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ओह! चाँद - डॉ. कविता भट्ट की कविताएँ

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1-ओह! चाँद / डॉ. कविता भट्ट

चाँद हथेली पर उग नहीं सका
सपनों वाली निशा से थी आशा

अश्रु-जल से बहुत सींची धरा
रेखाओं की मिट्टी न थी उर्वरा

खोद डाली बीहड़ की बाधा
मरु में परिश्रम अथाह बोया

रानियों के कारागृह में है या
मेरी हथेली सच में बंजर क्या

समय से संघर्ष है रेखाओं का
स्वप्न- निशा न आएगी है पता

किन्तु जाने क्यों मन नहीं मानता
हथेली पर चाँद उगाना ही चाहता

शुभकामनाएँ- सपने देखते रहना
निष्ठा से चाँद उगेगा- चाँदनी देगा

कल्पना पर तो वश है ही तुम्हारा
ओह! चाँद असीम चाँदनी लाया
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2-नीरवता के स्पंदन / डॉ. कविता भट्ट
  

मनध्वनियाँ प्रतिध्वनित करते, ओढ़कर एकाकीपन
प्रचुर संख्या में, चले आते हैं नीरवता के स्पंदन।
नीरवता के स्पंदनों को निर्जीव किसने कहा है?
प्रतिक्षण इन्होंने ही मन को रोमांचित किया है।
साँझ के आकाश पर कुछ बादल विभा के घनेरे से,
स्मृतियों में प्रणय-क्षण कुछ उस साथी के-मेरे से।
अन्तर्द्वन्द्वों के भँवर में खोया उद्विग्न सा मन,
बीते कल संग खोजता ही रहा उन्मुक्त क्षण,
और अब, चादर की सलवट से कभी बोलते हैं,
मेरे बनकर, परदों की हलचल से बहुत डोलते हैं।
हैं प्रतिबद्ध, यद्यपि हो निशा की कल-कल,
हैं चेतन प्रतिक्षण, यद्यपि दिवस जाये भी ढल।
मानव स्वभाव में व्यर्थ इनको न कहना,
ध्वनिमद के अहं स्वरों में कदापि न बहना।
अस्तित्व में विमुखता-अनिश्चितता है ही नहीं,
परन्तु संदेह-उद्वेगों की विकलता है ही कहीं।
अस्तित्व रखते हैं-नीरवता के स्पंदन,
निःसंदेह, हाँ वही-नीरवता के स्पंदन-
जिनमें है प्रशंसा, माधुर्य, स्मरण, चिंतन,
अपने भाव अपनी ही प्रतिक्रिया के टंकण।
सफलता-असफलता में वे ही पुचकारते हैं,
धीरे से- अधर माथे स्पर्श कर सिसकारते हैं।
रात को निश्छल किंतु सकुचाए चले आते हैं,
नीरवता के स्पंदन अकस्मात् मेरा दर खटकाते हैं।

3-आँसुओं का खारापन / डॉ. कविता भट्ट
 

विशाल सागर किन्तु खारा
आँसू भी अनन्त हैं खारे ही
कितना बड़ा अचरज है
सागर की एक बूँद भी नहीं पीते
परन्तु आँसू पीना ही पड़ता है
अस्तित्व की पहली शर्त जो है
हम जीवित हों या न हों
जीवित होने का ढोंग करते रहते हैं
और आँसुओं का खारापन
उपहास करता है; हमारा जीवनभर
हम निरुत्तर होकर अपलक निहारते
जबकि हमें प्रश्नचिह्न अच्छे नहीं लगते...
-0-
mrs.kavitabhatt@gmail.com

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