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चूना लगाने का धंधा - सुरेश खांडवेकर

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इस दुनिया में एक आदमी बताओ जिसने चूना लगाने की कोशिश न की हो। और एक आदमी बताओ जिसको चूना न लगा हो। कुछ लोग चूना लगाने को झांसा देना कहते हैं...

इस दुनिया में एक आदमी बताओ जिसने चूना लगाने की कोशिश न की हो। और एक आदमी बताओ जिसको चूना न लगा हो। कुछ लोग चूना लगाने को झांसा देना कहते हैं। लेकिन ऐसा नहीं है। चूना लगना-लगाना एक सौदा है। एक चूना लगाता है- दूसरा चूना लगवाता है।

लोग कहते हैं कि पान वाले चूना लगाते हैं। चूना लगा कर पान बेचते है। आप पान खरीद कर खाते है और पीक निकालते हैं। कभी-कभी थूक देते हैं। आपको लगता है आपके जबड़े से किसी ने कुछ छीन लिया है। इसलिये आपके दिमाग में आता है कि आपको चूना लग गया। खाया हुआ पान थूकना पड़ा। अजी ये तो सौदा था। आपने पैसे दिये, उसने पान दिया। आपने जबड़े में रखने के बजाय थूक दिया, उसका क्या कसूर था?

भारत के पांच लाख लोग चिंतित है। उन्हें भारतीय स्वास्थ्य की चिंता है। पांच-सात लाख लोगों के बराबर एक सांसद होता है। लाखों लोग देश के स्वास्थ्य की चिंता करें तो बीमारी को भागना ही पड़ेगा। चाहे जो बीमारी हो।

डाक्टरों की संख्या अस्पतालों से हजार गुना ज्यादा है। हर साल दो-ढाई लाख डॉक्टर धनुषबाण की तरह हाथ में इंजेक्शन लेकर रोग-रावणों का नाश करने निकलते हैं।

देश में चूने, मेरा मतलब कैलशीयम की कमी है। औषध शास्त्री और फार्मेसिया जी तोड़ मेहनत कर रही है। नये-नये फार्मुले इजाद हो रहे हैं, जिससे देश के नागरिकों की हड्डियां मजबूत हो। कभी, गुलाबी रंग की टिकिया। कभी चूना-चीनी और चटपट का संयोग। कभी एक-दो रत्ती चूना कैपसूल। कभी चीनी की परत में टिकियां। इस पर भी गुजारा नहीं हुआ तो सायरपो और मिक्चरो में भी चूना। लेकिन इतने चूने से क्या होना है इस भारी-भरकम शरीर का। चौरसिया बंधु अभी भी अपर्याप्त चूने की आपूर्ति से परेशान हैं। देशवासी चूने से वंचित हो रहे हैं।

देश में चूने का बहुत बड़ा भंडार है। चूने को सीमेन्ट की तरह निर्माण कार्यो में भी लाया जाता है। चूने के प्रयोग अनंत है। खाने से लेकर रंग-रोगन तक और रंग-रोगन से लेकर चूना लगाने तक। सीमेन्ट और चूने में जुड़ाव शक्ति गजब की है। बहुत मजबूत जुड़ते हैं। आप देख रहें हो हजारों साल पहले बने बड़े-बड़े किले, स्मारक, राजदरबार और मंदिर-मस्जिद अभी तक वैसे के वैसे है। सभी विशिष्ट चूने से बने थे। आज तक उन्हें कोई हिला नहीं सकता। जाहिर है चूने की पौष्टिकता मानव शरीर में जानी चाहिये। ताकी सौ-साल तक शरीर निरोगी और मजबूत हड्डियों वाला बना रहें। सम्पन्न लोग चूने के स्थान पर केलशियम का प्रयोग करने लगे हैं। इससे भी उन्दा सीमेंट पैदा होने लगा है, लेकिन अभी तक सर्व सामान्य के लिये सर्वसुलभ और सुव्यवस्थित दुकानें नहीं है। चूने की दुकाने लाखो को संख्या में है।

चूने की अनुपातिक आपूर्ति की सुव्यवस्थित वितरण प्रणाली जो भारत में है, वैसी विश्व में कही नहीं है। रामायण से लेकर महाभारत काल से इसके संस्कार पड़े है। भगवान श्री कृष्ण को भी पान अच्छा लगता था। यह विडम्बना ही है कि इतना पुराना इतिहास होने के बावजूद चूना लगाने का और चूने के अनुपातिक वितरण का सुव्यवस्थित ढंग स्थापित न हो सका।

चूना लगने से जो कुछ मेरे ज्ञान चक्षु देख रहें है उसमे मेरा अनुमान प्रमाणित होने लगा है। मुझे लगता है भारत में चूने के वितरण का सही ढंग 1960 से आरंभ हुआ है।

सभी जर्दाओं, शर्माओं, वर्माओं, गुप्ताओं, ब्राम्ह्णों और मुल्लाओं ने चौरसिया समाज में प्रवेश कर लिया है। सभी से देश के भीतर-बाहर चुना लगाने के संकल्प को बढ़ावा मिला है। वास्तव में धर्मनिरपेक्षता का एक शाश्वत स्वरूप है। जो महात्मा गांधी नहीं कर सकें वह इस चौरसिया समाज ने कर दिखाया। यह बात अलग है कि इनसे सीख लेकर इन्हीं को ठेंगा दिखाने वाले या लाल-लाल जीभ दिखाने वालों की भी कमी नहीं है इस देश में। उन्होंने देश को खानेवाला बना कर चूना लगाने की कोशिश की। लेकिन चौरसिया समाज का जवाब नहीं अपने मूल संकल्प को कभी भूलते नहीं।

अब देश के इन पान सदनों, पान भण्डारों और पानपरागों की संख्या जोड़े तो एक विराट और समृद्ध चौरसिया समाज खड़ा हो जाता है। इनका परिवार दो करोड़ जनसंख्या से कम नहीं है।

चौरसिया यानी चारों ओर से रसिया। बातों में रसिया, देखने में रसिया, सुनने में रसिया, मौनियों में रसिया। जीभ और होठो की लाली शायद विदेशो में थी ही नहीं। उन्हें भारत के होठों की लाली लुभा गयी। वरना लिपिस्टिक की डण्डी उन सुन्दरियों के होठो पर नहीं फिरती, जो अभी तक बनावटी रंगो से होंठ रंग रही है। इसमें न कैलशियम, न रस न, मुस्कान ना लार!

