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शहर सुन्दर है बड़ा है लेकिन, तंग रिश्तों की गली है साहिब। तेजपाल सिंह ‘तेज’ की दस ग़ज़लें

तेजपाल सिंह ‘तेज’ की दस ग़ज़लें

-एक-

अश्क पीकर बचपना हमने जिया फुटपाथ पर,

धूप खाकर उम्र का हर पल जिया फुटपाथ पर।

​​

ये कोई मिसरा नहीं, दरअसल एक सत्य है,

मृत्यु को बाकायदा हमने जिया फुटपाथ पर।

​​

गो दर्द का दरिया मेरे आगोश में बहता रहा,

पर दर्द की हर थाह को हमने जिया फुटपाथ पर।

​​

बन्द कमरों ने जिसे एक जुर्म का दर्जा दिया,

ऐसा हरेक जुर्म सच! हमने जिया फुटपाथ पर।

​​

वोट के बदले में पाकर वायदों की रोटियाँ,

खून अपना ‘तेज’ खुद हमने किया फुटपाथ पर।

​​

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-दो-

बात जीने की चली है साहिब,

आग सीने में पली है साहिब।

​​

माना चलने का हुनर है उनमें,

चाल अपनी भी भली है साहिब।

​​

बहते दरिया के किनारों की तरह,

उम्र अपनी भी ढली है साहिब।

​​

शहर सुन्दर है बड़ा है लेकिन,

तंग रिश्तों की गली है साहिब।

​​

भूख से लड़ने की तमन्ना लेकर,

पाँव दो-पाँव चली है साहिब।

​​

<><><>

-तीन-

आज सूरज ज़मीं पे उगा है यहाँ.

