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संस्मरण - हमने भी सुनी अपनी तारीफ़ - डॉ. प्रणव भारती

 

देखा जाय तो पूरी उम्र ही तो एक संस्मरण है ,आज की बात पुरानी हुई और वो घटना अगले दिन एक संस्मरण में तब्दील हो गई | यानी आप चाहें तो हर रोज़ ही न जाने कितने संस्मरण कलमबध्द कर सकते हैं | पर ऐसा होता कहाँ है जनाब ,उम्र के इस दौर में जो बात अभी दिलोदिमाग़ को परेशान करके आपके दिल को चीर रही होती है ,वही अगले पल न जाने कहाँ तिरोहित हो जाती है और हम सिर पर हाथ धरकर बैठ जाते हैं आख़िर हम सोच तो रहे थे कुछ अभी,कहाँ गायब हो गया ?

सत्तर की उम्र के इस नाज़ुक दौर में अगर कोई हमसे बहुत मुहब्बत से बात करता है ,हमारी पर्सनैलिटी की तारीफ़ करता है ,हमें चने के झाड़ पर चढ़ा भी देता है तो हम इतना तो समझ ही सकते हैं कि भाई ! अब हमसे कोई क्या उम्मीद रख सकता है सिवाय इसके कि हम उसे पुचकारकर कहें कि बेटा ! अनुभव बटोर लो हमसे और सीख सको तो सीख लो ,बहुत घिसा है ज़िंदगी ने हमें | जबकि हम भली प्रकार परिचित हैं कि बंदा हमारी तारीफ़ों के इतने पुल बाँध रहा है तो उसमें कहीं न कहीं तो कुछ गड़बड़ है ! हाँ,यह बात तो है कि ज़रूरी नहीं कि जो हम सोच रहे हों ,वह शत-प्रतिशत सही ही हो ,भाई हो भी सकता है कोई शरीफ़ बच्चा हमसे सच में ही प्रभावित हो |सोचने में क्या जाता है ? मन स्फ़ूर्ति से भर उठता है और हम अपने आपको उस युवा-वर्ग की पंक्ति में ला खड़ा करते हैं जो सामने 'जी' और पीठ पीछे 'न जी ' के हिंडोले में झूलती हुई चिढ़ाती, मुस्कुराती रहती है | वैसे तो ये कहने की बातें हैं,सोचने भर की --एक बार दिमाग़ में ठुस्स होना चाहिए --बस !

गलती तो अपनी ही होती है जिसने भी भेजी फ्रैंड रिक्वेस्ट,हम हो गए उसी से अटैच्ड  ! बना लिया उसे अपना दोस्त | न--न ,वैसे अपनी ही बात काटकर बता दूँ,मैं आसानी से फ़्रैंड रिक्वेस्ट नहीं स्वीकारती , बहुत ठोकर खाने के बाद सीखी हूँ | फिर भी कभी-कभी बहक तो जाती ही हूँ,अब आप सबसे छिपाने से फ़ायदा भी क्या? लेकिन---उस बंदे की 'फ़्रैंड लिस्ट' देखती हूँ,उसकी पढ़ाई-शढाई भी देख लेती हूँ और फिर 'ओ.के' कर देती हूँ| अब इस उम्र में सौ नख़रे दिखाना भी तो ' सौ मन की धोबन ' के नख़रे सा लगता है वो भी बूढ़ी धोबन !अब इतना बोझ ढोकर भी क्या करना ,शरीर का तो होता नहीं ,मन का बोझ तो हल्का किया ही जा सकता है , शरीर का बोझ वैसे भी कहाँ फूल सा है !पता नहीं ,कैसे लोग गिरती उम्र में निचुड़ से जाते हैं ,खाल भर रह जाती है कंकाल पर ,यहाँ तो वज़न बढ़ने का कॉम्पिटिशन ही लगा रहता है हरदम--जी,अपने से ही ! पिछले साल कैसे थे और अब कैसे ?  चलो ,पर खुश होने के लिए कुछ तो चाहिए न बंदे को !आख़िर ज़िंदगी के बचे-खुचे दिन भी तो गुज़ारने हैं ,वो भी हँसते-हँसते ,नहीं तो बाल-गोपाल ---आप सब समझते हैं ,अपनी कलम को अब क्या कष्ट दूँ !