देश के आर्थिक समृद्धि के लिये आजादी के बाद लगातार पंचवर्षीय योजनाएं बन रही है। करोड़ों रूपयों में अलग-अलग क्षेत्रों में विनियोग हुआ।

लेकिन दुर्भाग्य से सरकार ने चूने के आहार-संसार पर कभी गम्भीरता से सोचा नहीं। वरना लाल-लाल या लार-दार जबड़े के सुख की योजनाएं बनती। बाद-विवाद पर आयोग बने पर मुख-विलास पर नहीं। लोगो की ललचाई लार को सही माने में तम्बोलितो ने पहचाना। पान की खेती के भी वहीं हाल। ज्यादा पानी, ज्यादा सर्दी, ज्यादा गर्मी सब कुछ वे सह रहे है। परिवहन की व्यवस्था नहीं, पान के रखरखाव की व्यवस्था नहीं। चौरसिया बंधु सब सह रहें है। गले-सड़े पान का सदुपयोग कर रहें है। खास किस्म के चाकू और कैची चला-चलाकर पान का सैन्सर करते हैं। एडिटिंग करते हैं। काट-छांट कर आपको पान खिलाते हैं। और खिलाते ही आप खिलखिलाते हैं। परेशानियों में भी उनके माथे पर कभी शिकन नहीं आयी, क्योंकि वे भी चूने के गुण को जानते हैं। उसके रसीलेपन को भुनाते है। इसलिये उन्होंने लारभरी मुसकान से, तो कभी-कभी मौन से इन उपेक्षाओं को सामना किया है।

1960 से उन्होंने पान सदनो पर रेडियो रखकर कानों में भी रस घोलना शुरू किया। दुकान के बीचों-बीच एक शीशा भी रखने लगे। वैसे तो उन्होंने शीशा इसलिये रखा था कि लोग पान की लाली को देख सके। लेकिन लोग इसके कई फायदे उठाते रहे है। जेब मे कंघी रखना, बालों को संवारना। कपड़ों को देखना। व्यक्तित्व को हर एंगल से देखना। भाई यह भी काम बहुत बड़ा किया उन्होंने। यह इंग्लैण्ड और अमेरिका जैसा हिसाब-किताब तो है नहीं। जो लोगों को जगह-जगह, नहाने-धोने या साफ-सूफ होने का मौका मिले।

यहां तो दिन भर की दौड़ धूप। एक बार सुबह शीशे को देखा तो बस बाद में दूसरे दिन ही इस काम का नम्बर आता है। पान सदन एक ऐसा स्थान है जहां तक दस-बीस कदम आदमी चल भी देता है और शीशे में खुद को निहार भी लेता है। यह जैसे एक लघुजन सुविधा केन्द्र हो। समाज में व्यक्तित्व विकास और रख-रखाव का प्रयोजन भी अपने-आप पूरा हो गया है।

चौरसिया समाज ने भारत की सांस्कृतिक धरोहर को समृद्ध किया है। नृत्य-संगीत, भाषण, चहल-पहल। हर जगह हर समय चौरसिया समाज ने रात-रात जाग कर बिताया है। किसी सभा में भाषण अच्छा हो या बुरा, संगीत-अच्छा हो या बुरा। नाटक हो या मंडली, सभी को प्रोत्साहित किया। कभी ऊंह तक नहीं किया। किसी नुकक्ड या चौराहे पर चौरसिया की दुकान में लगा रेडियो तो उसका निजी होता था, पर ऐसे लगता था जैसे पूरे मुहल्ले का रेडियो पूरी ताकत से बजता था।

संगीत सम्राट सहगल, मोहम्मद रफी, मन्नाडे, मुकेश, तलक, आशा, लता, कमल बारोट, कृष्णा, सुमन कल्याणपूरी और किशोर कुमार से लेकर महेन्द्र कपूर को भी उन्होंने प्रसिद्धि दिलाई। यदि नहीं, मुजरा, डान्स, रॉक एण्ड रोल को भी खूब सम्भाला। यह तो कुछ भी नहीं उनके हिम्मत की दाद दीजिए। पलुस्कर, बडोडकर, अमीर खान, बड़े गुलाम अली, उस्ताद बिसमिल्ला खान, पं- हरिप्रसाद चौरसिया, पं- भीमसेन जोशी, उस्ताद अब्दुलकरीमखॉ और बड़े-बड़े संगीत-शास्त्रियों का महत्व उन्होंने समझा। कोई सूने या न सूने वे सुनाते गये। आज देश में बहुत बड़ा संगीत समाज कायम हो गया है। संगीत के प्रचार में चौरसिया समाज का योगदान बहुत है।

एक बात और है उनके देश भक्ति की। उन्होंने कभी आकाश वाणी के राष्ट्रीय समाचारों के समय रेडियो बंद नहीं किया। बल्कि वे आवाज ऊँची करते रहे हैं।

सुबह पांच बजे से लेकर रात के एक बजे तक वे श्रीकृष्ण का एक ही संदेश याद रखते- कर्मण्येवाधिका रसते। काम करते जाओ फल की इच्छा मत करो। उनकी अठारह घण्टेवाली पालीदर पाली-वाली अनथक मेहनत रंग लायी। उनकी मेहनत के आगे पंचवर्षीय योजना की क्या जरूरत?