काग़जों पर बहुत कुछ हुआ है यहाँ।

​​

किसी ने अन्धेरों को दी जिन्दगी,

चाँदनी ने किसी को ठगा है यहाँ।

​​

दाल-आटे की कीमत गगन हो गईं,

साँस लेने को बेशक हवा है यहाँ।

​​

मथ रहा ख़ून को हर घड़ी आदमी,

दूध के नाम पर कुछ नया है यहाँ।

​​

‘तेज’ दुनिया की बेशक ख़बर है उसे,

ज़िन्दगानी से जो भी ख़फा है यहाँ।

​​

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-चार-

ज़िन्दगी बेशक झमेला है तो है,

भीड़ में कोई अकेला है तो है।

​​

सो रही संसद हमारे बेखबर,

पटरियों पे घर किसी का है तो है।

​​

जी रहे हैं लोग जीवन बारहा,

आतंकमय वहशी ज़माना है तो है।

​​

प्रजा तो प्रजा है अबस चीखा करे,

भ्रष्टतम शासन हमारा है तो है।

​​

चाँड-तारों से अधिक प्यारा मुझे,

’तेज’ मिट्टी का खिलौना है तो है।

​​

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-पांच-

शोर ज़्यादा है, आँधियाँ कम हैं,

कौन कहता है तल्खियाँ कम हैं।

​​

आज संसद में जगह पाने को,

नाम ज़्यादा हैं, कुर्सियां कम है6।

​​

स्वाति-बून्दें तो बहुत है लेकिन,

तल्ख़ सागर है, सीपियाँ कम हैं।

​​

अबकी सावन की शुष्क आँखों में,

आग ज़्यादा है, बिजलियाँ कम हैं।

​​

‘तेज’ बरपा है बाढ़ का ख़तरा,

लोग ज़्यादा हैं, कश्तियाँ कम है।

​​

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-छ:-

कब-कब नहीं सताया तुमने,

कब-कब नहीं रुलाया तुमने।

​​

इंतजार की सुखद आग में,

कब-कब नहीं जलाया तुमने।

​​

मन-मन्दिर की दीवारों को,

कब-कब नहीं हिलाया तुमने।

​​

धरती बन अम्बर का बोझा,

कब-कब नहीं उठाया तुमने।

​​

‘तेज’ ख़यालों में आ-आकर,

कब-कब नहीं जगाया तुमने।

​​

<><><>

-सात-

छीनकर मुँह से निवाला आपने,

शर्म को घर से निकाला आपने।

​​

चंद चुपड़ी रोटियों के वास्ते,

स्वयं को ही बेच डाला आपने।

​​

शहर अपना जगमगाने के लिए,

ग़ाँव सारा फूँक डाला आपने।

​​

चाँद-तारों की तलब में बारहा,

अर्श पर पत्थर उछाला आपने।

​​

देखने को अपनी सौ-सौ सूरते,

आईना तक तोड़ डाला आपने।

​​

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-आठ-

फूल हों न हों, तितलियाँ तो हैं,

मेघ हों न हों, बिजलियाँ तो है।

​​

उनको दिखता है हवा की तह तक,

आँख हों न हों, पुतलियाँ तो हैं।

​​

झूमते दिखते है सभी मेहफिल में,

जाम हों न हों, प्यालियाँ तो हैं।

​​

कौन कहता है कि भूखे हैं रहनशीं,

भात हो न हो, थालियाँ तो हैं।

​​

‘तेज’ यूँ रहमत पे पलेगा कब तक,

दूर हों न हों, खामियाँ तो हैं।

​​

<><><>

-नौ-

हर-एक चौरस्ते पे ट्रैफिक जाम है,

कि मुब्तिला हरेक खासो-आम है।

​​

लगने को है कर्फ्यू, सड़क ख़ाली करो,

हैफ़ कि ऊपर से ये फरमान है।

​​

पता नहीं कि क्या हुआ, कैसे हुआ,

ये सभी प्रश्नों का उत्तर आम है।

​​

फ़तवा है कि रामो-रहीम एक हैं,

नेपथ्य में पर जंग का पैगाम है।

​​

मरने से पहले आत्मा ने ख़त लिखा,

कि ख़ून ये इंसानियत के नाम है।

​​

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-दस-

इक कमल के फूल सी खिलती है वो,

जब कभी दालान में मिलती है वो।

​​

ताज़ तो शाहजहाँ की जागीर है,

पर मुझे मुमताज सी मिलती है वो।

​​

रात से उसका कोई रिश्ता नहीं,

इक अदद प्रभात सी मिलती है वो।

​​

यूँ तो है अख़लाक पर भारी मिरे,

प्यार से पर टूटकर मिलती है वो।

​​

धूप के साये में तपकर हर नफ़स,

चौदहवीं के चाँद सी खिलती है वो।

​​

<><><>

( ‘ट्रैफिक जाम है’ (ग़ज़ल संग्रह) से प्रस्तुत)

तेजपाल सिंह ‘तेज’ (जन्म 1949) की गजल, कविता, और विचार की कई किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं- ‘दृष्टिकोण ‘ट्रैफिक जाम है’, ‘गुजरा हूँ जिधर से’, ‘तूफाँ की ज़द में’ व ‘हादसों के दौर में’ (गजल संग्रह), ‘बेताल दृष्टि’, ‘पुश्तैनी पीड़ा’ आदि (कविता संग्रह), ‘रुन-झुन’, ‘खेल-खेल में’, ‘धमा चौकड़ी’ आदि ( बालगीत), ‘कहाँ गई वो दिल्ली वाली’ (शब्द चित्र), पाँच निबन्ध संग्रह और अन्य सम्पादकीय।

​​

तेजपाल सिंह साप्ताहिक पत्र ‘ग्रीन सत्ता’ के साहित्य संपादक, चर्चित पत्रिका ‘अपेक्षा’ के उपसंपादक, ‘आजीवक विजन’ के प्रधान संपादक तथा ‘अधिकार दर्पण’ नामक त्रैमासिक के संपादक रहे हैं।

​​

स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त होकर आप इन दिनों स्वतंत्र लेखन के रत हैं।

​​

सामाजिक/नागरिक सम्मान सम्मानों के साथ-साथ आप हिन्दी अकादमी (दिल्ली) द्वारा बाल साहित्य पुरस्कार ( 1995-96) तथा साहित्यकार सम्मान (2006-2007) से सम्मानित किए जा चुके हैं।

​​

आजकल आप स्वतंत्र लेखन में रत हैं।

​​

सम्पर्क : फोन—9911414511 : E-mail — tejpaltej@gmail.com

ग़ज़लें 883651120250405103

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