नाका - विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका. 

विविध विधाओं में से चुनकर पढ़ें -

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---

यहाँ की विशाल ऑनलाइन लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोज कर पढ़ें -

 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com  रचनाकार के वाट्सएप्प नंबर 8989162192 (कृपया कॉल नहीं करें, कॉल रिसीव नहीं होगी, तथा इसका उपयोग केवल प्रकाशनार्थ रचना भेजने के लिए ही करें) पर भी वाट्सएप्प से रचनाएँ अथवा रचना पाठ के वीडियो प्रकाशनार्थ भेजे जा सकते हैं. अधिक जानकारी के लिए यह पृष्ठ [लिंक] देखें.

--

भक्ति गीतों का संकलन- रतन लाल जाट

(1) गीत-“संकट समय भी”
                 
संकट समय भी हम विश्वास नया रखेंगे।
यमराज से लड़कर भी जीवन दुबारा लायेंगे॥
शुभ कर्मरत बाधा-विघ्न आते-रहते।
मगर अंत समय जीत का सेहरा बाँधेंगे॥

हिम्मत ना हारना, विश्वास ही जिन्दा रखता।
धरती-अंबर पर वरना, कभी दिन-रात होते ना॥
कौन पाप के दामन से बच पाया?
क्या पूण्य के हाथों कभी उसका अंत ना हुआ?
धीरे-धीरे एक उपाय नया खोज लायेंगे।
असंभव को भी संभव करके हम दिखायेंगे॥

धर्म-कर्म असफल नहीं होता है कभी।
अंबर के तारे भी दीपक लगते हैं कहीं॥
दुख के बाद हमेशा आता है सुख ही।
नैया पार लगाना है हार के कगार भी॥
मुरझे फूल को फिर से आज खिलायेंगे।
जन्नत इस धरती को हम बनायेंगे॥

- रतन लाल जाट

(2) गीत-“किस-किससे नहीं हुई भूल बिन सोचे?”
                         
किस-किससे नहीं हुई भूल बिन सोचे?
भरत ने भी चला दिया था बाण हनुमत पे॥

जब मुर्च्छित हो हनुमान गिरे।
तब राम-नाम वो जपने लगे॥
सुनत ये वचन सोचा भरत दौड़े।
हाय! क्या पाप कर दिया मैंने?

बहुत विनय करने पर, हनुमान को होश आया।
जल्दी खड़े हुए उठ, देखत मुस्काये भरत राम जैसा॥
नैनन ही नैनन जान गये सब।
भरत भी रोने लगे थे अब॥
समझ बैठा था मैं कि- कोई निशाचर है।
निकले आप तो मेरे भ्राता के सेवक हैं॥

हनुमत नाम भरत का सुनकर
गदगद् हुए कि- हो गया है उद्धार।
जिनको जान रहा था अनजान
वो निकले हैं अपनी ही जान॥

कई जन्मों के बड़े हैं भाग मेरे जो,
दर्शन हुए इनके रघुवर दूसरे समझो।
अपनों को गले लगाया एक-दूजे ने।
राम-कहानी पूछी, तो सोचा हनुमान ने॥

‘कैसे कहूँ मैं सच? भरत का दिल टूट जायेगा।
मगर कहना पड़ेगा, पाप है झूठ कुछ बोलना॥’
कह दी बात सारी, जो राम पर बीत रही थी।
भरत खो गये धीरज, जो आज तक थे धीरजधारी॥
और सुनकर हाल अपने लखन का।
भरत को राम से भी ज्यादा दुःख पहुँचा॥
खुद को कोसने लगे, वो खुद अपने आप से।
हनुमत धीरज दिलाके, उड़ गये फिर पवन-वेग से॥

- रतन लाल जाट

(3) गीत-“लखन का क्या होगा?”
                   
अंत समय जब विश्वास टूट रहा था।
कि- हनुमत क्यों नहीं आये? लखन का क्या होगा?

राम को अपने भक्त पर भरोसा है।
मगर अब और वक्त सहा नहीं जाये॥

विपत्त घड़ी में सुगम भी।
बन जाता है मार्ग दुर्गम भारी॥

दिन उगते ही अंत हो जायेगा मेरा।
अब और नहीं बचा कोई उपाय दूसरा॥

यह मन ही मन, सोच रहे थे राम।
आँखों से बरस रही थी अश्रुधार॥

तभी वानर-सेना को नजर आये हनुमान।
रोम-रोम नाच उठा, देखकर गिरिराज॥

रघुकुल राम की खुशी का नहीं कोई ठिकाना।
नीलकमल-सा मुख उनका एकबार खिल उठा॥

तुरन्त वैद्य ने पहचान कर संजीवन-पान कराया लखन।
पलभर भी देर ना लगी उठ खड़े हुए जल्दी ही लखन॥

बोले-लाओ, कहाँ है मेरे तीर-कमान?
बताओ भैया! मेघनाद का है अब काल॥

यह सुनकर लखन के वचन प्रभु ने विचार किया।
अब नहीं कोई रोक सकता है विनाश इन्द्रजीत का॥

- रतन लाल जाट

(4) गीत-"सीता के परिव्रत-धर्म को देखो”
                     
सीता के पतिव्रत-धर्म को देखो।
सपने में भी ना भाये, जो पराया हो॥

सबकुछ सहन कर लिया।
रानी से दासी बन जीया॥
मगर अपने मन-मंदिर में,
राम-नाम का दीप है जलाया।
कितने ही संकट आये भला?
मगर साथ पति का नहीं छोड़ा॥

हरण करके रावण लाया है।
मगर मन सीया का नहीं आया है॥
सिर्फ उसकी छायामात्र ही लंका में रही।
उसका सर्वस्व तो समाया था श्रीराम में ही॥
जागत-सोवत देखे रूप राम का।
रोवत-हँसत बोले नाम प्रभु का॥

इतनी शक्ति पायी, पतिव्रत निभाके।
रावण क्या? सारी लंका ही जल जाये॥
नहीं कोई दुस्साहस करे।
ना शक्ति को प्रताड़ित करे॥
अंत गति बहुत बुरी, कोई ना बच पाये।
नारी-धर्म पर आँच नहीं, जब तक चाँद-सूरज उगे॥
सीता-सी नारी ही, नाम है नारी का।
जिसके प्राण अपने नहीं, अगर साथ छुटे पति का॥

- रतन लाल जाट

(5) गीत-“पापी को देख पापी”
                  
पापी को देख पापी, आज फूला नहीं समाये।
छल-बल से जीती, जीत पर वो खूब इतरावे॥

इसको क्या मालूम है?
आगे क्या हाल होना है?
मद में भरे होश अपना खो जाये।
यूँ समझे कि- सियार शेर को जीते॥

लक्ष्मण को शक्ति लगा के,
मेघनाद लोक-विजय जाने।
और मन ही मन राम घबरावे,
इस अनर्थ से अब कौन उबारे?

सत्य-धर्म पर जो चलता है।
काल उसका नहीं कुछ बिगाड़ता है॥
पापी कितना ही पाप छुपाये?
एकदिन उसका अंत निकट आता है॥

झूठ से कभी सच ना हारे।
अधर्म धर्म को जीत ना पाये॥

अम्बर में आवास नहीं बनाया जाता है।
पानी में नहीं आग-शोला कभी जलता है॥

पेड़ बिना फल कभी नहीं आये।
जड़ किसी की पाताल में नहीं जाये॥

निर्णय एकदिन तो होना है।
दंड पापी को मिलना पक्का है॥
सबने यही कहा है।
धर्म भी यही कहता है॥

- रतन लाल जाट

(6) गीत-“अपने बीरन को देख”
                        
अपने बीरन को देख मुर्च्छित
रघुवर हो गये विचलित।
क्या हुआ भाई मेरे!
कैसी यह घड़ी आयी है?

