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विकट है टिकट की व्यथा-कथा : सुरेश खांडवेकर

सेवाराम के साथ ज्यादती हो रहीं है। जनता की सेवा करते करते बाल सफेद हो गये। दुःख तो इस बात का है कि इतना करने के बाद भी उन्हें सिर्फ उनके इलाके के लोग ही जानते है। और जिनका कोई इलाका नहीं है, वे टिकट बांटने वाले हो गये है। वे हर इलाके में बोल लेते है। हर मौके पर बोल लेते है। सेवाराम अपने और अपने इलाके के दुःख दर्द में ही उम्र बिता रहें है।

कितनी बार चुनाव हुआ सेवाराम हर बार सोचते रहें कि अपनी आप पार्टी का टिकट उन्हें मिल जायेगा। पर उनकी महान सेवा बार-बार आड़ें आने लगी। कोई कहता, ‘सेवारामजी ने अपना जीवन दुखियों के लिये अर्पित कर दिया है। उन्हें उनके उद्देश्य से भटकाना ठीक नहीं।’

कोई कहता, ‘पचास अनाथ बच्चों को सेवाराम जी ने जो जीवन दिया, शायद उनके माता-पिता भी नहीं देते। उनके कार्यक्रम को विस्तार देने के लिये उनके स्थान पर अपने गिरजास्वामीजी को टिकट देना चाहिये।’

एक कहता ‘‘भाई साहब, पानी, बिजली, सड़कें, लाईट, पार्क, सीवर, एक-एक दफ्तर में सेवाराम की दौड़-धूप, चिट्ठी-पत्री काबिले तारीफ है। फिर चाहे किसी का काम हो। बड़ा हो, अपना हो, पराया हो, चाहे किसी पार्टी का हो मजाल है उनको कोई मना कर दे। हाल ही में जो तोड़-फोड़ और हिंसा हुई सेवाराम के इशारे पर शांत हुई। उनके सामने इलाके का एक भी आदमी ऊँचा बोल नहीं बोल पाता। ऐसे सेवाभावी और ऊँचे कद वाले सेवाराम जी को पार्टी टिकट देकर उनकी जिंदगी बर्बाद करना है। हम तो कहते है हमारे उधमसिंह को टिकट मिलना चाहिए। उसकी ऊपर तक पहुंच है। वे पटाखे फोड़ना भी जानते है।’

सेवाराम सोचते कि, अबके जरूर दिल्ली की विधानसभा के चुनाव में पार्टी उन्हें टिकट दे देगी। वे चुपचाप अपना काम करते। उन्हें अपना नाम सुझाने का या अपने नाम प्रस्ताव का भी तरीका नहीं आता था। बड़ी शर्म महसूस होती थी कि कैसे कहें, ‘मै इस इलाके के लिये सबसे अच्छा उम्मीदवार हूँ।’ जब भी पार्टी की बैठक होती, लोग उन्हें मंच पर बिठाते। फूलों की मालाएं पहनाते। यदि कभी गलती से किसी कोने में बैठे हों तो उन्हें बुला कर उनका मान करते। सेवाराम जी इसी में गदगद हो जाते-

इस बार जब टिकट बंटने की बात चली तो पार्टी के संयोजक से धनीराम बोला, ‘‘हमारे पास सेवारामजी को टिकट देने की बात भी आयी। लेकिन सेवाराम जी को मैं अपने बाल्यकाल से जानता हूं। वैसे भी जो बिना मंत्री के, बिना पद के इतने सारे मंत्रालय संभाल सकता है, उन्हें टिकट देकर उनका मजाक उड़ाना अच्छी बात नहीं है, सेवा करना एक योग-साधना है। साधना में विघ्न डालना पाप है। हम ऐसा पाप नहीं होने देंगे।’

धनीराम ने फिर कहा, ‘ऐसे काम के लिये चरनदास सबसे बेहतर उम्मीदवार होंगे। वह सरल भी है, जटिल भी। काम करना भी जानते है और काम करवाना भी। चरनदास ने घाट-घाट का पानी पिया है। वह छाती पर बैठना भी जानता है और चरणों में भी। पिछली बार बस्तो पहलवान को एक घूंसा मारा और दांत मुटठी मे भर लाया। दूसरे दिन ऐसा समझाया कि सारे अखाड़ें बाज पहलवान चरणदास के चरणों में आ गये।’

सेवाराम अपने मन की बात कहने को उठ रहे थे कि किसी ने जोर-जोर से नारे लगाने शुरू कर दिये, ‘सेवाराम जिंदाबाद, ऊधमसिंह जिंदाबाद, चरणदास जिंदाबाद।’ इतने में पार्टी के पांच-सात मजबूत खूंटेदार आ गये। उन्होंने आते ही पूछा, ‘आपके इलाके की तरक्की के लिये मिल्खा सिंह की उम्मीदवारी कैसी रहेंगी?’

‘वे तो दौड़ने वाला है।’

‘तो हमें क्या बैठने वाला चाहिये?’

‘क्या पार्टी का दिवाला निकल गया?’

‘दिवाला?’

‘अरें पार्टी निहाल हो जायेगी।’

‘पार्टी में हर तरह से जान फूंकेंगे।’

‘भगदड़ मची और हो-हल्ला हो गया। उधर उधमसिंह ने हवा में बंदूक चला दी। सबको शांत किया। बोला, ‘आप शांति से बैठिये। सबको खाना मिलेगा। बाद में आइसक्रीम, उसके बाद टिकट की बात होगी। जूतें घिसने से लीडरी नहीं आती। सेवा करने से लीडरी नही आती। लीडरी वो है, जिसमें आप और हम बेधड़क जी सकें। अफसरों के कान मरोड़ सकें। बल्कि उनकी छाती पर बंदूक रख कर काम करवा सकें।’

एकाएक हजारों लोगों ने उधमसिंह की जय बोल दी। दस मिनट में सैकड़ों मालाओं से उधमसिंह का गला लाद दिया।

सेवाराम समझ गये सेवा की पगडंडी से सत्ता की सड़क नहीं मिल सकती।  

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