1975 तक चौरसिया समाज झंझावातो में कानों में रूई डालने के बजाय महेन्द्र कपूर का ‘ओम जय जगदीश’ हरे सुनाता रहा। आपात काल में लोगो के मुंह बंद करने के लिये 390 का पान खिलाता रहा। स्वतंत्रता के आंदोलन में अनेक नेता जेल मे थे। कई होनहार नेताओं ने जेल की कोठरी में गांधीजी की गोद में राजनीति का पहला पाठ पढ़ा था। अब तो नयी पौध है। अब पाठ पढ़ने के लिए जेल नहीं है। और ना ही अच्छे स्कूल कॉलेज। अब नेता लोग पान सदनों पर राजनीति के अनेक पाठ पढ़ते है। एक अनसोची उपलब्धि।

सतयुग में हिरण और शेर एक ही जगह पानी पीते थे। पता नहीं उस समय पानी का अभाव था या प्राणियों में आपस में लगाव। लेकिन चौरसिया समाज कितना समदर्शी है, समानता का पाठ पढ़ाता है, जो विरोधियों को भी एक साथ पान खिलाता है। लोग कहते है चूना लगाता है। गलत है। वैचारिक मतभदों को वह हिंसा से दूर करना नहीं चाहता। माधुर्य के साथ निभाना चाहता है। गांधीजी के अहिंसावादी सिद्धांत को चौरसिया समाज ने खूब फैलाया है। आप समझ सकते है। पान खानेवाले का मुंह बंद हो जाता है। मुंह बंद तो बातचीत बंद। बातचीत बंद तो गाली-गलोच बंद। दोनों बंद तो हाथ-पांव कहा चलेंगे? मनन-चिंतन के आधार पर अहिंसा के सिद्धांत को समझना बहुत कठिन है। लगाम लगाकर चुप कराने से सब काम आसान। पान खाने वाले को बहुत सावधानी बरतनी पड़ती है। पान को दांतो में दबाये रखना, रस को जुबान में धोलते रखना। पान को जुबान में जुगालते रहना। रस का स्वाद लेते रहना। लार की मात्र बढ़ाते जाना, ऐसे में वह तुरंत प्रतिक्रिया को टाल देता है। अन्यथा निगल कर या थूक कर अपनी बात बतानी पड़ती है। जो वह नहीं चाहता। और मार-पीट टल जाती है।

आपात-काल में चौरसिया समाज ने बहुत कार्य किया है। कई भूमिगतो को आकाशगत किया। जो आकाशगत हुए इनके पुत्रों को सरपंची से लेकर विधानसभा तक पहुंचाया। जो विधानसभा में थे उन्हें लोकसभा के टिकट दिलवाये। जो बोल नहीं सकता था, उन्हें ऐसा पान खिलाया कि उनकी झिझक मिट गयी। जो ज्यादा बोलता था उसको 120 नम्बर का पान दे देता। जिन्हें अदब सिखाने की जरूरत थी, उनके मुंह में फोस्क्वेअर की सिगरेट ठूंस दी। पान नहीं तो धूम्रपान करवाया। जो जरूरत से ज्यादा बोलता था, उन्हें जर्दापान दिया, जर्दाशील बनाया। समय के साथ-साथ कुछ लोगो को जर्दापान और धूम्रपान भी। इतना ही नहीं, क्रियाशील लोगों को, जो पान खाना या लार टपकाना अच्छा नहीं समझते। ऐसे सद्गुणी नेताओं को उसने गुटके दिये। अब तो सैकड़ों गुटका उत्पादक आ गये है। उनका गुटका न हो तो शादियां ही रूक जाती है। खैर उन्होंने गालियां देने वालों को मुखशुद्धि का उपाय दिया। मदिरा की दुर्गंध को रोकने का बंदोबस्त किया। समाज के उधार के लिए क्या नहीं किया इन्होंने।

चौरसिया समाज का दावा है कि 1989 के चुनाव में जितने नेता खड़े हुए थे उनमें 30 प्रतिशत सदस्य उन्हीं की पाठ-शालाओं से निकले है। उनका मानना है कि अगर इसी तरह उत्साह बना रहें तो आगामी चुनाव में उनका बहुमत हो जायेगा।

1985 से 1990 तक चौरसिया समाज ने अपने विकास के लिये बहुत प्रयत्न किये। न जाति आड़े आयी न धर्म। इसमें प्रवेश करने के लिये न कोई डण्डा लगता है ना गुल्ला। सिर्फ एक ही शर्त है। चुना लगाओ। पान दो। देश को बढि़या, परिष्कृत चुने की आवश्यकता है। चाहे आयात करना पड़े वे आयात करेंगे। हमारे देश का हिसाब ही अलग है। हम हजारों सालों से चीजों का उपयोग करते रहें है, फिर भी हमें मशीनों की तकनीक नहीं सूझी। विदेशों की बात ही कुछ और है। उन्होंने कभी पान खाया नहीं, लेकिन वे पान बनाने का आटोमेटिक प्लांट बना सकते हैं। चूना वे खाते नहीं, पर चूने को परिष्कृत करने की मशीनें वे हमसे पहले बना लेते हैं अब देखिये ना चाय भारत से विश्व में पहुंच गयी, लेकिन चाय के उत्पादन की मशीनें अभी भी विदेशों से मंगाई जाती है। जाहिर है पान के औद्योगिक विकास के लिये प्रतिनिधि मंडल बाहर भेजना ही पड़ेगी।

