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लघुकथा - फूलों वाली रोटी -डॉ. मधुलिका बेन पटेल

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फूलों वाली रोटी

सिरिया और उसका छोटा बच्चा भूख से बिलबिला रहे थे. बांस की झोपड़ी में आज कुछ न था खाने के लिए. उनके हड्डियों के ढांचें पर कपड़े न के बराबर थे. मुंह सूखने के कारण आँखें बाहर आ गयी थी. अँधेरें में अचानक अगर वे सामने आ जाते तो मासूम और नाजुक लोगों को भूत का भरम हो जाता. आज अनपढ़ सिरिया को राजा के जलसे की खबर मिली थी. रात से लोटा भर–भर कर पानी डकारने के बाद भी उसकी आँतों में ठंडक न पहुंची थी. बदले में वे और भी आग उगल रही थी. ‘सुना है कि दुनियां का शायद ही कोई हिस्सा बचा हो जहाँ राजा जी के पांव न पड़ें हों.’ यही विचार उसके मन में बार–बार आ रहा था. कल राजा अपने ही क्षेत्र में बिजली की चमक लेकर उतरने वाले थे. भोरे – भोरे बच्चे का हाथ थामे सिरिया निकल गया. आखिर राजा जी से अपनी दो जून की रोटी जो मांगनी थी. तय जगह और तय समय पर राजा की सवारी निकली. राजा पर स्वर्ग से पुष्प वर्षा हो रही थी. सारा वातावरण गमगमा रहा था. गमक ऐसी कि अगल-बगल की बजकती नालियां भी शर्म से धरती में गड़ी पड़ी थी.

भीड़ में सिरिया का बच्चा कुचलते-कुचलते बचा. सिरिया ‘राजा जी रोटी’ ‘राजा जी रोटी’ चिल्ला रहा था. राजा काले सूट वाले लोगों से घिरे श्वेत वस्त्रों में, उच्च आसन पर स्मित मुख विराजमान थे. सिरिया देखता और राजा की सवारी की ओर लपकता. सवारी मृदु-मंद-मंद-मंथर’ गति से आगे बढ़ती जा रही थी. सिरिया को लोग धकियाते फिर भी वह दम न छोड़ता. लपकते हुए आखिर वह रस्सी के उस छोर तक आ ही गया जहाँ से जन समूह की सीमा तय की गयी थी. रस्सी के पार कोई न जा सकता था पर रोटी की तपिश ने सिरिया को उस पार ठेल ही दिया. अचानक उसने महसूस किया कि दो वर्दीधारी कड़क बाँहों ने उसे जकड़ लिया है. घिसटते हुए उसके हाथों से बच्चे का हाथ छूट गया. चहरे पर तमाम घूंसों को झेलता वह किनारे पर ले जा कर अपनी कंकाल हो चुकी पीठ पर ‘सट्टासट सट्टासट’ मार का अनुभव किया. उसकी चमड़ी फट गयी थी पर कोई लहू की छलक दिखाई न दे रही थी.

आखिर उसकी चुरमुराई चमड़ी के पीछे लहू होता तो न छलकता. सिरिया अधमरा सा वहीं पड़ गया. घड़ी भर बाद चेतना आने के बाद उसने देखा कि राजा की सवारी गुजर चुकी थी. भीड़ तितर-बितर हो चुकी थी. रास्ते पर पड़े पुष्प कुचले जा चुके थे. वहां धूल में बैठा उसका बच्चा कुचली पंखुरियों को भकोस रहा था. सिरिया की आँखों के आंसू जम गये थे जैसे उसकी देह का लहू जम गया था ठीक वैसे ही. अपने बापू को अबूझ नज़रों से स्वयं को देखते हुए देख बच्चे ने कहा –‘बापू, तुमने तो बताया था कि राना परताप घास की रोटी खाते थे देखो तुम्हारा राजा फूलों की रोटी खा रहा है.’ ...सुनकर सिरिया की बंजर आँखों में खारा समुन्दर उमड़ आया. जमीन पर धम से बैठ वह सांसे रोक हिचकियाँ लेने लगा.

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-डॉ. मधुलिका बेन पटेल

सहायक प्राध्यापक

हिन्दी विभाग

तमिलनाडु केन्द्रीय विश्वविद्यालय, तिरुवारूर

ben.madhulika@gmail.com

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