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समीक्षा - " काव्यांजलि" कवियों की सादर भावांजलि

" काव्यांजलि" कवियों की सादर भावांजलि

(माँ गंगा को समर्पित कृति)

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संस्कार भारती गाजियाबाद की शानदार प्रस्तुति "काव्यांजलि" वास्तव में माँ गंगा के प्रति भावांजलि है।

संस्कार भारती के विभाग संयोजक डॉ राजीव कुमार पाण्डेय एवं जिला संयोजक डॉ जयप्रकाश मिश्र के सम्पादन में हर्फ़ मीडिया प्रकाशन दिल्ली से सद्य प्रकाशित कृति "काव्यांजलि" एक अदभुत, संग्रहनीय काव्य कृति है।

संस्कार भारती के पावन अनुष्ठान "माँ गंगा महोत्सव" से कल्पित कृति जिसमें 91 कवियों की गंगा गाथा में लिखी अनुपम कविताएं हैं जिन्हें श्रद्धा से माँ गंगा की ऋचाएँ कहना अतिश्योक्ति नहीं है।

संस्कार भारती के अखिल भारतीय संरक्षक और हमारी प्रज्ञा के मूल प्रेरणा स्रोत महान कला साधक पद्मश्री बाबा योगेंद्र जी को समर्पित इस कृति में उनके पावन आशीष की छाया है वहीं पूर्व केंद्रीय विदेश राज्य मंत्री श्री जनरल डॉ वी के सिंह जी, प्रदेश के खाद्य एवं रसद राज्यमंत्री श्री अतुल गर्ग जी, गाजियाबाद महानगर की प्रथम नागरिक श्रीमती आशा शर्मा जी की पावन मंगल कामना से हमारे पवित्र कार्य को ऊर्जा मिली है और यह काव्य कृति आपके सम्मुख आ सकी है।

कवर पृष्ठ का चित्रांकन न केवल आकर्षित करता है बल्कि किसी धार्मिक ग्रन्थ की तरह श्रद्धा सहित नत कर देता है।

मां गंगा का गुणगान करने में अनेक कवियो ने अपनी कलम चलायी है लेकिन यहाँ इस कृति में इक्यानवे कवियों ने अपनी आहुति दी है। कुछ प्रमुख आहुतियों से परिचित कराते है-

दिनेश त्यागी जी की ये पंक्तियां प्रार्थना की पंक्तियां है-

माँ गंगा के नीर की,महिमा अपरम्पार।

सत्य सनातन धर्म की,होती जय जयकार।

हिंदुस्तान के ओज के बड़े कवि डॉ वागीश दिनकर जी की ये पंक्तियां-

यही विश्व की अद्भुत निधि है,विश्व इसी का यश गाता है।

विश्व शांति की सुधा यही है, यही विश्व वन्धा माता है।

संस्कार भारती के प्रांतीय सह महा मंत्री एवं सुप्रसिद्ध गीतकार श्री चन्द्रभानु मिश्र जी की ये पंक्तियां सहज ही जिव्हा पर चढ़ जाती है-

माँ गंगा के द्वार चले हम,माँ गंगा के द्वार चले।

पाप मिटाती है जो जग का,हम उनके दरबार चले।

सम्पादक डॉ जयप्रकाश मिश्र जी का यह दोहा हमारी आस्था को बढ़ाता है-

गोमुख से बहकर चली, जिसकी निर्मल धार।

श्रष्टि ने हमको दिया,सर्वोत्तम उपहार।

मिजोरम से शिक्षक कवि श्री जयवीर सिंह यादव आज की व्यवस्था से दुखी होकर कहते है-

गंगा दूषित कर रहे,जान बूझ कर लोग।

सड़े गले शव फेंकते, बाँट रहे है रोग।

प्रांतीय साहित्य विधा प्रमुख श्री बाबा कानपुरी जी पँक्तियों में माँ गंगा के प्रति प्रेम दर्शाया गया है-

प्यासे को पयपान कराती ज्यों माता,

गोदी में लेकर दुलराती ज्यों माता,

लिटा खाट पर लोरी यथा सुनाती है,

हर सुख दुख में साथ निभाती ज्यों माता।

सम्पादक डॉ राजीव पाण्डेय के 10 दोहों में गंगा का संक्षिप्त इतिहास है कुछ पँक्तियों में उनके भाव इस प्रकार हैं-

