की मुहताज नहीं है,

और सरकार कब दिखती है,
जब मतदान का समय निकट होता है,
लोगों के पैरों में जा गिरती है,
जब इनके शिकार का समय निकट होता है
मगर सरकार मेरी कविता की हकदार नहीं है

देश का नागरिक है आज़ाद,
क्यों दबा हुआ है इन दरिंदो के नीचे,
अभी भी समय है उठे नींद से,
जो हाथ कभी ना आएंगे इसके,
भागता है ऐसे परिंदों के पीछे,
लोकतंत्र तो लोकतंत्र है दिखावे का यार नहीं है

होकर एक दूसरे के ख़िलाफ़,
हमें बेवकूफ़ बनाना इनका काम है
पर आपस में रिश्तेदार हैं सब,
इनका लोगों को आकर्षित करना कामयाब है,
इन्हें अपनी जेब की चिंता है किसी से प्यार नहीं है

यशु तेरी हर कविता, ग़ज़ल,
क्या बिगाड़ सकती है ऐसे शैतानों का
पर मुझे पता है मेरी कविता,
जिस्म तक साड़ सकती है इन हैवानों का,
जनता का इशारा चाहिए और किसी इंतज़ार नहीं है


12.हम दरबदर भटकते रहे उनकी तलाश में
हम दरबदर भटकते रहे उनकी तलाश में,
आँखों से अश्क टपकते रहे उनकी तलाश में

वो थे नहीं या ख़ुदा ने ही बनाया ना उनको,
हम बीच में लटकते रहे उनकी तलाश में

मोहब्बत पाक थी हमारी हमने की है सिर्फ वफ़ा,
सब बेवफ़ा समझते रहे उनकी तलाश में

वो महलों में पले और बन गए गुलफ़ाम की तरह,
हम मुश्किलों को गटकते रहे उनकी तलाश में

अब तो यशु में भी दम ना रहा दर-दर भटकने का,
ख़ुद की आँख में खटकते रहे उनकी तलाश में


यशु जान (9 फरवरी 1994-) एक पंजाबी कवि और अंतर्राष्ट्रीय लेखक हैं। वे जालंधर शहर से हैं। उनका पैतृक गाँव चक साहबू अप्प्रा शहर के पास है। उनके पिता जी का नाम रणजीत राम और माता जसविंदर कौर हैं । उन्हें बचपन से ही कला से प्यार है। उनका शौक गीत, कविता और ग़ज़ल गाना है। वे विभिन्न विषयों पर खोज करना पसंद करते हैं। उनकी कविताएं और रचनाएं बहुत रोचक और अलग होती हैं | उनकी अधिकतर रचनाएं पंजाबी और हिंदी में हैं और पंजाबी और हिंदी की अंतर्राष्ट्रीय वेबसाइट पे हैं |उनकी एक पुस्तक 'उत्तम ग़ज़लें और कविताएं' के नाम से प्रकाशित हो चुकी है | आप जे . आर . डी . एम् . नामक कंपनी में बतौर स्टेट हैड काम कर रहे है और एक असाधारण विशेषज्ञ हैं |उनको अलग बनाता है उनका अजीब शौक जो है भूत-प्रेत से संबंधित खोजें करना,लोगों को भूत-प्रेतों से बचाना,अदृश्य शक्तियों को खोजना और भी बहुत कुछ | उन्होंने ऐसी ज्ञान साखियों को कविता में पिरोया है जिनके बारे में कभी किसी लेखक ने नहीं सोचा, सूफ़ी फ़क़ीर बाबा शेख़ फ़रीद ( गंजशकर ), राजा जनक, इन महात्माओं के ऊपर उन्होंने कविताएं लिखी हैं | वे अपनी उपलब्धियों को अपनी पत्नी श्रीमती मृदुला के प्रमुख योगदान के रूप में स्वीकार करते हैं।

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