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लघुकथा - पानी की मजबूरी - ज्ञानदेव मुकेश

पानी की मजबूरी 

ज्ञानदेव मुकेश       

मैं एयरपोर्ट पर पानी की तलाश में भटक रहा था। कहीं कोई नल नहीं था, जहां स्वच्छंद रूप से बह रहे पानी के रेला के नीचे हथेली जोड़कर हलक को गीला कर सकूं। हर तरफ बंद बोतलों में ही पानी घुटता और तड़पता हुआ दिख रहा था। आखिर, मैंने उसी पानी को पीना स्वीकार किया। मगर ऐसा पानी भी कहीं भी 60 रुपए से कम में उपलब्ध नहीं था। मैं 20 रुपए से कम में मिलने वाले बोतल की तलाश घूमता रहा। मगर वैसा बोतल नहीं मिला। एक दुकानदार ने कहा, ‘‘यह एयरपोर्ट है। यहां पानी महंगा ही मिलेगा। यहां ऊंचे ब्रांड के ही बोतल मिलते हैं।’’
मैं तिलमिला उठा, ‘‘हद् ज्यादती है। पानी के भी ब्रांड ?’’
आखिर मजबूरी के सामने घुटने टेकते हुए मैंने 60 रुपए निकालने के लिए जेब में हाथ डाला। तभी सामने एक स्टॉल पर 40 रुपए प्रति गिलास की दर से लस्सी मिलती हुयी दिख गयी। मैंने सोचा, ‘प्यास ही बुझानी है तो क्यों न लस्सी का मज़ा ले लिया जाए।’


मैंने दुकानदार से कहा, ‘‘रखो अपना पानी। मैं लस्सी पीने जा रहा हूं।’’
मैं लस्सी की दुकान पर आ गया। मगर मेरी आंखों के सामने पानी के बोतल नाचते रहे। मैं फौरन वापस पानी की दुकान पर आ गया। मैंने 60 रुपए निकाले और दुकानदार की तरफ बढ़ाते हुए कहा, ‘‘भैया, एक बोतल पानी ही दे दो।’’
  दुकानदार ने व्यंग्य से पूछा, ‘‘भाई साहब, लस्सी से प्यास नहीं बुझ रही थी क्या ?’’
  मैंने कहा, ‘‘मैं प्यास बुझाने नहीं आया हूं। प्यास तो लस्सी से बुझ ही जाती।’’


  दुकानदार ने पूछा, ‘‘फिर यहां क्यों आए हो ?’’
  मैंने कहा, ‘‘मैं कैद में पड़े पानी को मुक्त कराने आया हूं।’’
 
   
                                                 -ज्ञानदेव मुकेश                          
                                   पता-
                                               फ्लैट संख्या-301, साई हॉरमनी अपार्टमेन्ट,
                                               अल्पना मार्केट के पास,
                                               न्यू पाटलिपुत्र कॉलोनी, 
                                               पटना-800013 (बिहार

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