काहू को ना मर गया मैं?
क्यों हूँ अब जिन्दा यह देखने?
हिम्मत हार गये, दिल से काँप उठे।
नैनन से जल ढ़रकाये,अश्रु ही अश्रु बहे॥

आज धीरजधारी का धैर्य टूटा।
जगदाता को भी जग दुखद लगा॥
जो दुख हरके औरों को सुख बरसाते।
आज कौन उनसे मुसीबत का पहाड़ उठाये॥

विश्वास ना होये कभी इस सत्य पर।
गिर सकता है नहीं इस तरह लखन॥
जो खुद धरती का भार धरे।
वो इस धरती पर कैसे गिरे?

लखन मेरा तू प्राण है, क्यों ना मेरे प्राण निकले।
मछली बिन पानी के, वैसे ही लखन बिना हूँ मैं॥
हो नहीं सकता है, कभी वो घायल महाकाल से।
फिर कौन शक्ति है, जो लखन का काल बने?

उठ मेरे भाई जाग तू! नहीं तुझको कुछ हुआ ।
बिन तेरे जग को मुख दिखाऊँगा मैं कैसे बता?
इसी जगह पर होनी अब मेरी समाधि है।
समझो, आज राजाराम की खत्म हुई कहानी है॥

सारे वानर संग हनुमान भी समझाये।
कि- हिम्मत ना हारो,आप खुद हिम्मतवाले॥
कोई ना कोई जतन हम कर ही लेंगे।
बलिदान देकर भी अपना हर विपति हर लेंगे॥

जाकर खुद महाकाल के घर
लायेंगे प्राण लखन के छिनकर।
चाँद-सूरज थम सकते हैं,
दिन में भी रात हो सकती है।
मगर यह संभव नहीं है कि-
लखन बिन प्रभु राम जीये॥

- रतन लाल जाट

(7) गीत-“लक्ष्मण के शक्ति लगने पर राम विलाप करे।”
                             
लक्ष्मण के शक्ति लगने पर राम विलाप करे।
कैसे मुख दिखाऊँगा जाकर अयोध्या मैं॥

जब लखन नहीं रहा।
तो मुश्किल है राम का बचना॥
धरती फट जायेगी।
और समाधि राम की॥
संकट यह जान गया दिल उर्मिला का है।
जलता दीप उसका कुछ क्षण को मंद हुआ है॥

राम ही जाने दुःख सबका।
आज कौन जाने दुःख राम का॥
हर कोई था स्तब्ध कि- क्या करे?
तभी ध्यान में आया एक उपाय विभीषण के॥

जिसके चारों ओर पहरा है।
उसका कौन क्या बिगाड़े?
लक्ष्मण के साथ सबकी दुआ है।
कोई ना कोई तो उसके प्राण बचाये॥
निराशा में भी आशा जगती।
राम बैठ गये, मगर हनुमत में शक्ति॥
लखन के लिए वो तीन लोक ला सकते तो।
फिर वैद्य और संजीवन ना लाये क्यों?
भाग्य में लिखा दुःख कोई ना टाल सकता है।
दुःख में भी विश्वास रख, एकदिन सुख लौटता है॥

- रतन लाल जाट

(8) गीत-“सीता-स्वयंवर”
                    
सीता-स्वयंवर में गुरू के संग
पहुँच गये राम और लखन।
देखते ही सभा में सब,
मन ही मन हुए प्रसन्न॥

जब आयी सीता, ध्यान प्रभु का खींचा।
बिन कुछ बोले, मिल गयी आँखें।
लाख-हजारों में, फिर भी वो पहचाने॥

राम ने देखा सिया को।
सिया ने देखा राम को॥
मन ही मन सोच लिया अपना मिलन।
यही लिखा था अपने भाग्य में केवल॥

फिर कौन तोड़ेगा शिव-धनुष?
सिर्फ राम ही है एक मनुज॥

कर-कर कोशिश हार गये सब
महाबली राजा-दावन भूल गये मद

धनुष-भंग करना तो दूर की बात
उठा ना सके कोई उसको अपने हाथ

राम-नाम पढ़ाया था उसको,
राम को देखते ही उठ गया वो।
ठीक तरह से छुया तक नहीं,
और टूट गया धनुष तब ही।

जय-जयकार हुई सभा में,
सिया मन ही मन फूली नहीं समाये।

सखियाँ लेकर फूल मालाएँ।
विजय गीत गाते-गाते॥
चल रही है बहुत धीरे।
  हंसनी हो सिया जैसे॥

- रतन लाल जाट

(9) गीत-"बहकावे में आ जाती है नारी”
                      
बहकावे में आ जाती है नारी।
जब उसके कोई कान भर देती॥
माँग बैठी थी वचन रानी कैकेयी।
बातों में आकर मंथरा दासी की॥

सोच-समझ सारी बुद्धि मारी गयी।
बस, अपनी स्वार्थ-पूर्ति में लग गयी॥
पति का मरणासन्न हाल कर गयी।
जिनको प्राणों से भी प्रिय वो भयी॥

अपने पुत्र के खातिर,
राम को वनवास दिलाया।
राम-भरत का प्रेम,
नहीं उसने कभी जाना॥
यह नहीं सोचा था कभी,
राम बिना भरत राजा बनेगा नहीं।
मर गये स्वामी हुई भारी बदनामी,
तब रानी मन ही मन खूब पछतायी॥
अवसर चला गया, अब कुछ बचा नहीं।
फिर भी राम से क्षमा माँग ली,
और राम ने भी उसको गले लगा ली॥

- रतन लाल जाट

(10) गीत-“कितना प्रचंड है भैया मेरा”
                  
कितना प्रचंड है भैया मेरा?
मेरे खातिर कुछ भी कर सकता॥
धधकती आग-सा है, लखन एक अंगारा।
जलकर भस्म हो जाये, जो कोई आये यहाँ॥

नहीं कोई ललकारे, मुश्किल फिर रोकना है।
सारा ब्रह्माण्ड काँप जाये, जब खुद शेषनाग फूँकारे॥

जब आज्ञा हो श्रीराम की।
तो देर फिर किस बात की?
ऐसा नहीं कुछ काम यहाँ।
जो लखन को दर्भर लगता॥

गर्व है मुझको, धन्य है वो।
जिसका भाई है, समान लखन के॥
इस दुनिया में नहीं फिर कोई संकट है।
त्याग करके अपना दुःख सारे पलभर में दूर करे॥

सबको मिले भाई ऐसा।
राम के साथ लखन जैसा॥

- रतन लाल जाट

(11)गीत-“मैया कौशल्या”
                 
मैया कौशल्या राम तेरा ही लाल नहीं
सब माताओं की आँख का वो तारा है।
भाई भरत-लक्ष्मण के साथ
हर भाई का वो हाथ दाहिना है॥

जिसने भी संकट में राम को पुकारा,
प्रभु ने आकर उसको गले अपने लगाया।
जटायु को दर्शन देकर मुक्ति दी,
और सुग्रीव को सिंहासन मारकर बाली।

जब सबरी ने मान लिया बेटा अपना,
तो आ पहुँचे अपनी माँ के हाथों बैर खाने।
रास्ते में ब्राह्मण का वेश धरे हनुमान को,
हँसकर अपना सेवक अनन्य स्वीकारा है॥

दुश्मन का भाई जब शरण में आ गया,
निडर होके बाँह फैलाकर स्वागत किया।
विनाश के कगार जा पहुँचे पापी को,
कहे कि- अहंकार छोड़ माफ गुनाह हजारों॥


डूबती नैया को पार लगाकर,
करूणानिधि सबको ही तारे।
हर दीन-दुःखी का दुःख हर,
खुशियों का सुखधाम लुटाये॥

अवधपुरी के रघुनन्दन,
हम करें तेरा ही अभिनन्दन।
जब तक साँस है अपनी,
जपेंगे माला तेरे नाम की।

हम पर अपनी दया रखना,
और सद्मार्ग ही सबको दिखायी दे।
पलभर तू दूर ना हमसे जाना,
चाहे छोड़ दें नाता सकल जग से॥

