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आँख चुराओगे तुम कब तक, प्यार छुपाओगे तुम कब तक। तेजपाल सिंह ‘तेज’ की ग़ज़लें

तेजपाल सिंह ‘तेज’ की दस ग़ज़लें

-एक-

मन है मिरा कि सब तक, मेरा सलाम पहुँचे,

हर खासो-आम की रुख, मेरा कलाम पहुँचे ।

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दीनो-मजहब का रोड़ा, बाकी रहे न पथ में,

मस्जिद में हो पुजारी, मन्दिर इमाम पहुँचे ।

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छोटा – बड़ा न कोई, बन्दे हैं सब खुदा के,

यानि कि मुहब्बत का घर-घर पयाम पहुँचे।

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परजा को चाहिए कि राजा का हाल जाने,

परजा का हाल लेने घर – घर निजाम पहुँचे।

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पीरी मिरे ज़िगर की सह लूंगा ‘तेज’ मैं खुद,

कातिल मेरा सलामत, अपने मुकाम पहुँचे।

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-दो-

इंसानियत यूँ आजकल ठहरी चुकी – चुकी,

एकांत में हँसती है पर अब भी कभी-कभी।

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यूँ ही तो मेरा अपना दुनिया में दिलनशी है,

सो रहती है तिरे सामने आँखें झुकी – झुकी।

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यू मंजिलें हैं बाकी अभी और भी ए! दोस्त,

राहें मगर लगती हैं, कुछ-कुछ थकी-थकी।

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नए दौर के पेशेनजर यूँ बोझ बस्तों का बढ़ा,

कि उम्र बचपन की भी है लगती पकी-पकी।

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कल बादलों को ओढ़कर लीं ‘तेज’ ने अंगड़ाइयाँ,

है कि चाँदनी भी आजकल बेशक ठगी – ठगी।

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-तीन-

वो लौटकर घर आए तो अच्छा हुआ,

हो रू-ब-रू बतियाए तो अच्छा हुआ।

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सुधियों के आइने में कल आँखें लड़ा,

वो दो घड़ी मुस्काए तो अच्छा हुआ।

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कि भूलकर गुजरे दिनों की दास्ताँ,

वो दो घड़ी मुस्काए तो अच्छा हुआ।

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पथरा गई थे नयन सच तेरे बिना,

अबकी तनिक सरसाए तो अच्छा हुआ।

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कि बाद मुद्द्त आस के बिस्तर मिरे,

थोड़ा – बहुत गरमाए तो अच्चा हुआ।

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-चार-

धरके कूल्हे पे गगरिया साहिब,

घर से निकली है गुजरिया साहिब।

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जुल्फ समझी ना हवा की साजिश,

सिर से खिसकी है चुनरिया साहिब।

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क़ि जो भी देखे है ठिठक जाए है,

ऐसे लचके है कमरिया साहिब ।

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पाँव धरती से नहीं हैं बाबस्ता,

ऐसे बहकी है उमरिया साहिब।

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‘तेज’ निकला है बदन कपड़ों से,

ऐसे निखरी है उमरिया साहिब।

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-पांच-

आँख चुराओगे तुम कब तक,

प्यार छुपाओगे तुम कब तक।

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छोड़ों भी अब आँख-मिचौनी,

ख्वाब दिखाओगे तुम कब तक।

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कि कोई नहीं फँसने वाला याँ,

जाल बिछाओगे तुम कब तक।

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अपनी फितरत में जलना है,

आग बुझाओगे तुम कब तक

‘तेज’ हिमालय की चोटी पर,

गाँव बसाओगे तुम कब तक।

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-छ:-

दादी माँ जो भी कहती थीं,

अब लगता है सच कहती थीं।

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बचपन की नन्हीं दुनिया में,

अम्बर में नदियाँ बहती थीं।

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धरती पर थे चोर-उच्चके,

अम्बर में परियाँ रहती थीं।

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घर की छत पर भूत-भूतनी,

आँगन में चिड़ियाँ रहती थीं।

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आज हुआ गुलशन आवारा,

कल बूदार हवा बहती थीं ।

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-सात-

इश्क मरने का तसव्वुर तो नहीं,

जख़्म गहरे हैं समंदर तो नही।

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हमने जाना कि लोग दुनिया के,

बहुत जालिम हैं सिकन्दार तो नहीं।

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वो जो बैठा है मेरी चौखट पे,

माना अपना है मुंतजिर तो नहीं।

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कि कैसे छेड़ूँ मैं तार वीणा के,