मिलन हिमालय का हुआ, मैना से इक बार।

दो कन्या गंगा उमा, जन्मी उनके द्वार।

विन्दुसार से चल पड़ीं,धाराएं भी सात।

संग भगीरथ सातवीं, जो थी गंगा मात।

बेटी ऋषिवर जुन्ह को, नया मिला इक नाम

उसी जान्हवी को सभी, पूजें जैसे धाम।

डॉ हरिदत्त गौतम 'अमर' ने देववाणी संस्कृत में लिखा है

गंगे,त्रिपथगे, भागीरथि राजिते।

विष्णु चरणप्रिये,ब्रह्मद्रवे जान्हवि नमोउस्तुते।

श्री चेतन आनन्द ने गंगा का आव्हान इस प्रकार है-

त्रिवेदों की लाडली, हिमशिखरों की शान।

आज धरा से माँगती, जीने का आव्हान।

गंगा मैया की व्यथा को लिखा है श्री ब्रह्मप्रकाश वशिष्ठ 'बेबाक' जी ने -

गंगोत्री से गंगासागर तक,गङ्गा जी फैली हैं।

धोते धोते पाप सभी के गंगा मैया मैली हैं।

डॉ मीनाक्षी शंकर शर्मा प्रदूषण से दुखी हैं

मैंने माँ का फर्ज निभाकर,तुमको गले लगाया।

झंझावातों को सह सह कर, अपना अमिय पिलाया।

देकर तुमको सर्वस्व अपना,सब कुछ तुम पर वारा,

तुमने मुझको प्रदूषित करके इतना क्यों है रुलाया।

डॉ सरोजिनी ' तन्हा' जी की ये पँक्तियों में भी सार छिपा है-

मैं गङ्गा हूँ मेरी हर बूँद में अमृत समाया था

कठिन तप करके धरती पर भगीरथ मुझको लाया था

मैं गंगा हूँ मेरी हर बूँद,....

इस ग्रन्थ की दूसरी विशेषता यह है कि इसमें भोजपुरी के बड़े कवियों की भी रचनाएँ हैं

श्री तारकेश्वर राय 'तारक' जी के उदगार

गंगा क हालत का बताई ये भाई

हरन बाड़ी देखी उ जग के मिताई।

भोजपुरी सरिता के सम्पादक श्री जयशंकर प्रसाद द्विवेदी जी की भावांजलि भी इस प्रकार है

अइला, त आवते तू उनके गुन गवला।

जन जन जे सँगवे तू हमरो मन भवला

असरा जगाई दिहला बनिके कन्हैया

बोलावत बाडी हो आइके करहु सेवकइया।

सम्पूर्ण ग्रन्थ में एक से एक बढ़कर कविताएं संग्रहीत हैं जिन्हें पढ़कर अनायास श्रद्धा उमड़ने लगती है। बहुत सुंदर और प्रणम्य सार्थक प्रयास संस्कार भारती का।

कवर पृष्ठ के पार्श्व में ध्येय गीत है तो फ्लैप पर हमारे पर्व , हमारी विधाएं, और अंतिम फ्लैप पर राष्टगीत वन्देमातरम भारत माता के प्रति अगाध प्रेम परिलक्षित करता है। यह कृति साहित्य जगत की अनुपम निधि है इसके समस्त कर्मठ पदाधिकारियों के प्रयासों की मुक्त कंठ से सराहना करते हुए अपने सम्पादक साथी डॉ जयप्रकाश मिश्र जी को भी बधाई और हार्दिक शुभकामनाएं। इस कृति और कवियों को माँ गंगा यश प्रदान करें।

जय गंगा माँ।

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समीक्ष्य कृति- काव्यांजलि

सम्पादक- डॉ राजीव कुमार पाण्डेय,डॉ जयप्रकाश मिश्र

प्रकाशक- हर्फ़ मीडिया नई दिल्ली

मूल्य-200 रुपये मात्र

पृष्ठ- 104

समीक्षक-डॉ राजीव कुमार पाण्डेय

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