1955 के पहले पांच हजार जनसंख्या वाले गांव में मैंने दो तम्बोलियो को देखा था। 1965 में बढ़कर, जाहिर है जनसंख्या भी बढ़ी थी, लेकिन तम्बोलियों के अलावा 7 पान सदन खुल गये थे। अब 1995 उस गांव की जनसंख्या 20 हजार के लगभग होगी। लेकिन पान सदन का आकड़ा 40 से ऊपर है। इन 40 सालों में इतना व्यापक परिवर्तन। सामाजिक, शैक्षणिक, सांस्कृतिक और आर्थिक परिवर्तन। अब यह उद्योग एक स्वयंस्फूर्त उद्योग बन गया है। किसी का मोहताज नहीं है। इसके विकास में भारत का कार्यकल्प निहित है।

चौरसिया समाज ने परम्परागत चूना लगाने की शैली को आधुनिकता में बदला। उसे पाला-पोसा। विदेशी सांस्कृतिक हमलों का सामना किया। कई मामलों में हमारी जीवन शैली पूरी-तरह विदेशी हो गयी। किन्तु पान सदनों के आधुनिक रूप-रंग से उसे कोई हिला नहीं सका। विदेशी संस्कृति के हमले से भारत की महिलाएं माथे की बिंदी तक भूलने लगी है, पर चौरसिया समाज की हिम्मत है कि वह पुरूषों के होंठों की लाली को अभी तक संवारे हुए है।

हांलाकि उन्होने महिलाओं के कई काम कर दिये। 40 साल पहले हर घर में पान, चूना, कत्था, सुपारी, गुलकन्द और ना जाने क्या-क्या रखना पड़ता था। एक पान डिब्बा ही सम्भालना पड़ता था। उसकी साफ-सफाई रखनी पड़ती थी। दरबारी, नाचने व गाने वालों के लिये खास तौर से पानदान की व्यवस्था करनी पड़ती थी। और तो और, जिसका पान-दान जितना अच्छा और कीमती- वह उतना ही मालदार कहलाता था। पान सदनों ने उन्हें मुक्ति दे दी है। महिलाओं को चाहिये कि वे उनका आभार माने।

उन्होंने साधु-संतों की अपेक्षा तीर्थ स्थलों पर बल दिया। सिने कलाकारों में दिलीप कुमार, देवानंद, राजकपूर से लेकर अभिताभ बच्चन, राजेश खन्ना अौर शत्रुघ्न सिन्हा को अपना आदर्श बनाया। मौके-मौके पर राजीव गांधी के साथ रेखा का चित्र भी लगाया। हेमा के ओठों की लाली को धर्मेन्द्र पर आजमाया। उनकी प्रयोगशीलता ने उन्हें एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में भी स्थापित कर दिया। किसी के पोस्टर पर उन्हें आज तक आपत्ति नहीं रही है। भले ही वह किसी भी मत का मानने वाला क्यों न हो।

पहले रेडियो के सारे कार्यक्रमों का प्रचार करते रहें अब दूरदर्शन द्वारा भी निकट दर्शन कराने लगा है। रेडियो सुन-सुन कर वे हर खिलाड़ी के व्यक्तित्व और मंशा जान गये है। क्रिकेट का परिणाम वे कामेन्ट्री से पहले सुना देते हैं।

समाचारों पर तत्काल प्रतिक्रिया प्रकट करने का स्वतंत्र आंदोलन शुरू करने का श्रेय पान-सदनों को जाता है। कई बार संवाददाताओं को सविस्तार खबरें भी यहीं से प्राप्त होती हैं। जब पान सदनों पर चार-पांच संवाददाता इकट्ठे हो जाते हैं, तब पान चबाते-चबाते अपने आप खबरें लम्बी हो जाती है। चिंतन के साथ लार जमा होती मुंह में और लार की तरह समाचार लम्बे और पुष्ठ! उन्होंने संवाददाताओं की दौड़-धूप को कम किया है। हजारों छोटे-बड़े समाचार पत्रों का भरण-पोषण इन्हीं अलौकिक पान सदनों से होता है।

एक बार एक चोर को पकड़ने के लिये पुलिस ने सारे सूत्र अपनाये लेकिन ना चोरी का माल मिला और ना चोर। जब चौरसिया तक यह बात पहुंची। तब उसने पुलिस को कहा आप एक दो घण्टें बाद पान सदन पर आये। अगर कमर में लूंगी में लपेट कर चूना लगाने बैठ जाओ तो और भी अच्छा। चाहे जो हो पुलिस ने ये फार्मूला क्या अपनाया दो घण्टे में चोर के दर्शन हो गये। अपने आप सब उगलने लगा।

आपने देखा होगा, पुलिस और चौरसिया का बड़ा घनिष्ठ संबंध है। पुलिस के पौरुष भरे कार्य को देखते हुए अक्सर चौरसिया समाज उनसे पान-चूना-जर्दा या सिगरेट के पैसे नहीं लेता। हां, पुलिस दे देता है तो ले लेता है। लेकिन सौदेबाजी नहीं, यही कारण है कि देश के 80 प्रतिशत पुलिस पानपट्टी से जुड़े रहते है। वहीं से उन्हें अच्छे बुरे की खबर मिलती। किसी गांव या शहर में पुलिस पुरानी फाइल बादमें देखता है, पहले देखता है पान सदन! एक ही दिन में वह पूरे गांव के अच्छे-बूरे लोगों का नक्शा खींच लेता है। पान वाला बाकायदा एक-एक को इन्ट्रोड्यूस कराता है। पुलिस वर्दी में हो या बिना वर्दी के उनका आना-जाना लगा रहता है। मानो यह पानसदन नहीं एक गैरसरकारी पुलिस चौकी।