लगभग तीन साल पहले किसी मित्र ने मुझे 'twoo' में जोड़ दिया | तब तक इस आधुनिक तहज़ीब के नाम पर शून्य ही थी ,नया -नया शौक चर्राया था फेसबुक का ,वो भी बच्चों ने ऍफ़.बी खोल दिया नहीं तो भला मुझे कहाँ आता था कुछ भी पर जब खुल गया तो उत्सुकता बढ़ती ही गई  | आप अपने बारे में जो कुछ डालें न डालें पर आपकी ख्याति ये फेस बुक फैला ही देती है | कसम से ,मुझे पता ही नहीं चला कैसे मेरा सारा कच्चा चिठ्ठा उस 'ऐप' में पहुँच गया | मज़े की बात मैं यही सोच सोचकर खुश होती रही कि मेरे प्रोफ़ाइल पर इतने लोग गए ,कितनी प्रशंसा के पुल बंध रहे हैं मेरे ! अरे भई ! दिल बल्लियों उछलने लगता था ,दो-चार का उत्तर भी दे डाला पर पढ़ तो अक्सर सभी लेती | अपनी तारीफ़ पढ़कर आनंद के समुद्र में गोते लगाने लगती | फिर एक मित्र को बताया ,वो डाँट खाई कि पसीने छूट गए पर अब तो मेरा मेल  'नोटिफिकेशन' से इतना भरने लगा कि पीछा छुड़ाना मुश्किल !

मित्र की झाड़ खाकर उत्तर देने बंद किए पर खोलकर देखने का मोह ! रोक ही न पाऊँ खुद को अरे! अपनी तारीफ़ पढ़ने में हर्ज़ भी क्या था और उसमें भी कोई मेरी ही उम्र के लोग थोड़े ही थे ,अट्ठारह-बीस साल से लेकर अस्सी साल तक के लोग मित्र बने पड़े थे | अब चुपके से उनके सुविचार पढ़ती ,कोई मिलने बुलाता ,कोई कहता एक कप कॉफ़ी तो पी ही सकती हैं | पर मैं शांत,स्निग्ध मन से पढ़ती तो सब ,किसीकी बात का उत्तर न देती | फिर एक दिन ऐसे ही अपनी प्रशंसा देखने की आकांक्षा में 'टू ' पर गई तो - चार लोगों की शिकायत पढ़ने को मिली क-' अगर आपको जवाब नहीं देने होते तो आप साइट पर जाती ही क्यों हैं?'

अभी तक तो पता नहीं था कि सामने वाले लोगों को इस बात का पता चल जाता है कि हम साइट खोलकर पढ़ लेते हैं | जब यह पता चला तो घबराहट भी हुई और कुछ थोड़े से लज्जा से लाल भी हुए  | कुछ लोग वाक़ई अच्छे थे पर अधिकतर उस साईट पर टाइम पास करते हुए ही लोग मिले | जो कुछ अपने मानसिक स्तर के लगे ,उनसे कुछ दोस्ती भी हुई और उनमें से एक ने मेरी कविताओं को अंग्रेज़ी में अनुदित भी किया | यह सब अब मेल से हो रहा था | एक युवा भी मिला जिसने अपने बच्चे के लिए कविताओं की मांग की,बड़ी खुशी हुई और उसे कविताएं भेज दीं | घबराहट यह थी कि वह ऑफ़िस पहुँचते ही गुड़ मॉर्निंग करता ,मैं मेल पर कुछ लिख रही होती तो वह बात करने के मूड में होता | मुझे उससे कहना ही पड़ा कि बेटा ! इस तरह से तो मैं कुछ काम ही नहीं कर पाऊँगी , मैं तो अपना सारा लेखन मेल पर ही करती थी | वह कुछ रुष्ट सा हो गया | फिर मैंने उसे समझाया और उससे सहायता की मांग की किसी भी प्रकार मुझे इस साइट से निकलवा दे ,उसने फोन पर मुझे न जाने कैसे-कैसे करके उस साइट के महाराक्षस से मुक्त करवाया और कहा कि कम से कम छह माह तो इस साइट को गलती से भी न खोल देना | पर न जाने उसने मुझसे कितनी बार पूछ लिया कि मैं वास्तव में ही निकलना चाहती हूँ न ? इतनी बार पूछा कि खीजने लगी पर उसमें से निकलना था और घर में किसीसे पूछती तो डाँट खाने के अलावा कुछ होने वाला नहीं था,दोस्तों से पहले ही डाँट खा चुकी थी  | ख़ैर ,किसी न किसी तरह उस पंजे से बाहर निकली और खुली हवा में साँस ली,कान पकड़कर उठक-बैठक ,नहीं--फिर झूठ बोलने लगी ,उठक-बैठक तो कर ही नहीं सकती थी ,हाँ! कान ज़रूर उमेठे कि भई अब किसी ऐसी प्रशंसा के लालच में नहीं पड़ूँगी |

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