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लघुकथा - अपने-अपने हाथ - ज्ञानदेव मुकेश

एक कामवाली अपनी नादान बेटी को लेकर एक घर में काम करने पहुंची। उसने बेटी को एक कोने में बिठाया और बर्तन-बासन से लेकर घर के सभी छोटे-बड़े काम अपने हाथों से करने लगी। यह देख बेटी को बड़ा अचरज हुआ। वह मां के पास गई और कौतुहलवश पूछा, ‘‘मां, घर के लोगों को भी भगवान ने हाथ दिए हैं। वे कोई भी काम अपने हाथों से क्यों नहीं करते ?’’


  मां ने समझाया, ‘‘बेटी, ये दिमागवाले लोग हैं। ये सिर्फ दिमाग का काम करते हैं। हम हाथवाले हैं। हम हाथ का काम करते हैं।’’
  इसपर बेटी ने एक जायज प्रश्न उठाया, ‘‘तब भगवान ने हमलोग को चार हाथ क्यों नहीं दिए ? और इनलोगों को क्यों बेकार में हाथ दे दिए ?’’
मां ने झिड़कते हुए कहा, ‘‘मुझे नहीं पता ! जाकर चुपचाप कोने में बैठो।’’


बेटी दिमाग पर प्रश्न लिए कोने की तरफ बढ़ी। तभी उसका पांव फिसल गया और उसके गंदे हाथ सोफे के चमकदार गद्दे पर पड़ गए। गद्दे को गंदा होता देख गृहिणी को तैश आ गया। वह बेटी की तरफ लपकी और अपने दोनों हाथों से बेटी के मासूम गालों को थप्पडों से नवाज दिया।


  बेटी रोती हुई मां के पास गई। कामवाली ने पूछा, ‘‘क्या हुआ ?’’
  बेटी ने अपने गालों को सहलाते हुए भरी आंखों से कहा, ‘‘मां, मुझे मेरे प्रश्न का जवाब मिल गया है।’’ 
 
                                               -ज्ञानदेव मुकेश                         
                                    पता-
                                                फ्लैट संख्या-301, साई हॉरमनी अपार्टमेन्ट,
                                                अल्पना मार्केट के पास,
                                                न्यू पाटलिपुत्र कॉलोनी, 
                                                 पटना-800013 (बिहार)

e-mail address - gyandevam@rediffmail.com

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