- रतन लाल जाट

(12) गीत-“एक सीता एक उर्मिला”
                     
एक वन में, एक महल में-२
एक सीता है संग रघुवर के।
एक उर्मिला अकेले अपने प्रिय से॥
दोनों की इस कहानी में,
कुछ अजब-सी बातें हैं।-२

सिया को नसीब मिला,
अपने पति संग रहने का।
उर्मिला को त्याग करना पड़ा,
लखन के सेवक बन जाने का॥

एकदिन सिया को दुष्ट रावण हर ले गया।
तब राम का दुख और भी गहरा हो गया॥
मगर लखन तो अपने भ्राता के खातिर भूल गये थे।
अपना सबकुछ हँसते हुए न्योछावर कर गये थे॥

जब मालूम हुआ कि- वन जायेंगे लखन
अपने भैया-भाभी की सेवा में समर्पण।
रहा न गया उर्मिला से तब
मन में ठान लिया था मगर॥

अपने स्वामी को रोकना है असंभव।
जहर पी लिया अपनी आँखें बन्दकर॥
राम नहीं सह पाये थे जुदाई सिया से।
उर्मिला ने तो एक विश्वास पर बरस गुजारे॥

उस दिन सोया विरह जाग उठा।
जब लखन को शक्ति ने सुला दिया॥
उर्मिला की भक्ति में जलता दीया।
अमिट विश्वास का प्रतीक डगमगाया॥

अपने आँचल की ओट से ना उसने बुझने दिया।
कितने ही जोर से क्यों ना आये आँधी-तूफां?
प्रेम-पंथ पर कंटक बिछे और उस पर चलना है।
मगर उर्मिल के वास्ते शूल भी फूल बना है॥

- रतन लाल जाट

(13) गीत-“चलकर हम आये हैं तेरे द्वार”
                          
चलकर हम आये हैं तेरे द्वार।
करते हैं सबकी अरज मेरे नाथ॥
हाथ जोड़ तेरे आँगन में,
शीश अपना तेरे चरणों में।
झूकाते हैं,
मालिक! झूकाते हैं॥

अपनी नहीं होगी,
अरज है यह सकल जग की।
उस भिखारी की अरज,
है उस अपाहिज की॥
कोई ना रहे तेरे दरबार में।
रोग-दोष बीमारी से पीड़ित
कोई ना रहे॥
करें तेरी आरती, नित पावन मंगलदायक।
चलकर हम आयें हैं तेरे द्वार…………

अपना कोई ना होगा,
सब तेरे बन्दे हैं।
मालिक! गीत तेरे गायें,
प्रेम-बंधन तुमसे मिलायें॥
भक्ति करने वाले,
सब आये हैं तेरे दरबार में।
नन्हें- नन्हें बच्चे
और बड़े-बूढे॥
कोई सुन्दर है वो बाला,
दूर बैठा अपाहिज अकेला।
सब राज आये, तेरे आँगन।
नाच करे,
इन पावन चरणों में।
सब भिखारी,
हम सब भिखारी है॥
हाथ जोड़ तेरे आँगन में,
शीश अपना तेरे चरणों में।
झूकाते हैं,
मालिक! झूकाते हैं॥
चलकर हम आयें हैं तेरे द्वार…………

- रतन लाल जाट

(14) गीत-“मेरे भगवान सब सुनते हैं।”
                               
मेरे भगवान सब सुनते हैं,
जो सच्चे दिल से बुलाते हैं।
उसकी पुकार पर द्रवित हो,
  वो दयानिधि भगवान आते हैं॥

अपने भक्तों के संकट हरने।
सबकी नैया पार लगाने॥
सुरलोक को छोड़के, वो आ जाते हैं।
जिनको अपने से,
ज्यादा भक्तों का खयाल रहता है॥
मेरे भगवान सब सुनते हैं……….

कौन कहता? आज देव नहीं।
भला कैसे जानें? कोई सुगन्ध उसकी॥
जिनको ना पता है,
उसकी लीला का।
कब सोचते हैं?
जिसका मिलना॥
एक पल भी,
जन्मों-सदियों बाद होता है।
मेरे भगवान सब सुनते हैं……….

क्या मन में? किसके है?
कहीं छिपके, कुछ करते हैं॥
रात हो या हो पाताल।
आज है या फिर बरसों बाद॥
साथ हैं वो सबके,
लेकिन ऐसी आँखें कहाँ?
जो देख सके,
रंग-रूप उसका॥
यहाँ ऐसा कोई नहीं है।
मेरे भगवान सब सुनते हैं……….

हर सच्चाई में वो,
गरीब की पुकार में वो।
चलती पवन, बहती नदियाँ,
फल-फूल, लहराती बगियाँ॥
यह सब रूप उसका है।
मेरे भगवान सब सुनते हैं……….

करूणा उसमें, परहित के संग।
दुख-दर्द में और भक्ति में हरदम॥
विश्वास वो है, अटूट सबका।
जितना सूरज को, अपनी किरणों का॥
और चाँद को, अपनी आभा का है।
मेरे भगवान सब सुनते हैं……….

दया-दान, धर्म-सेवा,
            जहाँ-जहाँ है।
कर लो विश्वास पक्का,
              वो भी वहाँ-वहाँ है॥
कोई जगह नहीं, नहीं है कोई।
दिन या तिथि-मास,
किसी का बन्धन नहीं॥
ऊँचा हो या नीचा,
धरती हो या आसमाँ।
लोक तीन, जिसका तू राजा॥
आ जा, आ जा, हमको भी जगमगा जा रे।
मेरे भगवान सब सुनते हैं……….

अनादि तू अजन्मा,
अजर-अमर है सदा।
भक्तों का तू है माली,
सारी धरा भी है तेरी॥
हम पर रहम कर दे।
मेरे भगवान सब सुनते हैं……….

- रतन लाल जाट

(15) गीत-“उस रब की महिमा है निराली”
                           
उस रब की महिमा है निराली-निराली।
यह जग उसके हाथों, चीज है छोटी-सी, छोटी-सी॥
जिसका है रखवाला वो,
उसका कोई दुश्मन नहीं-नहीं।
यदि जन्म दिया है उसने,
तब कोई मार सकता नहीं-नहीं॥
उसके आगे किसी का कभी,
कोई वश चलता नहीं।
बिन उसके कोई काम,
कभी सँवरता नहीं॥
उस रब की महिमा है……….

जब हम संकट में हो,
तो उसका नाम जपते हैं।
तब तक उसको आने में,
जरा देर लग जाती है॥
तभी तो हमें कहकर गया था।
वो दास कबीर उसका॥
उसको ना भूलो,
जब हो सुख की घड़ी।
यदि उसकी छत्रछाया,
हम पर पड़ गयी॥
  तब कभी, कोई धूप हमें,
लगती नहीं।
क्योंकि भक्तों के वश में,
भगवान है सदा ही॥
उस रब की महिमा है……….

दुनिया बड़े मतलब की,
जो काम बनते ही भूल जाती।
तब यह देखकर, उस रब का,
सोया हुआ गुस्सा।
ताण्डव बनकर, फूट पड़ता॥
भक्तजनों! भगवान को,
मरते दमतक याद रखना।
क्योंकि वो अजर-अमर है,
जो हरकहीं रहता॥
हम उसके पास रहकर,
मर-मिट जायें ।
तो कुछ नहीं बात है,
जो उस रब से छुपायें॥
बात यह दुनिया नहीं समझती।
उस रब की महिमा है……….