मुझको रोना भी मयस्सर तो नहीं।

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कि बातों–बातों में सिमटा जाएगा,

‘तेज’ इतना भी मुख्तसर तो नहीं।

​​

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-आठ-

गुजरा हूँ जिधर से मैं यारा,

धुँधला- धुँधला प्रकाश मिला।

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कि चाँद-सितारों से बोझिल,

कुछ झुका-झुका आकाश मिला।

​​

पतझड़ को हर साँस जिन्दगी,

अरु पावस को सन्यास मिला।

​​

याँ रोटी के बदले में अक्सर,

सच! एक अदद उपवास मिला।

​​

नए दौर की रजधानी में,

है जनता को वनवास मिला।

​​

अनुबन्धों की तंग गली में,

बिखरा-बिखरा विश्वास मिला।

​​

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-नौ-

तेरे पीछे चुपके रहना सीख गया,

असमानों से बातें करना सीख गया।

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तेरे संग होने-भर से थे ग़ज़ल जवाँ,

तुम बिछड़े तो आहें भरना सीख गया।

​​

पल-पल इतना टूटा-बिखरा मैं आखिर,

रेत की दीवारों-सा ढहना सीख गया।

​​

कि वादे तो वादे है सच्चे –झूठे क्या,

वादों की धारा में बहना सीख गया।

​​

बहुत लोग मर-मरके जिन्दा रहते हैं,

’तेज’ भी मरके जिन्दा रहना सीख गया।

​​

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-दस-

थोड़ा सा जो असर हुआ है,

जिन्दा अपना हुनर हुआ है।

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आँखों-आँखों चपल चाँदनी,

पाँवों-पाँवों सफर हुआ है।

​​

मानव-मानव गूँगा – बहरा,

दानव – दानव मुखर हुआ है।

​​

कि बेसिर संबंधों के चलते,

अनुबन्धों का गुजर हुआ है।

​​

कि बस्ती-बस्ती सन्नाटा है,

’तेज’ बता क्या कुफर हुआ है।

​​

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(‘गुज़रा हूँ जिधर से’ ग़ज़ल संग्रह से प्रस्तुत)

तेजपाल सिंह ‘तेज’ (जन्म 1949) की गजल, कविता, और विचार की कई किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं- ‘दृष्टिकोण ‘ट्रैफिक जाम है’, ‘गुजरा हूँ जिधर से’, ‘तूफाँ की ज़द में’ व ‘हादसों के दौर में’ (गजल संग्रह), ‘बेताल दृष्टि’, ‘पुश्तैनी पीड़ा’ आदि (कविता संग्रह), ‘रुन-झुन’, ‘खेल-खेल में’, ‘धमा चौकड़ी’ आदि ( बालगीत), ‘कहाँ गई वो दिल्ली वाली’ (शब्द चित्र), पाँच निबन्ध संग्रह और अन्य सम्पादकीय।

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तेजपाल सिंह साप्ताहिक पत्र ‘ग्रीन सत्ता’ के साहित्य संपादक, चर्चित पत्रिका ‘अपेक्षा’ के उपसंपादक, ‘आजीवक विजन’ के प्रधान संपादक तथा ‘अधिकार दर्पण’ नामक त्रैमासिक के संपादक रहे हैं।

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स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त होकर आप इन दिनों स्वतंत्र लेखन के रत हैं।

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सामाजिक/नागरिक सम्मान सम्मानों के साथ-साथ आप हिन्दी अकादमी (दिल्ली) द्वारा बाल साहित्य पुरस्कार ( 1995-96) तथा साहित्यकार सम्मान (2006-2007) से सम्मानित किए जा चुके हैं।

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आजकल आप स्वतंत्र लेखन में रत हैं।

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सम्पर्क : फोन—9911414511 : E-mail — tejpaltej@gmail.com

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