नाका - विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका. 

विविध विधाओं में से चुनकर पढ़ें -

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---

यहाँ की विशाल ऑनलाइन लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोज कर पढ़ें -

 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com  रचनाकार के वाट्सएप्प नंबर 8989162192 (कृपया कॉल नहीं करें, कॉल रिसीव नहीं होगी, तथा इसका उपयोग केवल प्रकाशनार्थ रचना भेजने के लिए ही करें) पर भी वाट्सएप्प से रचनाएँ अथवा रचना पाठ के वीडियो प्रकाशनार्थ भेजे जा सकते हैं. अधिक जानकारी के लिए यह पृष्ठ [लिंक] देखें.

--

चंद्रभान सिंह मौर्य की कविताएँ

image

बैल राज की कथा

एक समय में बैल राज का
कथा बहुत गौरवशाली था
हर कोई उनको पूजे
और उनका है श्रृंगार करें
खुरों से धरती की माटी मथ
सबका है उद्धार किया,
हल-नागर को खींचकर
धरती का उदर पसीजकर
अन्न का सौगात दिया
सबका है उद्धार किया,
सोचो अगर ना होते बैल राज
दाने-दाने को हम होते मोहताज।
पर देखो दस्तूर समय का
भूल गए हम बैल राज को
जिसने हमें है अन्न दिया
हमने उनको क्या दिया?
करवट समय का बदलते ही
भूल गए हम बैल राज को
छोड़ दिया गुमनाम रास्तों पर,
लड़ा दिया धर्म के नाम पर,
भिड़ा दिया प्रतिस्पर्धा के खेल में,
रंग दिया राजनीति के रंग से,
कितने बदल गए हैं हम
क्या यही है मानव धर्म?


गंध

गंध है हर जगह
कहीं अधिक
कहीं कम पर
गंध है सब जगह
आते जाते वक्त
परेशान करती है
आखिर क्यों?
उस गंध से
इतनी तकलीफ है,
किसी के लिए वही घर है
उसी में सुबह और शाम
पूरी दुनिया गंध से
भरी पड़ी है
किसी के लिए सुगंध है
किसी और के लिए दुर्गंध
सुबह होती है
उसी एहसास से
भले हर वक्त
जीने में गंध महसूस हो
हर नया आदमी
उस गंध से जुड़ा है
"सबकी गंध एक है"
आखिर कौन सी
वह गंध है?
माटी की गंध;
मानवता की गंध;
मनुष्यता की गंध;
जिसमें एक
जिजीविषा है
एक तड़प है
फूल बनकर
गंध देने की।।


चंद्रभान "भानु"


नागार्जुन
साधारण से प्रतिरूप में
असाधारण व्यक्तित्व लिए हुए
  हमारे बाबा नागार्जुन
जिन्हें देख कर कोई
सोच में पड़ जाए
इतनी खुरदरी और नुकीली
लेखनी है किसकी
  उनकी विचार धारा

बिल्कुल जनमानस के

ह्रदय कंठ से उमड़कर

फैल जाती है दूर-दूर तक
ऐसे थे हमारे बाबा।
बाबा को बहुत भाता
  जब कोई उन्हें बाबा
था कह कर पुकारता
  यह थी उनके बड़प्पन
की पहचान
  बहुत भाता था

72 चूल्हे का स्वाद

यायावर जिंदगी की कथा रही
जीवन से जिया और फिर

उसी को लिखकर विस्तार दिया
एक ऐसे यात्री की कथा
जो हर किसी को बार-बार जानने
को लालायित और मजबूर करदे
  उनका समय काफी डामाडोल

उतार-चढ़ाव भरा रहा पर
बाबा जूझते रहे संघर्ष करते रहे
बहुत कुछ अपने समय से 
और कुछ स्वयं से जूझते रहे
नए गगन के सूर्य को अपनी
आभा से आलोकित करते रहे
शासन की बंदूक से लड़ते रहे
मास्टर के दुख से जूझते रहे
अकाल की अकड़न से समझौते करते रहे
जीवन से पर हार नहीं माना अपने समय से
  कुछ ऐसे थे हमारे प्रगतिशील जन बाबा।।