- रतन लाल जाट

(16) गीत-“हे देवी! मुझ पर कृपा करो।”
                                                                                                          
हे देवी! मुझ पर कृपा करो।
वीणावादिनी! ऐसा सुर बख्श दो॥
जब तक जीऊँ, नाम तुम्हारा जपूँ।
नाचूँ चरणों में, शीश नमन करूँ॥

रागों की तू एक माला,
उस माला का एक मोती।
इस भक्त को दान कर,
तू पद्मासना, वीणावादिनी॥
नित वन्दन करूँ,
जीवन अर्पण कर दूँ।
जब तक जीऊँ, नाम तुम्हारा जपूँ।
नाचूँ चरणों में, शीश नमन करूँ॥

तुम्हारे बिना जग नीरव लगता।
सुर तुम्हारा सारे संसार को रव देता॥
करो कृपा, वीणावादिनी।
बख्श दो, ऐसा सुर हे देवी॥
तुम्हारे चरणों का दास मैं,
तुम्हीं से मिली है जिन्दगी ये।
इस नीरवता में नया रव भर दो,
मुझ बेसुर को एक सुर बख्श दो।
हे देवी! मुझ पर कृपा करो।
वीणावादिनी! ऐसा सुर बख्श दो॥

- रतन लाल जाट

(17) गीत-“मुझे उस मजहब का पुजारी बना दो”
                        
मुझे उस मजहब का पुजारी बना दो।
जहाँ सब एकभाव से रहते हो॥
वहाँ मैं नित जा-जाकर,
मस्जिद में शीश नमन करूँ।
और सुबह उठकर,
चर्च में भक्ति-आराधना करूँ॥
सब जगह मुझको,
एक ही भाव लगे।
हम कभी ना माने, ऊँच-नीच को॥
यदि कोई नीच हो,
तो हम अपना देव समझे उसको॥
मुझे उस मजहब का पुजारी बना दो।
जहाँ सब एकभाव से रहते हो॥

मुझे सीखा दो,
रमजान में रोजा।
और नवरात्र में,
व्रत रखना॥
एक साथ मनाऊँ मैं,
दिवालीऔर भाईदूज रे।
इतना ही प्यारा हो पर्व मुझे,
वैशाखी और क्रिसमस रे॥
सुबह का नाश्ता,
क्रिश्चियन के संग करूँगा।
दोपहर का भोजन,
सिक्ख-जनों के साथ पाऊँगा॥
फिर चाय-पानी,
हिन्दू घर की पीना हो।
और रात का भोजन करने,
मुस्लिम-परिवार के बीच जाना हो॥
मुझे उस मजहब का पुजारी बना दो।
जहाँ सब एकभाव से रहते हो॥

हरकहीं पर जाऊँगा,
कोई मुझे मत रोकना।
मन मेरा लगे जहाँ,
किसी का मन नहीं लगता॥
फिर किसी बात का डर ना हो।
और आपसी भेदभाव का अंत हो॥
मुझे उस मजहब का पुजारी बना दो।
जहाँ सब एकभाव से रहते हो॥

- रतन लाल जाट

(18) गीत- “मेरे भगवान”
              
मेरे भगवान! तुम दया-कृपा कर मुझको।
इन गरीब-बेसहारा लोगों के बीच, एक दयावान बना दो॥
तब मैं अपना सबकुछ लूटा दूँगा।
अपने लिए बचाकर कुछ ना रखूँगा॥
चाहता हूँ सच्चे दिल से, बस यही एक तमन्ना।
गरीब को कपड़ा मिले और मिले बेसहारे को एक आसरा॥
यही दुआ करूँगा, आप सुन लो।
मेरे भगवान! तुम दया-कृपा कर मुझको।
इन गरीब-बेसहारा लोगों के बीच, एक दयावान बना दो॥

एक-एक पैसा खर्च करें, हम ऐसे काम पर।
ताकि दीन-जनों की आँखों से, ढलके प्रेम-मोती बन॥
बस, इन मोतियों को पिरोकर, एक माला मैं बना दूँ।
अपना सबकुछ लूटाकर, यही एक उपहार पा लूँ॥
यही एक मेरा सपना हो।
मेरे भगवान! तुम दया-कृपा कर मुझको।
इन गरीब-बेसहारा लोगों के बीच, एक दयावान बना दो॥

गरीबों के संग बैठकर, सूखी रोटी चबाऊँ।
बेसहारों को सहारा देकर, टूटी छप्पर में सो जाऊँ॥
फटे-मैले कपड़ो में लिपटकर, चटकती धूप में पसीना बहाऊँ।
हर दुःख-दर्द में संग इनके मिलकर, अपना हाथ बटाऊँ॥
महलों से कभी मेरा नाता नहीं हो।
मेरे भगवान! तुम दया-कृपा कर मुझको।
इन गरीब-बेसहारा लोगों के बीच, एक दयावान बना दो॥

बस, मुझको यहीं पर एक स्वर्ग लगता है।
और इसी स्वर्ग में सदा ही जन्म पाऊँ मैं॥
सुन लो, दयानिधि! दीनबन्धु करता है विनती।
आप बिन कोई ना अपना है, जो सुन सके मेरे मन की॥
ऐसा जग में और कोई ना हो।
मेरे भगवान! तुम दया-कृपा कर मुझको।
इन गरीब-बेसहारा लोगों के बीच, एक दयावान बना दो॥

- रतन लाल जाट

(19) गीत-“छिपाकर भी तू क्या छिपायेगा?”
                 
छिपाकर भी तू क्या छिपायेगा?
उस खुदा से क्या चीज बचायेगा?
किसी की नजरों से बचा लेगा।
दुनिया को भी झूठ बोल देगा॥

क्या उस रब के सामने,
कभी कोई छिपा है?
यदि छिपा रूस्तम है,
कोई इस दुनिया में॥
तब भी उसका है रखवाला।
वो जग का निर्माता॥
छिपाकर भी तू क्या छिपायेगा?
उस खुदा से क्या चीज बचायेगा?

जिसकी ना चाहत है किसी को।
फिर भी रब का प्यार है वो॥
जहां चाहे, कुछ करना।
हरपल सोचे, वो नया॥
लेकिन प्रभु के आशिष बिना,
करना कुछ भी मुश्किल है यारा॥
छिपाकर भी तू क्या छिपायेगा?
उस खुदा से क्या चीज बचायेगा?

जग के मालिक को,
है जग का पता।
यदि जग-निर्माता वो,
एकपल भी दूर हमसे रहता॥
तब कोई सोच ना सकता,
हाल हमारा क्या होता?
छिपाकर भी तू क्या छिपायेगा?
उस खुदा से क्या चीज बचायेगा?

सोचता है संसार,
करता है कुछ संसार।
उस रब की कृपा से,
कर पाते हैं उसके बन्दे॥
ऐसा ना सोचना, एकपल भी।
रब ना देख रहा, ना है पता कहीं भी॥
अकेला मैं, मेरे सिवाय कोई जाने नहीं॥
ज्ञानी होकर भी, निरा-पशु।
उस रब के हाथों तू॥
सूरज में वो छिपा,
उसके जादू से दिन उगा।
रोशनी वो देता,
पवन बनकर बहता॥
छिपाकर भी तू क्या छिपायेगा?
उस खुदा से क्या चीज बचायेगा?

खेत-खलिहानों से, गाँव-शहर में।
जादू-जादू-जादू, रब तेरा ही जादू है॥
सागर-नदी-पर्वतमाला।
निर्जन कोई स्थल ना रहता॥
छिपाकर भी तू क्या छिपायेगा?
उस खुदा से क्या चीज बचायेगा?
रहता है हरपल वो,
हरक्षण है उसकी ही घड़ियाँ रे।
ढ़लती साँझ में देखें,
उस रब के नजारे॥
अब समझ ले, पागल जन है।
तू इस जग का,
छिपाकर भी तू क्या छिपायेगा?
उस खुदा से क्या चीज बचायेगा?

