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पुस्तक समीक्षा:- समीक्षक : तेजपाल सिंह ‘तेज’ पुस्तक का नाम; सपने अच्ची लगते हैं(कविताएं)\ कवि :राजपाल सिंह राजा

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पुस्तक समीक्षा:-

समीक्षक : तेजपाल सिंह ‘तेज’

पुस्तक का नान; सपने अच्ची लगते हैं(कविताएं)\

कवि :राजपाल सिंह राजा

प्रकाशक: कैलाश चौहान12/224 एम सी दी फ्लेट्स, रोहिणे, दिल्ला

पृष्ट 120 मूल्य : 150\- रुपये

इन्द्रधनुषी सपनों की शंकाए और अशंकाएं

अप्रैल 2019 को दिल्ली यूनीवर्सिटी के एक मान्य विद्यालय में मेरी मुलाकात राजपाल सिंग जी से हो गई। हालांकि मेज्र्र् उनसे यह पहले ही मुलाकात थी, लेकिन यह सम्भव हो कि उन्होंने मेरा नाम किसी रूप में कहीं सुन लिया हो। संयोगवश मैं उनके पास वाली सीट पर ही बैठा था। बात-बात में एक दूसरे से रू-ब-रू हुए। इसी बीच उन्होंने अपनी स्द्यप्रकशित पुस्तक ‘सपने अच्चे लगते हैं’ सप्रेम मुझे अर्पित करदी। किंताब के कुछ पेज पलटकर देखा तो पाया कि उनकी ये किताब निरानिरी कविताओं की किताब् नही थी। मुझे ऐसा देखकर आश्चर्य कम, खुशी इसलिए ज्याद हुई कि राजपाल जी ने कविता को पेंटिग के आवरण में ढाककर कविता को एक नया आयाम और पेंटिग को कविता का जामा पहनकर एक नई साहित्यिक विधा को जन्म दिया है यह बात अलग है कि साहित्य जगत इस प्रणाली को अपनाने कितना समय लगाएगा।

वरिष्ट साहित्यकार नेमीशराय इए राजपाल सिंह की कविताओं को तथार्थ और सपनों की बीच की कशमकस मानते हैं। उनका मानना है कि नई शताब्दी की दस्तक के बाद अधिकांश दलितों के जीवन में अंधेरा है। लंबी यात्रा के बावजूद वे भटकाव के दौर से गुजर रहे हैं। कुछ लाचार हैं तो कुछ बेबस कुछ भ्रमित हैं। इसका आशय ये हुअ कि नेमीशराय जी ये मानते है कि इस प्रकार की रचना-.प्रक्रिया से समाज में व्याप्त भटकाव और भ्रष्टाचार के ग्राफ में कुछ अन्तर आएगा,,,काश कि ऐसा हो जाए।

इतना ही नहीं, कुछ दलित जीवन और मृत्यु की कश्मकस में जूझ रहे हैं। कहना न होगा कि दलित समाज के अधिकांश साथी तथाकथित विराट हिंदू संस्कृति के जाल में अभी भी फंसे हुए हैं हालांकि कुछ बाबा साहेब के शिक्षित बनो, संगठित हो, संघर्ष करो के सूत्र को आत्मसात कर आंदोलनरत हैं, वे जड़ से विचार की ओर बढ़ रहे हैं उनके भीतर जीवटता है बाबा साहेब के सपनों को साकार करने की ललक है। लेकिन मेरा मानना है इनमें से ज्यादातर वे लोग हैं जो राजनीती के पित्ठू बनना चाहते हैं। कवि की कविताएं लगता है कि ऐसे लोगों पर तीखा प्रहार करती हैं।

माँ है तो

गाँव जाना अच्चा लगता है

<><><>

माँ के आँचल में

छिपी दुनिया,

जो मेरे जीवंको हरा-भरा बनाती है

इतना ही नहीं वो वोटर को भी साअधान करते हैं

कुछ दिन तो लोकतंत्र दिख

अब तक तानाशाही ही दिखी

इसी क्रम में जयप्रकाश जी का कहना है कि राजपाल की कविताएं नई आकांक्षाओं को जन्म देते सपने हैं। वे निन्द्रावस्था और खुली आँखों देखे गए दोनों ही सपनओं की व्याक्या करते हुए राजपाल की कविताओं को अल्प समय और दीर्ध समय की कसोटी पर कसने का प्रयास तो करते हैं किंतु सपनों के मनोविज्ञान का वर्गीकरण् करगे हुए यथार्य और मनोवैज्ञानिक की समीक्षा के गणित को जैसे स्प्ष्ट करने का प्रयास करते-करते कवि को साधने के प्रयास में यह खहके संतोष बन्धाते हैं कि कवि एक अम्भेडकरवादी है। सो उनके सपने में अम्बेडकरवार और अम्बेडकर वाद से जुड़े लाखों/करोड़ो लोगो के सपने को साकार होता देखना चाहते हैं। अपने आपको एक महायोद्धा के रूप में देखने को प्रयासरत है। और इनमें शंका भी नहीं यही निरंतर प्रयास रहे तो सफलता उनके ज्याद दूर नहें है? बसकरते कि कवि की कविताएं सकमुच पाठक तक पहुंच जाएं।