सब अपने

अनुभव करता हूं मैं
यह खेत-खलिहान सब
हमारी वास्तविक जमीन है
जिसमें हमने स्वयं को खपाया है
जिस मिट्टी में स्वयं को साना है
कई जन्मों से हम इसमें गूंथे हैं
कई सूत्रों से हम इससे जुड़े हैं
इन चित्रों में तुम भी हो
इस समस्त गगन-अंबर में
वास है तुम्हारा
इन खेतों की हरियाली में
हिरण की भांति उछल- कूद रहे हैं

हम इस खेत की भूमि से हटकर
  खुद से उचट जायेंगे हम
हमें जीना है घास की ढेरों में
हमें खेलना है उन पशुओं के पगहे से

हमें खोजना है स्वयं की जमीन को

जिसके बिना अस्तित्व नहीं किसी का

हम बीज हैं इस जमीन के
अंकुरित होने का प्रयास कर रहे
ताकि फल-फूल सके,
छांव दे सके,
शीतलता दे सकें
यही तो ध्येय है जीवन का।

पहले और अब
कितना बदल गया है जमाना
पहले आने पहले पाने की अंधी दौड़ में

बहुत आगे होकर भी क्यों

लगता है कहीं छूटते जा रहे हैं

पीछे स्वयं से
भूल गए हैं रिश्तो के मर्म को
संवेदनाएं कुंठित होने लगी है
अब वह पुराना वाला लगाव

देखने को आँखें तरस जाती है
दादी ठीक ही कहती है
पहले तो ऐसा होता था
हमारे समय में तो ऐसे होता था
और अब सब घालमेल है
  सब मिलावट है सब दिखावटी

और बनावटी है
आखिर क्यों ? यह सवाल है

खुद से कैसे सब कुछ इतना

तेजी से बदल गया
  पहले सी सुबह अब कहां गई
पहले सा  निर्मल जल

किधर चला गया

पहले सी शीतल ठंडी हवाएं

कहां खो गयी
क्यों इतना प्रचंड आग उगल रहे हैं हम?

आखिर क्यों हमारी संवेदनाएं

अपने अतीत से सबक नहीं लेती

संतोष ,त्याग ,परोपकार

इन शब्दों का असर

आज क्यों नहीं दिख रहा
क्या इतना बेअसर बेरहम हो गए हैं हम

आओ बूढ़ी दादी की

गूढ़ बातें पर थोड़ा ठहर कर

सोचने का प्रयास करते हैं
  पहले पहले सी कहानियां कहां खो गई
पहले सी लो रिया कहां सो गए
अब बहुत तेज चलने लगे हैं हम
आगे ही आगे निकलने लगे हैं हम
कहीं भीड़ के कुंभ में बिछड़ने लगे हैं हम
अब स्वयं से दूर निकलने लगे है हम।

आओ बैठकर विचार कर ले हम
कहीं समय निकल ना जाए और
तब सोचते ही सोचते रह जाएंगे हम।


संसाधन के नैतिकमूल्य
हम बदल रहे हैं
हमें चिंता नहीं है
हम भूल गए हैं
हमें याद नहीं है
अब याद करना होगा
सबको दिलाना होगा
याद कि हम बहुत दोहन
कर रहे हैं धरती की
अमूल्य निधियों का
जिनका अस्तित्व हमारी
वजह से संकट की ओर
बढ़े जा रहा हमारी जरूरत
चाहत बनती जा रही
जिसका बदला चुका रही
प्रकृति का सौंदर्य,
यह संसाधन, सोखने का
हक हमें किसने दिया
आखिर कौन है? वह
जो इसके प्रति नैतिक हो
संवेदनशील हो और सबको
मंथन करने की ओर अग्रसर करें
यह धरती करोड़ों वर्षों की
संघर्ष का प्रतिरूप है
जिसकी कोख में
अपार निधियां समाहित है
जिसे सभी को एक
नैतिक दृष्टिकोण से देखने
समझने की जरूरत है
आखिर इतिहास गवाह है
संसाधन के महत्त्व का
यह सबकी जिम्मेदारी है
हम धरती को फलित
और पोषित करके
समृद्ध बनाएं चलो
संसाधन की जरूरत को
जरूरत ही समझें
चाहत ना बनाएं।

"भानु "