- रतन लाल जाट

(20) गीत-“जब कृष्ण ने जन्म लिया था”
                          
जब कृष्ण ने जन्म लिया था,
मथुरा के बन्द कारावास में।
वसुदेव के संग थी देवकी,
वहाँ दोनों चुपचाप कैद थे॥
उनको ना मालूम यह था,
कि- भादो कहाँ बरस रहा है?
उमड़ रही थी बाहर नदियाँ,
इधर वो थे बन्द कारावास में॥
जब कृष्ण ने जन्म लिया था…………

मैया देवकी की आँखें, बरस रही थी।
जैसे हो वो, चमकती तेज बिजली॥
उस कृष्ण-अष्ठमी की,
अर्द्धरात्रि के अंधकार में।
चीरकर जता रही थी,
बार-बार कंस को ये॥
जब कृष्ण ने जन्म लिया था…………

हमको कारावासमें डाला,
औलाद आठवीं ने आज जन्म पाया।
जाग जा, तू निद्रा से कंस,
राक्षस! आज तेरा काल आया है॥
जब कृष्ण ने जन्म लिया था…………

तब हुआ था जयघोष, इस गगन-मण्डल में,
देख स्वप्न में, आवाज सुनायी दी वो।
तो जगकर कंस ने,
जगमग पायी थी मथुरा नगरी को॥
इधर कारावास की सलाखें, अपने आप टूट गयी।
उनके पैरों की जंजीरें, जैसे सोने के तार बन गयी॥
सागर हँसता हुआ, कर रहा था ठिठोली।
नदी यमुना, लग रही थी नाचती॥
उस वक्त भादो सावन बन गया था।
जब नन्द की बेटी को, कृष्ण समझ लिया॥
आया था वो, करने को कत्ल उसका।
काली अर्द्धरात्रि में, कंस डरता-डरता॥
उधर देवकी-वसुदेव दोनों ने जाके।
नन्द-यशोदा के द्वार खटखटाये॥
जब कृष्ण ने जन्म लिया था…………

आवाज सुनकर यशोदा दौड़ी,
कन्हैया को अपने घर ले आयी।
कान्हा-कान्हा बोली, लेकर उसको गोदी में।
छा गयी थी खुशियाँ, सारे ब्रजमण्डल में॥
जब कृष्ण ने जन्म लिया था…………

गोपियाँ नाची घुम-घुम, यहाँ से वहाँ।
ग्वालें भूल गये थे, अपनी गायें दुहना॥
अब आया है नन्दलाल,
ब्रज का वो माखनचोर।
नर-नारी झूम-झूम,
करने लगे मौज।
जब गली-गली में, बज रही थी बाँसूरी।
सुनकर बालाएँ, दिल अपना खो बैठी थी॥
ऐसा नटखट यारा, ब्रज में कौन आया है?
चलो, जाकर आज हम, उस मनमोहन को देख आयें॥
जब कृष्ण ने जन्म लिया था…………

मन में उमंग छायी,
पागल सब नर-नारी।
नाचने लगे, गीत गाने लगे।
आयो है नन्दलाल, ब्रज को माखनचोर रे॥
वो छैल-छबीली, राधा-राधी।
देखके उसको, सुध-बुध अपनी खो गयी रे॥
जब कृष्ण ने जन्म लिया था…………

- रतन लाल जाट

(21) गीत-“ऐसा पुरुष नहीं देखा”
                    
ऐसा पुरुष नहीं देखा,
मैंने प्रभु राम के जैसा।
जिसने अवतार लिया था,
भक्तों का उद्धार किया॥

दुष्ट पैशाचों का नाश कर,
असुर प्रवृति का संहार किया।
बढ़ गया था भार जब दावनता का,
तब धरती पर अवतार लिया था॥
ऐसा पुरुष नहीं देखा………

घमंड में डूबा, वो रावण था।
सोने की लंका का, जोअकेला राजा था॥
उसके आगे, भयभीत थे देवता।
अपमान कर उसने, भक्तों को सताया था॥
ऐसा पुरुष नहीं देखा………

तब चारों छा गया था।
पाप-कर्म का अंधेरा॥

जब प्रभु ने आकर यहाँ,
रोती-बिलखती जनता को देखा।
तब उसने रहा न गया,
उमड़ पड़ा था सागर करुणा का॥
ऐसा पुरुष नहीं देखा………

दीन-दुखी निर्दोष जनता,
चीख रही थी झेलकर पीड़ा।
हाथ जोड़कर प्रभु को,
सुनायी थी अपनी दुर्दशा॥
ऐसा पुरुष नहीं देखा………

कर दो विनाश, इस रावण-राज का।
जिसने आकर, यहाँ अत्याचार बढ़ाया॥
अधर्म-अन्याय फैलाया,
सत्य को परवश कर दिया।
अहिंसा को शर्मनाक कर,
बेकसूरों का खून पिया॥
ऐसा पुरुष नहीं देखा………

नारी को मान लिया, साधन अपने भोग का।
हाहाकार कर उठी थी धरा, गूँज उठा आसमां॥
तब आकर भक्तों को गले लगाया।
छुआछूत का भेदभाव मिटाया॥
शुद्र के घर खाना खाया।
अछूत के हाथों पानी पिया॥
ऐसा पुरुष नहीं देखा………

नारी को देव-शक्ति बताकर,
उसका पूजा-पाठ किया।
एकबार धरती पर दुबारा,
मानवता का पाठ पढ़ाया॥
मधुर बचन बोलकर,
सत्य-धर्म मानकर,
कि- परहित की सेवा॥
ऐसा पुरुष नहीं देखा………

वो रक्षक मर्यादा के,
अपने वचन के पक्के।
स्वर्ण-सिहांसन का त्यागकर,
काँटों भरी वन की डगर में घुमे थे॥
दर्द सभी का एकपल में दूर किया।
लेकिन अपना दर्द किसी को ना बताया॥
ऐसा पुरुष नहीं देखा………

सीधा-सादा उनका पहनावा था।
हीरे-मोती देख होती थी घृणा॥
अपने लिए कुछ ना रखा।
सब भक्तों को लुटा दिया॥
ऐसा पुरुष नहीं देखा………

दया-दान करुणा के,
वो परम पुजारी थे।
सत्य का आँचल पकड़े,
अहिंसा का व्रत निभाये।
वो दाता है शक्ति के,
रूप-सुन्दरता के खजाने।
शील से भरे-भरे,
अनमोल रतन है या हीरे॥
सारे जग ने यह पुकारा।
ऐसा पुरुष नहीं देखा………

- रतन लाल जाट

(22) गीत-"भगवान को सब पता”
            
भगवान को सब पता,
लिखा है हिसाब सबका।
किसी को कुछ देना,
तो किसी से लेना॥

अपना-पराया कोई भेद नहीं।
जो कर्म करे, उसको मिले फल भी॥
वो सच्चा करता है न्याय सबका।
ना किसी को कम, ना किसी को ज्यादा॥
भगवान को सब पता,
लिखा है हिसाब सबका।
किसी को कुछ देना,
तो किसी से लेना॥

जैसी करनी, वैसी भरनी।
जो उसको समर्पित,
उसका है वो रक्षक।
सारे जग का मालिक,
वो हम सबका मालिक॥

उसके दरबार में, सब जन एक हैं।
ना कोई धनवान, ना कोई कंगाल।
सुनता है वो सबकी,
करता है जो अरजी।

धनवान को कंगाल,
कंगाल को धनवान।
दुखी को सुखी करके,
सुखी को दुखी बनाके।
विद्वान के घर शैतान।
अनपढ़ के घर महान्॥
सबको हैं ध्यान,
फिर भी सब अनजान॥

लेकिन कोई समझे ना,
तो भला हम करें क्या?
भगवान को सब पता,
लिखा है हिसाब सबका।
किसी को कुछ देना,
तो किसी से लेना॥

- रतन लाल जाट

(23) गीत-“जीवन के सुन्दर उपवन में”
              
जीवन के सुन्दर उपवन में।
मन मेरा पपीहा-पपीहा है॥
धीरे-धीरे चहकता।
वो राम-नाम भजता है॥
आती हवा के संग जो,
रहता बेचैन चलता वो है।

न जाने कब आये?
सन्देश मिलने का।
कौन रोक सकता है?
जाने को मुझे वहाँ॥
जब चाहूँ, तब आऊँ,
जो कहूँ मैं, वो सुन ले।
दिल के अरमान को,
बिन किसी आवाज के॥
जीवन के सुन्दर उपवन में।
मन मेरा पपीहा-पपीहा है॥

यहाँ तो बस इतना ही,
चलता है वश अपना।
  जैसे हम हैं, चीज ऐसी,
तेरे हाथों बनी, मेरे रब्बा!

