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लघुकथा - मिट्टी धर्म - ज्ञानदेव मुकेश

 
                मिट्टी धर्म

एक व्यक्ति को जमीन का एक टुकड़ा दिया गया और उससे कहा गया कि इस जमीन से एक अच्छी फसल उगाकर दिखाओ। वह पढ़ा-लिखा आदमी था और उसने बाहर की दुनिया देखी थी। उसने तय किया कि खूब अच्छे नस्ल के बीज बाहर से मंगाऊंगा और बाहर के मुल्कों से खाद भी ले आऊंगा। फिर तो अच्छी फसल आएगी ही। कहना न होगा कि उसने खेती के आधुनिक यंत्र भी मंगा लिए। मगर इन अति विशेष प्रयासों के बावजूद उसकी फसल उग न सकी। कुछ पौधे पनपे भी, मगर बाद में वे सभी मुरझा गए। वह निराश हो गया और उसने हार स्वीकार कर ली।


बाद में एक किसान को वह जमीन दी गई और उसे भी एक अच्छी फसल उगाने की चुनौती दी गई। पहला व्यक्ति किसान पर हंसने लगा। उसने कहा, ‘‘मेरे बाहरी बीज और खाद कुछ न कर सके। तू गरीब किसान साधारण बीज और खाद से भला क्या कर लेगा ?’’


किसान चुप रहा और अपने काम में लग गया। कुछ माह बीत जाने के बाद लोगों ने देखा, उसके खेत में धान की हरी-हरी बालियां लहरा रही हैं। हारा हुआ वह आधुनिक व्यक्ति भी हैरान था। उसने किसान से पूछा, ‘‘यह चमत्कार कैसे हुआ ?’’


किसान ने कहा, ‘‘बस, मिट्टी से प्यार किया।’’
‘‘क्या मतलब ?’’


  किसान ने जवाब दिया, ‘‘इस जमीन की मिट्टी पथरीली और खर-पतवार से भरी थी। उसे मैंने साफ किया। हल्का पानी देकर मिट्टी मुलायम की। इस तरह मैंने जमीन को जीवंत बनाया। फिर क्या था। बीज बोए और जमीन की निरंतर सेवा की। आखिर लहलहाती फसल आ गई।’’


उस व्यक्ति ने एक सवाल किया, ‘‘इस घटना का निष्कर्ष क्या है ?’’
किसान ने कहा, ‘‘बाहरी चीजों का कोई लाभ नहीं होता। पहले हमारे संस्कार सुधरने चाहिए।’’

                                                  -ज्ञानदेव मुकेश                     

                                        पता-
                                             
                                                 फ्लैट संख्या-301,
                                                    साईं हॉरमनी अपार्टमेन्ट,
                                                    अल्पना मार्केट के पास,
                                                    बोरिंग-पाटलिपुत्र रोड,
                                                    पटना-800013(बिहार)

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