पान-सदनों ने अपने ऊपर जाने-अनजाने सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक और आर्थिक समस्याओं को सुलझाने का दायित्व लिया है, वहां व्यवहार और आचरण की भी व्यवस्था दी है। कहां थूकना चाहिये, किस पर थूकना चाहिये, कैसे थूकना चाहिये या थूकना चाहिये या नहीं। अस्पतालों, सिनेमाघरों, सभागृहों और सार्वजनिक स्थानों पर बड़े-बड़े पीक दान रखे मिलते हैं पीतल के कुण्ड, बर्तन और सीमेन्ट के गमले रखे मिलते हैं सीमेन्ट के गमलों में जानबूझ कर रेत रखी जाती हैं ताकि शक्तिशाली पीक का सामना कर सकें। यदि सुखी मिट्टी रखे तो लेने के देने पड़ जाते। रेलवे, सार्वजनिक मूत्रालयों और शौचालयों सीढि़यों के कोनो को आमतौर पर थूकने या पीकने के लिये चुना जाता है। चौरसिया बंधुओं का जैसे पान खाने वालों को यह सांकेतिक निर्देश है कि भले जगह बदबुदार हो, चाहे  नाक बंदकर वहां पहुंचना पड़े। किसी अच्छी जगह पर नहीं। आश्चर्य है कि लोग इसका बाकायदा पालन करते हैं। चौरसियों से संबंध स्थापित होने पर आपको कोई एक भी ऐसा नहीं मिलेगा जो साफ सुथरी जगह पर थूकता हो। इनकी दीवारों पर पीक और थूक से जो चमत्कारिक चित्रकारी होती है, उसको समझने के लिये महान चित्रकारों को भी कई जन्म लेने पड़ेंगे।

देसी, बनारसी, बंगला, मद्रासी पान के चलन से राष्ट्रीय एकता को बहुत बढ़ावा मिला है। यही नहीं अंतर्राष्ट्रीय व्यापार-व्यवसाय भी बढ़ा है। गाय, भैंस और बैलों से हमारा रिश्ता सांस्कृतिक और व्यापारिक है। उनकी जुगाल में कितनी शांति दिखाई देती हैं। उनका शांति से बैठे जुगाल करते देखते है तो ऐसा लगता है, जैसे अक्षय कुमार हजार परेशानियां झेलकर लड़की बचाता है, और फिर शांति से रेण्ड एण्ड वाईट सिगरेट के कश लगाता हो। थकने के बाद मुंह में पान या जर्दा एक अलग ही शांति और सुख देता हैं। चौरसिया समाज के अनुसार बनारसी साड़ी से ज्यादा बनारसी पान लोकप्रिय हैं और सस्ता भी। चेहरे की किताब पढ़ने के लिये बनारसी साड़ी की अपेक्षा बनारसी पान कहीं अच्छा। साड़ी की किनार देखने के बजाय होठों की लाली देखने का आनंद ही कुछ और है।

चौरसिया बंधु मिलावट से चितिंत नहीं है। जरूरत से ज्यादा मिलावट से परेशान है। धर्म समझते है। कभी-कभी लगता है कि ईश्वर भी बहुत बड़ा मिलावटी है। नहीं देखो बोते गेहूं है घास भी उगने लगता है। पीते पानी है नमक भी आ जाता है। मिट्टी को खोदो कोयला निकल आता है, कोयले को खोदो हीरा निकल आता है। कुआं गहरा करो तो पानी के बजाय पत्थर आने लगता है। मिटटी में रेत, रेत में मिटटी। लेकिन भगवान ने एक काम अच्छा किया है। सब खानों की सतह बना रखी है। एक-एक परत, पर खेत वाली बात सही है ना। हम धान बोते है-भगवान साथ में घास बो देता है। बेर के साथ बबूल के पेड़ खड़े हो जाते है। इसलिये चौरसिया समाज ज्यादा मिलावट से दुखी है। अगर रेत चाहिये तो रेत में मिटटी इतनी मिलाओ कि मिटटी भी रेत दिखाई दे। और मिट्टी के अभाव में रेत इतनी मिलाओ कि रेत भी मिट्टी दिखाई दे। मिट्टी में इतनी रेत हो कि मिट्टी बर्दाश्त कर सके और रेत में मिट्टी इतनी हो कि रेत बर्दाश्त कर सकें।

देखो अच्छी चीजों में घटिया चीजें मिलाना भी मिलावट है और ऊँची चीजों में उससे बढि़या चीजें मिलाना भी मिलावट है। लेकिन बड़ी अजीब बात है घटिया चीजों को मिलाने को ही मिलावट कहते है। चूने में गजब की मारक शक्ति हैं चूने और दूध की क्या बराबरी? कहां दूध और कहा चूना? इनमें केवल सफेद रंग की समानता है। बाकी दूध ये तो वैसे ही पानी मिलकर आता है। वे उसमें और पानी डालते हैं और चूना घोलते है। चूने की पकड़ हजार गुना बढ़ जाती है। इसे कहते है भलाई वाली मिलावट। इस देश में नेताओं और ठेकेदारों ने तो सीमेन्ट में राख मिला दी और रेत के मकान और पुल खड़े कर दिये। पुल गिर गये। हजारों आदमी भी मर गये, लेकिन उनके ना दांत टूटे और ना हड्डियां टूटी। क्योंकि ये चूने का कमाल है वे पान-सदनों पर जाते आते रहें थे।