जैसे खिलते फूल की खुशबू,
आज उड़ गयी रे।
सरोवर का पानी,
सूरज सोंख गया रे॥
जीवन के सुन्दर उपवन में।
मन मेरा पपीहा-पपीहा है॥

निशा के हाथों,
उजाला गायब हो चला है।
बहते झरने को,
सागर ने बुला लिया है॥
जीवन के सुन्दर उपवन में।
मन मेरा पपीहा-पपीहा है॥

- रतन लाल जाट

(24) गीत-“नित उठ-उठकर”
             
नित उठ-उठकर,
दिल से साँसे करती है राम-राम।
खड़ा रहकर देखूँ,
मैं तुझको मेरे पास-पास॥

नित मेरे मन में तू,
जब चाहूँ, बात कहूँ।
अपनी-परायी जग के साथ वो,
सुनकर विनति मेरी आये हो॥
अब रहना अपने साथ,
ना करना कभी विराना हमें नाथ।
नित उठ-उठकर,
दिल से साँसे करती है राम-राम।

बनकर पवनसुत आये,
नये रूप धरकर अपने।
  सब प्यारे हैं नाम,
किस नाम से पुकारूँ मैं आज॥
नित उठ-उठकर,
दिल से साँसे करती है राम-राम।

कोई कहता अल्लाह है,
वो ही अपना राम है।
कहता हूँ मैं उसको,
ईशु अपना, जो प्यारा है॥

ब्रह्मा-विष्णु-शंकर,
सब रूप मुझको प्यारा।
शक्ति-देवी के,
रूप हैं हजारा॥
इस उपवन का तू है बागवान।
नित उठ-उठकर,
दिल से साँसे करती है राम-राम।

सच्चे दिल से पुकारा है,
जिसको नाम लेकर हमने।
वो ही अजब रूप धरके,
हमारे पास आया है॥
बाहर से नहीं, अपने में ही,
प्रकट हुई है, सौरभ उसकी।
मन को भाती, लगती है प्यारी॥
उसको मैं क्या दूँ नाम?
नित उठ-उठकर,
दिल से साँसे करती है राम-राम।

कभी साथ ना छोड़ूँगा,
तेरे लिए हैं सब अपना।
जिस पल जरूरत हो, आयेगा जरूर वो।
रूप-अनूप बनके, जग ना जाने उसको॥
मेरे प्रभु सुन लो यह पुकार।
नित उठ-उठकर,
दिल से साँसे करती है राम-राम।

- रतन लाल जाट

(25) गीत-“मैं तो तुझे मानता”
           
मैं तो तुझे मानता
और किसी को नहीं यहाँ रे।
सारे जहाँ का तू कर्त्ता है,
हम सब करते हैं कर्म तेरे पीछे।।

दुनिया एक नगरी है,
इस नगरी का स्वामी तू।
हम नगरी में रहनेवाले,
किसी दूसरे को माने क्यूँ?
जब अपना संगी तू,
धरती-अम्बर से आगे।
जीते-मरते हैं सब हाथों,
और तू हमें जीवन दे॥
सारे जहाँ का तू कर्त्ता है,
हम सब करते हैं कर्म तेरे पीछे।

अगर मान लें हम,
कि- कोई है अपने संग।
तुम जैसा आया है,
फिर भी वो तेरा है।
और हम सब तेरे,
तू हमारे में छिपा है॥

कभी भूलाने की तमन्ना
होगी हमारी पागलता।
मैं तो तुझे मानता
और किसी को नहीं यहाँ।
सारे जहाँ का तू कर्त्ता है,
हम सब करते हैं कर्म तेरे पीछे।
क्योंकि तू एक तरू है,
जातियाँ हैं उसकी डाल।
और मैं तो हूँ,
उसका एक पान॥
कुछ फिक्र नहीं है वो पत्ता,
कब टूटा या सूख गया।
वापस वो कौंपल बन
निकलेगा अति कोमल॥
यदि कहे कोई डाल मुझे,
कि- तू मेरा एक पत्ता है।
तो तुरन्त इन्कार करके,
नाम तेरा बताऊँगा मैं॥
सारे जहाँ का तू कर्त्ता है,
हम सब करते हैं कर्म तेरे पीछे।

ए डाली, जिसकी तू,
मैं भी उसका हूँ।
वो जितना तेरा,
है उतना ही मेरा।
वो सूख जायेगा,
तो फिर कैसे रहेगा, वो पत्ता हरा?
डाली! तब तुझको भी सूखना पड़ेगा॥
पल-पल तेरा राज है।
गिन-गिन तू हमें देता है॥
तब कौन है बीच हमारे,
जो एकपल भी दे सकता है॥

तुम बिन कौन सच्चा?
सारा जहां है कच्चा।
शाश्वत दीप-सा तू जलता,
मैं भी हूँ लौ का एक उजाला॥
मैं तो तुझे मानता
और किसी को नहीं यहाँ।
सारे जहाँ का तू कर्त्ता है,
हम सब करते हैं कर्म तेरे पीछे।

- रतन लाल जाट

(26) गीत-“हम करते हैं विश्वास”
               
हम करते हैं विश्वास,
पसारे हुए अपने हाथ।
थाम लेना हमको,
गिरने मत दो नाथ॥

अपना सर्वस्व है, जो आपको समर्पित।
निशि-दिन गायें, हम तुम्हारे गीत॥
बस, तेरे पीछे हैं अपना जीवन।
उसको करते हैं आज न्योछावर॥
हम करते हैं विश्वास,
पसारे हुए अपने हाथ।

जीवन यह, गीत तेरा।
भक्त हम, तू देव हमारा॥
भक्तों को मरने से,
तू हमेशा ही बचाता है।
भक्त तेरे जपने में नाम,
जीवन सारा कर देते हैं अर्पण।
हम करते हैं विश्वास,
पसारे हुए अपने हाथ।

खुद संकट में पड़ जाते हो,
अपने भक्त की बाधा हरने को।
दयावान हो तुम, हम दुष्टों का,
नाश नहीं, उद्धार करते हो॥
हमने की हैं गलतियाँ बहुत आज।
लेकिन दण्ड नहीं क्षमा मिल जाती है साथ॥
हम करते हैं विश्वास,
पसारे हुए अपने हाथ।

- रतन लाल जाट

(27) गीत-“मेरे प्रभु जगदाता”
            
मेरे प्रभु जगदाता,
मैं हूँ सेवक आपका।
सारी शक्ति हाथ तेरे,
मैं हूँ विश्वासी आपका॥
आप दयानिधि,
करूणा के सागर।
भक्तों पर बरसाते,
कृपा के बादल॥

अपने दिल की बात सुनके,
पूरे करते हो काज हमारे।
मेरे प्रभु! हम दीनजनों के,
साथ आप हमारी दौलत हैं॥

बाकी सबकुछ है धूल बराबर।
सारे जग में आप अजर-अमर॥
हमरी हस्ती आपके पीछे।
आप मालिक हो सबसे बड़े॥

हम छोटे भक्तों की,
एक दुआ है छोटी-सी।
सुनकर इसे पार लगाओ,
यह नैया अपनी डूब रही॥

मेरे स्वामी की महिमा है निराली।
उनके नाम में शक्ति और विश्वास ही भक्ति॥


आओ, स्वामी दर्शन दो,
चरणों में सीस झूकायें।
प्रभु! हम आपकी
दिन-रात महिमा गायें॥

जन्म-जन्म शरण पायें।
आपसे दूर हम कहाँ जायें?
प्रभु! सारी राहें निकलकर
आती है द्वार तुम्हारे॥

