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शिक्षा की समीक्षा (एकांकी ) सुशील शर्मा

शिक्षा की समीक्षा

(एकांकी )


सुशील कुमार शर्मा

सुशील शर्मा

पात्र -(शिक्षक, सरपंच ,पत्रकार ,बुद्धिजीवी )


शिक्षक -शिक्षक से आखिर चाहते क्या हैं ? ... पढाये ? ... पढ़ाने देते ही

कब हैं ? ... कर्मठ शिक्षक /शिक्षिकाएं काम के बोझ में पिस रहे हैं।

सरपंच -प्रायः स्कूल ही न जाने वाले अध्यापक /अध्यापिकाओं की लम्बी फेहरिस्त है जो बिना कुछ ख़ास काम किये तनख्वाह ले रहें हैं ।

पत्रकार -सही है नेता जी ये बहुत हरामखोरी करते हैं।

शिक्षक -माफ़ी चाहूंगा सभी शिक्षक ऐसे नहीं हैं जैसा आप कह रहें हैं।

बुद्धिजीवी -सही है मास्टर जी मैं आप से सहमत हूँ।

सरपंच -फिर सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या लगातार क्यों घट रही है ?

शिक्षक -इसके लिए सभी दोषी हैं।


पत्रकार -सभी मतलब ?

शिक्षक -सरपंच जी आपके सभी बच्चे कहाँ पढ़ रहें हैं।

सरपंच -शहर में क्योंकि प्राइवेट स्कूलों में अच्छी पढाई होती है।

शिक्षक -यही तो विडंबना है कि आप लोगों को हम पर विश्वास नहीं हैं।

पत्रकार -इसमें विडंबना नहीं सच्चाई है अधिकांश शिक्षक खूब मोटी तनख्वाह लेकर ऐश कर रहें हैं धेले भर का पढ़ते नहीं हैं।

बुद्धिजीवी -बेचारे शिक्षक भी क्या करें ,विशुद्ध अध्यापन की आकांक्षा वाले अध्यापक /अध्यापिका क्या करें ? ... सरकारी योजनाओं में शिक्षणेतर कार्यों की लम्बी फेहरिश्त है ... मसलन जन गणना, भवन गणना ,आर्थिक गणना ,स्वास्थ परिक्षण, हाउस होल्ड सर्वे (बाल गणना),वोटर लिस्ट पुनरीक्षण(BLO) ,पशु गणना ,आधार कार्ड कैंप, पिछड़ी जाति गणना , छात्र वृत्ति का खाता खुलवाने की ड्यूटी , पल्स पोलियो की ड्यूटी ,भवन निर्माण,निर्वाचन में ड्यूटी ये विद्यालय से इतर है और मिड डे मील ,गैस सिलेंडर मंगाने की जिम्मेदारी,ड्रेस वितरण (बिना बजट आये दूकान वालों से उधार मांग कर कपडे बितरणका आदेश),रंगाई पुताई ,फर्नीचर क्रय ,पुस्तक वितरण व् उक्त के अभिलेख सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी।

शिक्षक -धन्यवाद जी आपने सही बात कह दी।

सरपंच- तो भैया इसमें क्या है पैसे तो मिलते हैं इन कामों के कम से कम पचास हज़ार सेलरी है।

शिक्षक -सेलरी तो है लेकिन समय कहाँ जो हम बच्चों को पढ़ाएं।

पत्रकार -अगले पाँच साल में सारे सरकारी स्कूल बंद हो जायेंगे अगर यही रवैया रहा तो।

शिक्षक -गाँव के स्कूल बच्चों को मनरेगा का मजदूर ढालने के कारखाने हो चुके हैं । ...सामान शिक्षा का नारा आज भी मुंह बाए खड़ा है ।

बुद्धिजीवी -दूर देहात गाँव के स्कूलों में पढ़ाई होती ही कब है ?...मां बाप बच्चों को पढने के लिए गंभीर नहीं हैं ...मास्टर प्रायः अनुपस्थित रहते हैं।

पत्रकार -इन पर नियंत्रण कौन करे ?

सरपंच -हम करेंगें।

बुद्धिजीवी -.कामचोरी के बदले घूस देते अध्यापक ...स्कूल की जर्जर इमारत में बाजीफे के पैसों से दारू पीते ग्राम प्रधान और समान चरित्र वाले अध्यापक कैसा राष्ट्र निर्माण करेंगे ?

शिक्षक -सरपंच महोदय आपको तो पता है मैं समय पर स्कूल आता हूँ और जाता हूँ।

सरपंच -आप अपवाद हैं आप जैसे शिक्षक बहुत कम हैं।

पत्रकार -इसमें शासन ,समाज और तंत्र दोषी है ग्रामीण स्कूलों की इमारतें ऐसी हैं जैसे शिक्षा विभाग के अधिकारियों के चरित्र की इबारतें ...ग्रामीण स्कूलों की इमारत उतनी ही जर्जर और घटिया हैं कि जितना शिक्षा विभाग के प्रायः अधिकारियों का चरित्र।

सरपंच -इसलिए तो सरकार ने RTE लागू की है ताकि गरीब के बच्चों को अच्छी शिक्षा मिले।

शिक्षक -सरपंच जी RTE के अंतर्गत जिन बच्चों का दाखिला प्राइवेट स्कूलों में हुआ है उन बच्चों की मानसिक दशा बहुत ख़राब है। बेचारे ही भावनाओं से ग्रसित होकर स्कूल नहीं जाते हैं और फ़ैल होने पर स्कूल से निकल दिए जाते हैं।

पत्रकार -इसका कोई सर्वे तो आया नहीं।

शिक्षक -सर्वे करना आप लोगों का काम है।

सरपंच -फिर भी पढाई तो प्राइवेट स्कूल में ही अच्छी होती है।


शिक्षक-पिछले पांच वर्षों में सरकारी स्कूलों का परीक्षा परिणाम प्राइवेट स्कूलों से बेहतर रहा है।

बुद्धिजीवी -काश हम शिक्षक को शिक्षक ही रहने देते कर्मचारी न बनाते।

सरपंच -आओ हम सभी संकल्प करें कि शिक्षा को जन जन तक पहुंचाएंगे।

(नेपथ्य में स्कूल चलें हम का रिकार्ड बजता है )

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