मिटटी से अगर सोना कमाना है तो कमाओं कौन रोकता है। थोड़ा बुद्धि से काम लो। लाल, पीली, काली जैसी चाहो मिट्टी लो। एक किलो मिटटी में सौ ग्राम माजूफल पीस दो और बना लो शुभ्रदंती मंजन। मजाल है किसी का दांत मरने से पहले हिले भी। हमारे देश में मिलावट करने वाले नकली माजुफल और अकलकरे खरीदना चाहते हैं। क्या होगा देश का।

पान का नुस्का कोई एक हो तो समझे और समझाये। गंगू कहता है मेरा पान दे, डॉक्टर बोलता है मेरा दो। उधर प्रोफेसर साहब का अलग पान। लाला जी का अलग, तो रंजीत बाबू की क्या कहने। और चौधरी साहब को तो इस दुकान के अलावा कहीं का पान पसंद ही नहीं। सबकी मांग अलग और स्वाद अलग। जाहिर है- शिशियां और डिब्बियां पड़ी रहती है। दस-पंद्रह किस्म के गुटकें, उतने ही जर्दे, चटनी, गुलकंद और खुशबू। बैठने की जगह नहीं और पचास-साठ डिब्बियां रखना कोई मामूली बात है। फिर सिगरेट और बिडि़यों के दस-दस ब्राण्ड। बड़ा मुश्किल है इन्हें सम्भालना। पान को सूखने से बचाते-बचाते एक हाथ पानीदार तो दूसरा हाथ कत्थेदार हो जाता है। इतनी चीजो की कैसी जांच-पड़ताल करें और कब करे? यहां तो नाक कि मक्खी उड़ाने का समय नहीं, कई बार उंगली की बजाय कत्थे की दण्डी से मक्खी उडाते रहते हैं। उनकी मक्खियां भी बड़ी अडि़यल है। चूने और कत्थे से भागती ही नहीं।

अब जर्दे के नाम पर सड़ी-गली पत्तियां आ जाय। सुपारी के नाम पर बेर और खजूर के बीजें फोड़कर बेची जाय। सुपारी के लच्छे में लकड़ी छीलन को मीठा और रसीला बना कर बेचा जाय तो चौरसिया क्या करें। चटनी, गुलकंद, खुशबू, बहुत सारी चीजे है। सब घटिया चीजे मिला-मिला कर बेचते है। दरअसल काम इतना बढ़ गया है कि अब चौरसिया समाज अपनी दुकान पर ये सब चीजें बना नहीं सकता। इसलिये चूने में दूध मिलाना उसे पसंद है, इससे चूने की प्रतिकार शक्ति हजार गुना बढ़ जाती है। कितने ही पथरीली, जहरीली-नशीली या घटिया मिलावट क्यों न हो सबको हजम कर लेता है। जब चूना गले से उतर कर जठराग्नि तक पहुंचता है तो सबको मार-पछाड़ कर नीचे के दरवाजे से सबको निकाल देता है। वरना तो गले से नीचे जाने ही नहीं देता। थूकने को मजबूर कर देता है।

उनके अनुसार मिलावट में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष गुण स्पष्ट होने चाहिये। देख कर भी नकली न लगे और चख कर भी। मिलावट का फार्मुला होना चाहिये आटे में नमक जैसा, हल्दी में पीली मिट्टी जैसा। मसालों में भूसे जैसा। चौरसिया समाज ने चूने में तारक और मारक शक्ति देखी है। उनके अनुसार देश में सभी तत्वों का उसी मात्र में प्रयोग होने चाहिये। मजबूत जहाज हो तो खारापानी, जीव-जन्तुं और ज्वार-भाटे की थपेड़े उसका कुछ बिगाड़ नहीं सकती। हां अगर जहाज ही मिलावटी चीजों से बना हो तो?

मौलिक चीजों की जांच बहुत जरूरी है। अब देखना होगा की किसी भी काम में दो-तीन चीजें मौलिक होती है। ये सब काम के अनुसार है। जैसे नेता बनना है- तो हाथ होना जरूरी है, दूसरा कुर्सी होना जरूरी है और इसके अलावा कुछ ख्याति और साथी होना जरूरी है। बिना हाथ के नेता नहीं और बिना कुर्सी के नेता नहीं। हाथ होंगे तो वह कूर्सी को पकड़ सकता है। मजबूती से जकड़ सकता हैं नकली हाथों से काम नहीं चलेगा। उसी तरह कुर्सी लकड़ी की हो तो मजबूत हो। वरना लोहे या स्टील की होनी चाहिये। कुर्सी पकड़ कर उठने-बैठने से जो व्यवसाय होता है उससे नेता का वजन भारी हो जाता है। भूख बढ़ती है। कुर्सी में उसे सहने की ताकत हो। अब हाथ और कुर्सी कितना ही मिलावटी काम करें किसी को पता ही नहीं चल सकता। बाकी कुछ ख्याति और साथी के हवाले छोड़ दो।

यही बात पान-सदनों मे है। पान, चूना और कत्था ये तीन चीजें है मूल। इसके बाद तो मुंह बंद करने वाले फार्मूले है और जेब भरने वाले तजुर्बे है। लेकिन इन दिनों चौरसिया समाज बहुत परेशान है। चूने में कोयले की राख की मिलावट होने लगी है। कम से कम दो-तीन मूल तत्वों में मिलावट नहीं होनी चाहिये। वैसे, गैर जरूरी चीजों की मिलावट से पान के दाम में 200 प्रतिशत कीमत बढ़ जाती है, यह बात अलग है। चौरसिया समाज चूने के शाश्वत गुण को बनाये रखने के लिये पूरा प्रयत्न कर रहे हैं। चूना खरीदते समय बरती जाने वाली सावधानी को बता रहें है। उनके अनुसार मानव अपने पूरे शरीर को ढक देता है, खुला छोड़ता है केवल चेहरा। यदि चूने में विकृति आ जाय तो चेहरे के सुन्दरता बिगड़ सकती है। इसलिये चूना असल होना चाहिये, भले ही बाकी चीजों को थूक कर बाहर निकालना पड़े।