एकपल भी अलग रहना,
लगता है नरक के जैसा।
मेरे प्रभु अवतार लो,
हम भक्तों को दर्शन दो।
दया करो दान हमें,
आप त्रिलोकी प्रजा की सुनो॥

- रतन लाल जाट

(28) गीत-“यदि हमको भगवान ने”
             
यदि हमको भगवान ने,
प्यारा-सा जग में कोई काम दिया है।
तो फिर क्यों हम?
उस काम को भूल जाते हैं॥

नाम जपेंगे उस रब का,
अहसान भी मानेंगे।
कुछ नहीं है हमारा,
तूने दिया हमको उपहार यह है॥

यदि हमको भगवान ने अपने पास बुलाया है।
तो फिर क्यों हम? कोई एतराज करेंगे॥
जीवन यह उसके ही नाम है।
कुछ माँगेंगे नहीं कभी बदले में॥

जो भी देगा मालिक हमको,
खुशी से हम वही स्वीकर लेंगे।
वरना ऐसी कृपा पाना,
जन्मों तक नामुमकिन है॥

यदि हमको भगवान ने जग में,
सबसे बड़ा मानव जीवन दिया है।
तो फिर जीवन का मान घटने ना देंगे,
कभी ऐसा कोई बुरा काम हम ना करेंगे॥

प्रभु के नाम पर हम,
आज ऐसा कुछ खास कर
प्यारा-सा काम करके आज
जायेंगे यह जग छोड़कर
आने वाले भी राह अपनी चलेंगे।
उस रब का नाम लेकर दुआ करेंगे॥

- रतन लाल जाट

(29) गीत-“सारा जहां तू”
       
सारा जहां तू,
इस जहां से आगे भी तू है वहाँ,
सदा ही सदा॥

तेरी सूरत इतनी बड़ी,
कि- दुनिया लगे छोटी-सी।
हम सब तेरे, एक तू हमारा।
तेरे नाम पर क्यों, लड़े ये सारा जहां॥
सारा जहां तू,
इस जहां से आगे भी तू है वहाँ,
सदा ही सदा॥

जबकि तू है कितना भला?
जिसको ना किसी ने जाना।
फिर भी तुमने उसको,
उतना ही प्यार दिया॥
सारा जहां तू,
इस जहां से आगे भी तू है वहाँ,
सदा ही सदा॥

जग में नहीं कोई ऐसा,
जो हमसे अलग है।
सबको दिखाता है वो रस्ता,
जो तेरी ज्योति से जगमगाये॥

ऐसी कोई ना ठौर बाकी है,
जहाँ कभी तू ना गया।
वो ऐसी क्या चीज है?
जिसका नहीं तुझको पता॥
सारा जहां तू,
इस जहां से आगे भी तू है वहाँ,
सदा ही सदा॥

रूप तेरा, मन में सोचा।
वही लगता, हमको प्यारा॥
अपनी खबर, तुझे पल-पल।
सच्चा विधान, जो है अटल॥

दे सबको कर्मों का फल,
नहीं ज्यादा नहीं कम।
इस हाथ देकर,
उस हाथ लेता।
सारा जहां तू,
इस जहां से आगे भी तू है वहाँ,
सदा ही सदा॥

- रतन लाल जाट

(30) गीत-“मेरे ईशु करना तुम रक्षा”
               
मेरे ईशु करना तुम रक्षा।
अपनों की लाज बचाये रखना॥
बचाये रखना इन दुष्टों से।
मैला ना होने देना आँचल ये॥

मेरे ईशु करना तुम रक्षा।
तुम पर है मुझको भरोसा॥
वरना इस युग में कौन है अपना?
जो संकट में साथ निभाये किसी का॥
मेरे ईशु करना तुम रक्षा।
अपनों की लाज बचाये रखना॥

कली-सी कोमलता, फूलों की मुस्कान।
हमको दिखलाते रहना मेरे भगवान॥
अपने ही थे वो लोग अब
बन गये हैं जान के दुश्मन।
इसी ताक में फिरते हैं दिन-रात
कब मौका मिले उनको एकबार॥

है थोथी बातें बहलाना-फुसलाना।
किस पर करें अब हम भरोसा॥
मेरे ईशु करना तुम रक्षा।
अपनों की लाज बचाये रखना॥

मेरे ईशु करना तुम रक्षा।
आज मानव लगे दानव-सा॥
बाप बन गया है कसाई जैसा।
डाकन है एक नन्हीं-बेटी की माँ॥
तब क्या दूजे अपने होंगे यहाँ?
वो भी इनसे बुरे बन जायेंगे वहाँ॥
मेरे ईशु करना तुम रक्षा।
अपनों की लाज बचाये रखना॥

आ गयी है बेला अब
होने को प्रलय कुछ हैं पल।
धरती भी काँप उठेगी,
पापी बचेगा कब तक?
जीत होगी सत्य की,
सोने के महलों में आग।
जिन्दा जलके राक्षस होंगे राख॥

मेरे ईशु करना तुम रक्षा।
तेरी शरण आ करते हैं दुआ॥
हारेगा पाप-झूठ और धोखा।
एकदिन अंत निकट आयेगा,
मानव कुत्ते की मौत मरेगा॥
मेरे ईशु करना तुम रक्षा।
तेरी शरण आ करते हैं दुआ॥

मेरे ईशु करना तुम रक्षा।
अपनों की लाज बचाये रखना॥
बचाये रखना इन दुष्टों से।
मेरे ईशु करना तुम रक्षा।
जीत जायेगी उस दिन मानवता॥
मैला ना होने देना आँचल ये॥

- रतन लाल जाट

(31) गीत-“ए भगवन”
           
ए भगवन! अपनी दया-दृष्टि रखना।
हम भोले भक्तों पर रहम करना॥
पापी का तू सर्वनाश कर।
धरती पर सबका उद्धार कर॥

तुम सत्य हो, शिव हो।
जग में बस अकेले ही सुन्दर हो॥
हमारी गलती माफ करना।
करेंगे हम पश्चाताप रोजाना॥
ए भगवन! अपनी दया-दृष्टि रखना………॥

तुम अधर्म की जगह
धर्म की पताका फैलाना।
अपने भक्तों का विश्वास
कभी ना डगमगाने देना॥
भोले-भक्तों की लाज बचाना।
पापी को मारने अवतार लेना॥
ए भगवन! अपनी दया-दृष्टि रखना………॥

आप सत्य को जीत दिलानेवाले।
भक्तों को दर्शन चलकर देनेवाले॥
तीन लोक में हो आप विचरनेवाले देवा।
अजर-अमर नाम है जग के रखवाले तुम्हारा॥
ए भगवन! अपनी दया-दृष्टि रखना………॥

- रतन लाल जाट

(32) गीत-“ईश्वर कहाँ है?”
         