चिड़िया की आंखें
  देखी है नजदीक से
  चिड़िया की आंखें
रंग बिरंगी प्यारी-प्यारी
  चिड़िया की आंखें
किसी की बड़ी
किसी की छोटी
किसी की गोल
बिंदी सी सुरमई आंखें
देखी है नजदीक से
  टिकुली सी आंखें
देखत है टुकुर टुकुर
कभी इधर तो कभी उधर
  फुर फुर करके
तैरती है आकाश में
डुबकिया लगाती आकाश में
गोते लगाती आकाश  जल में
आंगन में आती
हमें नई सुबह की
आगाज सुनाती
  देखी है नजदीक से
चिड़िया की आंखें।।


छत्तीसगढ़ में
अभी शुरू हुआ था
एक नए प्रवास का सफर
बहुत प्रफुल्लित था मन
एक नई जमीन पर जमने को
शुरुआत कुछ कठिन सी रही
थोड़ा समय लगा वहां की
आबो हवा को महसूस करने में
समय बीतता गया ,
दिन गुजरते गए 
भाने लगी छत्तीसगढ़ की धरती
रास आने लगे  वहां के लोग
सुकून मिलने लगा सांस लेकर
मन की चिंताएं दूर होने लगी
सोचने का समय अब शुरू होता है
कुछ बेहतर करने का दौर
अब शुरू होता है
कुछ नवाचार प्रयोग कर दिखाने का दौर
अब शुरू होता है
बच्चे मन के सच्चे
खेलने लगे थे मुझमें
और मैं उन सब में
प्यार सा हो गया
कविताओं की महक से
नित कुछ लिखने की जिज्ञासा
सोने नहीं देती
सोचता हूं सोए तो कुछ लिखकर
जागता हूं रातों को
रात के सच की गहराई में उतर कर
कुछ सवालों के जवाब ढूंढता हूं
न जाने कब मिलेगी मंजिल
न जाने कब आएगा वह दौर
जब मेरी यात्रा पूरी तरह सार्थक होगी
मुझे बहुत रास आ रहा है प्रवास
दक्षिण कोसल का
मुझे रास आ रहा है प्रवास
छत्तीसगढ़ का।


परिचय- चंद्रभान सिंह मौर्य का साहित्यिक उपनाम "भानु" है| 18 सितंबर 1994 को वाराणसी (उत्तर प्रदेश) में जन्मे है| वर्तमान में छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले के कुरुद ब्लाक में रहते हैं | जबकि स्थाई पता - दीनदयालपुर जिला वाराणसी है | आपको हिन्दी, भोजपुरी, संस्कृत, अँग्रेजी, छत्तीसगढ़ी, सहित अवधी, ब्रज, खड़ी बोली, भाषा का ज्ञान है| उत्तर प्रदेश से नाता रखने वाले चंद्रभान की पूर्व शिक्षा- बी. ए.( हिन्दी प्रतिष्ठा ) और एम. ए. ( हिन्दी ) है| वर्तमान में अजीम प्रेमजी फाउंडेशन (छत्तीसगढ़) में एसोसिएट के पद पर कार्यरत है| सामाजिक गतिविधि में शिक्षा में नवाचार, बाल साहित्य और छत्तीसगढ़ी स्थानीय शब्दकोश को लेकर क्रियाशील है| लेखन विधा में कविता, कहानी, नाटक, शिक्षा और सामाजिक सरोकार से जुड़े लेख और पुस्तक समीक्षा तथा स्वतंत्र समीक्षा करते है| आपकी विशेष उपलब्धि शिक्षक प्रशिक्षक और समाज सेवक के रूप में है| आपकी लेखनी का उद्देश्य साहित्य के विकास को आगे बढ़ाने के साथ - साथ शिक्षा के क्षेत्र में किए जा रहे नवाचार व प्रयोग तथा सामाजिक समस्याओं से सभी को रूबरू कराना है| आपके पसंदीदा हिन्दी लेखक- नागार्जुन, निराला, प्रेमचंद, दुष्यंत कुमार और रामधारी सिंह दिनकर है| आपके लिए प्रेरणा पुंज- नागार्जुन है| अपने राष्ट्र और हिन्दी भाषा के प्रति मेरे विचार- "हिन्दी नहीं है केवल एक भाषा, यह तो है बड़े सपने की भाषा, हिन्दी ही वह द्वार है जो अभिव्यक्ति के खतरों को उठाने से पीछे नहीं हटती||


चंद्रभान सिंह मौर्य

एसोसिएट, अजीम प्रेमजी फाउंडेशन

0 टिप्पणियाँ

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.