राशन की दुकान हो या न हो, पान की दुकान हर जगह होनी चाहिये। चाहिए दुकान हो या बक्सा, टपरी या टपरा। चलती-फिरती हो बैठी, दुकान होनी चाहिये। खाद्यान्न की इस विकट समस्या में अगर पानसदन न होते तो आधा समाज यमलोक चला जाता। पान-चूने-कत्थे से कम से कम आदमी दिन भर जुगाल कर सकता है और भूख को टाल सकता है। यह भी उल्लेखनीय है कि पान पाचक भी होता है। इसलिये बेमतलब खाने को भी पान पचा देता है। राशन की दुकान से मिट्टी का तेल एक बार मिले तो भी समस्या। शराब दिन में दो बार मिले तो भी समस्या। पर पान दिन में पांच बार भी मिले तो भी कम है।

चौरसिया बंधु ने मानव जाति को बहुत संतुलित करने का प्रयास किया है। आदमी पान खाकर जवाब सोच-समझकर देता है। चिंतन करने का बहुत अच्छा अवसर मिलता है। संयम के अवसर मिलते है। उत्तेजना कम होती हैै-आदि-आदि। अगर चूने में विकृति आ गयी तो भावी पुरुषों को घूंघट में घूमना पड़ेगा।

हरी सब्जियों की समस्या दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रहीं है। रोगी न घर के न घाट के। हरी सब्जियों और साग-भाजी ना सही पान उसके मुंह में ठूंस दो। उसका सारा रोष ठण्डा पड़ जायेगा।

यू तो भारत के हर हेयर कटिंग की दुकान पर बड़े से बड़े हीरों ने बाल कटवाते है और जितने ब्यूटी पार्लर है सभी में -रेखा से लेकर माधुरी और श्रीदेवी गयी है। बाल कटवाने वाला मजबूरी में गले तक कपड़े में बंध जाता है। खुली गर्दन को नाई के हवाले कर देता है। शीशे में खुद को देखता है। हर एंगल से। लेकिन पान सदनों के शीशे में खुद को देखने का अंदाज ही अलग है। थूक-थूक कर या खकार कर, एक बार उसके शीशे में झांको तो लगेगा कि यह भी किसी फिल्मी हीरों से कम नहीं।

चौरसिया समाज की परिकल्पना में एक और भारी पलड़ा है। उनके अनुसार, ‘बड़ी से बड़ी शादी पार्टियों में चूना लगाने वालों का बुलावा मिलता है। बहुत तहजीब से दुकान सजती है। हर एक को पान मिलता है। जो नहीं खाता वह भी खा लेता है। जो सिगरेट नहीं पीता वह भी एक सुटटा लगा लेता है। क्यों न हो इस देश में इस व्यापार संवर्धन के लिये राशन की दुकान पर भी पान का एक फट्टा रख दिया जाये। ताकि हर एक गरीब आदमी अपने सूखे और सिकुड़ें होठों को लाल कर सकें।’ उनकी बात में दम है।

हर 10-20 कि-मी- की दूरी पर पान सदनों और पान के फार्मूले अलग-अलग है। 400 से 1000 कि-मी- की दूरी के पानों का अंदाज ही अलग है। उन्हें एक सूत्र में पिरोना भी इसका संकल्प है। मद्रास में दो किस्म के पान मिलते है। एक पान रोल के रूप में गोले की गिरी के साथ, दूसरा पान हर दुकान पर मिलता है- 10 पैसे में पांच और 50 पैसे की 4-5 गुटकियां। दिन भर का हिसाब किताब इसी में। ऐसे ही कोलकता में यहा पान 5 रूपये से गिरकर 50 पैसे में मिलता है। इंदौर का पान अलग है। खंडवा और खरगोन के पान में 20 ग्राम सुपारी होती है। नये आदमी की एक दिन में जीभ चौपट। आगरे और लखनऊ के पान का अंदाज भी अलग है। फिर भी रीति रिवाजों और परम्पराओं को ध्यान में रखते हुए वे पान के फार्मूले पर ज्यादा चिंतित नहीं है। वे छूट देते है पर कीमतों पर समानता चाहते है। दिल्ली में 1 रूपये से लेकर 5 रूपये तक के पान बिकते है। दिल्ली में तो फिर भी संतुलित है पर चेन्नई और कोलकत्ता में? कहा 50 पैसे का पांच पान और कहां 5 रूपये का एक पान। कीमतों के इतनी दूरी में समाज का चिंतित होना जायज है।

अनेक राज्यों में उन्होंने चूना, चूनादान की व्यवस्था बहुत सुचारू रूप से चला रखी है। गरीब लोग जर्दा दांतो में दबाने के पूर्व, अमीर लोग अपने अनुपात को संयत करने के लिये अलग से चूना मांगते है। चौरसिया समाज बड़े आदर के साथ दे देता है। बल्कि एक अलग ही डिब्बा रख देता है। अपना चुना खुद लगाओ। उसी तरह मुंबई, इंदौर में एक टिमटिमाता दिया जलता रहता है। दिल्ली में रस्सी। ताकि हर राहगीर जब चाहे सुलगदानी से बीड़ी सिगरेट जला सकता है। चूनादान और अग्निदान की इस सेवा को कौन भूला सकता है। लोग अपने आप स्वयं चूना लगाते हैं और सिगरेट जलाते हैं। दानवीरता और स्वावलम्बन का पाठ इससे अच्छा और कहां मिलेगा।