बकौल कवि -

मां है तो

गांव जाना अच्छा लगता है खेत-खलिहान,

ग-बगीचा मां की याद दिलाती

वो हर चीज अच्छी लगती है। मां के आंचल में

छिपी दुनिया, जो मेरे जीवन को हरा-भरा बनाती है।

मां जब नहीं होती, उसका भी बेबाकी से कवि वर्णन करता है

सपने अच्छे लगते हैं

आज हृदय में

एक वेदना चीत्कार उठी। आज मां का साया

मेरे ऊपर से उठ गया।

कवि का कहन है कि निश्चित ही मां को लेकर मैं महत्वपूर्ण कविता की रचना की है जिसे पढ़ कर भावनाएं उद्वेलित हुए बिना नहीं रहतीं क्योंकि हर किसी की मां होती है वह बात अलग है कि किसी के साथ मां की ममता होती है और कोई मां के प्यार से महरूम होता है इस होने और न होने की दोनों स्थितियां ही मनुष्य को प्रभावित करती है

यथोक्त की आलोक में अध्ययन किया जाय तो युवा कवि राजपाल सिंह ‘राजा’ के भीतर भी ऐसे ही कुछ सामाजिक सवाल हैं, जिनको लेकर वे व्यथित हैं। वे हिंदू धर्म और वर्ण-व्यवस्था के पैरोकारों से सवाल करते हैं... उन्हें चेतावनी भी देते हैं साथ ही दलितों को सावधान भी करते है, इसलिए कि विषय और विकट परिस्थितियों के भंवर से वे बाहर आएं... आत्मस्वाभिमान के साथ अपना जीवन जिएं.... सपनों को पूरा करें... समाज को आगे ले जाएं.... दलितों के भीतर शिक्षा का उजाला आए। इन्हीं सब सवालों और चुनौतियों को लेकर कवि ने ‘सपने अच्छे लगते हैं’ के तहत कुछ कविताओं का सृजन किया है, जो काबिले तारीफ है किंतु अक्सर कविताएं उनकी पेंटिग़्स के आगोस में समाकर रह गई हैं। ‘सपने अच्छे लगते हैं’ कविता संग्रह की कविताओं में यथार्थ और सपनों की कश्मकस की ऐसी बानगी है, जो दलितों को आह्वान करती है इस कविता में जीवन का विरोधाभास है जैसे सपनों और यथार्थ के भीतर भी होता है | यहाँ यह कहना अतिश्योक्ति लगेगा कि कवि ने नींद में आने वाले सपनों और उन्नति के लिए साकार बुने जाने सपनों का कहीं भी वर्गीकरण नहीं किया है। इसलिए उनके सपनों की स्ष्पष्ट गणना करना एक टेड़ी खीर बनकर रह गई है। मुझे लगता है कि उनके सपने नेजी होकर रह गए है, सामाजिक नहीं।

सारांसत:कहना न होगा कि प्रस्तुत पुस्तक दर्श्नीय ही नहीं संग्रहनीय भी क्योकि मैंने आज इतनी सुसज्जित पुस्तक देखी ही नहीं है” पुस्तक का पेज-पेज सचित्र है। सम्पूण पुस्तक मल्टी कलर्स में छपी है कविताएं भी रंगीन् पृष्ठ्पभूमि पर प्रकाशित हैं। इसका एक मुख्य कारण यह भी है कि लेखक राजपाल सिंह राजा दिल्ली सरकार में चित्रकला के ही अध्यापक और राज्य सरकार का उत्तम शिक्षण का पुर्स्कार भी मिल चुका है। पेंटिग में अनेक अन्य पुरसकार भी मिल चुके हैं। सच तो ये भी है उनकी कविताएं और पेंटिन एक दूसरे में घुलमिल गई हैं आप विभिन्न सामाजिक संस्थाओं में सक्रीय भूमिका भी निभा रहे हैं. उतम भविष्य की कामना सहित।<><>

समीक्षक तेजपाल सिंह ‘तेज’ (जन्म 1949) की गजल, कविता, और विचार की कई किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं- ‘दृष्टिकोण ‘ट्रैफिक जाम है’, ‘गुजरा हूँ जिधर से’, ‘तूफाँ की ज़द में’ व ‘हादसों के दौर में’ (गजल संग्रह), ‘बेताल दृष्टि’, ‘पुश्तैनी पीड़ा’ आदि (कविता संग्रह), ‘रुन-झुन’, ‘खेल-खेल में’, ‘धमा चौकड़ी’ आदि ( बालगीत), ‘कहाँ गई वो दिल्ली वाली’ (शब्द चित्र), पाँच निबन्ध संग्रह और अन्य सम्पादकीय। तेजपाल सिंह साप्ताहिक पत्र ‘ग्रीन सत्ता’ के साहित्य संपादक, चर्चित पत्रिका ‘अपेक्षा’ के उपसंपादक, ‘आजीवक विजन’ के प्रधान संपादक तथा ‘अधिकार दर्पण’ नामक त्रैमासिक के संपादक रहे हैं। स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त होकर आप इन दिनों स्वतंत्र लेखन के रत हैं। सामाजिक/नागरिक सम्मान सम्मानों के साथ-साथ आप हिन्दी अकादमी (दिल्ली) द्वारा बाल साहित्य पुरस्कार ( 1995-96) तथा साहित्यकार सम्मान (2006-2007) से सम्मानित किए जा चुके हैं। आजकल आप स्वतंत्र लेखन में रत हैं।

सम्पर्क :  : E-mail — tejpaltej@gmail.com

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