ईश्वर कहाँ है ईश्वर?
कहाँ खोजे उसको?
ना मंदिर, ना मस्जिद,
है कहीं नहीं वो॥

किसको जाकर पूछे हम?
उसको देखा है कहीं तुम?
जिसका ना कोई पता है।
फिर भी हरघट में रहता है॥

यदि मुझको होती, उसकी खबर कहीं तो।
  मैं चला जाता, जल्दी उससे मिलने को॥
ईश्वर कहाँ है ईश्वर?
कहाँ खोजे उसको?
ना मंदिर, ना मस्जिद,
है कहीं नहीं वो॥

जो मानता है उसको,
उसी को मिलता है वो।
फिर आकर अपने रंग-रूप की,
दिखाताहै एक परछायी॥
जो ज्ञानी है, सच्ची करता भक्ति वो।
ईश्वर भी देता है, दर्शन-शक्ति उसको॥
वरना हम जैसे, कितने ही रोते हुए तड़पते वो?
जन्मों-जन्मों तक उसकी झलक भी ना पाते एक जो॥
ईश्वर कहाँ है ईश्वर?
कहाँ खोजे उसको?
ना मंदिर, ना मस्जिद,
है कहीं नहीं वो॥

रातें जाग-जाग जपें, उसके नाम हम।
दिनभर उसकी तलाश में, नहीं खाते-पीते हम॥
मिलता है वो, नहीं किसी को।
ईश्वर नाम है सच्चा, रखो विश्वास अपना।
भक्ति-शक्ति और श्रद्धा, जो मिलन कराती है अपना॥
जन-जन का रूप है ईश्वर।
पल-पल में रहता है वो छिपकर॥

पत्थर-पत्थर और पानी।
डाल-डाल और पत्ती॥
क्या जीव, क्या जन्तु?
मानव हो पशु॥
सब रूप हैं ईश्वर के वो।
हिलते-डुलते, चलते-फिरते जो॥
ईश्वर कहाँ है ईश्वर?
कहाँ खोजे उसको?
ना मंदिर, ना मस्जिद,
है कहीं नहीं वो॥

फूलों की सुगन्ध, करूणा की मुस्कान।
बादल देखो, देखो रवि-चाँद॥
तारे की ज्योति, छिपकती वो चाँदनी।
उठता है तूफान, चलती है आँधी॥
हररूप है ईश्वर का,
पहचान ले आज तू जरा।
ज्ञान- चक्षु से देख उसको।
ईश्वर कहाँ है ईश्वर?
कहाँ खोजे उसको?
ना मंदिर, ना मस्जिद,
है कहीं नहीं वो॥

- रतन लाल जाट

(33) गीत-“मैया जगमग तेरा दरबार”
             
मैया जगमग तेरा दरबार।
भक्तों की लगी है कतार॥
फूलों की माला सबके हाथ।
खड़े हैं दर्शन हेतु आज॥

मैया अपनी तरफ भी देखो।
आज भक्तों को दर्शन दे दो॥
शीश झुकाये कुछ माँगे तो,
उनकी मन्नत पूरी कर दो॥

कर दो ऐसा चमत्कार
मैया जगमग तेरा दरबार………
 
माँ शेरोंवाली!
दुष्टों का सर्वनाश कर।
तू हजार हाथोंवाली!
दीन-दुःखियों का उपकार कर॥
मैया जगमग तेरा दरबार…………

मंदिर में भीड़ भारी है।
लगे हैं यहाँ पर भण्डारे॥
रोनक है इस मेले में।
सबका मन आज भर गया है॥
हाथ जोड़ करें पुकार
मैया जगमग तेरा दरबार…………

कोई मैया के गीत गाता।
तो कोई इसके दरबार में नाचता॥
स्वर्ग से भी प्यारा लगता।
हमको यहाँ का ये नजारा॥
आज हमने माँगा है वरदान
मैया जगमग तेरा दरबार…………

सबकी आँखों में समाया है प्यार।
हाथ उठे हैं उपकार में एक साथ॥
मुख से बोले मैया तेरे नाम।
सबके चेहरे खिल उठे हैं आज॥
मैया जगमग तेरा दरबार…………

मैया की शरण में जो आते हैं।
गम अपने छोड़ वो खुशियाँ ले जाते हैं॥
भक्ति के मार्ग पर जो चलते हैं।
जीवन में कभी ना वो डरते हैं॥
आगे बढ़े, उन्नति करें, दिन-रात
मैया जगमग तेरा दरबार…………

देखो, यहाँ पर छूआछूत है नहीं।
ना कोई अमीर, तो ना कोई दीन-दुःखी॥
सब लोग मैया तेरे दास हैं।
आज संकट से सबको तार दे॥
कर दे तू एक अनोखा काम
मैया जगमग तेरा दरबार…………

अपनी आँखें खोलो माँ!
भक्तों को दर्शन दो माँ!
विश्वास कभी ना टूटे उनका।
तेरे नाम से ही पार लगे नैया॥
सबका जीवन हो जाये भवसागर पार
मैया जगमग तेरा दरबार…………

- रतन लाल जाट

(34) गीत-“क्या खिलौने बनाये हैं?”
        
मेरे बनमाली भगवन्!
क्या खिलौने बनाये हैं?
जो रूप तुम्हारे, नाम तुम्हारे।
वो नन्हें-मुन्ने बच्चे॥
भोला-भाला उनका बचपन।
मेरे बनमाली भगवन्!

सच्चा उनका मन,
औरों को दे वो आनन्द।
कहीं अकेले हँसते हैं।
कहीं औरों को खिलखिलाते हैं॥
मेरे बनमाली भगवन्!
क्या खिलौने बनाये हैं?

धूप में भी वो ना रूके।
बरसते पानी में नहाते॥
बैर-भाव कभी ना रखे।
सबको अपनों-सा समझे॥
मेरे बनमाली भगवन्!
क्या खिलौने बनाये हैं?

रोक ना सके उनको कोई दीवार।
सारे गम भूला दे उनका प्यार॥
जो भी मिलता उनको आपस बाँट खाये।
बिना बिस्तर वो चैन की नींद सो जाये॥
मेरे बनमाली भगवन्!
क्या खिलौने बनाये हैं?

मार खाकर वो रोते हैं।
अगले ही पल मुस्कुराते हैं॥
भूख-प्यास कभी ना सताये।
मेरे बनमाली भगवन्!
क्या खिलौने बनाये हैं?

उनके आगे हार जाये।
कभी ना उनको जीत पाये॥
उनके संग मुझको घुलने दे।
भले लघु जीवन मिले॥
मगर जूदा ना होऊँ उनसे।
मेरे बनमाली भगवन्!
क्या खिलौने बनाये हैं?

वो नैया है समन्दर में।
उनके बल पर सब तार जाये॥
वो ही सत्य इस संसार में।
मेरे बनमाली भगवन्!
क्या खिलौने बनाये हैं?

- रतन लाल जाट

(35) गीत-"दुनिया के मालिक"
             
दुनिया के मालिक, हम दास हैं तेरे।
तेरी शरण में हमको, पनाह मिल जाये॥

सुबह उठ करें दर्शन।
मन में रखें हरपल॥
बेकार है तुम बिन अपना जीवन।
कभी भूल ना पायें एकपल॥

तुम्हारे लिए सब जन एक हैं।
दया के सागर  हमको तार दें॥
सबके मन की पुकार सुन ले।
दुनिया के मालिक………….

तुम हो नीर, हम हैं मीन।
तुम हो धीर, हम हैं अधीर॥
आकर हमको विश्वास दो।
अपना भव-सागर पार हो॥

सात लोक, चौदह भुवन हैं तेरे वश में।
दुनिया के मालिक……………

तुम्हारे नाम से, मरते को जीवन मिले।
तुम्हारे हाथ से, पापी का पाप धूले॥
सबसे बलवान हो तुम।
सबसे दयवान हो तुम॥
इन चरणों में अपना।
अर्पण है जीवन सारा॥

तुमसे दूर ना हम रह पायें।
दुनिया के मालिक…………….

- रतन लाल जाट

(36) गीत-"रब! तूने ही इस जीवन में"
                       
रब! तूने ही इस जीवन में,उगाया सूरज नया है।
फूल-सा कोमल मनको, बाग तन को बनाया है॥

तेरे होते अंधेरा कहीं हो जाये ना।
मनभावन खुशबू कहीं खो जाये ना॥
हमने तो पग-पग तुमको, साया अपना माना है

हँसी दी हमको नयी खुशी भी मिली है।
नजर ना लगे कभी किसी की रे॥
दया रखना रब्बा! हम पर विश्वास तुम्हारा है

कपट ना मन में कोई आये।
पाप ना दिल को अपने भाये॥
तू सबको ही अमृत-प्रेम लुटाये।
आँसू ना कोई यहाँ बहाये॥
हाथ जोड़के नमन अपना, बस तुझको पुकारा है

- रतन लाल जाट

0 टिप्पणियाँ

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.