पारिवारिक जीवन स्तर और आर्थिक ढांचे का सही-सही मूल्यांकन चौरसिया समाज करता है। कौन पान कैसे खाता है। कौन सी सिगरेट पीता है। कितने पान खाता है। एक व्यक्ति स्वयं पर कितना खर्च करता है, इसी से पता चलता है कि वे कितना कमाता है। उनके अनुसार अब भारतवासी उतने गरीब नहीं है जितने की आंकड़े बताते हैं। वे खर्च करना चाहते है पर आपूर्ति की समस्या आडे आ जाती है।

चौरसिया समाज का औद्योगिक और व्यापारिक प्रतिनिधी मंडल ताईवान, सिंगापुर, लंदन, टोकियों और वाशिंगटन, कीनियां, थाईलैण्ड बल्कि विश्व के प्रमुख देशों में उड़ान भरना चाहता है। वहां पर भारतीय तो है ही, साथ ही बड़े व्यापारिक संभावनाओं को खोजा जा रहा है। निर्यात अभी भी हो रहा है। किंतु उल्लेखनीय नहीं है। मनमोहन सिंह (तात्कालिक वित्तमंत्री) ने अभी तक इस उद्योग व्यापार पर गहरी दृष्टि नहीं डाली। पर सम्भावनाओं से नकारा नहीं जा सकता। उन्हें केवल देश के लोगों के होठों की लाली पसंद नहीं, वे विश्व के लोगों को भी अपना समझते है। इसके लिये एक अलग से बिटल लीफ एक्स्पोर्ट परिषद् स्थापित होनी चाहिये।

मुम्बई, चेन्नई, कोलकत्ता, मदुराई, बंगलोर और हैदराबाद दो कदम आगे है। उन्होंने इस सार्वजनिक वितरण प्रणाली को और सुखमय बनाया है। उन्होंने तारक और मारक तत्वों को खूब आजमाया है। पान में गोले गीरी, दाल, मुलैठी आदि भी देते है। इसके अलावा-केले, कोलगेट, साबुन, अगरबत्ती, झण्डूबाम, कैम्पा भी बेचते है। खुशबू डिस्प्रिन, सेरेडॉन सब बेचते है। जिससे चूना लगने पर इधर-उधर झांकना न पड़े। वे मानते है कि सिगरेट सेहत के लिये हानिकारक है- तो सिगरेट के बाद केला खाओ। अगर जर्दे से सिर झन झनानें लगे तो सेरेडॉन लो। इस पर बात न बनती हो तो कोलगेट से दांत और मूंह साफ करो।

समृद्धि के शिखर तक पहुंचते-पहुंचते आदमी आधी उम्र बिता देता है। बाद में उतार आना शुरू होता है। आदमी चाहता है कि अब आगे कुछ नहीं चाहिये। तो घटिया चीजों से सेहत बिगाड़ना कहां तक अच्छा है और फिर मरना ही है तो मामूली बीमारी से मरना भी कोई मरना है। बीमारी वह हो जिसकी कोई चर्चा हो। जिसमें मर्ज का नाम हो और मरीज का भी।

संगीतकारों, गीतकारों, साहित्यकारों को भी इन पान सदनों ने खूब पाला पोसा है। उनके ज्ञानचक्षू खोल दिये है। पान की पीक या बिडी-सिगरेट की धूप से अनेकों साहित्यकारों और संगीतकारों ने मासिक, त्रैमासिक और ऐतिहासिक रचनायें दी। पान खाये सैंया हमार, सजना के होंठ और खाईगे पान बनारस वाला। आज के युग के प्रसिद्ध गीत है। एक पान से आदमी की तमाम खिड़कियां खुल जाती है।

तथा कथित गुटके बाजो ने इनपर हमला भी किया है कि इनकी दुकान न चले ना इनकी डण्डी हिले। लेकिन ये सदा लूंगी बांधे कमर कसे रहते है। उन्हें आज तक कोई हिला नहीं सका।

विदेशी सांस्कृतिक हमलों का सामना भी वे डट कर कर रहें है। भले ही विदेशी ब्राण्ड की दो-चार खाली सिगरेट की डिब्बियां दुकान में रखते हो लेकिन बेचते है स्वदेशी चीजें।

देश के विकट स्थिति में चौरसिया समाज ने देश और सरकार को अप्रत्यक्ष रूप से सुरक्षा की है। एक नेता के समर्थन देने या न देने से या ना कहने से सरकार पटखनी खा सकती थी। चौरसिया से ऐसा पान चलाया कि नेता ने चूं तक नहीं की। सरकार बच गयी। कुल मिला कर देश और समाज के लिये इस समाज ने बहुत कुछ दिया है, निश्चित रूप से इन सदनों को व्यापक प्रचार प्रसार होना चाहिये।

पीकने और थूकने में अंतर है। पीकने में सम्मान है। आदर है, थूकने में अनादर, घिनौनापन है। पीकने में एक अदा एक नजाकत हे। परिष्कृत और संतुलित व्यवहार। जबकि थूकने में यह बात नहीं, उसमें उन्माद है संस्कार हीनता हैं। थूक को व्यर्थ समझ कर बाहर फेंकने का प्रयत्न होता हे। ध्यान रहें थूकने के लिये पीकदानियां नहीं बनी, पीकने के लिये बनी है।

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रचनाकार: चूना लगाने का धंधा - सुरेश खांडवेकर
चूना लगाने का धंधा - सुरेश खांडवेकर
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